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हम ब्‍लॉगिंग करते हैं, आप कहते हैं हिंदी की सेवा करते हैं

22 October 2009 10 Comments

♦ विनीत कुमार

mahatma gandhi international hindi university frontहम जैसे हजारों ब्लॉगर जो कि महीनों-सालों से कीबोर्ड पर किचिर-पिचिर करते आ रहे हैं, जो कि बौद्धिक समाज के लिए लेखन के नाम पर गंध फैलाने का काम है, आज उसे देश के एक अकादमिक संस्थान ने हिंदी की सेवा करने का नाम दिया है। कल से इलाहाबाद में महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय विश्वविद्यालय की ओर से हिंदी चिट्ठाकारी की दुनिया पर आयोजित दो दिनों की (23-24 अक्टूबर) होनेवाली राष्ट्रीय संगोष्ठी का मेल के जरिये जो हमें न्योता मिला है, उसमें लिखा एक वाक्य है कि – इस आयोजन की सफलता ब्‍लॉग लेखन के माध्यम से हिंदी की सेवा कर रहे आप जैसे सक्रिय चिट्ठाकारों की सहभागिता पर निर्भर करती है।

वैसे तो मेरी तरह हिंदी ब्लॉग समाज का शायद ही कोई ब्लॉगर हो जो कि अपने ऊपर किसी भी तरह के धर्मार्थ का लेबल लगाये जाने का मोहताज रहा है, इस मुगालते में जी रहा हो कि दिनभर खटने के बाद घंटे-आध घंटे के लिए जो कीबोर्ड खटखटाने का काम कर रहा है, उसके बूते उसे हिंदीसेवी होने का तमगा मिल जाए लेकिन हमारे इस काम को अगर कोई सेवा का नाम दे रहा है तो इसे हम घलुए में मिली हुई चीज़ मानकर थोड़ी देर के लिए तो ज़रूर खुश हो सकते हैं। सच कहूं, हम अब भी यही मानते हैं कि हमने कभी भी इस एजेंडे के तहत नहीं लिखना शुरू किया कि हम कोई सेवा का काम करने जा रहे हैं। बल्कि हमने तो सिर्फ इसलिए लिखना शुरू किया कि लिखते नहीं तो और क्या करते? मूंछ उगने के बाद से सात-आठ साल तक साहित्य और मीडिया के जरिये जिन भावों, शब्दों, अनुभूतियों और स्थितियों को जाना-समझा, उसे कहां फेंक आते। जिस बात को कभी मजाक में कहता रहा कि कब तक हम दूसरों का लिखा पढ़ते रहेंगे, उसे आज शिद्दत से महसूस करता हूं। हिंदी में रहकर सिर्फ लिख कर तो लेखक होने से रहे। फिर हम जैसे लफुआ की बात को छापनेवाला कौन सा कोई प्रकाशक मिल जाएगा? न्यूज रूम में हमारे साथ जो भी हुआ, अभावग्रस्त बचपन, नकारे हुए टीन एज और पानी खाती जाती जवानी जो बाकी साथियों के साथ अब भी जारी है, उसकी भड़ास लिखकर नहीं निकालते तो और क्या करते। अपने को नैतिक न भी मानें तो हम उस हैसियत तक कब तक पहुंचते कि रंगीन पानी पीकर बकना शुरू कर देते और फिर उस पर बौद्धिकता का मुलम्‍मा चढ़ाने में कामायाब हो जाते, हम कब उतना बड़ा कद हासिल करते कि नामी बनिया का मैल भी बिकता है के तहत लिखे जानेवाले साहित्य को अनर्गल करार देते। यकीन मानिए, तब तक तो हम बुढ़ा जाते। इसलिए हमने कभी भी कागजों पर अपनी हिस्सेदारी की मांग नहीं की। अलाय-बलाय (उल्टी-सीधी) लिख-छापकर नामचीन लोग महान होने के दावे करते रहे, हमने कभी भी उसका प्रतिकार नहीं किया। हम उनके महान होने में कभी भी अड़चन बनकर सामने नहीं आये। हमने बस इतना किया कि किसी तरह से काट-कपटकर पैसे जमा किये, लिखने का औज़ार ख़रीदा और अब पान-बीड़ी की लत न पालकर, मुंह में लेई लगाकर महीने में सात सौ-आठ सौ रुपये इंटरनेट का बिल भर रहे हैं और अपने एक-एक एहसासों को कंप्‍यूटर की कुंजियों पर पटकते जा रहे हैं। इसे आप हमारी कुंठा कहिए, फ्रस्ट्रेशन कहिए, बौड़ाहापन कहिए… जो जी में आये कहिए, न जी में आये मत कहिए।

