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विजयशंकर चतुर्वेदी द्वारा लेखक संघ का बहिष्कार

24 October 2009 32 Comments

♦ विजयशंकर चतुर्वेदी

पहले सोच रहा था कि मोहल्ला लाइव पर चल रहे इस इकतरफा कीचड़ उछालू कार्यक्रम में क्यों हाथ भिड़ाया जाए। लेकिन जिस तरह की टिप्पणियाँ चंद लोग नाम बदल-बदल कर रहे हैं उससे जरूरी लगता है कि अपना पक्ष हलके से ही सही रख दिया जाए। साहित्य और ब्लॉग जगत में कुछ सुधीजन मुझसे परिचित हो चले हैं। ऐसे में मेरा चुप रहना कहीं यह सन्देश न दे दे की जो पत्नी ह्त्या की बातें उड़ाई जा रही हैं वे सत्य हैं। शायद यही वजह है कि मुबई से बाहर के लोगों ने जो एकाध टिप्पणियाँ की हैं वे एक किस्म के कृत्रिम इम्प्रेशन की वजह से की हैं। मैं उन्हें दोष नहीं देता। पहले भी मेरे हर लेख पर कुछ लोग इस तरह की ‘हत्यारा-हत्यारा’ टिप्पणियाँ करते रहते थे जिसके चलते मुझे अपने ब्लॉग में मोडरेटर लगाना पड़ा था। दरअसल यह कुछ लोगों की लगातार व्यक्तिगत चिढ़ और ईर्ष्या का नतीजा है जो अब नफ़रत में बदल गयी है। जानता हूँ कि इनकी संख्या बेहद कम है और इनको मैंने कभी भाव नहीं दिया। ये लोग चाहते थे कि मैं पूरी तरह नष्ट हो जाऊं जो नहीं हुआ। लेकिन हमारे यहाँ कहावत है कि गिद्धों के चाहने से वृद्ध नहीं मरा करते।

मुंबई जनवादी लेखक संघ का मैं आज भी सम्मान करता हूँ लेकिन किसी व्यक्ति नहीं बल्कि एक लेखक संगठन के तौर पर। उसमें भी अच्छे-बुरे लोग सक्रिय होंगे, उनकी अपनी-अपनी शख्सियतें होंगी। लेकिन पिछले 10 से भी अधिक वर्षों से मुंबई जलेस के किसी आदमी ने यह खोज-खबर नहीं ली कि विजयशंकर जी रहा है या मर गया। उसके पहले भी मैं ही लोगों से जाकर मिलता था। पत्नी के साथ इनके घर आया जाया करता था। पत्नी की दुखद मृत्यु के बाद मैं 4 साल बेरोजगार रहा। एक कमरे में घुट-घुट कर जीता रहा। क़र्ज़ ले-लेकर गाँव पैसे भेजता रहा। लेकिन किसी ने मुझसे फोन पर बात तक नहीं की। मेरी स्वर्गीया पत्नी के प्रति अचानक संवेदनशील हो रहे इन लोगों ने कोई सुध नहीं ली। ऐसा मैं आत्मदया के लिए नहीं बल्कि जलेस और उसके द्वारा मुझ पर हमला करने के लिए छोडे गए तिलंगों की बातों को पढ़कर कह रहा हूँ।

वैसे भी 10 साल का हमारा दाम्पत्य जीवन क्या इन लोगों के भरोसे चलता रहा था? गंदी टिप्पणियाँ करने वाले मृत्यु का वैसा दृश्य खींच रहे हैं जैसे वे वहां मौजूद थे और वीडियो शूट कर रहे थे। इनमें से एक भी आदमी बता दे कि 10 वर्षों के पहले भी कौन मेरे घर आया था? तब इन्हें कैसे इल्हाम हो गया कि मैं पत्नी का जीवन नरक बनाए हुए था? मुबई जलेस के लोग जानते हैं; इसलिए मानेंगे कि मैंने पत्नी को ताले में बंद करके कभी नहीं रखा। अक्सर सभा-गोष्ठियों में उसे ले जाया करता था। इन लोगों के घर भी ले जाता था।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे दाम्पत्य जीवन में कोई खटपट नहीं होती थी। कई बातों को लेकर हमारे बीच तनाव उत्पन्न हो जाता था। मेरी माँ को पैसे भेजने को लेकर नोक-झोंक भी होती थी लेकिन मामला कभी गंभीर नहीं हुआ। मेरी बेटी ने स्वयं अपने मामा-नाना से कई बार कहा है कि पापा ने कभी उस पर या उसकी मम्मी पर हाथ नहीं उठाया था। जिन लोगों को तस्दीक़ करना हो वे मेरे घर आकर देख सकते हैं कि पत्नी की मृत्यु के 10 वर्षों बाद भी उसके कपड़े सहेज कर रखे हुए हैं, बेटी की किताबें-कॉपियां रखी हुई हैं। यह तय होने पर कि मेरे अकेला हो जाने के बाद अब बेटी मामा के यहाँ ही पलेगी मैंने पत्नी के तमाम जेवर उसके माता-पिता को सौंप दिए थे और आज तक पलट कर नहीं पूछा कि उनका क्या हुआ।

ये सज्जन कल्पना भी नहीं कर सकते कि हम कितने साहचर्य और सुख से रहते थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे 10 वर्षों के दाम्पत्य काल में वह बमुश्किल 3 या 4 बार मायके गयी थी। मैं फिर कहता हूँ उसके द्वारा आवेश में उठाया गया वह एक ऐसा कदम था जिसे आप आत्महत्या तक नहीं कह सकते। लेकिन लोग बार-बार मुझे हत्यारा कहने से नहीं चूक रहे क्योंकि वे वैसा ही मानना चाहते हैं। इसमें उन्हें सुख मिलता है।

एक जगह लिखा गया है कि मैंने पत्नी की मृत्यु के तुंरत बाद शादी की व्यग्रता दिखाई थी। जबकि तथ्य यह है कि उस दुखद घटना के चार साल बाद तक परिवार के लगातार पड़ते दबाव के बाद मुझे मजबूरी में यह निर्णय लेना पड़ा था। मेरे मुंबई के ही अन्य मित्र जानते हैं कि सुमन की मृत्यु के बाद मैंने कैसे अपना एक-एक पल मौत के घटाटोप में गुजारा है और कई बार अवसाद में डूबकर खुद मृत्यु के करीब पहुँच कर लौटा हूँ।

यहाँ एक बात और स्पष्ट कर देना जरूरी है कि पत्नी ने मृत्यु के पहले जो बयान दिया, अबोध बेटी ने जो पुलिस से कहा उसके आधार पर केस बंद हुआ था, किसी गृह मंत्री या पुलिस आयुक्त के कहने पर नहीं। फोन करने की सिर्फ बातें हुई थीं। पुलिसिया बयानों के वक्त मैं अपना पैर तुडाये स्ट्रेचर पर पड़ा था और बयान भी इन्हीं कुछ लोगों के सामने हुए थे… लेकिन अमानवीय और जालिम टिप्पणीकार ईर्ष्या और द्वेष से इतने कालकूट हो चुके हैं कि सुनी-सुनाई बातों पर घनघोर वाहियात और झूठे दावे कर रहे हैं। फाइल खुलवाने की धमकी दे रहे हैं, मेरी नौकरी चाट लेने की बातें कह रहे हैं। अब पाठकगण खुद फैसला करें कि समाज में चेहरा चमकाने वाले नकाबपोश और असल हत्यारे कौन हैं। ये एक ज़िंदा कवि को मृत्यु के रास्ते पर धकेल रहे हैं।

एक टिप्पणीकार का कहना है कि महाराष्ट्र जलेस का पत्र प्रकाशित होने के बाद मैंने बौखलाहट में साथी ब्लोगरों को फोन करना शुरू कर दिया कि मेरे समर्थन में एक लाइन लिख दें। यह सब पढ़कर हंसी आती है। जिस दिन यह पत्र प्रकाशित हुआ उस दिन मैं मुंबई में था ही नहीं। उसके तीन दिन बाद जब मैं कल्याण स्टेशन पर ट्रेन से उतर रहा था तो प्रणब प्रियदर्शी का फोन आया कि ऐसा-ऐसा हुआ है। मैंने उससे कहा कि इसमें कोई नई बात नहीं है और मैं कल्याण से सीधे दफ्तर चला गया। सबूत के तौर पर मैं ट्रेन के आरक्षित टिकट भी दिखा सकता हूँ। लेकिन जैसे ही प्रणब ने कुछ लिखा ये उस पर पिल पड़े। उसका चरित्रहनन करने से भी बाज़ नहीं आये। अब लोगों को समझ लेना चाहिये कि ये खुद कैसी प्रवृत्ति के लोग हैं। खुद इनकी पत्रकारिता और साहित्य में कोई औकात बन नहीं सकी तो ये लोगों के चेहरों पर कालिख पोतने में जुटे हुए हैं।

