Home » ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला मुंबई, शब्‍द संगत

विजयशंकर चतुर्वेदी के ख़‍िलाफ़ बहिष्‍कार पत्र

18 October 2009 7 Comments
यह पत्र जनवादी लेखक संघ की महाराष्‍ट्र ईकाई ने भेजा है। 21 सितंबर 2009 को मोहल्‍ले में हमने कवि विजयशंकर चतुर्वेदी के नये कविता संग्रह का लोकार्पण समाचार छापा था। लोकार्पण समारोह में विजयशंकर की कही गयी जिन बातों का ज़‍िक्र हमने समाचार में किया था, उन बातों पर ही जनवादी लेखक संघ ने यह प्रतिवाद पत्र भेजा है। इस पत्र में कुछ व्‍यक्तिगत प्रसंगों का ज़‍िक्र है, जिन्‍हें पत्रका‍रीय नियमों के आधार पर हमें डिलीट कर देना चाहिए, लेकिन चूंकि जनवादी लेखक संघ एक ज़‍िम्‍मेदार लेखक संगठन है और चूंकि यह पत्र संगठन की महाराष्‍ट्र ईकाई की ओर से भेजा गया है, लिहाजा हमने कोई एडिटिंग करना वाजिब नहीं समझा। कवि-लेखक, पाठक-विजिटर के सामने जलेस का यह पत्र जस का तस : मॉडरेटर

jales photo

माननीय महोदय,
मोहल्‍ला हिंदी प्रेमियों, रचनाकर्मियों का एक चर्चित मंच है। यह हिंदी के रचनात्‍मक माहौल को न केवल सक्रिय बनाता है, अपितु अभिव्‍यक्ति और स्‍वस्‍थ संवाद का भी माध्‍यम बनता है। आपके ब्‍लॉग की लोकप्रियता व विश्‍वसनीयता का एक कारण यह भी है कि आप स्‍वस्‍थ और रचनात्‍मक संवाद को आवश्‍यक मान कर उन्‍हें यथोचित स्‍थान देते हैं। हमारा मानना है कि साहित्‍य व संस्‍कृति के निर्माण में इस प्रक्रिया की बड़ी भूमिका होती है। रचना का सही मूल्‍यांकन व आलोचनात्‍मक नज़रिया रचनाकार को बेहतर रचने की ओर प्रवृत्त करता है।

मान्‍यवर, आपके बहुचर्चित व बहुपठित मंच पर हम जनवादी लेखक संघ, महाराष्‍ट्र के लोग अपना प्रतिवाद दर्ज कराना चाहते हैं। आशा ही नहीं, पूरा विश्‍वास है कि आप उसे अपनी साइट पर प्रक्षेपित करेंगे।

पिछले दिनों मुंबई परिक्षेत्र के कवि विजय शंकर चतुर्वेदी की कविता पुस्‍तक ‘पृथ्‍वी के लिए तो रुको’ के लोकार्पण की एक रिपोर्ट पढ़ी। रिपोर्ट में अनाम लेखक संगठनों पर एक बड़ी भद्दी और ग़ैरज़‍िम्‍मेदाराना टिप्‍पणी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘यहां के लेखक संगठन युवा रचनाकारों की क़ब्र खोदने का काम कर रहे हैं।’

जैसा कि विदित है, यहां पर वामपंथी लेखक संगठनों में केवल जनवादी लेखक संघ ही सक्रिय है। बाक़ी के प्रलेस व जसम का कोई आधिकारिक व सांग‍ठनिक ढांचा नहीं है। ऐसी स्थिति में उक्‍त टिप्‍पणी जनवादी लेखक संघ पर ही मानी जाएगी।

जनवादी लेखक संघ पिछले करीब पचीस सालों से यहां पर सक्रिय है। हिंदी और उर्दू के कई राष्‍ट्रीय स्‍तर के रचनाकार संगठन में सक्रिय हैं। संगठन में युवाओं की आमद भी कम नहीं है। स्‍वयं विजय शंकर चतुर्वेदी की रचनाओं का पाठ लेखक संघ के मंच से हो चुका है। गीत चतुर्वेदी, संजय भिसे, हरिमृदुल जैसे चर्चित रचनाकारों की रचनात्‍मकता पर आलोचनात्‍मक बहस होती रही है। यहां पर हमें संगठन के कार्यक्रमों की सूची देना अभीष्‍ट नहीं लगता।

