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ध्रुवस्वामिनी@2009 : समय के बैरियर को तोड़ता नाटक

16 October 2009 15 Comments

♦ दिलीप मंडल

♦ निर्देशक : मृत्युंजय प्रभाकर ♦ म्युजिक : सतीश मुख्तलिफ ♦ बैकग्राउंड म्युजिक : अनिल मिश्र ♦ ढोलक : जितेंद्र यादव ♦ कॉस्ट्युम/कार्ड : रिकिमी मधुकल्या ♦ लाइट/सेट : प्रवीण गुंजन
सहर नाट्य ग्रुप की प्रस्तुति

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लगभग 1600 साल पुरानी इतिहास कथा। इसका नाट्यरूपांतरण लगभग 80 साल पहले जयशंकर प्रसाद ने किया। नाटक है ध्रुवस्वामिनी। निर्देशक मृत्युंजय प्रभाकर 2009 में जब ऐसी कथा को मंचन के लिए चुनते हैं तो पहली बार में आश्चर्य करने का कारण बनता है। ऐसे ही सवालों और शंकाओं को लेकर कई लोग 12 अक्टूबर को दिल्ली के श्रीराम सेंटर के ऑडिटोरियम में पहुंचे होंगे। पीरियड नाटकों का मंचन ऐसे तो बेहद सामान्य बात है लेकिन मृत्युंजय प्रभाकर अब तक नाटकों से लेकर लेखन में जिस चेतना का परिचय देते रहे हैं, वैसे में ऐसे सवाल का उठना चौंकाता नहीं है।

मृत्युंजय प्रभाकर का ध्रुवस्वामिनी का पाठ एक पुराने नाटक का घिसापिटा पाठ नहीं है, इसकी झलक नाटक की शुरुआत में ही मिल जाती है। मृत्युंजय की ध्रुवस्वामिनी एक साथ चौथी शताब्दी और आधुनिक युग में विद्यमान है। एक ही साथ एक ही सेट पर। दोनों चरित्र कब अलग अलग होते हैं और कब एक का विलोप दूसरे में हो जाता है, ये देखना बेहद रोचक है। मृत्युंजय इस प्रयोग के माध्यम से मंच पर एक चमत्कार की सृष्टि करते हैं। रामगुप्त की पटरानी ध्रुवस्वामिनी जब अपने अस्तित्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए जूझ रही होती है तो 2009 की ध्रुवस्वामिनी भी उसी मंच पर लगभग ऐसे ही सवालों से लड़ती पैर पटकती, बगावती तेवर दिखाती नजर आती है। 2009 की ध्रुवस्वामिनी की काली चुन्नी कभी उसकी हाथों की हथकड़ी है तो कभी गले का फंदा और इतिहास से लेकर वर्तमान तक में वो इन बंधनों को तोड़ती/तोड़ने की कोशिश करती नजर आती है।

जयशंकर प्रसाद ने अन्यत्र “स्वयंप्रभा समुज्ज्वला/ स्वतंत्रता पुकारती” के संघर्ष का उद्घोष किया है। ध्रुवस्वामिनी में भी विदेशी आक्रांता से संघर्ष की कहानी है। वहीं नाटककार मृत्युंजय प्रभाकर 2009 में जब ध्रुवस्वामिनी का आधुनिक पाठ कर रहे होते हैं तो इस संघर्ष के मायने बदल जाते हैं। ये संघर्ष साम्राज्यवाद विरोधी विश्वव्यापी महासंघर्ष के एक अंश के रूप में मंच पर साकार होता है। यहां गुप्त वंश के सम्राट रामगुप्त उस राज्यव्यवस्था के प्रतीक के रूप में पेश किए जाते हैं जो साम्राज्यवादी ताकतों के सामने बिना लड़े घुटने टेक देता है। चौथी शताब्दी का आक्रमणकारी शकराज वर्तमान युग की साम्राज्यवादी ताकतें हैं, जो सिर्फ राज्य को जीतकर संतुष्ट नहीं है, वो राष्ट्र के गौरव का भी क्षय चाहता है। ध्रुवस्वामिनी और कुमार चंद्रगुप्त इस नाटक में प्रतिरोध की वर्तमान ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