कहने का मतलब यह है कि इन सारे लोगों ने मुझसे ईर्ष्या और नफ़रत के चलते इतना झूठ गढ़ लिया है और उसे ही सच मानने लगे हैं। यह मानसिक विकार है। मुझे हत्यारा कहने वालों में शायद इतनी भी संवेदनशीलता नहीं बची कि वे 10 वर्ष पूर्व स्वर्गलोक सिधारी मेरी पत्नी की बार-बार ह्त्या क्यों कर रहे हैं। अब वे मेरी बेटी को भी इसमें घसीट लाये हैं। अपना केस मजबूत करने के लिए ये लोग मेरा चरित्रहनन करने पर तुले हुए हैं। पाठक और लेखकगण इन क्रूरकर्माओं की असलियत जान लें।

इनकी हज़ार कोशिशों के बावजूद मेरा कविता संग्रह छपा। इनके बहिष्कार के बावजूद उसका लोकार्पण भी धूमधाम से हुआ। आप सुधीजनों के प्रताप से उसकी चर्चा भी हो रही है। इससे इन निर्दयी और कुंठित लोगों के कलेजे पर सांप लोट रहा है।

महाराष्ट्र जलेस ने बहिष्कार की घोषणा करके मुझ पर अहसान ही किया है। 10 वर्षो से मुझे आइसोलेशन में धकेलने के बावजूद मैं इस मुगालते में था कि ये मेरे शुभचिंतक लोग हैं। मैं अब भी इस मुगालते में रहना चाहता हूँ कि कुछ लोग अब भी वहां मेरे शुभचिंतक होंगे। आखिरकार मेरे दाम्पत्य जीवन तथा लेखन के शैशव काल से मेरा इनसे जुड़ाव रहा है। यहाँ मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं मूलतः गाँव का आदमी हूँ और मुझसे सामान्य व्यवहार तथा शिष्टाचार में कुछ गलतियां अवश्य हुई होंगी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं हत्यारा या साम्प्रदायिक हो गया। लेकिन अब जबकि इन लोगों से कोई वास्ता ही नहीं रहा तो मैं भुजा उठाकर स्वयं महाराष्ट्र जनवादी लेखक संघ का बहिष्कार करने की घोषणा करता हूँ।
इसके बाद अब यह बहराबाड़ा मेरी तरफ से बंद समझा जाए। जिसे जितना चरित्रहनन करना हो करता रहे। मैं इतना ही आग्रह करूंगा कि कहीं से मिले तो मेरा कविता-संग्रह ‘पृथ्वी के लिए तो रुको’ पढ़ें, जो राधाकृष्ण प्रकाशन से छपा है। मेरे निजी जीवन में ज्यादा पड़ने और पढ़ने जैसी कोई दिलचस्प बात ही नहीं है।

धन्यवाद!

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32 Comments »

  • पूर्णिमा said:

    ’विजय शंकर चतुर्वेदी बहाने हिन्दी साहित्य में एक नया मुद्दा उभर कर आया है.अनेक लोग अब सुझाव दे रहे हैं कि हिन्दी में पत्नी -उत्पीड़्क कवियों की एक विशेष श्रेणी है.ऐसे कवियों को पुरस्कॄत करने की एक खास व्यवस्था होनी चाहिये..कविता का नैतिकता, मूल्य-बोध, पारदर्शिता और कर्म व आचरण की शुचिता से क्या वास्ता.?कविता तो हमारे महान आचार्य नामवर सिंह के अनुसार केवल शब्द -क्रीडा़ है. तो कवियों छूट है तुम्हें–बाहर स्त्री के प्रति अथाह प्रेम, और अनुराग और निजी जीवन मे घरवाली की रोज रोज ठोक-पिटायी. खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन, अराजकता और हिंसा. जाओ कविता तुम्हारे सारे पापों को ढक लेगी . वह तरण तारिणी है . वह तुम्हारे व्यक्तिगत आचरण का मैला ढोती सदा- नीरा है. कवियों तुम प्रिविलेज क्लास के सदस्य हो.क्योंकि तुम कागज पर कुछ उगलते रहते हो . तुम पर कोई कायदा कानून नहीं, कोई अदालत नहीं . तुम्हारा कोई कन्फ़ेशन नही, कोई आत्म -स्वीकृति नहीं , कोई आत्म- साक्षात्कार नहीं , कोई पीर नहीं. कोई प्रायश्चित नहीं,चल जो हुआ सो हुआ. बस्ता उठा और काम पर निकल .रात गयी सो बात गयी. .जीवन और कविता दो अलग चीजें हैं.जो इनमे कोई तारतम्य देखना चाहता है, वह तुम्हारे प्रति ईर्ष्यालू है. जो तुम पर सवाल उठायेगा वह तुम्हारी महान प्रतिभा से जलता है. पुलिस के रेकार्ड में तुम्हारे खिलाफ़ सबूत नहीं और इसीलिये तुम निर्दोष हो.मनुष्यता की अदालत में तुम्हारी कोई पेशी नहीं होगी क्योंकि स्त्री के जल मरने के बाद तुमने उसके गहने उसके मां -बाप को लौटा दिये. वाह क्या जज़्बा है., क्या नेक दिली, क्या खूलुस, क्या दरियादिली. .जीवन में तुम्हारा पर्सनल केवल पर्सनल है,और तुम्हारा सार्वजनिक केवल तुम्हारे शब्दों से वाबस्ता है.. चारदीवारी के भीतर तुम्हारी आंखों के सामने तुम्हारी स्त्री मिट्टी का तेल छिड़्क कर जल मरती है , तुम्हारी छोटी सी मासूम बच्ची यतीम हो जाती है और तुम सवाल उठाने वालों से कहते हो अरे दुष्टों क्यों मेरी प्रतिभा से जल रहे हो . क्यों कुढ रहे हो मेरे कविता- संग्रह की चर्चा से. सवाल एक तुम्हारा ही नहीं है विजय शंकर. ऐसे बेशुमार कवि हैं , जो तुम्हारी ही इस बिरादरी के हैं .किस कवि ने किस मात्रा में अपनी घरवाली पर शारीरिक जोर अजमाइश की है , उसे मानसिल विक्षिप्तता या खुदकुशी तक पहुंचा दिया है , ,उस हिसाब से उसकी कविताऒं पर पुरस्कार.सम्मान.नागरिक अभिनन्दन,शौर्य-चक्र, तमगे आदि का प्रबन्ध होना चाहिये.जिन कवियों ने सचमुच अपनी घरवालियों को मार ही डाला है ,उन्हे उनकी विशेष उपलब्धियों के लिये आजीवन फ़ेलोशिप दी जानी चाहिये.यदि ये सुझाव पर्याप्त न हों तो कुछ और मौलिक सुझाव भी दिये जा सकते हैं. जय हो. जय हो.

  • आलोक said:

    पूर्णिमा बहन, भाई भी हो सकते हो (बेनामियों की क्या जात? उनकी पैदाइश का क्या जायज-नाजायज होना?) क्या आपको पता है कि महाराष्ट्र जलेस का जो बीसियों साल से एक मेढक जैसा दिखनेवाला पदाधिकारी है उसने अपने घनघोर सामंती संस्कारों के चलते मात्र १४ वर्ष की उम्र में अपनी बेटी की शादी कर डाली थी. उसे कौन-सा ईनाम देना चाहेंगी/चाहेंगे आप? उस मेढक ने जब अपनी ही बेटी को दाम्पत्य जीवन का मजा इतनी जल्दी चखा दिया तो वह माकपा का सांस्कृतिक मोर्चा किस गुणवत्ता से संभालता होगा इसकी सहज कल्पना की जा सकती है!