ब्लॉगिंग करते हुए हमने कभी नहीं सोचा कि हम कोई गंभीर काम कर रहे हैं। वैसे भी अपने छुटपन को याद करना, मां की यादों में नास्टॉल्जिक हो जाना, हिंदी समाज पर लिखना और फिर जूते खाना, मीडिया संस्थानों की कमज़ोर नब्ज पर लिखकर धमकियां झेलना, ऑफिस में आप बलत्कार करते हैं या फिर सुहागरात मनाते हैं – पुरुष समाज से एक स्त्री का सवाल करना और प्राइम टाइम में आनेवाले एंकर का टेलीविजन को खुद ही गोबर का पहाड़ बताना… ये सब बौद्धिक समाज के लिए कब से गंभीर काम होने लगा? हमारे भाषाई स्तर के बेहयापन (जिसे कि अभी-अभी चैट बॉक्स पर अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि हम दो जुबान के लोग नहीं है, लिखने और बोलने के अलग-अलग) ने हमें बौद्धिक समाज के आगे और नीचा गिरा दिया। हमने चपर-चपर करना नहीं छोड़ा और सभ्य कहलाने से रह गये। हम भाषा के स्तर पर मोहल्लेपन के शिकार हो गये। हम चौराहे पर की जुबान में लिखने लग गये, इसलिए उनके बीच लील लिये गये। अब हवन जैसे पवित्र काम में जसधारी लोग एक-एक मुठ्ठी होम डालते हैं, वैसे ही सब कूड़ा है सब कूड़ा है कहते हुए इस समाज ने हमारे ऊपर लानते-मलानतें डाली। हम और कूड़ा लिखने लग गये। इस भाषाई कूड़ापन के बीच हमारे अनुभव, तेवर, समझ, खरा-खरा और सच्चापन दब गये। एक शब्द और वाक्य को पकड़कर ऐसे बैठ गये कि करतल ध्वनि से हमें वाहियात, बेकार, बकवास करार देने में बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी।

लेकिन, जब आयोजकों की ओर से हमें प्रस्तावित विषय भेजे गये तो हमें ही नहीं शायद औरों को भी ताज्जुब हो रहा होगा कि क्या हमने रोज़मर्रा की किचिर-पिचिर के बीच सोचने और विचार करने के इतने संदर्भ बिंदु पैदा कर दिये? यक़ीन न हो तो आप ही देखिए न कि किस तरह से ये प्रस्तावित विषय सूची इस बात का इशारा करती है कि देश के औसत समझ के पढ़े-लिखे लोगों ने सिर्फ पांच-छह सालों में विमर्श के इतने आधार खड़े कर दिये कि इस पर महीनों बहस चल सकती है।

1. हिंदी चिट्ठाकारी : इतिहास, स्वरूप और तकनीक
2. अंतर्जाल पर हिंदी भाषा : कुशल प्रयोग के औजार, ब्‍लॉग बनाने की तकनीक और प्रबंधन
3. हिंदी चिट्ठाकारी पर बहस के मुद्दे
4. चिट्ठाकारी की भाषा बनाम संप्रेषणीयता
5. अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य और पठनीयता
6. चिट्ठाकारी : समय प्रबंधन एवं उपादेयता
7. अभिव्यक्ति की उन्मुक्तता एवं इसमें निहित खतरे
8. ब्‍लॉग जगत के कुंठासुर/बेनामी या छद्मनामी टिप्पणीकार।

