इलाहाबाद में पहले दिन की ब्लॉग संगत का रॉ मटीरियल
♦ विनीत कुमार
अचानक पाबंदियों के टूटने से भी दम घुटने लगता है, अनंत आजादी कई बार अराजक स्थिति पैदा करते हैं। इसलिए चिट्ठाकारी पर जब भी हम बात करते हैं तो स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच के फर्क को समझना होगा। चिट्ठाकारी में जो कुछ भी कर रहे हैं उसके साथ हर हाल में जिम्मेदारी का एहसास भी होना चाहिए। आदमी जब बोलता है तो कुछ भी बक देता है लेकिन लिखते वक्त हम ऐसा नहीं कर सकते। बोलने से जीभ नहीं कटती लेकिन लिखने से हाथ कट जाता है। हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि आजाद अभिव्यक्ति के नाम पर जो कुछ भी चिट्ठाकारी की दुनिया में लिखा जा रहा है, इसके बीच एक स्टेट मशीनरी भी है। आनेवाले समय में ये राज्य लिखने के मामले में दखल करे इससे पहले ही चिठ्ठाकारों को चाहिए की वो अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए स्वयं अनुशासित हों। इलाहाबाद में चिठ्ठाकारी की दुनिया विषय पर आयोजित दो दिनों की राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए नामवर सिंह ने ब्लॉगिंग को आजादी की अनंत दुनिया मानकर सिलेब्रेट करनेवाले ब्लॉगर समाज को इस पक्ष से भी सोचना जरुरी बताया। नामवर ने इस मौके पर इस शहर को ऐतिहासिक करार दिया कि कभी इसी शहर से हिन्दी के आंदोलन की शुरुआत हुई थी और आज फिर इसी शहर ने हिन्दी के नए रुप चिठ्ठाकारिता पर पहली बार राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी आयोजित की है। नामवर सिंह की ही बात को आगे बढ़ाते हुए महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि-हमें पता है कि जब स्टेट इस तरह के किसी भी मामले में दखल करती है तो उसका रवैया किस तरह का होता है? ऐसे मसले में ब्यूरोक्रेसी नियंत्रण के नाम पर किस तरह का व्यवहार करती है,ये सब हमें समझना होगा। उन्होंने इन्टरनेट के जरिए अपार सूचना प्रसारित किए जाने के सवाल पर कहा कि जो भी इन्फार्मेशन आ रहे हैं उनमें नॉलेज एलीमेंट कितना है, इस सिरे से भी सोचने की जरुरत है? शुरुआत में जिस तरह टेलीविजन के आने से लगा कि अखबार और पत्रिकाएं अपना महत्व खो देंगी वैसी ही चर्चा ब्लॉग के बारे में की जा रही है लेकिन ऐसा नहीं है। मंच पर आसीन लोग जब बारी-बारी से ब्लॉग के जरिए अराजक स्थिति पैदा करने की बात कर रहे थे,ऐसे में संतोष भदौरिया ने स्पष्ट किया कि इसके लिए ब्लॉगर या मॉडरेटर कम दोषी है। इसके लिए दोषी वो कुंठासुर बेनामी टिप्पणीकार जिम्मेदार हैं जो कि बेतुकी बातें करके निकल लेते हैं। अभिव्यक्ति के नाम पर अराजकता और छिछोरेपन के सवाल को पूरे दिन तक ब्लॉगर और गैर-ब्लॉगर मौके-बेमौके प्रमुखता से उठाते रहे।
प्रथम सत्र में अकादमिक मिजाज की औपचारिकता पूरे होने के बाद हिन्दी ब्लॉगिंग के गुरु कहे जानेवाले रवि रतलामी ने पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के जरिए ब्लॉग से जुड़े विविध मसलों पर अपनी बात रखी। उन्होंने ग्राफिक्स के जरिए स्पष्ट किया कि आनेवाला समय इंटरनेट का है और ब्लॉगिंग में अनंत संभावनाएं हैं। लेकिन उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि ब्लॉगिंग के कई तरह के नुकसान भी है और हमें इससे सतर्क रहने की जरुरत है। रवि रतलामी कल ब्लॉगिंग के तकनीकी पक्षों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। प्रथम सत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा कि इसमें हिन्दुस्तान एकेडमी की ओर से प्रकाशित,सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की किताब ब्लॉग जगत का एक झरोखा सत्यार्थमित्र का लोकार्पण भी किया गया। इस किताब में उनके ब्लॉग की चुनी हुई पोस्टें शामिल हैं। इस किताब पर ज्ञानदत्त पाण्डेय ने ब्राउसर के जरिए प्रेषित किया कि-अगर आपके पास पहले से उपलब्ध अनुभव,भाषा पर पकड़ और नैसर्गिक रुप में’कम से अधिक’अभिव्य्त करने की क्षमता नहीं है तो आप सफल ब्लॉगर नहीं हो सकते। सिद्धार्थ को हिन्दी ब्लॉगिंग में सफलता में सफलता,शंका की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती। कुल मिलाकर ब्लॉगरों के बीच ये सत्र नैतिक निर्देश का एहसास कराने और सांकेतिक रुप से संस्कारित किए जाने की कोशिशों के तौर पर याद किया जाएगा।
दूसरे सत्र में विचार अभिव्यक्ति का नया आयाम पर विमर्श करने के लिए हम हिन्दुस्तानी अकादमी की बिल्डिंग से दूरस्त महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के इलाहाबाद सेंटर पर जमा हुए।। इस सत्र में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए करीब 35 ब्लॉगरों ने शिरकत की और इलाहाबाद के करीब 12 ब्लॉगर मौजूद थे। ब्लॉगरों के औपचारिक परिचय के दौर ने काफी समय ले लिया। शोर-शराबे के बीच इस परिचय का शायद ही बहुत लोगों को लाभ मिला होगा। खराब ऑडियो क्वालिटी, लोगों की आपसी कानाफूसी और लगातार आवाजाही के बीच विमर्श के लिए जो माहौल बनने चाहिए वो नहीं बन पाया। इसी माहौल में बारी-बारी से आज के ब्लॉगर-वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं। इस दूसरे सत्र का संचालन फुरसतिया नाम से मशहूर ब्लॉगर अनूप शुक्ल ने किया।
पहले वक्ता के तौर पर चर्चित पोर्टल भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह ने ब्लॉगिंग में अभिव्यक्ति के खतरे पर बातचीत करते हुए कहा कि शुरुआत में जब भड़ास को लेकर शिकायतें आनी शुरु हुई तब हमने व्यवस्थित तरीके से भड़ास4मीडिया शुरु किया और उसके बाद गाय समझी जानेवाली मीडिया के भीतर के सफेद-स्याह को सामने लाने की कोशिशें की। बड़ी मीडिया जिस तरह से बड़ी खबरों को दबाने का काम करती है,हमारी कोशिश होती है कि हम उन पक्षों को सामने लाएं। हमें कई तरह से लोग सलाह देने का काम करते हैं किसी की इच्छाएं भली होती है तो किसी का बहुत ही खतरनाक लेकिन मेरा मानना है कि हम अगर अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं तो किसी भी तरह का फर्क नहीं पड़ता। यशवंत ने ब्लॉग के मॉनिटरी पहलूओं को बहस के बीच शामिल किया जाना अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि पैसे पर बात करने के मामले में हिन्दी समाज पिछड़ा रहा है औऱ इस पर गंभीरता से बीत होनी चाहिए।
अभिव्यक्ति के नए माध्यम पर बात करने आयी मीनू खरे ने अपना पूरा समय ब्लॉग के इतिहास, अभिव्यक्ति के संवैधानिक प्रावधानों के वर्णन में खपा दिया। उनकी प्रस्तुति से ब्लॉग-इतिहास की एक अच्छी समझ बनने की संभावना हो सकती थी लेकिन एक तो विषय से भटक जाने औऱ दूसरा कि रवि रतलामी की ओर से पहले ही सत्र में इन सब बातों पर चर्चा कर दिए जाने की वजह से ऑडिएंस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी और कुछ भी निकलकर सामने नहीं आने सका। जबकि मीनू ने आते ही घोषणा की थी कि बात निकली है तो बहुत दूर तलक जाएगी।