  • khareekharee said:

    विजय शंकर जी यह आप अपने बचाव में दलील दे रहे हैं? सच भी तो बोलो महाराज. जिस शराब ने तुम्‍हें बरबाद किया उसका जिक्र तक नहीं. दस साल पुराने इस हादसे में शराब ने क्‍या रोल अदा किया है, जरा सच तो बोलो. आज तक शराब पी पी के क्‍या गुल खिलाते हो, वह भी तो बता दो. मासूम बनने से क्‍या होगा. बहिष्‍कार करने से भी क्‍या होगा. इस बात का कोई मतलब भी है? अभी यह हाल है, अगर कभी आत्‍मकथा लिखोगे तो भी सच्‍चाई से मुंह चुरा जाओगे. तुम तो कवि बनते हो. कोई मतलब है इसका. जरा आइने के सामने खड़े होकर खुद को देखो. दुनिया को यूं बरगलाओ मत. अपने अंधेरे कोनों को स्‍वीकार करने की हिम्‍मत जुटाओ. भगवान तुम्‍हारा भला करेंगे.

  • rakesh said:

    विजय शंकर

    हिंदी क्षेत्र के लेखक उत्तरप्रदेश-बिहार आदि की जिस पिछड़ी पृष्ठभूमि से आते हैं, ससे उत्पन्न उनके जीवन के सचमुच के निजी प्रसंगों को उनकी शारीरिक बनावट का जिक्र कर तुम अपने चरित्र की हिमालय जैसी भूलों और विसंगतियों पर परदा डालना चाहते हो। एकमात्र प्रश्न है कि तुम्हारी पत्नी ने किसी क्षणिक आवेश में नहीं तुम्हारे कुकर्मों से तंग आकर आत्महत्या की थी। और सिर्फ बेटी का मुंह देख कर उसने मरते समय पुलिस के सामने बयान बदल दिया था। जिस कारण तुम जेल और फांसी से बचे। आज इसी बात की आड़ लेकर तुम खुद को पाक साबित करने का खेल खेल रहे हो। भारतीय समाज और कानून दोनों ही ऐसे हैं, कि अधिकांश अपराधियों को सजा मिलना तो दूर वे कानून की चपेट में आने तक से बच जाते हैं, तुम एक ऐसे ही अपराधी हो। तुम कहते हो कि तुम्हारी कविता की कीर्ति से लोग जल रहे हैं। नहीं विजयशंकर, यह सारे देश का हिंदी साहित्य से जुड़े लोग जानते हैं कि इस मुंबई में हिंदी साहित्य से जुड़े बीसियों प्रमुख लोग रहते हैं – जगदंबा दीक्षित, सुधा अरोड़ा, अनूप सेठी, विजय कुमार, जीतेंद्र भाटिया, निलय उपाध्याय, विनोद दास, आलोक श्रीवास्तव, रमेश राजहंस, शैलेश सिंह, हरि मृदुल, संजय भिसे… इनमें से कोई तुम्हारी कविता और कीर्ति से नहीं जल रहा है। तुम कहते हो कि दस साल पुरानी घटना को फिर से याद दिला कर तुम्हारा चरित्र हनन किया जा रहा है। ऐसा नहीं है विजय, बात तो तब शुरू हुई जब तुम्हारे कविता संग्रह के प्रायोजित लोकार्पण में मुंबई के किसी लेखक ने शिरकत नहीं की तो तुम आपा खो बैठे और फोन करके लेखकों के घरों में उनकी पत्नियों-बेटियों को गंदी गालियां देने लगे, तभी तुम्हारी असलियत सामने लाने की जरूरत पड़ी। तुम इतनी बड़ी प्रतिभा नहीं हो कि एक शहर का पूरा साहित्य समाज तुमसे डाह करे। तुम खुद ही तो लिख रहे हो कि पिछले 10 सालों से तुम्हें बहिष्कृत कर रखा गया है? क्यों विजयशंकर? क्यों? तुम्हारी नीचता और कमीनेपन की यह पराकाष्ठा नही ंतो और क्या है कि तुम अपनी पत्नी की आत्महत्या जो कि सचमुच में दस वर्षों तक की गई क्रमिक और धीमी गति से की गई हत्या थी का अपराध बोध महसूस करने की बजाय उसे पति-पत्नी के सामान्य झगड़े से उत्पन्न अतिवादी प्रतिक्रिया करार दे रहे हो। तुम कह रहे हो कि हम तुम्हारी कविता पढ़ें और तब तुम्हारे बारे में राय बनाएं, बिल्कुल ठीक यह तुम कह सकते हो, उन समस्त लोगों से जो मुंबई के बाहर रहते हैं, और तुम्हारे बारे में अधिक नहीं जानते, पर मुंबई के एक भी आदमी तुम्हारी इस बात का जवाब शायद अब सामने पड़ने पर तुम्हारे हाथ-पैर तोड़ कर देगा, क्योंकि विजयशंकर पत्नी की मृत्यु अकेली घटना नहीं थी, तुम्हारी बदतमीजियों और बेहूदगियों के सैकड़ों प्रसंग इस शहर का हिंदी साहित्य से जुड़ा एक एक आदमी जानता है. प्रेस क्लब में सुदीप की जेब में पेशाब करने से लेकर मेट्रो के पास लोगों द्वारा तुम्हें पूरी तरह नंगा कर पीटे जाने तक की पचासों घटनाएं हैं? तुम कह रहे हो लोग तुम्हारी कविता पढ़ें! अरे अधम, यही तो मुददा है कि एक घटिया आदमी सही बातों को भी अविश्वसनीय और झूठी बना देता है, तुम लोगों को व्यक्तित्व के कमीनेपन और अपने लेखन में फर्क करने का पाठ पढ़ा रहे हो! क्विता तो अभ्यास से और दूसरों की पढ़ कर लिख लेना और ठीक ठाक लगने वाली कविता लिख लेना तो हमारे युग में एक बहुत आसान काम है। अब तुम हम सब को यह अवसर दे रहा हो और बाध्य कर रहे हो, कि तुम्हारी एक-एक हरकत के बारे में विस्तार से लिख कर मुंबई के बाहर की हिंदी दुनिया को भी अवगत करा दिया जाए।

  • Alok said:

    यह विजयशंकर कौन है भाई? क्यों यह इतना उछल रहा है? सब लोग क्यों इससे जल रहे हैं? इसे मारने की भी धमकी दे रहे हैं। अरे दारू पीना क्या इतना बड़ा गुनाह है? और पत्नी जल मरी तो इस बेचारी ने एक दूसरी अपने से आधी उम्र की लड़की से शादी कर उसके घर वालों का बोझ तो कम ही किया है। भाई लोग कल तुम लोगों ने गांधी को मारा था और आज विजय शंकर के पीछे पड़े हो। अरे कवियो ंको तो माफ है भाई पत्नी जलाएं, व्यभिचार करें… आप तो बस उनकी कविता पढ़िए और मस्त होईए। बाइ द वे यह विजय शंकर अव्वल दर्जे का व्यभिचारी है, इसको एक बार मैं बुरी तरह से मुंबई में इसके ही दफतर में पीट चुका हूं, क्योंकि इसने दारू के लिए मेरी जेब से जबरन पैसा छीनने की कोशिश की थी….

  • jagadeesh said:

    अपनी बीवियों को जला कर मारने वाले तो असंख्य लोग इस समाज में हैं.पर कवि जब ऐसा करता है तो इस पराक्रम को एक नयी गरिमा मिलती है.आप सब भूल रहे हैं कि कवि तो स्वतंत्रता का उपासक होता है . उसे दैविक प्रतिभा मिली हुई है.उसको कुछ भी कर गुजरने का लायसेंस है.उसके कार्य संसारिक सही और गलत की परिभाषाओं से ऊपर होते हैं.आपका सरोकार सिर्फ़ उसकी कविताओं से होना चाहिये, बाकी बातें फ़िजूल हैं, जियो मेरे लाल विजय शंकर चतुरवेदी. इन सबकी चिन्ता मत करो.ये तुम्हें जानते नहीं.तुम अद्वितीय प्रतिभा शाली हो.अब ऐसा पराक्रम दोबारा अपनी नयी स्त्री के साथ कब कर रहे हो.