और अंत में, देर रात संतोष भदौरिया ने फोन करके बताया कि हमने टिकट मेल कर दी है, तो अपने उतावलेपन का शिकार होते हुए पूछ बैठा – और कौन-कौन आ रहे हैं सर? वो प्रदेश के क्रम से गिनाने लग गये। दिल्ली से अविनाश, मसिजीवी, यशवंत, समरेंद्र, रियाज़ुल हक़, इरफान, भोपाल से मनीषा पांडे, मुंबई से यूनुस खान, कानपुर से अनूप शुक्ल… तभी मैंने कहा – रुकिए सर मैं एक-एक करके नोट करता हूं। तब उन्होंने इस वायदे के साथ कि कल वो ऑफिस पहुंचते ही पूरी सूची मेल करेंगे, कहा कि हम चाहते हैं कि पूरी बातचीत बिना किसी औपचारिकता के हो। हम इस संकेत को किस रूप में लें कि अकादमिक संस्थान भी अगर ब्लॉग पर विमर्श के लिए अपने को तैयार कर रहा है और वो भी बिना औपचारिक हुए तो इसका मतलब ये है कि वो हिंदी में ज्ञान पैदा करने के लिए ब्लॉगिंग को अनिवार्य मानने लग गया है या फिर अब तक हमने जो कुछ लिखा उसे सामूहिक तौर पर मथकर वैचारिकी की एक नयी दुनिया की तलाश करना चाहता है… क्या ये इस बात का संकेत है कि आनेवाले समय में ज्ञान की खिड़कियां इनफॉर्मल राइटिंग और बौद्धिक चिंतन के बीच में जाकर खुलेगी और पढ़ने-पढ़ाने का एक नये किस्म का फ्यूजन वर्ल्ड पैदा होगा। आप क्या सोचते हैं, कुछ हमें भी तो बताएं?

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10 Comments »

  • abraham hindiwala said:

    vishay kisi ponga pandit ne nirdharit kiye hain.aap sabhi ko nathne ki koshish hai.jaise hindi sahitya mein kavita-kahani par vimarsh kiya jata hai.waise hi blog par bahas kar rahe hain.mujhe gandh aa rahi hi adhpake anaj ke sadan ki.please aap log blog ke ankur par hi phaphoond lane ki koshish na kare.

    samjhe ko samjhana sabs mushkol udyam hai.

  • anup sethi said:

    विनीत जी,
    आपने ब्‍लाग के विकास की कहानी सच्‍चाई और विनम्रता से लिखी है. हिंदी भाषा (खड़ी बोली) का इतिहास ज्‍यादा पुराना नहीं है. तकनीकी रूप से भी हाथ तंग ही रहा है. टाइपराइटर यहां लोकप्रिय नहीं हुए. यानी पढ़ने लिखने वाले वर्ग ने इस्‍तेमाल नहीं किए. जैसे अंग्रेजों ने कर लिए. मोहन राकेश टाइप करके लि‍खते थे. ज्ञानरंजन पोस्‍टकार्ड भी टाइप करके भेजते थे. बाबू लोगों को हिंदी टाइप करने की जरूरत नहीं पड़ी क्‍योंकि कामकाज की यानी सरकारी भाषा अंग्रेजी रही. कंप्‍यूटर में हिंदी की और भी ज्‍यादा दिक्‍कतें रहीं. हिंदी पाठक की कमी भी जग जाहिर है.

    ऐसे में अगर इंटरनेट पर हिंदी देवनागरी में दिखने लगे तो कम चमत्कारी बात नहीं है. शुरू शुरू में हमारे दफ्तर में लोग कंप्‍यूटर को हाथ लगाने से डरते थे. आईटी वाला बंदा इन्‍नोवेटिव था. उसने चैटिंग करना और गेम खेलना सि‍खाया कि लत लग जाएगी तो आगे चल कर काम भी करेंगे. ब्‍लागरों का काम भी हिंदी के प्रचार प्रसार में योगदान है.

    हिंदी लेखक समाज शुद्धतावादी किस्‍म का रहा है. वह फिल्‍म लेखन को और फिल्‍मी लेखन करने वालों तक को मान्‍यता नहीं दे पाया. आप भी उस नजर से ब्‍लाग को मत देखो. आज अगर ब्‍लागिंग पर विमर्श हो रहा है तो इसका स्‍वागत किया जाना चाहिए. कुछ साल पहले मैंने वागर्थ में इंटरनेट में हिंदी पर कालम ल‍िखा था. एक किस्‍त ब्‍लागों पर भी थी. ब्‍लागरों के विष्‍ायों में गजब की विवधिता थी. लेखक भी हिंदी के पेशेवर लेखक नहीं थे. मुझे वह गद्य का नया संस्‍करण ही लगा था. और बहुत खुशी भी हुई थी. भाषा के विकास में इस तरह के काम का महत्‍व है. जब हम यह सोचकर अवसादग्रस्‍त हो जाते हैं कि हिंदी समाज हिंदी की परवाह नहीं करता, हिंदी मर जाएगी वगैरह तब ब्‍लाग जैसे अभिनव प्रयोग देखकर मन उत्‍साहित होता है.

