एक शगुन की तरह “पलट…” की याद…
♦ मृणाल वल्लरी
डीडीएलजे की चर्चा पढ़के मन थोड़ा रूमानी हो गया। यक़ीन नहीं होता कि डीडीएलजे चौदह साल पहले की बात है। वह साल स्कूल में मेरा आख़िरी साल था। यानी अगले साल से कॉलेज में जाना था। पटना जैसे शहर में आज से चौदह साल पहले हमें अपनी सहेलियों के साथ सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन डीडीएलजे देखने की हमारी हसरत लोकल केबल वाले ने पूरी कर दी। मैंने मोहल्ले की सभी दोस्तों ने साथ बैठ कर फिल्म देखी। पिक्चर क्वालिटी थोड़ी खराब ज़रूर थी और संवादों के साथ घर्र-घर्र की आवाज भी आ रही थी। लेकिन ये बात अब समझ में आती है। उस वक्त तो उसी पिक्चर क्वालिटी में राज हमारे दिलों पर राज कर रहा था। कहीं एक लेख में मैंने पढ़ा था कि पायरेसी आपका दोस्त है। सच है, अगर पायरेटेड सीडियां नहीं रहतीं तो…।
स्कूल के खाली पीरियड में जिनका गला अच्छा था, वह गाने लग जातीं- मेरे ख्वाबो में जो आए… और हम सभी ब्लैक बोर्ड के पास डांस करना शुरू कर देतीं। हर ग्रुप में चर्चा के केंद्र में थे सिमरन और राज। किसी के साथ कुछ भी हुआ तो डायलॉग निकलता- बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें हो जाया करती हैं। हद तो तब हो गयी, जब टीचर्स डे पर सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान हमने स्कूली परंपरा के उलट पारंपरिक वेशभूषा में भोजपुरी और देशभक्ति गीतों को छोड़ कर छोटे स्कर्ट पहन कर- “मेरे ख्वाबों में आये…” और “मेहंदी लगा के रखना…” पेश किया। लेकिन इस ख़ता के लिए हमें इतनी मामूली डांट मिली, जिसे आसानी से भुलाया जा सकता था।
हां, इन्हीं दिनों लड़कियों को एक नया नाम मिला – “सिमरन।” हमारी पीढ़ी की श्वेता, एकता, संगीता, प्रियंका खुद में एक “सिमरन” को ढूंढ़ रही थीं। फिल्म के रिलीज़ होते ही बाज़ार में काजोल का पहना ट्यूनिक स्कर्ट और पैरलल सूट भी आ गया था। काजोल ने नेक्स्ट डोर गर्ल वाले लुक को फैशन बनाया। खास था काजोल का चश्मा पहनना। अब ड्रीमगर्ल बनने के लिए अपने चश्मे पर शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं थी। भई “सिमरन” ने जो पहना था। हम स्कूल ड्रेस के अलावा जो, पहनते उस पर सिमरन की छाप थी।
हमारे फ्रैंड सर्किल में कोई लड़की अगर अपने ब्यॉयफ्रेंड-नुमा लड़के को कुछ ख़त-वत भेजती, तो अपना छद्म नाम सिमरन ही रखती। छोटे शहरों की लड़कियों के लिए सिमरन एक आइकन थी। उस दौर में हम टीनएजर्स लड़कियां अपने ख्वाबों में सिमरन थीं। अपने बाबूजी और भैया से डरते हुए भी…। सबसे मज़ेदार था “पलट…।” स्कूल से लेकर कॉलेज तक डीडीएलजे का “पलट…” वाला फार्मूला साथ था। एक हिप्पोक्रेसी की तरह हम “पलट…” वाला शगुन मानते थे। इस खुशनुमा मौसम में डीडीएलजे की याद सचमुच खुश कर गयी…।
(मृणाल वल्लरी। जनसत्ता की युवा जुझारू पत्रकार। दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए। सामाजिक आंदोलनों से सहानुभूति। मूलत: बिहार के भागलपुर की निवासी। गांव से अभी भी जुड़ाव।)









mrinal,
is lekh ko chavanni par lena chahoonga.wahan koshish hai ki DDLJ par dus lekh ho jayen.aap ki anumati ho to maza aa jaye.