जनवादी लेखक संघ किसी भी असामाजिक तत्‍व को कभी भी प्रश्रय नहीं देता। संगठन का मानना है कि साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी व बुद्धिजीवी की देश व समाज के प्रति चुनौतीपूर्ण ज़‍िम्‍मेदारी। अत: उसे सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में गंभीर रूप से व सचेत होकर ज़‍िम्‍मेदारी निभानी पड़ती है। सांस्‍कृतिक ही नहीं, सामाजिक व राजनीतिक हलचलों में भी अपना हस्‍तक्षेप दर्ज कराना संवेदनशील संस्‍कृतिकर्मी रचनाकार व बुद्धिजीवी का दायित्‍व बनता है।

बहुत से लोग संगठन की तरफ अपनी प्रतिष्‍ठा, पहचान के लिए आकृष्‍ट होते हैं। अपनी साहित्यिक रचनात्‍मकता के निखार के लिए नहीं अपितु रातोंरात प्रसिद्ध होने के लिए संगठन में आते हैं। संगठन के अनुशासन व गतिविधि में उनका कोई योगदान नहीं होता। उनकी ऐसे कार्यों में कोई रुचि भी नहीं होती। वे महंत की तरह पुजवाने के आकांक्षी होते हैं। जनवादी लेखक संघ ऐसे लोगों से न केवल दूरी बनाये रखता है बल्कि ऐसी प्रवृत्तियों को हतोत्‍साहित भी करता है। अंतत: ऐसे यश लोभी व तथाकथित कवि अपनी मौत स्‍वयं मरते हैं।

रही बात युवा कवि विजयशंकर चतुर्वेदी की, तो उनके संदर्भ में लेखक संगठन का मानना है कि वे निकृ‍ष्‍ट कोटि के व्‍यक्ति हैं। उनमें मनुष्‍यता के लेशमात्र भी गुण नहीं हैं। शराब के नशे में लोगों को गालियां देना, रात्रि के दो बजे से सुबह के पांच बजे तक मिसकॉल करना, घर की औरतों व बच्‍चों को अश्‍लील व भद्दी गालियां देना इनके लिए शर्म की नहीं, गौरव की बात है।

हिंदी पाठकों को यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि इस तथाकथित महाकवि ने घर में ऐसी परिस्थिति पैदा की, जिससे तंग आकर पत्‍नी ने आत्‍महत्‍या जैसा क़दम उठाया। पत्‍नी की मृत्‍यु का कोई भी खेद उसे नहीं है। विजय शंकर चतुर्वेदी के सामने उसकी शालीन समर्पिता पत्‍नी ने शरीर पर घासलेट छिड़क कर आग लगा ली। और बकौल खुद विजय शंकर चतुर्वेदी, उसमें इतनी भी ताव न थी कि वह उठ कर उसे रोक पाता। वह जलती रही, उसकी अबोध बच्‍ची वहीं रोती रही और विजयशंकर उसे बचाने के लिए हाथ तक न उठा सका। क्‍योंकि रात के दो-तीन बजे विजयशंकर शराब के नशे में धुत होकर घर आया था।

स्त्रियों की गरिमा की बात करने वाला कवि शहर की स्त्रियों को गंदी गालियां देता फिरता है। ऐसे अमानवीय, असामाजिक व अराजक व्‍यक्ति से जनवादी लेखक संघ का घोषित बहिष्‍कार रहा है।

♦ हृदयेश मयंक
कार्याध्‍यक्ष, जलेस, महाराष्‍ट्र राज्‍य ईकाई
♦ शैलेश सिंह
सचिव, जलेस, महाराष्‍ट्र राज्‍य ईकाई
♦ राधेश्‍याम उपाध्‍याय
अध्‍यक्ष, जलेस, मुंबई ईकाई
♦ रामसागर पांडेय
सचिव, जलेस, मुंबई ईकाई

7 Comments »

  • nikhil anand giri said:

    क्या ये सच है….

  • अरविंद शेष said:

    जलेस की चिट्ठी के बहाने मोहल्लालाइव ने अपने पाठकों पर एक अहसान किया है। बल्कि मैं तो कहूंगा कि इस तरह के लोगों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें नंगा किया जाना चाहिए।

    ऐसे तमाम तथाकथित लेखक आदमी (अगर उन्हें आदमी कहें तो) मिल जाएंगे तो कथित तौर पर कविताएं लिखते हैं और कविता के मंचों पर क्रांतिकारी होने का तमगा लटकाए नाचते फिरते हैं। लेकिन घर में अपनी पत्नी और बच्चों को जूते की नोक बराबर नहीं समझते। कविताई करने की महानता ओढ़ लेने के बाद शादी करते हैं और मौका मिलते ही कुत्तों की तरह दूसरी स्त्रियों के पीछे दुम हिलाने लगते हैं। फिर शुरू होता है पहले पत्नी को यह समझाने का दौर कि लेखक तो चार-चार स्त्रियों से संबंध रखते ही हैं, यही उनकी उपलब्धि है। और यह नहीं समझ पाने के बाद पत्नी पर मानसिक-शारीरिक अत्याचार।