    बुरा न मानें अभी हिंदी के ज्‍यादातर ब्‍लाग मेमनों और शावकों की तरह हैं. इसलिए उछल कूद मची रहती है. धीरे धीरे ठहराव, गंभीरता और उपादेयता बढ़ती जाएगी. महात्‍मा गांधी विश्‍वविद्यालय हिंदी को समर्पित विश्‍वविद्यालय है. उन्‍हें नई राहें ढूंढनी ही हैं. इसलिए इस काम को आगे बढ़ाया जाए.

  • रविकान्त said:

    विनीत एवम अन्य साथियो,

    चिट्ठाकारी के कुंभ के सफल होने की शुभकामनाएँ, उम्मीद है कि आप हमेशा की तरह वहाँ की बातचीत
    का स्वाद हमें चखाते रहेंगे.

    विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि नामवर जी वहाँ पहले से मौजूद हैं, किसी और काम से, और आयोजक
    इसीलिए उनको भी बुला रहे हैं, वे ख़ुद इस बारे में बहुत संकोच कर रहे हैं, जो कि उन्हें करना चाहिए ही. लिहाज़ा इस मामले को न तो ज़्यादा तूल देने की ज़रूरत है, न ही चिट्ठा-जगत और हिन्दी साहित्य के बीच संबंधों के इतिहास में कोई क्रांतिकारी मोड़ देखने की आवश्यकता है. भई क्या चाहिए चिटठाकारों को अब? हिन्दी बौद्धिकता की दैनिक पाराकाष्ठा पर बैठा अख़बार जनसत्ता जब नियमित रूप से उन्हें छाप रहा है, तो अब किस पहचान की ज़रूरत बाक़ी बचती है. हाँ, दूसरे सवाल जो तुम्हारी पोस्ट में उठाए गए हैं, उनपर हम सबको सोचना चाहिए, और अपनी दुनकानदारियों से परे जाकर, तभी मज़ा आएगा. जो लोग वहाँ जुट रहे हैं, उनसे काफ़ी उम्मीद बँधती है, क्योंकि वे चिट्ठे की रोज़ाना रियाज़त से जुड़े लोग हैं.

  • दिलीप मंडल said:

    दुनिया के 49 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं और ये दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन इंटरनेट पर मौजूद 10 सबसे बड़ी भाषाओं में हिंदी कहीं नहीं है। इस लिस्ट में चीनी है, इंग्लिश है, स्पैनिश, फ्रैंच, अरबी, पुर्तगाली, जर्मन, जापानी, कोरियन और इटैलियन है। हिंदी नहीं है। जबकि सिर्फ 12 करोड़ लोग जापानी और 21 करोड़ लोग पुर्तगाली बोलते हैं।
    (http://www.iamai.in/Upload/Research/Vernacular%20Content%20Report_29.pdf)

    भारत की आबादी दुनिया की आबादी की लगभग 16 फीसदी है, लेकिन यहां इंटरनेट के यूनिक विजटर सिर्फ 3.2 करोड़ हैं। जबकि चीन में इंटरनेट के यूनिक विजटर 17.7 करोड़ हैं। दुनिया भर में होने वाले इंटरनेट सर्च में भारत से होने वाले सर्च का हिस्सा सिर्फ 2 परसेंट है। (http://comscore.com/)

    एक और सच ये कि देश के गांवों में 12 साल से ज्यादा उम्र के 56.8 करोड़ लोग रहते हैं। भारत सरकार ने 23 जुलाई 2009 को संसद को बताया कि भारतीय गावों में सिर्फ 3 लाख ब्रॉडबैंड कनेक्शन हैं। गावों में सिर्फ 33 लाख लोग ही इंटरनेट के सक्रिय यूजर हैं। यानी अभी तो डगर कठिन है और सफर लंबा है।

    ये तो हो गई कुछ कड़वी सच्चाइयां। देश की दस सबसे पॉपुलर साइट्स में हिंदी की किसी साइट को हम कब देखेंगे, ये कहना मुश्किल है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या कंटेंट और भाषा में लोकल हुए बगैर भारत का इंटरनेट ग्लोबल हो सकता है?