बोधिसत्व ने ब्लॉग के मुद्दे पर अपनी बात रखते हुई ये स्वीकार जरुर किया कि इसके जरिए हमारे परिचय का दायरा बढ़ा है लेकिन ब्लॉग में बहस की गुंजाइश है,इस बात से वो साफ इन्कार करते हैं। उनका मानना है कि ब्लॉग बहस का प्लेटफार्म नहीं है। आप कुछ भी लिख लो,बात करना चाहो लेकिन वो कमेंट के जरिए पर्सनल छींटाकशी में उलझकर रह जाता है। इसलिए मैं संस्मरण लिखता हूं,ब्लॉग बहुत ही अघाए हुए लोगों के हाथ में फंसा हुआ नजर आता रहा है जिनके हाथ में ब्लॉग के लिए हाथ में कम से कम 1000 रुपये हैं। खिले हुए चेहरे ही अधिक शामिल होता जा रहा है। इसे मैं अच्छे दिनों को याद करने का माध्यम मानता हूं और इसे अपनी निजी डायरी के तौर पर देखता हूं।
मोहल्ला के मॉडरेटर अविनाश के ये कहने पर कि मैं अनामी टिप्पणीकारों का समर्थन करता हूं,एक तरह से पूरे सदन में हंगामा मच गया। आगे बैठे कुछ लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर बातें करनी शुरु कर दी। उन्होंने कहा कि महौल इतनी अनौपचारिक हो जाएगी इसी उम्मीद नहीं थी। इतने वेपरवाह हो जाएंगे इसकी उम्मीद नहीं थी। यहां उद्घाटन सत्र से लेकर विषय से फोकस्ड सत्र में भी कक्षा की तरह से बात कर रहे हैं. मुझे लगता है कि बोधिसत्व ने कहा कि खाए-पीए-अघाए लोगों के बीच फंसा हुआ है,वो फंसा हुआ है भले ही लेकिन पीपुल्स का मीडियम है। ये पूंजी का माध्यम नहीं है।
हिन्दी में ब्लॉगिंग की कवायद पारिवारिक की तरह रही है। ये पीपुल्स मीडियम है,इसी हिसाब से उसे बात करनी चाहिए।सही नाम से बात करने से कई तरहकीपरेशानी हो सकती है। स्टेट से सुरक्षित रहते हुए अपनी बात करनी होती है। मैं बेनामी का समर्थक हूं। ट्रेडिशनल मीडिया के पास पूरे वाक्य है,उसके पास पूरा व्याकरण है। ये कानाफुसियों को दर्ज करने का माध्यम है। मैं इसमें डिक्टेट करने के पक्ष में नहीं हूं। मुद्दे की बात हो ही नहीं रही है। अविनाश ने पूरे सत्र को लेकर निराशा जाहिर करते हुए कहा कि मेरे सामने जनतंत्र डॉट कॉम के मॉडरेटर समरेन्द्र मौजूद हैं, मैं चाहता हूं वो ब्लॉगजगत के कुंठासुर पर मेरी तरफ से शुरु की गयी बातचीत को आगे बढाएं।
समरेन्द्र ने अपनी बातचीत की शुरुआत प्रथम सत्र में विद्वानों की ओर से दिए गए वक्तव्यों को शामिल करते हुए की। उन्होंने कहा कि- विभूति ने कहा कि जिम्मेदारी बहुत जरुरी है, राज्य जब दखल देगी तो आपलोग बहुत परेशान हो जाएंगे।. सिस्टम हमेशा डराने-धमकाने का काम करते हैं। नामवर ने कहा कि आप जिम्मेदार बनिए। क्या कोई चैनल जिम्मेदार है,आम आदमी की बात करता है। दूरदर्शन जिम्मेदार भी नहीं बन पाया।.. क्यों नहीं कहेंगे हम। क्या उंगलियां नहीं उठेगी। आम आदमी नाम के साथ नहीं आएगा। हमें जिम्मेदार बनने की हिदायत दे रहा है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे ये साफ होता है कि बेनामी ने अगर अपनी पहचान जारी कर दी तो स्टेट और मशीनरी शिकंजे कसना शुरु कर देती है। आम ब्लॉगर के लिए ये संभव ही नहीं है कि वो ये सबकुछ झेल पाए।
समरेन्द्र की बात से असहमति जताते हुए हर्षवर्धन ने कहा कि- मैं ब्लॉगिंग को वैकल्पिक मीडिया के तरह से देख रहा हूं।अनामी दस कदम आकर जाकर लड़खड़ा जाएगा। अगर ब्लॉग व्यक्तिगत होने लग जा रहा है तो माफ कीजिए इसका मुझे कोई बहुत बड़ा भविष्य नहीं दिखता है।हम मीडिया के बीच से एक रास्ता निकालने का काम कर रहे हैं। अगर हम इस ब्लॉग को सरोकार की मीडिया बनाना चाहते हैं तो हम उसके मददगार बने
एक बड़ा माध्यम बनने वाला है और मैं इस मुहिम के साथ हैं।