ek nazar yahan dalen…
http://chavannichap.blogspot.com
बिंदास उठा कर छापिए… हमने भी चवन्नी से चंडी का माल उड़ाया था।
अजय जी
चवन्नी चैप पर अपना लिखा देख मुझे बहुत अच्छा लगेगा।
धन्यवाद।
वल्लरी, आपको कुछ और ज्यादा लिखना चाहिए था, आपने कंजूसी की है !
mam it was really fantastic n very intersting to read. when ddlj has released i was in 5th class n i saw that in theatr so m quite lucky . bt grt ya i think u should add sumthing more . thanks for telling me … all the best . n plz check my blog also
मृणाल
लेख पढ़ कर अच्छा लगा लेकिन मैं सहमत हूँ बाकि लोगों से. थोडा और लिखना चाहिए था. अपने आप से चौदह साल बाद फिल्म के माध्यम से मिलना बड़ा अच्छा और मासूम सा लगता है. फिल्म के पॉलिटिकल एंगल को शायद तुम सायास ही रोक गयी हो. फिर मौका मिले तो ज़रूर लिखना.
अच्छा लेख है। पर मुझे कुछ बातें उस वक्त भी अजीब लगी थीं। चूंकि बहुत अरसा हो गया इस लिए सब कुछ ठीक से याद करके तो नहीं लिख सकता। पर चुभती रहीं थी कुछ बातें। बहुत सोचने के बाद निष्कर्ष यही निकलता था बार-बार कि अगर आप करवाचैथ रखने में रैगुलर रहेंगी तो आपको छोटी स्कर्ट भी अलाउ की जा सकती है। ‘मैंने प्यार किया’ देखने के बाद भी यही ख़लिश सी रह गयी कि सलमान एकाघ बार अपनी मां को ‘सैक्सी’ तो कह देते हैं, पर पूरी कहानी में रीति-रिवाज़-परंपराएं यथावत चलती रहती हैं। बाद में यही सब एकता कपूर ने भी लपक लिया। फ़लस्वरुप सामाजिक बदलाव भी हमें उसी किस्म का देखने को मिला।
अगर मैं ग़लत हूं तो माफ़ करना दोस्तो। आजकल वैसे भी डरा-डरा सा हूं। और न डराना।
कुछ-कुछ उसी तरह से जैसे ब्लागर्स को पहले तो खूब लतियाया गया। अब बुलाया जा रहा है तो ‘हिंदी की सेवा’ के नाम पर। याद आता है होली के मौके पर लफंगे अश्लील पैम्फलेट्स भी हिंदी ही में छापा करते थे। कल तक जिन ब्लागर्स को इसी नज़रिए से देखा जा रहा था, आज के बाद उन्हें बालकनी की झालर माना जाएगा या अपने लिए सीढ़ी बनाया जाएगा, देखना दिलचस्प होगा।
काश! कोई सिमरन हमें भी चिट्ठी लिखती…यहां तो हुआ ये कि जो पहली चिट्ठी हमें मिली, वो रामरतन के नाम से लिखी गई थी. पप्पा ने शर्लक होम्स बनकर जो इन्क्वायरी की, तो उससे नतीज़ा ये निकला कि रामरतन तो पास के स्कूल के चौकीदार का नाम है, वो अंगूठाटेक है. जब पढ़ना-लिखना ही नहीं जानता था, तो चिट्ठी कैसे लिखता…उसके बाद हमारे साथ क्या हुआ, ये ना पूछिए तो भला! ख़ैर, हमारी चिट्ठी का सच तो पकड़ा गया, क्या पटना की किसी सिमरन की चिट्ठी की हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जांच नहीं कराई गई? चलिए, कुल मिलाकर डीडीएलजे ने कुछ और दिल धड़काए…ये जानकर अच्छा लगा. आपने भी खूब सरस लिखा…थोड़ा और डिटेल नहीं होना चाहिए था क्या…खूब कही..जबर्दस्त बधाई.
mrinal,
jaisa ki sabhi aagrah kar rahe hain.ismein kuchh jod kar mujhe bhej den.political angle ho ta achchha rahega.main umeedvar hoon.
