यू-ट्यूब में बिहार है तो वही, लेकिन लगता मज़ेदार है
♦ रवीश कुमार
रवीश ने यूट्यूब की नज़रों से पटना देखने की कोशिश की और मेल ग्रुप दीवान पर अपने उदगार जाहिर किये। (युवा इतिहासकार और सीएसडीएस के सीनियर रिसर्च फेलो रविकांत ने टिप्पणी की : बहुत बढ़िया रवीश, मज़ा आ गया। वैसे जिस दिलचस्प नज़रिये की तलाश कर रहे हो, वो मुझे हाल में सिद्धार्थ चौधरी के उपन्यास पटना रफकट में मिला।) मोहल्ला लाइव में दीवान से साभार रवीश का राइटअप वीडियो में बसता एक शहर।
यू-ट्यूब के वीडियोगाह में आना-जाना कई तरह की फंतासियों से गुज़रना होता है। दिवाली की रात सर्च खांचे में पटना टाइप कर दिया। कई वीडियो निकल आये। इन्हें देख कर लगा कि पटना को भी नये सिरे से खोजा जा सकता है। पुरानी स्मृतियों या इन तस्वीरों में पटना बिल्कुल एक अलग शहर दिख रहा है। बदलाव का शहर नहीं। सिर्फ देखने वाले की बदली हुई नज़र का शहर। कुछ वीडियो में पटना के टॉप एंगल शॉट लिये गये हैं। उन्हीं इमारतों की तस्वीरें ली गयीं हैं, जिनसे लगे कि पटना में ऊंची इमारतें हैं। वीडियो बनाने वाला लगता है कि किसी बड़े अमरीकी शहर में रह कर लौटा है और उसी से मिलती-जुलती तस्वीरें खोज रहा है।
पटना सिटी नाम के एक वीडियो में पटना के विभिन्न रंग रूप का कोलाज बना था। तस्वीरों को स्टिल कर एडिटिंग की गयी थी। पटना का पुराना सचिवालय, हनुमान मंदिर, स्टेशन की मस्जिद की छत से लिया गया टॉप एंगल शॉट, गोलघर, हाईकोर्ट, फ्रेज़र रोड। हरी-भरी सब्ज़ियों के बीच बैठा सब्ज़ीवाला, एक लड़की भीगती चली जा रही है, बांकीपुर क्लब, पटना कॉलेज, कृष्ण मेमोरियल, गांधी मैदान के पास गांधी म्यूज़ियम के गेट पर लगने वाला बेंत बाज़ार, गंगा का किनारा, पुल, अशोक राजपथ, बिस्कोमान भवन से कोलाज बन रहा है। बैकग्राउंड में बंदे मातरम की धुन और सबसे आखिर में विमान से उतरते वक्त खिड़की से ली गयी तस्वीर। ज़रूर ये इस वीडियो की पहली तस्वीर रही होगी। कहीं बाहर से अच्छी नौकरी कर पटना लौटा होगा। हवाई जहाज़ से। विक्रमशिला एक्सप्रेस के थ्री टीयर में लदा कर गये कई लोग अब पटना राजधानी एक्सप्रेस या हवाई जहाज़ से लौटते हैं। कुछ लोगों ने राजधानी एक्सप्रैस के भी वीडियो बनाये हैं।
इस पटना को देख कर मैं भी रोमांटिक हो गया। हर तरह से समस्याग्रस्त इस शहर से कितना प्यार रहा होगा वीडियो बनाने वाले को। जैसे ही पटना की कई तस्वीरों में दुर्गा पूजा की तस्वीर आयी, कुछ कौंध गया। जो शहर कभी महानगरों की जमात में शामिल होने के लायक नहीं समझा गया, जिसे बिगड़ी कानून व्यवस्था की लावारिस औलाद कहा जाता रहा, उससे इतनी मोहब्बत? कोई वजह रही होगी, जिसके कारण ये वीडियोग्राफर पटना को फिर से देख रहे हैं। मैं यू-ट्यूब के वीडियोगाह में पटना टाइप करने लगा। मेरे डेस्कटॉप पर पटना का चलचित्र शुरू हो गया। जिस शहर को मैं अपनी स्मृतियों में ढूंढ़ रहा था, उसे वीडियो में साक्षात देख कर कितना रोमांचित हुआ बता नहीं सकता।
