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	<title>Comments on: विजयशंकर चतुर्वेदी द्वारा लेखक संघ का बहिष्कार</title>
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		<title>By: Mohalla Live &#187; Blog Archive &#187; कवि की अभद्रता के ख़‍िलाफ़ एक हस्‍ताक्षर अभियान</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/10/24/vijayshankar-chaturvedi-defending-himself/comment-page-1/#comment-4287</link>
		<dc:creator>Mohalla Live &#187; Blog Archive &#187; कवि की अभद्रता के ख़‍िलाफ़ एक हस्‍ताक्षर अभियान</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Nov 2009 14:22:00 +0000</pubDate>
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		<description>[...] हैं। स्‍वयं विजयशंकर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ का बहिष्‍कार शीर्षक से एक लंबी टिप्‍पणी दी है। यह [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] हैं। स्‍वयं विजयशंकर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ का बहिष्‍कार शीर्षक से एक लंबी टिप्‍पणी दी है। यह [...]</p>
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		<title>By: alok</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/10/24/vijayshankar-chaturvedi-defending-himself/comment-page-1/#comment-4154</link>
		<dc:creator>alok</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 08:40:11 +0000</pubDate>
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		<description>आलोक भट्टाचार्य

अब भी संभलो विजय...

मदद करके लोगों को बताना, साथ देकर बाद में जतलाना उचित नहीं। इससे मदद करने, साथ देने की भावना का अपमान होता है। लेकिन अगर आपने विजय शंकर चतुर्वेदी का साथ दिया, उसकी मदद की, तो आप इसे बार बार याद करके अपने चरित्र को छोटा बनाने, साथ देने की भावना के महत्व को कम करने को अभिशप्त रहेंगे, जीवन भर। इस तरह आप छोटे होते रहेंगे। लेकिन विजय शंकर अपने छोटेपनों से बाज नहीं आएंगे।
	मैंने डोंबिवली में विजय को ओनरशिप में मकान काफी सस्ते में दिलवा दिया था, यह सोचकर कि उनका घर बस जाएगा, कुछ दिन रहकर उन्होंने मकान बेच दिया, मुझे सूचित तक करने की तकलीफ नहीं की. लोगों ने मुझे बताया। इस असभ्यता और नाशुक्रेपन पर मैं आहत हुआ, चुप रहा।
	दूसरी बार मैंने उनका साथ तब दिया, जब समूची मुंबई के तमाम कवियों लेखकों पत्रकारों ने विजय को उनके अमानुषिक आचरण के कारण बहिष्कृत कर रखा था। मैंेने भी आजिज आकर कह दिया था कि वह मुझे फोन न किया करें रात को एक बजे, दो बजे, शराब पीकर धुत्त होकर....

मैंने सोचा कि इनके मन का कोई ऐसा काम यदि हो, जिससे यह खुश हो जाएं तो शायद यह अपने अंधेर अंतस्तल की दुनिया से उबर पाएंगे, और अपनी वे तमाम हरकतें बंद कर देंगे, जो असामाजिक, अशालीन, अनुचित हैं। शायद राह पर आएंगे। यही सब सोचकर मैंने महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिव श्री अनुराग त्रिपाठी से सिफारिश करके विजय के कविता संग्रह को प्रकाशन-अनुदान (इस अनुदान के पैसे में कुछ और पैसे मिला कर उन्होंने राजकमल प्रकाशन को धन देकर यह संग्रह प्रकाशित करवाया) दिलवा दिया। पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद विजय के कहने पर मैंने मुंबई की तीन विभिन्न संस्थाओं से इसके विमोचन करवाने का आग्रह किया। तीनों संस्थाओं ने मना कर दिया। उन्हें मुझसे नहीं, विजय से शिकायतें थीं। वे दुखी थे मेरी बात फेर रहे थे। इस तरह अपना अपमान सहकर भी मैंने विजय की मदद की कोशिशें कीं। मुझे दुख है कि विजय पर इस सबका कोई असर नहीं पड़ा। पीकर उन्होंने मेरे साथ बदतमीजियां कीं। विजय ने मुझे कहा कि पीकर नशे में किया गया दुव्र्यवहार दुव्र्यवहार नहीं होता। (शायद इसीलिए वे यह मानते हैं कि उनकी पत्नी की आत्महत्या एक स्वाभाविक मृत्यु थी)। उनका पक्का यकीन है कि नशे में की गई बदतमीजी बदतमीजी नहीं होती।
विजय के व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी बहुत सी शिकायतें हम मित्रों को हैं, कही भी जा सकती र्हैं क्योंकि किसी का जीवन व्यक्तिगत होने के बावजूद असामाजिक तो नहीं ही होता। सो समाज का हक है। फिर विजय हमारे मित्र नहीं, बहुत छोटे हैं, उम्र में, काम में, अनुभव में। समूचा समाज गलत हो सकता है, लेकिन समाज के दस-बीस लोग गलत नहीं होते, जिन्हेांने तीस तीस साल तक समाज में स्वयं को प्रमाणित किया है। दोष उनमें भी हो सकते हैं। किसमें नहीं होते? लेकिन जब कोई एक चिन्हित किया जाता है कि अमानुषिक है, अशालीन और असभ्य है, असामाजिक है, और ऐसा एकाधिक बार किया जाता है, तभी किसी की खास उस तरह की पहचान बनती है।
विजय आज भ्ज्ञी तुम जिस मकान में रहते हो, उसके कागजात मैंने अपने वकील से बनाए हैं, मैंने हस्ताक्षर किए हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं, बस इसी छोटी सी उम्मीद से कि तुम स्थिर होओेगे, शांत होओगे। तुमसे बहुत बहुत ज्यादा अच्छी कविता लिखने वाले भी बहुत हैं हिंदी में, इस देश में। अपनी बेहूदगियों से बाज आओ, उनको जस्टीफाई करने के लिए कविता की आड़ मत लो....