  • मानव शरमा said:

    आज तो सुधा अरोड़ा, ममता कालिया, शालिनी माथुर, हरिनाराण, प्रभु जोशी, चैकोर बाली जैसों की भी परीक्षा होनी है जो राजेंद्र यादव के एक शब्द ‘खांटी’ पर दुनिया भर का वितण्डा खड़ा कर देते हैं।

  • अमर नाथ सिंह said:

    विजय शंकर चतुर्वेदी के निजी जीवन के एक नितान्त दुर्भाग्य पूर्ण प्रसंग में रस लेते हुए इस तरह चर्चा लिप्त रहना कहां तक उचित है?मेरे विचार से उनकी बुनियादी समझ पर भरोसा करते हुए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाना चाहिये.यदि वे अपने इस दुर्भाग्य से कुछ आत्म मंथन कर पाये हैं तो बहुत अच्छा है. नहीं कर पाये हैं तब भी यह उन्की अपनी नियति है, जिसे वे भोगेंगे.हम किसी के जीवन के नैतिक दरोगा नहीं बन सकते.

  • Hridayesh Mayank said:

    अविनाश जी

    मैं यह पत्र लिखने के लिए इसलिए विवश हुआ हूं क्योंकि विजयशंकर चतुर्वेदी ने ‘बाघ के बिल्ला’ के छद्म नाम से मुझ पर जो अभद्र टिप्पणी की है, उसका प्रतिवाद करना बहुत जरूरी हो गया था। इसलिए प्रत्युत्तर में यह टिप्पणी की जा रही है।
    हृदयेश मयंक

    ‘बाघ का बिल्ला’ नहीं ‘कुकुर पिल्ला’ जी उर्फ विजय शंकर

    आप की हरामजदगियों के तो अनेेक किस्से हैं। सोचता हूं कि कहां से शुरू करूं। आप उस दिन को याद करें जब कुत्ते की तरह मुंह लटकाए, दुम हिलाते मेरे पास आए थे, मैंने आपके सर छुपाने का (कई वर्ष तक) इंतजाम किया था। वहां भी आप को कई किस्म के अनैतिक-असामाजिक कार्यों और हरामगिरी की वजह से हटना पड़ा था। आप से बड़ा कमीना तो शायद ही दुनिया में कोई हो, जो पत्नी की इस हिदायत के बावजूद कि यदि आपने बेटी की फीस के पैसे की दारू पी तो वह आपके सामने ही जान दे देगी, आपने बेशर्मी की हद पार कर दी और उस रात भी नशे में धुत्त होकर घर लौटे। उस भद्र महिला ने यह जानने पर कि फीस के पैसे आपने दारू में उड़ा दिए हैं, तुरंत ही आपके सामने ही मिटटी का तेल छिड़क कर आत्मदाह कर लिया और आपने उसकी जान बचाने की कोशिश भी नहीं की। सूचना मिलने पर राकेश शर्मा और पूरन पंकज दोनों दौड़े दौड़े आपके घर पहुंचे। राकेश एंबुलेंस से आपकी जली हुई पत्नी को पहले मीरा रोड के भक्ति वेदांत अस्पताल ले गए और वहां से मनाही मिलने पर भगवती अस्पताल, बोरीवली ले कर गए। वहां उस महिला ने जिस बच्ची की खातिर पुलिस को यह बयान दिया था कि वह खुद जली, आपने उस बच्ची को भी साथ नहीं रखा और दूसरी शादी कर ली।

    आपको चुल्लू भर पानी में नाक रगड़ कर मर जाना चाहिए, क्यांेकि आप जिस व्यक्ति पर कीचड़ उछाल रहे हैं, वही हृदयेश मयंक आत्मदाह करने वाली आपकी पत्नी की तिकटी बनाने से लेकर चंदा वसूल कर अंतिम क्रिया करने वाला व्यक्ति है। शवदाह गृह में वरिष्ठ लेखक सांवरमल सांगनेरिया ने आपसे अपराधों के लिए मृतक की आत्मा से क्षमा मांगने को कहा था, क्योंकि उन्हें पता था कि आपने उस मृतक को इतने दारूण दुख दिए थे, जो अक्षम्य थे। श्मशान में रमन मिश्र, शैलेश सिंह (जिसकी पत्नी को आपने कुछ दिन पूर्व ही फोन पर गंदी गंदी गालियां दीं), राकेश शर्मा, अनूप सेठी, सांवरमल सांगनेरिया, प्रो. रामसागर पांडे और मैं स्वयं शेष रह गए थे। आप शवदाह के तुरंत बाद रिक्शे में बैठ कर भाग गए थे। जो पैसे शवदाह क्रिया में खर्च हुए थे, उसे भी आप अभी तक लौटा नहीं सके। शहर में कौन ऐसा लेखक है (उपन्यास ‘मुर्दाघर’ के प्रख्यात रचनाकार वरिष्ठ लेखक जगदंबा प्रसाद दीक्षित सहित) जिसे आपने रात में दो-दो तीन-तीन बजे तक फोन कर परेशान न किया और शराब के नशे में धुत्त होकर अपनी टैक्सी का बिल देने को बाध्य न किया हो। मुंबई का पूरा लेखक समुदाय आपके कुकृत्यों से त्रस्त है (वह शीघ्र ही हस्ताक्षरित पत्र आपको भेजेगा) आप मुझ पर जो भी लांक्षन लगाएं सब चलेगा, पर आप जैसा पतित कोई दूसरा लेखक इस शहर में नहीं है। नाली साफ कराने वाला नशे में नाली में धुत्त होकर गिरने वाले कीड़े से ज्यादा अच्छा होता है। जो व्यक्ति अपनी पत्नी को बरसों बरस प्रताड़ित करता रहा हो, वह दूसरे की पत्नी के लिए कुछ भी कहने का हकदार नहीं है। उस भोली बच्ची का चेहरा याद कर हम आज भी सिहर जाते हैं, जिसके सामने उसकी मां आग लगाकर जल गई हो। वह बच्ची मां का दुपट्टा दूसरे दिन तक पकड़े राकेश शर्मा के घर सिसकती रही थी।

    यदि कोई शर्म बाकी है, तो आप शैलेश की पत्नी से लिखित तौर पर माफी मांगें, वरना यह शहर आपको बर्दाश्त नहीं करेगा। कवि बनना या कविता करना तो बहुत बड़ी बात है, पहले आप मनुष्य बनने की कोशिश करें। तलवे चाट कर पत्रकारिता या कविता में कुछ बनने का भ्रम न पालें तो बेहतर होगा। आपको ज्ञात होगा कि जब आप गिड़गिडाते हुए रमन मिश्रा के घर सुबह चार बजे पहुंचे थे — प्राण रक्षा की भीख मांगते हुए, उस वक्त आपका एक भी दारूबाज मित्र आपकी मदद को नहीं आया था, हमीं जनवादी लेखक संघ के लोगों ने मानवीय स्तर पर उतर कर आपको संकट से उबारने में मदद की थी। आप यह न भूलिए कि अभी भी आप मुंबई में हैं और उन्हीं हरामजदगियों के साथ। पूरा शहर गवाह है कि कुछ कुछ आपकी तरह ही बदतमीजी करने वाला अमन प्रिय अकेला इसी शहर में किस तरह सड़ कर मरा। आपके साथ भी ऐसा ही हो सकता है, क्योंकि अब आप दया के भी पात्र नहीं हैं, जिस फ्रस्टेशन में आप अनाप शनाप बक रहे हैं, कहीं आप पागल न हो जाएं, या खुद आत्महत्या न कर लें।

    साहित्य की या कवि बनने की चिंता अभी न करें तो शायद आपकी सेहत के लिए अच्छा होगा। मेरे जिस शरीर रचना की बात आपने अपने छद्म नाम से की है, वह भले बेडौल हो, पर वह आपके बाप की उम्र की है, कृपया अपने बाप का हुलिया न बखानें, वरना, उस पर खामखा लोग शक करेंगे, खैर, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, आप शैलेश की पत्नी से माफी मांग लें, वरना आपके ऊपर कानूनी कार्रवाई के लिए हम सभी विवश होंगे।

    उम्मीद है, कि यदि कोई शर्म नाम की चीज बची होगी तो आप उपरोक्त बातों पर ध्यान देंगे, और कम से कम मनुष्य बनने की कोशिश करेंगे।

    आपका शुभाकांक्षी
    हृदयेश मयंक

  • kamta prasad said:

    जलेस के लोग तो ऐसे पिंपिया-चिंचिया रहे हैं जैसे गांव की फूहड़ औरते एक दूसरे पर पिल पड़ती हैं जब उनके ऊपर चरित्र को लेकर उंगली उठायी जाती है। सहृदय युवा कवि विजयशंकर से तो दारू पीने की सफाई मांगी जा रही है पर हृदयेश मयंक इस बात को क्‍यों गोल कर गये कि सड़े-गले सामंती संस्‍कारों और पियरी पहनने के मोह में उन्‍होंने अपनी लड़की को बालिका वधू बना दिया। माकपा से जुड़े संसोधनवादियों (अनपढ़ों को संशोधनवादी शब्‍द सुनकर गुस्‍सा नहीं आता, ताज्‍जुब है) का आचरण निजी जिंदगी में निहायत अवैज्ञानिक, अतर्कपरक और दकियानूसी होता है, अरे ये ससुरे तो बोर्जुआ भी ढंग से नहीं हो पाये कम्‍युनिस्‍ट होना तो दरकिनार।

    मेरी यह स्‍पष्‍ट मान्‍यता है कि सद्गृहस्‍थ से ज्‍यादा लम्‍पट-हृदयहीन कोई भी अराजक-शराबखोर नहीं हो सकता। हृदयेश मंयक से ज्‍यादा चिरकुट-छिछोरा और तंगदिल आदमी जलेस का पदाधिकारी है जो कि मृतात्‍मा के दाहसंस्‍कार के पैसे मांग रहा है। आ: थू: छि: लानत है, धिक्‍कार है ऐसी प्रगतिशीलता और संस्‍कृतिकर्म पर।
    लेखक-पत्रकारों का बहुलांश दारू पीता है और जमकर पीता है पर उन्‍हें तो मनुष्‍यता के दायरे से कोई बाहर नहीं करता तो हमारे विजय भाई ने कौन सी अल्‍ला मियां की गाय मार दी है। इन नैतिकता के ठेकेदारों-बदमाशों की आंखों पर तेली के बैल का पट्टा पड़ा है जो मुंबई में ही रहते हुए उन्‍हें गोपाल शर्मा का अपनी पत्‍नी प्रेमा उपाध्‍याय के साथ अमानुषिक व्‍यवहार नजर नहीं आता।
    क्‍या इन्‍हें इंतजार है किसी दुर्घटना का। न्‍याय का रंचमात्र जज्‍बा अगर इन दोमुंहों के अंदर बचा हो तो मेरे द्वारा मुहैया कराये जा रहे इस तथ्‍य की पड़ताल करें और आवश्‍यक कदम उठायें।

    मार्क्‍सवाद को जीवन-दर्शन मानने वाले जलेस के लोग अपना-अपना मूल्‍यांकन अपने गाइडिंग प्रिंसिपल की रोशनी में करेंगे तो उन्‍हें यह साफ लगने लगेगा कि हुआ कुछ नहीं बस हमारे मुंहफट दोस्‍त विजय ने उन्‍हें एंटागोनाइज किया और वे कुत्‍तई पर उतर आये।

    बाघ का बिल्‍ला विजय नहीं श्‍याम बहादुर सिंह हैं उसका नंबर दूं क्‍या।

  • shyam bahadur said:

    आदरणीय अविनाश जी, नमस्‍कार

    मेरा नाम श्‍यामबहादुर सिंह है मैंने ही बाघ का बिल्‍ला नाम से हृदयेश मयंक के आचरण को लेकर कुछ मुद्दे उठाये थे। तथ्‍यों पर आधारित मसलों का विवेकसंगत जवाब देने और आत्‍मावलोचना करने की बजाय मयंक जी तो विजय भाई पर लंगोट खोलकर पिल पड़े। उनका और उनके दूसरे चहेतों का एक-एक शब्‍द विष बुझा लग रहा है। विजय शंकर जी से इन्‍हें कितनी बेपनाह नफरत है और उसे प्रकट कर पाने में इन्‍हें शब्‍दों का टोटा पड़ रहा है।
    ये कैसे मानववादी हैं कि इन्‍हें जनता के किसी कवि का अस्तित्‍व ही नागवार लग रहा है और उसे भौतिक रूप से मिटा देने पर आमादा हो गये हैं और कवि की परोक्ष रूप से जान लेने-शहरबदर करने की धमकी दे रहे हैं। ऐसे मानवद्वेषी चरित्र से और अपेक्षा भी क्‍या की जा सकती है। इसने बिना कोई शक-शुबह जाहिर किये विजयशंकर पर जहर वर्षा शुरू कर दी कि वही बाघ के बिल्‍ले हैं। बाघ का बिल्‍ला मैं हूं श्‍यामबहादुर सिंह और मेरा नंबर है ;9312035225।

    थोड़ी भी हया बाकी हो तो विजय भाई से अपने कुकर्मों की माफी मांगों और अपने शार्गिदों को संयम बरतने की सलाह दो।

  • Sarita said:

    यारो, इस अमानुषिक विजयशंकर चतुर्वेदी पर इतने अक्षर, शब्द और वाक्य क्यों खर्च किए जा रहे हैं? इस ई-मेल और नेट के जमाने में संसाधनों का सटीक इस्तेमाल करेंगे तो बहुत जल्दी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। यह कामतानाथ क्या वही शख्स है, जो काफी समय पहले मुंबई में शिवसेना के मुखपत्र दोपहर का सामना से जुड़ा हुआ था? (सामना के लोगों से ही सघन पूछताछ के बाद यह जानकारी मिली है) अपनी हरकतों के कारण इसे भी पिटपिटा कर मुंबई से पलायन करना पड़ा था। जैसा विजयशंकर वैसे ही उसके दोस्त। लेकिन उसे पता नहीं है कि जिन बैसाखियों का वह सहारा ले रहा है, उनमें पहले से ही घुन लगा हुआ है और उनमें कोई बल नहीं है। बहरहाल, मैं मुंबई के राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख साहित्यकारों का नाम लिख रही हैं
    विजयशंकर के बारे में ये सारे जन अपने श्रीमुख से ही इस शख्स के बारे में जानकारी दे देंगे। हाथ कंगन को आरसी क्या? इसके बाद प्रणव और कामता जैसे भाड़े के टटुओं का राग खुद ही बंद हो जाएगा। इन साहित्यकारों से कभी भी इस महामानव के बारे में पता लगाया जा सकता है। ये प्रामाणिक लोग इस प्रकार हैं — जगदंबा प्रसाद दीक्षित, चंद्रकांत बांदिवड़ेकर, सुदीप, निदा फाजली, आबिद सुरती, डाॅ. गिरिजाशंकर त्रिवेदी, लाजपत राय, सतीश कालसेकर, सुलभा कोरे, रामजी तिवारी, रमेश राजहंस, यज्ञ शर्मा, विजय कुमार, जितेंद्र भाटिया, विनोद दास, विनोद कुमार श्रीवास्तव, सुधा अरोड़ा, सूर्यबाला, राजम नटराजन पिल्लै, संतोष श्रीवास्तव, सूरजप्रकाश, अनूप सेठी, सूर्यभानु गुप्त, साजिद रशीद, सलाम बिन रजाक, सैयद सिराज, सत्यदेव त्रिपाठी, कैलाश सेंगर, राजेश रेडडी, हरीश पाठक, धीरेंद्र अस्थाना, राकेश शर्मा, निलय उपाध्याय, विश्वनाथ सचदेव, सांवरमल सांगानेरिया, सोहन शर्मा, अक्षय जैन, अलोक भटटाचार्य, हरि मृदुल, संजय भिसे, तुषार धवल, पूरन पंकज, मनोज शर्मा, आलोक श्रीवास्तव, डाॅ. करूणा शंकर उपाध्याय, रवींद्र कात्यायन आदि।
    सौ सुनार की एक लोहार की करनी है, तो सिर्फ एक ही नाम काफी है इसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए। वह नाम है पहल जैसी पत्रिका के यशस्वी संपादक और प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन। विजयशंकर के अनुसार उपरोक्त सभी साहित्यकार इसकी प्रतिभा से जल भुन कर खाक हो रहे हैं, लेकिन ज्ञानरंजन के बारे में तो कम से कम ऐसा नहीं कहा जा सकता। ज्ञान जी का नंबर तो सभी के पास है ही। तो देर किसी बात की। उम्मीद है कि अब तो प्रणव और कामता जैसे लोग इसके पक्ष में जबर्दस्ती की दलीलें देना बंद कर देंगे। वैसे भी, इसके बाद उपरोक्त तमाम साहित्यकारों का हस्ताक्षरित पत्र भी सामने आने वाला है। सच कभी छुपता नहीं, चाहे कितनी ही दलीलें कितनी ही चालाकी से पेश की जाएं।
    0 सरिता सिंह