कॉफी हाउस नाम से ब्लॉग चलानेवाले भूपेन ने अब तक की हुई बातचीत पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए ब्लॉगिंग को थ्योराइज करने की जरुरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि-किस दिशा में ब्लॉग जाए इस पर बात करनी चाहिए।
अविनाश ने मॉडरेटर की जरुरत को नकारा। ब्लॉग न्यू मीडिया का हिस्सा है। मेनस्ट्रीम मीडिया का क्या हाल है ये हमसे छिपा नहीं है। इसका मालिक कौन है इस पर भी हमें सोचना होगा। इसके रिच पर हमें बाक सोचनी होगी। अगर आप आजादी की बात कर रहे हैं तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। किसने आपको स्पेस दिया, उसके पीछे की इकॉनमी को समझना पड़ेगा। किस क्लास की ऑडिएंस है इसे भी हमें समझना है। झरखंड के लोगों के लिए डेमोक्रेसी का मतलब अलग है औऱ दिल्ली के डेमोक्रसी अलग। पीपुल्स मीडिया अभी नहीं हुआ है। समरेन्द्र ने कहा कि चाइल्डहुड में है लेकिन ये तर्क सही नहीं है। ये झूठ ठूंसा हुआ है। क्या वो वाकई चाइल्डहुड में है। नोम चॉमस्की का रेफरेंस दिया। इस बात को हमें समझना होगा। नए मीडिया को लेकर हमेशा शक रहा है। क्या ये राष्ट्रीय ब्लॉगिंग है,इन्टरनेशनल है,इस पर समझने की जरुरत है,ट्रांसनेशनल हैं,ये समझना है। हमे इसकी ऑनरशिप पर भी बात करनी होगी। ये मीडिया के कैरेक्टर को डिफाइन करता है। हमारे राष्ट्रीय मीडिया का चरित्र क्या होगा,इस पर बात करनी चाहिए। अंत में…मॉडरेटर पूरी आजादी नहीं देनी होगी,मॉडरेटर को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी।
अपना घर की आभा मिश्रा ने पहले तो हताशा और बात में उम्मीद जताते हुए कहा कि-लोग बहस नहीं करते,फैसले सुनाते हैं। मैं रही और तू गलत। बहस एकतरफा हो रही है.. लोग अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं। सामनेवाले ब्लॉग की हत्या की कोशिश में लगे हैं लेकिन हमें उम्मीद है कि आनेवाला समय ऐसा नहीं होगा।
बेदखल की डायरी नाम से मशहूर ब्लॉग की संचालक मनीषा पाण्डेय ने कहा कि-खास बात कहने को बची नहीं है। एक ही बात से कई गुत्थियां सुलझ गयी। एक हिन्दी समाज का प्रॉब्लम है। ब्लॉग में वही हो रही है जो कि समाज में हो रहा है। जैसे घरों में बात हो रही है वैसी ही बात हो रही है। हमारी लड़ाई रचनात्मक होनी चाहिए। अच्छे इरादे होनी चाहिए.कई तरह की गहराई होनी चाहिए। सही इरादों से विरोध होनी चाहिए कि कुछ लोगों के जुबान चुप हो सकें।..
अनामी को लेकर मसीजीवी नाम से मशहूर ब्लॉगर विजेन्द्र सिंह चौहान ने अपना खुला समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि-भूपेन जो सैद्धांतिक पृष्ठभूमि की बात की है उस पर बात करना जरुरी है। सैद्धांतिक आधार का होना अनिवार्य है। इससे पहले कि हमारे लिए कोई और सिद्धांत गढ़ने लगे इससे पहले जरुरी है कि हम खुद ही सिद्धांत गढ़ लें। बेनामी से बाहर जाकर सिद्धांत नहीं गढ़े जा सकते। मैंने भी इन गालियों को झेला है लेकिन फिर भी ब्लॉगिंग की परिभाषा में ये निहित है कि हम उसे शामिल है। बेनामी को जब हम बहिष्कृत कर देगें तो शिकंजा हमारा गले में हैं। कौन होता है बेनामी- सबसे बड़ा कारण स्वयं से डर। हम लगातार पॉलिटिकली करेक्ट होने का दावा झूठा करते हैं। एक भी मर्द नहीं है जो स्वीकार करे कि हम अपनी पत्नी को पीटते हैं। दूसरी बात,हम मानें या न माने लेकिन ये अर्थतंत्र हैं, हम इससे कमाएं या नहीं। हम कंटेट को कॉमोडिटी बनाते हैं। वो खरीदा जा रहा है बेचा जा रहा है। इंटरनेट पर जाकर हमारी पोस्ट प्रोडक्ट बन जाती है। तीसरा,हमने अब तक की सारी लड़ाइयां इकठ्ठा होकर किए हैं। इस नयी व्यवस्था में इन्डीविजुअलिटी को सिलेब्रेट किया जा रहा है। जैसे ही हम ब्लॉगिंग को ब्लॉगिंग के नहीं रहने में जाकर खड़े हो जाते हैं, तब तक हम राज्य की कठपुतलियों के शिकार हो जाते हैं।