एक वीडियो पर क्लिक करता हूं। अंग्रेजी में टाइटल है। Guys this is Patna, No matter what u people think, we dnt care, becoz patna is the best, देखो, ये पटना है, आप चाहें कुछ भी सोचें, हमें परवाह नहीं क्योंकि पटना ही बेस्ट है। अपनी ज़िंदगी में कामयाब हुए लोगों के ज़हन में पटना एक नाकामी की तरह मौजूद होगा। जिससे लड़ने के लिए वो इस तरह के वाक्य विन्यास रचते होंगे। वीडिया का टाइटल है – Take a look at Patna. ब्लैक एंड व्हाइट इफैक्ट दिया गया है। शुरू में घिसी हुई रील की लकीर हिलती डुलती है। फिर एक धुन बजता है और तस्वीरें बदलने लगती हैं। अंग्रेजी गाने का इस्तमाल किया गया है। take a look at me बज रहा है। चंदन नाम के किसी शख्स ने इस वीडियो को 2006 में बनाया है। तीन हज़ार से ज़्यादा लोगों ने देखा है।
पटना विश्वविद्यालय के मैदान से सटा गलियारा आता है। फिर गोलघर, फिर पटना साहिब, हवाई अड्डा… अंग्रेजी गाने के साथ पटना की ये तस्वीरें किसी अमरीकी शहर में होने के अहसास से भर देती हैं। पटना को लेकर ग़ज़ब का गर्व उभरता है। एक जनाब अपनी टिप्पणी से पूरा ख्वाब तोड़ देते हैं। कहते हैं आप किसी शहर की तुलना क्यों करते हैं? अगर बुराई है तो लोग बुराई की बात करेंगे ही। आलोक की टिप्पणी है कि कई राज्यों में रहने के तज़ुर्बे के बाद मैं कह सकता हूं कि बिहारी लोग काफी मददगार होते हैं। एक दर्शक मज़ाक उड़ाता है कि आप इतने बैकवर्ड हो कि कलर कैमरा भी इस्तेमाल नहीं कर सके। ब्लैक एंड व्हाइट में वीडियो मोंटाज़ बनाया। बहस छिड़ जाती है। इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रॉब्लम को छोड़ कर पटना इन वीडियो में एक बदलता हुआ शहर है। वीडियो बनाने वाला पटना को लेकर क्रिटिकल नहीं है।
तभी मुझसे एक भोजपुरी गाना क्लिक हो जाता है। छोटू छलिया गा रहा है। वीडियो अलबम की नायिका लाल टी-शर्ट और नीले स्कर्ट में है। गाने का नाम है – साइकिल वाली। साइकिल वाली की टक्कर दूध वाले से हो जाती है। धोती कुर्ते में दूधवाला उस पर कमेंट करते हुए गाता है। उसे एक बिगड़ैल घर की लड़की बताता है और फिर उसके करीब आकर गाना गाने लगता है। हई बड़ घर के बिगड़ल बुझाली, सइकिलिया वाली। सटा के देह में जाली सइकिलिया वाली। धोती कुर्ता बनाम टॉप-स्कर्ट के बीच एक उलाहना टाइप का सांस्कृतिक विमर्श चलता है। तीन-चार लफंगे किस्म के पटनहिया नौजवान डांस कर रहे हैं। डांस शैली को कोई पुरातत्ववेत्ता इस रूप में देख सकता है कि बॉलीवुडिया डांस स्टाइल के कुछ अवशेष आज भी पटनहिया नौजवानों के स्टेप्स में बचे हुए हैं। ये और बात है ये स्टाइल सत्तर के दशक की डांस शैली और इक्कीसवीं सदी के स्टेप्स का मिश्रण लगता है। पूरा वीडियो किसी सरकारी दफ्तर के गार्डन में फिल्माया गया है। शहर नये पुराने से जूझ रहा है। इस गाने को दो लाख से ज़्यादा हिट्स मिले हैं। भोजपुरी गाने को इतना हिट्स बता रहा है कि इंटरनेट पर हर भाषा बोली के लोग अपनी संस्कृति ढूंढ रहे हैं।
एक वीडियो है, पटना के डॉनबॉस्को स्कूल के फेयरवेल पार्टी की। लड़का-लड़की काफी करीब आकर मंच पर फिल्मी धुन पर डांस कर रहे हैं। गाना है भूल भूलैया। डांस कर रहे हैं बिकेस और रश्मि। इस तरह के वीडियो अब सार्वजनिक हो रहे हैं। पटना में ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जो अपनी फेयरवेल की तस्वीरों को घर तो दूर मोहल्ले के दोस्तों को नहीं दिखा सके, जिसमें उनके क्लास की लड़की साड़ी पहने स्नो पाउडर लगाये बगल में खड़ी थी। अब पटना के लोग इस तरह के वीडियो दुनिया के सामने ला रहे हैं। लड़की नाच रही है, वो भी