कॉस्ट्यूम में भी मृत्युंजय प्रभाकर नए और पुराने को मिक्समैच करते हैं। एक पात्र चौथी शताब्दी के परिधान में है तो अचानक दूसरा पात्र मॉडर्न ड्रेस में आ जाता है। शकराज आधुनिक सैनिक वर्दी में है तो उसकी पत्नी वेस्टर्न गाउन पहनकर मंच पर आती है। इस तरह से निर्देशक कालखंड के बैरियर को बार-बार लगातार तोड़ते हैं। दर्शकों को लगातार वो इस बात का एहसास दिलाते हैं वो एक ऐतिहासिक नाटक देख रहे हैं लेकिन इसका पाठ बिल्कुल आधुनिक हैं। इस तरह के प्रयोग के जरिए मृत्युंजय प्रभाकर दर्शकों को पैसिव होने से रोकते हैं। यही इस नाटक के मंचन की सबसे खास बात है।

सामाजिक संदर्भों की बात करें तो जयशंकर प्रसाद ने इस नाटक में रामगुप्त की विधवा ध्रुवस्वामिनी की दोबारा शादी के प्रसंग को काफी महत्व दिया है। जिस काल में ये नाटक लिखा गया, उस समय के हिंदू समाज के लिए ये सहज बात नहीं थी। इसलिए उन्होंने धर्म के माध्यम से इस विवाह का सत्यापित कराया है। मृत्युंजय 2009 में इस नाटक को करते हुए इस पूरे प्रसंग में धर्म और पुजारियों के महत्व को कम करके दिखाते हैं। ये नाटककार की विशिष्ट समाज-दृष्टि है। मृत्युंजय की ध्रुवस्वामिनी धर्म के प्रतीकों की धज्जियां उड़ाती है और राजपुरोहित को लगभग मंच से निकाल बाहर करती है। इस तरह मॉडर्निटी का जयघोष भी इस नाटक में नजर आता है।

नाटक के मंचन में सेट में सादगी है, और ये पात्रों और घटनाओं के प्रवाह में कहीं बाधक नहीं बनता है। इस सेट में कई लेयर्स हैं जो कभी पात्रों की हायरार्की को चिन्हित करता है तो कभी महत्व के हिसाब से उनके उत्थान और पतन को दिखाता है। इतने जटिल नाटक में सेट की निरंतरता घटनाओं के तारतम्य को बाधित होने से बचाती है। लाइटिंग इस नायक का मजबूत पक्ष है और इसमें भी आडंबर न्यूनतम है। लाइटिंग में रंगों के प्रयोग में विविधता है और कुछ भी थोपा हुआ नहीं लगता।

इस नाटक में 19 पात्र हैं और कई पात्र एकाधिक भूमिकाओं में हैं। ज्यादातर अभिनेताओं के लिए ये पहली मंचीय प्रस्तुति थी और इस लिहाज से आप कल्पना कर सकते हैं कि निर्देशक का काम कितना कठिन रहा होगा। उच्चारण और मॉड्युलेशन को लेकर कोई चाहे तो पात्रों की आलोचना कर सकता है, लेकिन ये नाटक के कुल असर को प्रभावित नहीं करते। अनगढ़पन का भी एक अलग सौंदर्य होता है, जिसे निर्देशक ने बखूबी बरता है। इस नाटक का संगीत असरदार है।

मृत्युंजय प्रभाकर की ये दिल्ली में ये अब तक की सबसे बड़ी प्रस्तुति है। इसके मंचन के दौरान हॉल में जमा भीड़ इस बात का प्रमाण है कि उन्हें लेकर रंगमंच में एक एक्साइटमेंट है।

15 Comments »

  • अजित वडनेरकर said:

    ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से जयशंकर प्रसाद ने भी प्रतीकात्मकता के साथ एक बात कही थी। कुशल निर्देशक का इतिहासबोध ही किसी कृति की प्रतीकात्मकता को और उभारता है। मृत्युंजय प्रभाकर बधाई के पात्र हैं अगर उन्होंने प्रसाद के बहुमंचित नाटक को एक नया तेवर, नई अर्थवत्ता और विलक्षणता दी।
    आपकी समीक्षा पढ़े बिना हम इस बारे में कैसे जान पाते? बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको बधाई और धन्यवाद।
    दीवाली की जै जै,शुभकामनाएं।