    एशिया की टॉप 10 साइट्स में चार साइट्स चीन की हैं। एक कोरियाई भाषा में है। ये बताने की जरूरत नहीं है कि एशिया की सबसे लोकप्रिय 10 साइट्स में कोई भारतीय या हिंदी साइट नहीं है। हम दरअसल फोकट में ही खुद को आईटी सुपरपावर मानते रहते हैं, हमारा योगदान ये जरूर है कि कि विश्व आईटी इंडस्ट्री को इंग्लिश जानने वाला सस्ता लेबर उपलब्ध कराते हैं।

    और जहां तक हिंदी की बात है तो भारत की 10 सबसे लोकप्रिय साइट में हिंदी की कोई साइट नहीं है, कुछ साइट हिंदी का थोड़ा बहुत कंटेंट जरूर देती हैं। वैसे एक महत्वपूर्ण बात ये है कि चीन का इंटरनेट बेहद लोकल है। वहां सबसे पॉपुलर सर्च साइट बायडू चीनी भाषा में है। भारत के सभी दस टॉप सर्च इंजन मुख्य रूप से इंग्लिश में हैं और उनमें भी ज्यादातर विदेशी हैं। तो समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर है अपने देश में।

    और एक बात। दुनिया में शायद ही किसी भाषा के उतने सेवक होंगे, जितने कि हिंदी भाषा के हैं। ये बेहद खतरनाक बात है।

    संगम के मंथन से कुछ रास्ता निकले तो बात है।

    शुभकामनाएं।
    dilipcmandal@gmail.com

  • रंगनाथ सिंह said:

    सभी ब्लागरों से यही कहना चाहुंगा कि हिन्दी की सेवा तो आप लोग ने कर दी। जाने या अनजाने। निश्चय ही यह सेमिनार ब्लागिंग के इतिहास में संगेमील बनेगा। जिस समारोह का आयोजन विभूति नारायण राय और अध्यक्षता नामवर सिंह कर रहे हों उसके सफल होने में कोई शंका नहीं हो सकती।

    ब्लागिंग से जुड़ा होने के कारण मैं इन दोनों महानुभावों और इस आयोजन से जुड़े सभी लोगों का तहेदिल से आभार जताता हूं। मुझे बड़ी ही शिद्दत से उस पल का इंतजार रहेगा जब वहां प्रस्तुत किए गए भाषण/पर्चे मोहल्ला के माध्यम से पढ़ने को मिलगें। मुझे विश्वास है कि जहाँ इतने सुविख्यात ब्लागर मिलकर ब्लाग की दुनिया के बारे में विचार-विमर्श करेंगे उस समारोह की रिर्पोंटिंग ब्लाग दुनिया पर जरूर आएगी। इसलिए इसके लिए किसी आग्रह-अनुग्रह की जरूरत नहीं है।

    कार्यक्रम की रूपरेखा पाठकों के सामने भी प्रस्तुत कर दिया जाए तो अच्छा लगेगा। खास तौर पर वक्ताओं के नाम और उनके द्वारा निष्पादित विषयों के बारे में। विनीत द्वारा यहां प्रस्तुत विषयों को देखकर महसूस हुआ कि ब्लाग की दुनिया की बौद्धिक गहराई हिन्द महासागर से कम नहीं है।

    शुभकामनाआंे सहित।

    अब्राहम हिन्दीवाला आपसे मेरी पूरी सहानुभूति है। और आप शायद जानते नहीं कि जब ज्ञान की आंधी चलती है तो उसमंे बड़े-बड़े बरगद उखड़ जाते हैं। अब ये आंधी ब्लाग के दुनिया के तरफ रूख कर चुकी है। आप के हित में यही बेहतर है कि आप किनारे हट जाएं। इस तरह की राय देते रहेगे तो !!