लड़के के साथ। बीस साल पहले के पटना में संभव नहीं था। शादी में अड़चनें पैदा हो जातीं। अब पटना भी दिखाने लगा है। खुद को। एक वीडियो में संगीत का आइटम है। अर्धेन्धु की बहन की शादी के मौके पर मंच पर लड़का लड़की दिल्ली स्टाइल में संगीत पर डांस कर रहे हैं। पटना की शादियों के लिए संगीत नया आइटम है। दिल्ली की शादियों और सीरियलों से आ गया है। स्टेप्स को लेकर कोई हिचक नहीं है। कमर और सीना बिंदास अंदाज़ में हिल-डुल रहा है। नाते-रिश्तेदार बैठ कर देख रहे हैं।
पुष्पांजलि के वीडियो का कई तरह से पाठ किया जा सकता है। वो अपने घर के भीतर कॉरिडोर में शास्त्रीय नृत्य कर रही हैं। टेप रिकार्डर पर मेरे ढोलना सुन, प्यार की धुन बज रहा है। वीडियो में नृत्यांगना की तरह सजी-धजी ये महिला पूरी अदाओं के साथ डांस कर रही है। कोई दोस्त होगा, पति हो सकता है या भाई भी। कैमरा बता रहा है कि घर में सिर्फ दो ही लोग हैं। एक नाच रही है और दूसरा रिकॉर्ड कर रहा है। निजी क्षण सार्वजिनक क्षणों की तरह होने लगे हैं। शर्म की बंदिशें घर के भीतर टूटने का अभ्यास कर रही हैं। स्पेस कम है। डांस स्टेप के रास्ते में सामने मोड़कर रखी एक कुर्सी आ जाती है। एक पुराना सोफा कम बेड स्पेस को संकुचित कर देता है। फिर भी गलियारे में डांस चल रहा है। दिल्ली बांबे के ख्वाब जवान हो रहे हैं।
मुझे एक और वीडियो मिलता है। Two circles.net की बनायी एक लघु फिल्म। पटना के रिक्शेवाले की कहानी है। रिक्शावाला मुदस्सिर रिज़वान का इंटरव्यू है। सवाल आता है, कहां रहते हैं। रिक्शेवाला कहता है लोदीपुर। मुदस्सिर अपनी कहानी बता रहे हैं। सौ रुपये कमा लेते हैं। दो बच्चे हैं जो स्कूल नहीं गये। शादी ब्याह में काम कर कमाते हैं। बुढ़ा हो रहा हूं तो अब रिक्शा कम चलता है। इस तरह कुछ और रिक्शेवालों का इंटरव्यू है। अलग-अलग ज़िलों से आये लोग रिक्शा चलाने की कहानी बताते हैं। बता रहे हैं कि कैसे रिक्शा चलाने के धंधे में आ गये। पटना में रिक्शा और रिक्शावाला, शहर की अर्थव्यवस्था मापने के मीटर हैं।
एक और वीडियो है। एमआईजी कंकड़बाग नाम से। एक मंज़िली इमारत। लाल बार्डर और सफेद दीवारें। कैमरा गेट से चलता है और बरामदे तक पहुंचता है, जहां ग्रील लगे हैं। पटना के घरों में ग्रील गेट के बाद सुरक्षा का दूसरा घेरा है। गेट के सामने सुधा डेयरी की नकल पर एक बोर्ड दिखता है। दूधा लिखा हुआ है। घर में घुसते ही कैमरा किसी बुज़ुर्ग की तस्वीर से पैन होता हुआ कई तरह के मेडल और शील्ड पर जा टिकता है। कोई कामयाब शख्स अपनी इन बुनियाद को गर्व के साथ कैमरे में उतार रहा है। देख कर यही लगता है। उसके बाद कंप्यूटर आता है। सजा कर रखा गया बिस्तर और झूला भी। वो अपने घर और कमरे को ऐसे देख रहा है जैसे उसका अतीत भी कम शाही नहीं रहा है।
इन वीडियो में आप पटना के नये मानस को देख सकते हैं। जिस शहर के लोग कभी अपने घर को बाहर से इस डर से नहीं रंगते थे कि कोई समझ न ले कि लूट का माल है और डाका न पड़ जाए, उस शहर के लोग वीडियो बना कर अपने कमरों तक की तस्वीरें सार्वजनिक कर रहे हैं।