  • kamta said:

    आदरणीय बहन जी उर्फ भाई जी जरा अपनी तारीफ भी तो कर दीजिए। झूठे नाम के सहारे आपका ये अरण्‍य-रोदन कोई सुनने वाला नहीं है। विजय शंकर चतुर्वेदी की कलम के कायल और उनकी सहृदयता को सलाम करने वाले राष्‍ट्रीय स्‍तर के कलमकारों में आदरणीय राजेंद्र यादव भी हैं, बहन जी जरा उन्‍हीं से बात कर लें काहे को फालतू में मगज चाट रही हैं, जनता का।
    नामों की सूची बनाकर पेश करने से कुत्‍तई नहीं छिपेगी, सच दुनिया जान गयी है। सुधीजनों को पता चल चुका है कि यशस्‍वी कवि की छवि भंजित करने की सुपारी किन लोगों ने ली है और अपने किन कुकर्मों को छिपाने के लिए ली है।
    इन कुकर्मियों पर फिर से सीरीज चलानी पड़ेगी जैसे कभी संजय निरूपम ने चलायी थी।
    कैसे फोकट की दारू पीने के लिए भाई लोग अटर सरेंडर हो जाया करते थे और कैसे पत्रकार बनकर बुद्धिजीवियों का खून पीकर अपना प्रकाशन खडा किया जाता है यह सब भी बताया जाएगा देर-सबेर।

  • rakesh said:

    श्याम बहादुर, फोन नंबर देने से अस्तित्व की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती। तुम कौन हो? मुंबई में कहां रहते हो? क्या काम करते हो? तुम्हारी टिप्पणी से तो ऐसा लग रहा है कि तुम हृदयेश मयंक, शैलेश सिंह समेत मुंबई के सभी साहित्यकारों को व्यक्तिगत रूप से जानते हो, पर इनमें से तो किसी को तुम्हारे अस्तित्व के बारे में कुछ पता नहीं है। तुम्हारा नाम तक किसी ने नहीं सुना। कहां से अचानक अवतरित हो गए? बाघ का बिल्ला भी तुम्हीं हो और विजय शंकर भी तुम्हीं हो। और यह कौन चूतिया कामता है, जो दारू पीने को महिमामंडित कर रहा है, अरे हरामखोर सभी लेखक-कवि दारू पीते हैं, यह तुझसे किसने कह दिया? अबे यहां मसला दारू पीकर पत्नी के लिए आत्मदाह की परिस्थितियां पैदा करने का है, बेटी की फीस से दारू पीने का है। तुम जिस आदमी के कुकर्मों का पक्ष लेने की कोशिश कर रहे हो, वह जनता की कवि नहीं, कवि के भेष में भेडिया है। हमने तुम्हारा नंबर नोट कर लिया है। विजयशंकर ने अब कोई हरकत की तो उसकी पुलिस में रिर्पोट की जाएगी और तुम्हारा नंबर भी साथ ही नत्थी होगा।

  • पुनीत said:

    दोस्तो. बौखलाहट विवेक को तिलांजलि देने की सीमा तक पहुंच गया लगता है। विजयशंकर को अराजक और मुंहफट होने की सजा देने की व्यग्रता में कुछ लोग इतने उतावले हो गए हैं कि उन्हें हत्यारा से लेकर अनगिनत पापों का दोषी करार दिए जा रहे हैं। जो भी कोई विजय शंकर के पक्ष में थोड़ा भी बोलता दिख रहा है, उसी को पापी और अपराधी घोषित करने का भी प्रयास साफ दिख रहा है। बाघ का बिल्ला विजयशंकर हैं या नहीं इस बारे में आश्वस्त होने से पहले ही हृदयेश मयंक जिस तरह विजय पर पिल पड़े उससे इतना तो साफ हो ही जाता है कि साहित्यकार (वह भी मार्क्सवादी) होने के उनके दावे पर भी विचार किया जाना चाहिए। गाली-गलौज की जिस भाषा का उन्होंने इस्तेमाल किया उसे विजयशंकर की किस बदतमीजी से सही साबित करने की कोशिश करेंगे पता नहीं। मुंबई के पूरे साहित्य समाज की ठेकेदारी इन्हीं कुछ लोगों ने नहीं ले रखी है।
    मैं जानता हूं मेरी टिप्पणी आते ही मेरे बारे में भी सवाल जवाब शुरू हो जाएगा। मैं साफ कर दूं कि मुंबई से मेरा कोई लेना-देना नहीं रहा है। मैं इस विवाद के चरित्रों को भी व्यक्तिगल तौर पर नहीं जानता। लेकिन मोहल्ला पर जो यह विचारों (?) भावनाओं का आदान-प्रदान हुआ है उससे भी काफी-कुछ पता चलता है।
    आखिर विजयशंकर के विरोधी तथ्यों की चिंता किए बगैर जिस तरह के बेसिर-पैर के आरोप एक तरफ से उन सभी लोगों पर लगा रहे हैं जो विजय के पक्ष में बोलते दिख रहे हैं, उन्हें तरह-तरह की गालियां दे रहे हैं और खुलेआम धमका रहे हैं – इससे इतना तो साफ है कि उनमें सत्य के प्रति खास आग्रह नहीं बचा है और न ही भाषा की गरिमा की चिंता है। अजीब बात यह है कि ये विजयशंकर पर बदतमीजी का आरोप लगा रहे हैं।

  • rakesh said:

    भाई पुनीत जी
    विजय शंकर को कोई सजा नहीं दी जा रही है। क्या आप जानते हैं यह प्रकरण कैसे आरंभ हुआ? आप कह रहे हैं कि आप विजय शंकर को नहीं जानते। हो सकता यह सच हो। पर ब्लाॅग के माध्यम से आप यह तो जान ही गए होंगे कि मामला क्या है? भाई मामला यह है कि जनवादी लेखक संघ ही नहीं मुंबई के तमाम साहित्यकारों ने विजय शंकर के कविता संग्रह के लोकार्पण समारोह का बहिष्कार किया और वहां नहीं गए। इस पर बौखलाकर विजय शंकर ने मोहल्ला ब्लाॅग में जनवादी लेखक संघ पर लेखकों की कब्र खोदने का आरोप लगाया। बात यहीं तक रहती तो ठीक थी। इसने फोन कर जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारी शैलेश सिंह की पत्नी को अश्लील गालियां दीं। जलेस के लोगों से गलती यह हो गई कि उन्होंने सचमुच विजय शंकर को इस अपराध के लिए जो स्वाभाविक कार्रवाई होनी चाहिए थी, वह न कर ब्लाॅग के जरिए बौद्धिक प्रत्युत्तर दिए। विजय शंकर की इस करतूत का जवाब आप पुनीत जी, और इसके अन्य शुभचिंतक, कामता, प्रणव, श्यामबहादुर या अन्य किसी के पास कुछ हो, तो कहे। फालतू की लफफाजी कर एक नाबदान के कीड़े को आप सब क्या साबित करना चाहते हैं?

  • shyam bahadur said:

    ये राकेश नाम से लिखने वाला सुअर की औलाद है क्‍या। अबे हरामजादे कुत्‍ते चूतिया किसको लिख रहा है और पुलिस की धमकी किसको दे रहा है। जरा अपनी असलियत बताकर बात कर कि तू किस गली का कुत्‍ता है।
    कुत्‍ते दस साल से तू कर क्‍या रहा था, अभी तक विजय को फांसी पर क्‍यों नहीं चढ़ाया अब एकाएक क्‍या तुझे ईसामसीह ने कान में आकर विजय को हत्‍यारा साबित करने को कह दिया है। तेरे जैसे दोगले लोग सामने आकर क्‍यों नहीं बात करते । झूठे नामों से क्‍यों लिख रहा है बे। गूगल पर मेरा नाम टाइप कर पूरा पता मिल जाएगा तेरे को और अपनी बता।
    पुलिस की धमकी दे रहे हो शहर बदर करने की योजना बना रहे हो कवि विजय को तुम सब लोगों के खिलाफ लीगल एक्‍शन लिया जाएगा और मानिहानि का मुकदमा दर्ज करवाया जाना चाहिए।

  • Raj sharan said:

    विजय शंकर चतुर्वेदी की कलम के कायल और उनकी सहृदयता को सलाम करने वाले राष्‍ट्रीय स्‍तर के कलमकारों में आदरणीय राजेंद्र यादव भी हैं

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  • Anil verma said:

    बेचारे विजयशंकर को लोग क्यों इतना परेशान करते रहे हैं। अरे स्त्रियां तो जल कर मरती ही रहती हैं। यह भी कोई बात हुई ‘जनता के कवि’ को सब मिल कर परेशान कर रहे हैं।

  • सुरेन्द्र said:

    जिन राजेद्र यादव का बार बार हवाला दिया जारहा है वे तो इस चतुर्वेदिया को जानते तक नहीं है.न जानना चाहते हैं.