आलोक भट्टाचार्य
मुंबई</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आलोक भट्टाचार्य</p>
<p>अब भी संभलो विजय&#8230;</p>
<p>मदद करके लोगों को बताना, साथ देकर बाद में जतलाना उचित नहीं। इससे मदद करने, साथ देने की भावना का अपमान होता है। लेकिन अगर आपने विजय शंकर चतुर्वेदी का साथ दिया, उसकी मदद की, तो आप इसे बार बार याद करके अपने चरित्र को छोटा बनाने, साथ देने की भावना के महत्व को कम करने को अभिशप्त रहेंगे, जीवन भर। इस तरह आप छोटे होते रहेंगे। लेकिन विजय शंकर अपने छोटेपनों से बाज नहीं आएंगे।<br />
	मैंने डोंबिवली में विजय को ओनरशिप में मकान काफी सस्ते में दिलवा दिया था, यह सोचकर कि उनका घर बस जाएगा, कुछ दिन रहकर उन्होंने मकान बेच दिया, मुझे सूचित तक करने की तकलीफ नहीं की. लोगों ने मुझे बताया। इस असभ्यता और नाशुक्रेपन पर मैं आहत हुआ, चुप रहा।<br />
	दूसरी बार मैंने उनका साथ तब दिया, जब समूची मुंबई के तमाम कवियों लेखकों पत्रकारों ने विजय को उनके अमानुषिक आचरण के कारण बहिष्कृत कर रखा था। मैंेने भी आजिज आकर कह दिया था कि वह मुझे फोन न किया करें रात को एक बजे, दो बजे, शराब पीकर धुत्त होकर&#8230;.</p>
<p>मैंने सोचा कि इनके मन का कोई ऐसा काम यदि हो, जिससे यह खुश हो जाएं तो शायद यह अपने अंधेर अंतस्तल की दुनिया से उबर पाएंगे, और अपनी वे तमाम हरकतें बंद कर देंगे, जो असामाजिक, अशालीन, अनुचित हैं। शायद राह पर आएंगे। यही सब सोचकर मैंने महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिव श्री अनुराग त्रिपाठी से सिफारिश करके विजय के कविता संग्रह को प्रकाशन-अनुदान (इस अनुदान के पैसे में कुछ और पैसे मिला कर उन्होंने राजकमल प्रकाशन को धन देकर यह संग्रह प्रकाशित करवाया) दिलवा दिया। पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद विजय के कहने पर मैंने मुंबई की तीन विभिन्न संस्थाओं से इसके विमोचन करवाने का आग्रह किया। तीनों संस्थाओं ने मना कर दिया। उन्हें मुझसे नहीं, विजय से शिकायतें थीं। वे दुखी थे मेरी बात फेर रहे थे। इस तरह अपना अपमान सहकर भी मैंने विजय की मदद की कोशिशें कीं। मुझे दुख है कि विजय पर इस सबका कोई असर नहीं पड़ा। पीकर उन्होंने मेरे साथ बदतमीजियां कीं। विजय ने मुझे कहा कि पीकर नशे में किया गया दुव्र्यवहार दुव्र्यवहार नहीं होता। (शायद इसीलिए वे यह मानते हैं कि उनकी पत्नी की आत्महत्या एक स्वाभाविक मृत्यु थी)। उनका पक्का यकीन है कि नशे में की गई बदतमीजी बदतमीजी नहीं होती।<br />
विजय के व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी बहुत सी शिकायतें हम मित्रों को हैं, कही भी जा सकती र्हैं क्योंकि किसी का जीवन व्यक्तिगत होने के बावजूद असामाजिक तो नहीं ही होता। सो समाज का हक है। फिर विजय हमारे मित्र नहीं, बहुत छोटे हैं, उम्र में, काम में, अनुभव में। समूचा समाज गलत हो सकता है, लेकिन समाज के दस-बीस लोग गलत नहीं होते, जिन्हेांने तीस तीस साल तक समाज में स्वयं को प्रमाणित किया है। दोष उनमें भी हो सकते हैं। किसमें नहीं होते? लेकिन जब कोई एक चिन्हित किया जाता है कि अमानुषिक है, अशालीन और असभ्य है, असामाजिक है, और ऐसा एकाधिक बार किया जाता है, तभी किसी की खास उस तरह की पहचान बनती है।<br />
विजय आज भ्ज्ञी तुम जिस मकान में रहते हो, उसके कागजात मैंने अपने वकील से बनाए हैं, मैंने हस्ताक्षर किए हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं, बस इसी छोटी सी उम्मीद से कि तुम स्थिर होओेगे, शांत होओगे। तुमसे बहुत बहुत ज्यादा अच्छी कविता लिखने वाले भी बहुत हैं हिंदी में, इस देश में। अपनी बेहूदगियों से बाज आओ, उनको जस्टीफाई करने के लिए कविता की आड़ मत लो&#8230;.<br />