  • abraham hindiwala said:

    नाटक के मंचन के बाद यह और भी आवश्यक हो जाता है कि उसके बारे में लिखा कैसे गया है? समीक्षा यह बताती है कि मृत्युंजय जी का काम बहुत बढिया रहा है. हम जैसे तो यही पढते और समझवाते बडे हुए कि जयशंकर प्रसाद के नाटकों का मंचन सम्भव नहीं. आज के लोग इसे सम्भव कर रहे हैं और नई नई व्याख्याएं दे कर उसे समकालीन बना रहे हैं, यह बहुत बडी बात है. पूरी टीम को बधाई!

  • Isht Deo Sankrityaayan said:

    अच्छी समीक्षा है. मृत्युंजय एक सिद्धहस्त निर्देशक हैं. यह आयोजन उनकी क्षमताओं का एक स्पष्ट निदर्शन है.

  • अरविंद शेष said:

    यह नाटक मुझे भी देखने का मौका मिला। मृत्युंजय ने दरअसल कम से कम मुझे चौंकाया नहीं। इससे पहले जेएनयू में उनकी दो प्रस्तुतियां देख चुका हैं।

    किसी भी नाटक को बड़ा बनाने में उसमें किए गए प्रयोग का पहलू सबसे महत्त्वपूर्ण होता है- ऐसा मानना है। इस लिहाज से मृत्युंजय अपने सभी नाटकों में शायद सबसे अहम मौलिकता लेकर आते हैं। जिस दौर में किसानों की आत्महत्या की खबर दबाने के बावजूद नहीं दबी और देश के लिए शर्म की कहानी बन गई, उसमें भी साहित्य के कलाकारों के लिए रचनाओं में कला का पक्ष ज्यादा अहम और स्वीकार्य होने की एकमात्र शर्त रही, मृत्युंजय की प्रस्तुति स्यूसाइड ने उनके सरोकार को दिखाया।

    ध्रुवस्वामिनी कथावस्तु के स्तर पर भले ही प्राचीन होने का बोध दे, लेकिन मृत्युंजय ने दिखाया है कि किसी रचना का समकालीन और नया पाठ कैसे किया जा सकता है।

    समय और समाज की जरूरत के हिसाब से नए मूल्य गढ़ना किसी भी रचनाकार की जिम्मेदारी होती है, न कि मूल्यों को निबाहने के नाम पर यथास्थितिवाद को बनाए रखने की साजिश। प्राचीनता की महानता की दुहाई देने के बजाय मृत्युंजय यहीं दिखाते हैं कि महानता के लिए प्राचीनता का मोहताज होने की जरूरत नहीं। जहां जरूरत पड़े, उसकी बुनियाद को भी बदल देना मुश्किल काम नहीं है, अगर आपके पास नया रास्ता हो।

    इसके बाद दिलीप मंडल ने नाटक की जो समीक्षा की है, वह मुग्ध कर देने वाली है। इस तरह समीक्षाएं कई बार आपके पाठ को नया नजरिया देने का भी काम करती हैं।

    नाटक के लिए मृत्युंजय प्रभाकर, और इस बेहतरीन समीक्षा के लिए दिलीप मंडल को बधाई…

  • shridharam said:

    mritunjay lagatar nikhar aarha hai. dhruvswamini ka yah naya path hai

  • सारथी शर्मा said:

    मृत्युंजय इस समय दिल्ली में सबसे तेजी से जगह बनाते डायरेक्टर हैं। रंगमंच पर एनएसडी की दादागिरी खत्म करने के लिए ऐसे निर्देशकों का सामने आना जरूरी है। एनएसडी वाले नया कुछ नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनकी नजर थिएटर कर्म पर कम और बरसने वाले फंड पर ज्यादा होती है। मृत्युंजय को अब कुछ बड़े मौकों की जरूरत है। ऐसे मौके बनाने का संघर्ष मृत्युंजय कैसे करते हैं और इस बीच अपने खुद को किस तरह से वो बचाते हैं, उस पर नजर रखिए। इस नाटक के दो स्क्रिप्ट आने वाले दिनों में हो सकते हैं:
    1. एक डायरेक्टर की मौत
    2. वो आया और कुछ कर गया
    हम तो सिर्फ इतना कर सकते हैं कि मृत्युंजय के नाटक को टिकट खरीदकर देखेंगे और दोस्तों को भी ऐसा करने के लिए कहेंगे। बाकी लड़ाई मृत्युंजय की अपनी है। दिवाली मुबारक।

  • hrishikesh sulabh said:

    बधाई मृत्‍युंजय। बधाई।
    दि‍लीप मंडल को भी अच्‍छी समीक्षा के ि‍लए बधाई।अभी कई कई दि‍लीप मंडल और वि‍भा रानी
    की आवश्‍यकता है हि‍न्‍दी रंगमंच को।
    यह एक जरूरी काम है।

  • mrityunjay prabhakar said:

    दिलीप जी को शुक्रिया. और आप सभी लोगों को सेहर के तरफ से शत शत धन्यवाद . मृत्युंजय के साथ हम सभी के इस प्रयास को सराह ने के लिए आप लोगों की आभारी रहेंगे.

  • anish ankur said:

    dilip mandalki samkiksha kafi achhi lagi.samiksha padhkar ye andaza ho jata h ki mrityunjay ne kaise prayog kiye.sachmuch jin logon ne natak dekha hoga unke liye behad sukhad anubhav rha hoga.aaj jarurat isi bat ki h ki period natakon ko ek samkalin aur modern path diya jai.ye kosish yadi hui hai to mrityujai badhai ke patra hain.is natak ke aur manchan ho sake iska prayas hona chahiye.hal ke kuch varshon me is natak ke kai manchan hue hain par ve utne safal nahin ho pai.dilip ji samiksha se aisa lagta hai ki mrityunjai ne kafi gambhir koshish ki hai.nirdeshak aur samikshak dono ko badhai.

  • randhir kumar said:

    badhi mrityunaay,
    i read all the comment about your production,its really very good.but i fell that any production is not a good or bad, hense honosty is the main thing,and really your are a honest theatre director and we expect more then this production.hope we see your new production very soon.

  • सुमधर भाषिणी said:

    मैं कब देख पाऊंगी ये नाटक?

  • rajnish prasad said:

    sabash Mrityunjay bhai! aise hi lage rahiye. Dilip Mandal ji ki shandar samiksha ne is natak ki acchaiyon aur iske nirdeshak ke prayogon ko jis khubsurti se ukera hai usse yeh saabit hota hai ki natakon ki zamin abhi bhi bachi hui hai aur puri tarah se banzar nahin hui hai.ummid hai Mrityunjay aage ahi isi zajbe ke saath samne aate rahenge.

    aur ek baat Randhir Kumar ji se:
    Bhai koi jaroori nahin ki apni baat angreji me hi kahi jaye. aur agar kahni hi ho to ashudhiyon se bachne ki puri koshish karni chahiye.

  • sunil kumar 'suman' said:

    MRITUNJAY mere chhote bhai ki tarah hain..delhi se dur rehkar uski pragati ki khabar sunkar mai kafi utsaahit hu.. wo aur mehnat kare aur aage jaye… yhi mangal kaamnaayen hain…

  • sunil kumar 'suman' said:

    MRITUNJAY mere chhote bhai ki tarah hai…delhi se dur rehkar uski pragati ki khabar sunkar mai kafi utsaahit hu.. wo aur mehnat kare aur aage jaye… yhi mangal kaamnaayen hain…

  • Mohalla Live » Blog Archive » देश के थिएटर को एनएसडी के चंगुल से मुक्‍त कराया जाए said:

    [...] बनाया। हाल ही में सहर की प्रस्‍तुति ध्रुवस्‍वामिनी ख़ासी चर्चा में रही। फिलहाल नई दुनिया [...]

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