  • Trilok said:

    राजेंद्र यादव तो प्रात: स्‍मरणीय उच्‍च कोटीय कवि श्री विजयशंकर को जानते हैं या नहीं यह अलग बात है लेकिन जलेस के पदाधिकारियों की नीच कर्मों को देखकर शहर के सारे भंड़ुवे आत्‍महत्‍या करने पर आमादा हैं।
    जलेस के कुत्‍तों के लिए एक और शानदार खबर – मुंबई के सारे खजहे कुत्‍ते बिना रीढ वाले व्‍यक्ति हृदयेश मयंक को जलेबी खिलाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।

  • anil said:

    प्रात: स्‍मरणीय उच्‍च कोटीय Patni-hanta कवि श्री विजयशंकर!!!!!!!

    Vah hatyare hi honge ab kavi hamre!!

  • pramudit said:

    इ बिजयवा का एतना इपारटेंट कबि बाटय कि सब के सब एकरे पछवे पड़ गइलै हउवै? अरे मरै द ससुरै क, आपन करम आपै भोगी।

  • राम शरण तिवारी said:

    हे चतुरवेदिया, सुन तुम कवि तो ससुरा कही से हय ही नही ,काहे अपने को कवि कहलाने का भरम पाले है?.बहुत हुआ अब बंद कर यह नौटंकी.तुम सोच रहा है बदमाम होंगे तो का नाम नहीं होगा? अउर रोज अलग अलग नाम धारन कर सबको गरिया रहा है कि सब तोहार चरचा करें .अरे पागल जब तोहार कबिता मां ही दम नाहीं तो इस साली चरचा से भी का होगा रे.. दुई दिन मां हि सब लोग तुम को बिसरा देगा.इहां तो लोगन को रोज नया नया मसाला का जरूरत है.अरे पागल, इ सब फोकट का कबता- शायरी बाद मे करना, पहिले अपने करमों का तनिक परायसचित तो कर बेटा.जो लोग तोहार कठिन समय मां तोहार सहायता किये उनको अब गरियाने का जगह उनका पांव पकड़ कर माफी मांग ले. इ दुनिया बहुत बडा़ है रे. जा बेटा तनिक गंगा नहा कर आ.तनिक सा भला इन्सान बनने का कोसिस कर मनुआ. कबता -कुबता तो होता रहेगा.का रखा है ई सब मां. अहंकार तज कर हमार वचन पर तनिक शान्ति से बिचार कर. हम तोहार भले का बात करत हैं.

  • S. P. S. said:

    ‘बाघ का बिल्ला’ उर्फ ‘श्याम बहादुर’ उर्फ विजय शंकर

    कल हमारे एक मित्र ने दिल्ली में राजेंद्र यादव से मुलाकात की। वे तो कह रहे थे कि वे इस नाम के किसी भी व्यक्ति को नहीं जानते। मित्र ने उनको सारा मामला बताया तो कहने लगे कि देखिए मैं कविता का युग नहीं मानता अपने समय को। यह कवि लोगों का बखेड़ा मुझे समझ में नहीं आता। कुछ गंभीर विमर्श वगैरह की बात करें तो राय भी दूं। फिर मित्र ने उनको सारा मामला विस्तार से बताया कि यह किस तरह एक तथाकथित कवि द्वारा अपनी भोली भाली ग्रामीण पत्नी को आत्मदाह तक ले जाने का मामला है, तो वे इस तरह से अपना नाम इस्तेमाल किए जाने से काफी खफा हुए। विजयशंकर 10 साल तक तुमको इसलिए कुछ नहीं बोला गया कि शायद तुम सुधर जाओ। परंतु अब मोबाइल और ब्लाॅग की सुविधा का इस्तेमाल कर तुमने नए सिरे से अपनी बदतमीजियां शुरू की हैं। यही कारण है कि जलेस को तुम्हारा और तुम्हारी गंदी हरकतों का प्रतिवाद करना पडा है।
    तुम पचासों बातें एक तरफ रख कर यह बताओ कि तुमने महत्वपूर्ण कथाकार धीरेंद्र अस्थाना की पत्नी और जलेस पदाधिकारी शैलेश सिंह की पत्नी को फोन कर गंदी गालियां क्यों दीं, और अश्लील बातें क्यों की? तुम इस शहर में या तो अब शरीफ बन कर रहोगे, या तुम्हारे साथ वही सलूक होगा, जो इस तरह के अपराधियों के साथ होता है। ब्लाॅग पर अपने नाम से संतई भरी भाषा और छदम नामों से लोगों को गालियां तुम दे लो, पर यह निश्चित जान लो कि इस शहर में अब तुम्हारी पहली लुंपेन हरकत का ही तुम्हें वह परिणाम भुगतना पड़ेगा, जिसकी तुमने कल्पना भी न की होगी और पिछले डेढ़ दशकों से तमाम घटिया हरकतों के बाद भी तुम उन परिणामों से बचे रहे हो।
    - एक जलेस सदस्य

  • kamta said:

    अविनाश जी सादर प्रणाम।

    हृदयेश मयंक का पत्र पढ़कर मुझे जो सदमा लगा था वह अभी तक बरकरार है। उनकी अकल पर तरस खाकर मैं दो-चार बातें और लिख रहा हूं। मुंबई मेरा भी अपना शहर रहा है और जैसा कि मैं पहले भी अर्ज कर चुका है सभी लोगों और घटनाक्रम से वाकिफ हूं। मयंक को यह पता होना चाहिए कि अस्थियां लेकर कोई शवदाहगृह में नहीं बैठा रहता। जनकवि विजयशंकर के वहां से जो खिसकने की बात भद्दे ढंग से मयंक द्वारा कही गयी है वह हास्‍यास्‍पद है। उस वक्‍त उनकी पत्‍नी के बड़े भाई स्‍वयं मौजूद थे और दाह-संस्‍कार का खर्च उन्‍होंने दिया था। विजयशंकर जी वहां मौजूद लोगों से विदा लेकर अस्थिकलश के साथ ऑटो पकडकर हरीश पाठक एवं बडे साले के साथ मीरा रोड रवाना हुए थे ताकि जल्‍दी से जल्‍दी अपनी बेटी के पास पहुंच सकें।

    अपने पत्र में यमराज के भैंसे की तरह फुंफकारने वाले मयंक मुंबई के जिन सम्‍मानित साहित्‍यकारों की सूची विजय को खलनायक बनाने के लिए पेश कर रहे हैं, उनमें से कोई भी यह नहीं कहेगा कि विजय ने उनसे कभी अनुचित बर्ताव किया है। विजय इन सभी का सम्‍मान करते थे और यह वह हमेशा करते रहेंगे। रही बात विजय शंकर के सडगल कर मरने की जैसा रूपक मयंक ने अमनप्रिय का उदाहरण देते हुए खींचा है तो उससे साबित होता है कि मयंक हत्‍यारी मानसिकता का आदमी है और उस पत्र से यह साफ झलकता है कि अमनप्रिय को इन्‍होंने ही सडगलकर मरने के लिए छोड दिया था।
    पत्र में और बाकी टिप्‍पणियों में जो बात प्रमुखता से उभरकर आ रही है वह यह है कि विजयशंकर कविता लिखना छोड दे वरना उसे मौत के मुंह में जाने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा तानाशाह जनरल फ्रैंको ने महाकवि लोर्का के साथ किया था और आज तक उसकी कब्र तक ढूंढे नहीं मिल रही है।