आलोक भट्टाचार्य<br />
मुंबई</p>
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	<item>
		<title>By: Harish</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/10/24/vijayshankar-chaturvedi-defending-himself/comment-page-1/#comment-4145</link>
		<dc:creator>Harish</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Nov 2009 19:08:47 +0000</pubDate>
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		<description>Kaun bandhega billi ke gale me ghanti ?
Aap hi shuruat kijiye chaoube ji</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Kaun bandhega billi ke gale me ghanti ?<br />
Aap hi shuruat kijiye chaoube ji</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: नरेन्द्र चौबे</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/10/24/vijayshankar-chaturvedi-defending-himself/comment-page-1/#comment-4134</link>
		<dc:creator>नरेन्द्र चौबे</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 19:14:16 +0000</pubDate>
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		<description>इस विजय शंकर चतुर्वेदी नाम के कवि का अब दाह-संस्कार कर दिया जाए तो बेहतर . बहुत सुन ली इस बाघ के बच्चे की दहाढ़ . नरेन्द्र चौबे</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस विजय शंकर चतुर्वेदी नाम के कवि का अब दाह-संस्कार कर दिया जाए तो बेहतर . बहुत सुन ली इस बाघ के बच्चे की दहाढ़ . नरेन्द्र चौबे</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सुरेन्द्र</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/10/24/vijayshankar-chaturvedi-defending-himself/comment-page-1/#comment-4082</link>
		<dc:creator>सुरेन्द्र</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 06:08:27 +0000</pubDate>
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		<description>विजय शन्कर चतुर्वेदी बेहद निर्लज्ज और  लबाड़ है. वह इसी एक बात से पता चल जाता है कि अपनी  झूठी शान बघारने के लिये  उसनी बार बार यह कहा है कि प्रख्यात कथाकार और ’हंस’पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव भी उसकी कलम का लोहा मानते हैं और उसे सलाम करते हैं.हमने यहां दिल्ली में जब यादव जी से इसकी तसदीक करनी चाही तो उन्होंने कहा कि इस नाम के किसी शख्स को वे जानते तक नहीं और ऐसे पचास सड़क छाप कवि विजय शंकर उन्के दफ़्तर में रोज आते रहते हैं .तुम कितने बडे़ फ़्राड हो कविराज ,अब इसकी पोल चारों तरफ़ से खुल रही है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विजय शन्कर चतुर्वेदी बेहद निर्लज्ज और  लबाड़ है. वह इसी एक बात से पता चल जाता है कि अपनी  झूठी शान बघारने के लिये  उसनी बार बार यह कहा है कि प्रख्यात कथाकार और ’हंस’पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव भी उसकी कलम का लोहा मानते हैं और उसे सलाम करते हैं.हमने यहां दिल्ली में जब यादव जी से इसकी तसदीक करनी चाही तो उन्होंने कहा कि इस नाम के किसी शख्स को वे जानते तक नहीं और ऐसे पचास सड़क छाप कवि विजय शंकर उन्के दफ़्तर में रोज आते रहते हैं .तुम कितने बडे़ फ़्राड हो कविराज ,अब इसकी पोल चारों तरफ़ से खुल रही है.</p>
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