  • रंगनाथ सिंह said:

    भूल-सुधार- प्रोग्राम की अध्यक्षता विभूति नारायण राय करेंगे। नामवर सिंह उद्घाटन भाषण देंगे, अध्यक्षता नहीं करेंगे।

  • madan said:

    as i understand that whenever we do any work, we must do our home work. in fact there is nothing like that. as i came to know that dr santosh bhadoria has nothing to do from blog. he does not know abc of computer,but organising a national seminar on BLOG.
    yahi hai INDIA . the on going topic is not new. in any topic of seminar u can put up this bits. it is only techniqe how can we mak ahuge public relation on public money. this is what, bhadoria is doing and he is a strong candidate for professorhip in allahabad university and and also in vardha university, and he is trying to qulify this hurdle with the help of DR NAMVAR SINGH as he has already done for readership with the help of DR KAMALA PRASAD

  • abraham hindiwala said:

    blog apne boote khada hua.ab mathadhish use apni giraft mein lene ke mood mein hain.sahitya ke log blog ke ek sadsya ke taur par rahen.tode sansthanik paise kharch kar neta ban gayae.aur ab batayenge ki kya achchha aur kya bura..hahahahaha

    hindi sahitya ne hindi jati aur pradesh ko koop mandook banane ka kaam jyada kiya hai.ab blog ko usi koop mein dhakelne ki taitari hai.

    yah aashanka hai.ho sakta hai sahityakar blog jagat ke naye bhikshu hon.swagat hai bhai sabhi ka,lekin apne baat kahne se koi kinare kaise kar sakta hai.blog ki democracy mein sahitya ke samntvaad ki gunjaish nahin hai.

    samjhe rangnath babu aur baua log.

  • रंगनाथ सिंह said:

    अब्राहम हिन्दीवाला आपको खतरे उठाने का शौक लगता है। इसलिए आप बोले जा रहे हैं। बोलिए। आप देख ही नहीं रहे कि किस तरह से हिन्दी जगत की तीन पीढ़ियां,नामवर सिंह,विभूती नारायण राय एवं हमारे ब्लागर भाई एक मंच पर कदम ताल करेंगे !!

    किसी नासमझ ने आयोजकों के ब्लागिंग से परिचय पर सवाल उठाया है। मैं पूछता हूं ऐसा कब हुआ कि साहित्यिक आयोजनों में साहित्यिक परिचय आवश्यक पात्रता रही हो। ऐसा कब हुआ है कि बौद्धिक गोष्ठियों में बुद्धि से परिचय होना आवश्यक पात्रता रही हो !! विश्व हिन्दी सम्मेलन की नजीर तो सबके सामने ही है। फिर ब्लागिंग को लेकर दोहरे मापदण्ड क्यों ??

    और आप ये बार-बार डेमोक्रेसी- डेमोक्रेसी क्या चिल्ला रहे हैं। आप भूल रहे हैं ये सारे ब्लागर हिन्दी के ब्लागर हैं। हिन्दी के। हिन्दी तो समझते हैं ना। लग रहा है आप अपनी जड़ों से कट गए है। इस समारोह की नीयत और मंतव्य पर सवाल खड़ा करने से बाज आइए। हो सकता है आप अपनी जान बचा भी लें लेकिन गर कोई नौजवान आपकी बातों के बहकावे में आकर कुछ ऐसा-वैसा लिख बैठा तो उसका तो फ्यूचर ही पंचर हो जाएगा !!

    मैं तो चाहता हूं कि ज्ञानपीठ,साहित्य अकादमी और राष्ट्रीय पुरस्कारों में ब्लागर का हिस्सा मिलना चाहिए। अपनी ताकत तो ब्लागरों ने दिखा दी है।

    :- पता नहीं मोहल्लालाइव के संचालक तक मेरी अपील पहुंची की नहीं। ब्लागिंग पर प्रस्तुत की जाने वाली अतिमहत्वपर्ण वक्तृताओं को हम तक पहुंचाने के बारे में उन्होने कोई व्यवस्था की या नहीं ??
    नामवर सिंह ब्लागिंग के बारे में जो उद-घाटक भाषण देंगे उसे लेकर तो मन में तीव्र जिज्ञासा है। संचालक को कम से कम से उसी लाइव र्रिपांेटिग की व्यवस्था जरूर करनी चाहिए।

  • abraham hindiwala said:

    किसी नासमझ ने आयोजकों के ब्लागिंग से परिचय पर सवाल उठाया है। मैं पूछता हूं ऐसा कब हुआ कि साहित्यिक आयोजनों में साहित्यिक परिचय आवश्यक पात्रता रही हो। ऐसा कब हुआ है कि बौद्धिक गोष्ठियों में बुद्धि से परिचय होना आवश्यक पात्रता रही हो !! विश्व हिन्दी सम्मेलन की नजीर तो सबके सामने ही है। फिर ब्लागिंग को लेकर दोहरे मापदण्ड क्यों ??

    aapke jawab mein meri aashanka nihit hai..shukriya.

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