    मैं जानता हूं कि मुंबई जलेस के सभी लोग ऐसे निर्दयी नहीं हैं लेकिन सिर्फ इस व्‍यक्ति की हिटलरशाही की वजह से उन्‍होंने इस तरह के पत्र विजयशंकर के खिलाफ लिखे हैं। मयंक कितना स्‍त्री-विरोधी और धुर सामंती, परम कूपमंडूक है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि इसने अपने विरोध पत्र में कवि विजय की मरहूम पत्‍नी का घटिया ढंग से चित्रण किया है और अब वह अपने साथी शैलेस सिंह की पत्‍नी को इस कीचड में बार-बार घसीट रहा है।
    भइया मैं कोई छद्मनामी व्‍यक्ति नहीं हूं, मुंबई में लंबे समय तक रहा हूं फिलवक्‍त लखनऊ में हूं। चाहें तो इसकी तस्‍दीक स्‍वयं अविनाश जी से ही कर लें।
    पुनश्‍च: जिन सम्‍मानित लेखकों की सूची पेश की गयी है उन्‍हें जलेस ने मांज-संवारकर तैयार नहीं किया है। उनका अपना आभामंडल है और वे मनुष्‍यद्रोही नहीं हैं कि कवि विजय के अस्तित्‍व को लेकर ही कुपित हों। मुझे पक्‍का यकीन है कि लेखक समुदाय विजय को भी दूसरे किसी भी महान कवि की तरह प्‍यार करता है। कहना न होगा कि कवि विजय सिर्फ लिखते समय ही नहीं वरन जीवन में भी हर क्षण स्‍वयं को संशोधित-संपादित करते चलते हैं और अपने ज्ञानात्‍मक संवेदन को विवेकसंगत और मानव-प्रेम से लबालब करते रहते हैं।

  • S. P. S. said:

    ‘बाघ का बिल्ला’ उर्फ ‘श्याम बहादुर’ उर्फ विजय शंकर Urf Kamta

    तुम पचासों बातें एक तरफ रख कर यह बताओ कि तुमने महत्वपूर्ण कथाकार धीरेंद्र अस्थाना की पत्नी और जलेस पदाधिकारी शैलेश सिंह की पत्नी को फोन कर गंदी गालियां क्यों दीं, और अश्लील बातें क्यों की?

  • सुरेन्द्र said:

    विजय शन्कर चतुर्वेदी बेहद निर्लज्ज और लबाड़ है. वह इसी एक बात से पता चल जाता है कि अपनी झूठी शान बघारने के लिये उसनी बार बार यह कहा है कि प्रख्यात कथाकार और ’हंस’पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव भी उसकी कलम का लोहा मानते हैं और उसे सलाम करते हैं.हमने यहां दिल्ली में जब यादव जी से इसकी तसदीक करनी चाही तो उन्होंने कहा कि इस नाम के किसी शख्स को वे जानते तक नहीं और ऐसे पचास सड़क छाप कवि विजय शंकर उन्के दफ़्तर में रोज आते रहते हैं .तुम कितने बडे़ फ़्राड हो कविराज ,अब इसकी पोल चारों तरफ़ से खुल रही है.

  • नरेन्द्र चौबे said:

    इस विजय शंकर चतुर्वेदी नाम के कवि का अब दाह-संस्कार कर दिया जाए तो बेहतर . बहुत सुन ली इस बाघ के बच्चे की दहाढ़ . नरेन्द्र चौबे

  • Harish said:

    Kaun bandhega billi ke gale me ghanti ?
    Aap hi shuruat kijiye chaoube ji

  • alok said:

    आलोक भट्टाचार्य

    अब भी संभलो विजय…

    मदद करके लोगों को बताना, साथ देकर बाद में जतलाना उचित नहीं। इससे मदद करने, साथ देने की भावना का अपमान होता है। लेकिन अगर आपने विजय शंकर चतुर्वेदी का साथ दिया, उसकी मदद की, तो आप इसे बार बार याद करके अपने चरित्र को छोटा बनाने, साथ देने की भावना के महत्व को कम करने को अभिशप्त रहेंगे, जीवन भर। इस तरह आप छोटे होते रहेंगे। लेकिन विजय शंकर अपने छोटेपनों से बाज नहीं आएंगे।
    मैंने डोंबिवली में विजय को ओनरशिप में मकान काफी सस्ते में दिलवा दिया था, यह सोचकर कि उनका घर बस जाएगा, कुछ दिन रहकर उन्होंने मकान बेच दिया, मुझे सूचित तक करने की तकलीफ नहीं की. लोगों ने मुझे बताया। इस असभ्यता और नाशुक्रेपन पर मैं आहत हुआ, चुप रहा।
    दूसरी बार मैंने उनका साथ तब दिया, जब समूची मुंबई के तमाम कवियों लेखकों पत्रकारों ने विजय को उनके अमानुषिक आचरण के कारण बहिष्कृत कर रखा था। मैंेने भी आजिज आकर कह दिया था कि वह मुझे फोन न किया करें रात को एक बजे, दो बजे, शराब पीकर धुत्त होकर….

    मैंने सोचा कि इनके मन का कोई ऐसा काम यदि हो, जिससे यह खुश हो जाएं तो शायद यह अपने अंधेर अंतस्तल की दुनिया से उबर पाएंगे, और अपनी वे तमाम हरकतें बंद कर देंगे, जो असामाजिक, अशालीन, अनुचित हैं। शायद राह पर आएंगे। यही सब सोचकर मैंने महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिव श्री अनुराग त्रिपाठी से सिफारिश करके विजय के कविता संग्रह को प्रकाशन-अनुदान (इस अनुदान के पैसे में कुछ और पैसे मिला कर उन्होंने राजकमल प्रकाशन को धन देकर यह संग्रह प्रकाशित करवाया) दिलवा दिया। पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद विजय के कहने पर मैंने मुंबई की तीन विभिन्न संस्थाओं से इसके विमोचन करवाने का आग्रह किया। तीनों संस्थाओं ने मना कर दिया। उन्हें मुझसे नहीं, विजय से शिकायतें थीं। वे दुखी थे मेरी बात फेर रहे थे। इस तरह अपना अपमान सहकर भी मैंने विजय की मदद की कोशिशें कीं। मुझे दुख है कि विजय पर इस सबका कोई असर नहीं पड़ा। पीकर उन्होंने मेरे साथ बदतमीजियां कीं। विजय ने मुझे कहा कि पीकर नशे में किया गया दुव्र्यवहार दुव्र्यवहार नहीं होता। (शायद इसीलिए वे यह मानते हैं कि उनकी पत्नी की आत्महत्या एक स्वाभाविक मृत्यु थी)। उनका पक्का यकीन है कि नशे में की गई बदतमीजी बदतमीजी नहीं होती।
    विजय के व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी बहुत सी शिकायतें हम मित्रों को हैं, कही भी जा सकती र्हैं क्योंकि किसी का जीवन व्यक्तिगत होने के बावजूद असामाजिक तो नहीं ही होता। सो समाज का हक है। फिर विजय हमारे मित्र नहीं, बहुत छोटे हैं, उम्र में, काम में, अनुभव में। समूचा समाज गलत हो सकता है, लेकिन समाज के दस-बीस लोग गलत नहीं होते, जिन्हेांने तीस तीस साल तक समाज में स्वयं को प्रमाणित किया है। दोष उनमें भी हो सकते हैं। किसमें नहीं होते? लेकिन जब कोई एक चिन्हित किया जाता है कि अमानुषिक है, अशालीन और असभ्य है, असामाजिक है, और ऐसा एकाधिक बार किया जाता है, तभी किसी की खास उस तरह की पहचान बनती है।
    विजय आज भ्ज्ञी तुम जिस मकान में रहते हो, उसके कागजात मैंने अपने वकील से बनाए हैं, मैंने हस्ताक्षर किए हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं, बस इसी छोटी सी उम्मीद से कि तुम स्थिर होओेगे, शांत होओगे। तुमसे बहुत बहुत ज्यादा अच्छी कविता लिखने वाले भी बहुत हैं हिंदी में, इस देश में। अपनी बेहूदगियों से बाज आओ, उनको जस्टीफाई करने के लिए कविता की आड़ मत लो….
    आलोक भट्टाचार्य
    मुंबई

  • Mohalla Live » Blog Archive » कवि की अभद्रता के ख़‍िलाफ़ एक हस्‍ताक्षर अभियान said:

    [...] हैं। स्‍वयं विजयशंकर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ का बहिष्‍कार शीर्षक से एक लंबी टिप्‍पणी दी है। यह [...]

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