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घर में जल्लादी और गोष्ठियों में कवि होने की मुनादी

20 October 2009 2 Comments

♦ अरविंद शेष

जलेस की चिट्ठी के बहाने मोहल्लालाइव ने अपने पाठकों पर एक एहसान किया है। बल्कि मैं तो कहूंगा कि इस तरह के लोगों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें नंगा किया जाना चाहिए।

shesh react on jales letterऐसे तमाम तथाकथित लेखक आदमी (अगर उन्हें आदमी कहें तो) मिल जाएंगे जो कथित तौर पर कविताएं लिखते हैं और कविता के मंचों पर क्रांतिकारी होने का तमगा लटकाये नाचते फिरते हैं – लेकिन घर में अपनी पत्नी और बच्चों को जूते की नोंक बराबर नहीं समझते। कविताई करने की महानता ओढ़ लेने के बाद शादी करते हैं और मौका मिलते ही कुत्तों की तरह दूसरी स्त्रियों के पीछे दुम हिलाने लगते हैं। फिर शुरू होता है पहले पत्नी को यह समझाने का दौर कि लेखक तो चार-चार स्त्रियों से संबंध रखते ही हैं, यही उनकी उपलब्धि है। और यह नहीं समझ पाने के बाद पत्नी पर मानसिक-शारीरिक अत्याचार।

घर में जल्लादी और गोष्ठियों-बैठकों में कवि-लेखक और मानव-गुणी होने की मुनादी। पाखंडी क्रांतिकारिता और प्रतिबद्धता-निष्ठा का गौरवगान।

जाति के विरुद्ध महान कहे जाने वाले लेख लिखेंगे, बातचीत में जाति के विरुद्ध रुदाली गाएंगे और निजी तौर पर सिर्फ इसलिए किसी को जाति के आधार पर अपमानित करेंगे या जातिबोधक अश्लील टिप्पणियां करेंगे या अपने बचाव के लिए झूठ पर आधारित प्रचार को हथियार बनाएंगे, क्योंकि किसी ने उनके पाखंडों का विरोध किया होता है।

और उनके आचरण का कोई स्त्री विरोध करे तो उसके खिलाफ झूठ पर आधारित निम्नतम भाषा का प्रयोग करने से नहीं चूकेंगे। पहले ही कुत्तई कर चुके उसके दुश्मनों को ढूंढ़ कर उसे अपना हथियार बनाएंगे।

कई लोग यह तर्क देते फिरते हैं कि लेखक के चरित्र से उसकी रचनाओं का आकलन नहीं करना चाहिए। सही है। लेकिन फिर इंतज़ार कीजिए कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिकता के विरुद्ध कोई महान किताब लिखे, कोई बलात्कारी बलात्कार के अनुभवों पर आधारित चमत्कारिक साहित्यिक भाषा में कोई किताब लिखे।

2 Comments »

  • कदलि said:

    …नहीं चलेगा,नहीं चलेगा। काश कोई यही बात कवि होने का दावा करने वाला कोई शख्स लिख पाता।.

  • विश्‍वस्‍त सूत्र... said:

    जब बात इतना आगे बढ़ ही गई है, तो कोई आगे आकर दिल्‍ली के कुछ जांबाज रसीले कवियों की भी पोल खोले… उदाहरण के लिए कुमार मुकुल द्वारा अपनी पत्‍नी के साथ अमानवीय बरताव की दास्‍तान… मॉडरेटर जी, आप भी इस मामले से बखूबी परिचित हैं… सेलेक्टिव सच क्‍यों कहलवाते हैं। श्रृंखला चलाइए ऐसे कवियों पर… सच मानें, बहुत महत्‍वपूर्ण काम होगा।

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