अजय जी,
मैं कोशिश करती हूं।
देखे तो हम भी थे। लेकिन नहीं जानते थे कि इस फिलिम का इतना बड़ा महत्त्व है। हम तो बस फिलिम देखने के लिए देखते थे। जिस समय देख रहे थे, उस समय तो जरूर राज हमारे भीतर घुसा था और हम भी मने-मन बोलते थे कि पलट… पलट… पलट…। लेकिन कौन पलट के देखता है हमारी ओर।
तब हम भी सोचे थे कि बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं हो जाया करती हैं। लेकिन यह सोचने से दिल कहां माना है कभी कि मान जाता। जब भी कहीं हमारी सिमरन दिखाई पड़ी, हम मने-मन बोल पड़े- पलट… पलट… पलट…। लेकिन कहां कोई पलटता है हमारी ओर। हां, ई जरूर हुआ कि हम बार-बार पलट-पलट के देखते रहे कि अब कोई पलटेगा।
इस बीच एक बात और हो गया कि पलट के देखने को बहुत गड़बड़ चीज मानने लगे और सीधे देखने को सही। इसलिए आगे हम किसी देख लेने का रास्ता तो देखेंगे, लेकिन ईहो सोचेंगे कि कोई पलट के नहीं, बल्कि सीधे देखते हुए देख ले…
Mrinal really it’s nice article.. I recalled my school days.. Now u r gonna to be a great journalist.. Mere Khawabo main jo aaye.. usse kaho kabhi samne to aaye.. giv u a call soon..
बहुत बड़िया आपके लेख के बाद मुझे भी स्कूल के वो दिन याद आ गए जब हम भी सिमरन को पटाने के लिए गाते थे… हो गया है तुझको तो…प्यार सजना…। वाह क्या दिन थे…। जो ताज़गी ऊर्जा और बेपरवाही मै उस वक्त पाता था… बहुत अर्से बाद आपने फिर मुझे वहीं पहुंचा दिया… सिमरनों के बीच…
mrinal vallari ke jagah agar manoj bhardwaj hote to bhi kya itni pratikriyan aati.Excuse me vallari
एक बार एक ऑटो में बाकी चार लोग बिहारियों को कोस रहे थे कि सा… यहां आकर गंद मचा रहे हैं और चारो तरफ कब्जा कर रहे हैं। मेरे पास इन बातों को महत्त्व देने के लिए कोई तर्क मौजूद नहीं था। लेकिन उनमें से दो ने सीधे मुझे संबोधित करना शुरू किया। ऑटो जब मीठापुर के नहर और उसके बाद के नाले के ऊपर से गुजरने लगा तो मैंने उनसे निवेदन किया कि हां, सर जी, बिहारी तो चारो तरफ फैल रहे हैं और गंद मचा रहे हैं। अब आपके सामने विकल्प मौजूद है। ये बगल में एक तेज धार वाला नहर और उसके आगे कीचड़ वाला नाला है। उसमें कूद जाइए। आपकी सारी समस्या का समाधान हो जाएगा।
तो आरके गुप्ता जी, आपसे यह निवेदन है कि अपने साथ-साथ मनोज भारद्वाज को भी यह सलाह दीजिए कि वे कुछ ऐसा लिखें कि उन पर भी इतनी ही प्रतिक्रियाएं लिखें। हालांकि मृणाल वल्लरी ने इसी लेख का जो अगला हिस्सा लिखा है, उसे भी पढ़ने की कोशिश कीजिएगा।
धन्यवाद…
mrinalji. nice article. bite atit se wartman aur wartman se atit ki yatra par aapki najar hame patrakarita me bhi kucch prayog k liye prerit karti hai. kitna accha ho ki ham khabro me bhi kucch aisa hi prayog kare aur pathko ko atit ki yatra par le jakar wartman se jode. ham to isi najar se article samajh paye. hope kucch aur naya aapke madhyam se milega.
[...] लिख रखी थी। सोचा था कि अपनी होनेवाली ‘सिमरन’ को सुनाऊंगा। कभी-कभी कभार कोई लेख पढ़ [...]
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