इसी तरह शहर के कई हिस्सों पर आपको वीडियो मिल जाएंगे। कुम्हरार, क्राइस्ट चर्च, पटना म्यूज़ियम, गांधी म्यूज़ियम, महात्मा गांधी सेतु, खुदाबख्श लाइब्रेरी, अगम कुआं, शीतला मंदिर। Patna Rockers नाम से एक वीडियो क्लिप निकलता है। चार दोस्त एसयूवी कार में मस्ती करते हुए कहीं जा रहे हैं। बंबइया गाने में मस्त। ड्राइविंग सीट पर हीरो टाइप एक लड़का ब्लैक चश्मा पहने झूम रहा है। पीछे की सीट पर चार दोस्त अक्षय कुमार स्टाइल में डांस कर रहे हैं। इस शहर में आज भी दोस्ती करने और निभाने के कई मौके मौजूद हैं।
इन वीडियो में पटना की साझा संस्कृति खूब दिखती है। महावीर मंदिर, पटना साहिब से लेकर मोहर्रम तक की रिकॉर्ड की गयी तस्वीरें। बहत्तर ताबूत, गुलज़ार बाग, पटना शिया अज़ादारी नाम का एक वीडियो क्लिप मिलता है। हज़ारों लोगों की भीड़ है। भीड़ में कई लोग अपने मोबाइल फोन में तस्वीरें उतार रहे हैं।
पटना का यह वीडियो संस्करण दिलचस्प है। एक शहर इन तस्वीरों के माध्यम से अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है। शहर की तस्वीरें कैमरे की मदद से जब मोंटाज में बदलती हैं, तो अचानक मेरे भीतर पटना दौड़ने लगता है। यू-ट्यूब के वीडियोगाह में पटना इस तरह से मौजूद होगा इसका तो बिल्कुल अनुमान नहीं था। इन वीडियो में फिल्मकार और शहर एक दूसरे से कोई रिश्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उस हीन भावना से भी निकलने की कोशिश लगती है जो उन्हें ऊंची महफिलों में पता चलते ही किनारे कर देती होगी। पिछले बीस सालों में बिहार बदहाल हुआ है तो यहां से निकले लोगों ने कई शहरों में अपनी कामयाब ज़िंदगी बनायी है। वो अब नयी पहचान चाहते हैं। एक ऐसा शहर चाहते हैं, जिसे वो दुनिया के सामने रख सकें। जिस पटना को खारिज कर दिल्ली से मैनहटन गये, उस पटना में मैनहटन को ढूंढ रहे हैं।
उधर जो पटना में रह गये हैं, वो चुपचाप अपने आप को फिल्मा रहे हैं। शायद इन तस्वीरों को अपलोड कर अपनी दुनिया को विस्तार दे रहे हैं। अपने घरों को फिल्मा कर बता रहे हैं कि कंप्यूटर उनके पास भी है। दिल्ली मुंबई में भले ही बेहद अमीर लोग कोठियों में रहते होंगे लेकिन पटना में उनकी एक कोठी है। जड़ से पेड़ निकलता है, तो पेड़ उसी जड़ पर आ टिकता है। एक संतुलन तो चाहिए।
लेकिन यह क्रांति सिर्फ पटना तक ही सीमित नहीं है। यू-ट्यूब के वीडियोगाह में मोतिहारी टाइप कर दिया। लो वोल्टेज का बल्व जल रहा है। मच्छरदानी के नीचे मां बैठी है। बेटा मां का हाल-चाल पूछ रहा है और मोबाइल कैमरे से रिकार्ड कर रहा है। ए माई, दवाई खईले ह। चप्पलवा पहिर न। मां शर्मा रही है। सामने कैमरे की मौजूदगी ने उसे कांशस कर दिया है। तभी फ्रेम में भौजी आ जाती हैं। जैसे ही कैमरा उनकी तरफ मुड़ता है, वो आंचल से अपना मुंह ढंक लेती है। शर्म से दोहरी हो जाती हैं और खुद को सिकोड़ने लगती हैं। कैमरा बेईमान ज़रा भी मुरव्वत नहीं करता है। यू-ट्यूब में बिहार है तो वही, लेकिन लगता मज़ेदार है।









आह पटना !
रवीश बाबू घर की याद दिला दिये।
ए महाराज.. ई का सब लिख दिये हैं? नौस्टेल्जिक काहे करते हैं हम सब को?
देर रात मोहल्लाइव पर रवीश की लगी पोस्ट के साथ यूट्यूब हमें विमर्श से बहाकर प्लेजर की तरफ लेकर चला गया। देसी मसाला सुनते और देखते हुए एक गाने को कुछ इस तरह से गाने का मन कर रहा है- जो बीच बजरिइया पकड़ी तूने मेरी मेरी बईयां,हथवा तोड़ दूंगी..
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