    घर में जल्लादी और गोष्ठियों-बैठकों में कवि-लेखक और मानव-गुणी होने की मुनादी। पाखंडी क्रांतिकारिता और प्रतिबद्धता-निष्ठा का गौरवगान।

    जाति के विरुद्ध महान कहे जाने वाले लेख लिखेंगे, बातचीत में जाति के विरुद्ध रुदाली गाएंगे और निजी तौर पर सिर्फ इसलिए किसी को जाति के आधार पर अपमानित करेंगे या जातिबोधक अश्लील टिप्पणियां करेंगे या अपने बचाव के लिए झूठ पर आधारित प्रचार को हथियार बनाएंगे, क्योंकि किसी ने उनके पाखंडों का विरोध किया होता है।

    और उनके आचरण का कोई स्त्री विरोध करे तो उसके खिलाफ झूठ पर आधारित निम्नतम भाषा का प्रयोग करने नहीं चूकेंगे, पहले ही कुत्तई कर चुके उसके दुश्मनों को ढूंढ़ कर उसे अपना हथियार बनाएंगे।

    कई लोग यह तर्क देते फिरते हैं कि लेखक के चरित्र से उसकी रचनाओं का आकलन नहीं करना चाहिए। सही है। लेकिन फिर इंतजार कीजिए कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिकता के विरुद्ध कोई महान किताब लिखे, कोई बलात्कारी बलात्कार के अनुभवों पर आधारित चमत्कारिक साहित्यिक भाषा में कोई किताब लिखे।

  • anand said:

    Sahtya mein Chipe hue vijay shankar jaise bhediyo ko khadedo.

  • बाघ का बिल्ला said:

    मोहल्ला जी,
    परनाम.
    ये विजयशंकर कौन है और क्या करते है इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन घनघोर निकृष्ट जातिवादियों तथा हरियाणा की पंचायतों की तर्ज़ पर जाति-बिरादरी से बहिष्कार का फतवा जारी करने वालों ने साबित कर दिया है कि इनसे साफ़-सुथरी सोच की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती. जरूर उसमें तानाशाह किस्म के आदमी सकृत होंगे. मैं छत्तीसगढ़ में रहता हूँ और बड़ी जाति की लड़की के साथ शादी करने पर मुझे भी बिरादरी से निकाल दित्या गया है. मुंबई से आये मेरे एक मित्र ने बताया कि पंचायत की तरह अंगूठा लगाने वाले इन चारों महाशयों का साम्यवाद से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है.
    मित्र का यह भी कहना था कि मेढक जैसे दिखने वाले मयंक ने तो अपनी पत्नी को आज तक सूरज की रोशनी तक नहीं देखने दी है और उसका मुख्य काम ब्राहमणों के कुल-गोत्र तथा जन्म कुण्डलियां मिलाकर शादियाँ करवाना और उससे दलाली वसूल करना है. वह नगरपालिका में सफाई कर्मचारी है जहां नाम मात्र को जाता है और नालियां साफ़ करने तक में रिश्वत लेता है. बाकी सब ठीक है. मित्र का कहना है कि जब मयंक की देह में ही गर्दन नहीं है तो आचरण में कहाँ से होगी?
    अगर आप चाहेंगे तो एक-एक कर इन सबके बारे में अपने मित्र से पूछ लूंगा और इनके चरित्र के बारे में आपको बताऊंगा. यह भी बताऊंगा कि वह मित्र कहाँ रहता है और इन लोगों को कैसे जानता है.
    परनाम!

  • sarita said:

    arvind shesh ji, mumbai ke log vijay shankar chaturvedi ki asliyat jante hai.yah aadami ke roop mai janver hai.
    sarita singh

  • vijay said:

    Kayar nakli nam wale bagh ke bille,

    Yaha patni ke hatya karne wale ko jait bahar kiya gaya hai na ki upper cast ladki se shadi karne wale ko. aur koi angutha chap hai ya medhak hai esse patne ki hatay ke apradh ka kya sambandh?

  • Mohalla Live » Blog Archive » एक पत्र कवि के पक्ष में, जनवादी लेखक संघ पर सवाल said:

    [...] लाइव मे जलेस की महाराष्‍ट्र ईकाई का पत्र देखा। बतौर कवि विजय शंकर चतुर्वेदी के [...]

Leave your response!

Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)

Add your comment below, or trackback from your own site. You can also subscribe to these comments via RSS.

Be nice. Keep it clean. Stay on topic. No spam.

You can use these tags:
<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

This is a Gravatar-enabled weblog. To get your own globally-recognized-avatar, please register at Gravatar.

Spam Protection by WP-SpamFree