मशहूर ब्लॉगर इरफान का मानना रहा कि- ब्लॉग समाज का आइना है। कोई एक स्टिकयार्ड नहीं हो सकता है, हर को अपनी बात कहने की आजादी है। आखिरकार एक रचना एक प्रयास की मांग करता है। सिर्फ वर्णमाला औऱ वाक्य रचना को जानकर आप लेखक नहीं बन सकते। बहुत दिलचस्प माध्यम है जिसमें मल्टीमीडिया का इस्तेमाल होता । ये अद्भुत माध्यम है। सवाल बहुत है लेकिन हम बद्ध होकर, व्यवस्थित तरीके से बात नहीं कर रहे हैं। सहारा चैनल के मालिक को सारा जगत सहारा लगने लगा है। छूकर मेरे दिल को किया तूने क्या इशारा, बदला ये मौसम लगे सहारा जग सारा, ये गीत गाते हैं।
क्यों बंद किया गाने को अपलोड़ करने का काम टूटी हुई बिखरी हुई पर?मैं दूसरे के मजे के लिए अपने अर्काइव नहीं उपलब्ध करा सकता। लोग टीप करके अपनी बात कर देते। मेरे पास एक रफ आइडिया है चेक करने के, आत्म नियंत्रण के समय मिला तो कल इसकी विस्तार से चर्चा करुंगा।
अफलातून ने खुले अंदाज में अपनी बात रखते हुए कहा कि- खुले विश्व के बंद होत दरवाजे- हिन्दुस्तान में मैंने एक लेख लिखा। कल हमसे सवाल-जबाब किए जाएंगे कि कहां से पैसा आ रहा है। विदेशों में ये काम शुरु हो गयी है। एक अंश में हम आत्म-मुग्धता के शिकार हैं। मसिजीवी ने जो पर्सनल होने की बात कही है, ये बहुत खतरनाक बात है। इमरजेंस एक ग्रंथ है इंटरनेट और चीतों को लेकर अध्ययन पक्षियों को लेकर जो व्यवहार है, वही व्यवहार है इंटरनेट की दुनिया में। हमें सही दिशा में बातों को ले जाएं ये बहुत जरुरी है। इ-स्वामी, इ-पंडित की चर्चा इन्होंने भी अनामी थे… हमें इनके योगदान को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बेनामी टिप्पणियां अगर सकारात्मक तौर पर हो तो फिर उसमें क्या आपत्ति हो सकती है।अभी ब्लॉगिंग हम कोई क्रांतिकारी नजरिया नहीं आ रहा है। टेकनीकली सिख लिए और निपट दिए। जरुरी है कि एक सामूहिक घोषणा जारी हो.. इलाहाबाद से एक घोषणा जारी हो। वीकीपीडिया में योगदान करने की जरुरत है। इसे हिन्दू वीकीपिडिया या मुस्लिम वीकिपीडिया नहीं बनने दें। हमें जिम्मेदारी तो हर हाल में निभानी होगी।
अब ब्लॉग पर कायदें की बहसें नहीं होती। जब तक पहुंचता हूं तब तक धूल उड़ती नजर आती है। मेरे ब्लॉग पर ऐसा कुछ नहीं होता कि बेनामी कमेंट किए जाएं लेकिन करते हैं और भद्दे तरीके से करते हैं। ब्लॉगिंग ने भाषा का कोई नया मुहावरा नहीं रचा है। अजीत वडनेरकर को आज ही गाड़ी से दिल्ली जाना था इसलिए उन्होंने बहुत ही संक्षेप में अपनी बात रखते हुए संभावनाओं की तरह बढ़ने पर जोर दिया।
कलकत्ता से आए प्रियंकर ने कहा कि- मैं बेनामी पर कहना चाहूंगा। किसी से हर समय नाम की उम्मीद करना सही नहीं है। ये अतिरिक्त मांग है। पचास जन्म लेना पड़ेगा घुघूती बासुती..अनामदास जैसा लिखने के लिए, ये अपनी पहचान नहीं बताना चाहते तो क्या दिक्कत है? इन्होंने बहुत ही बेहतर तरीके से लिखा है। बेनामी कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। असल चीज है कि कंटेंट पर बात होनी चाहिए। अगर वो छद्म नाम से लिखते हों तो क्या दिक्कत है।
ब्लॉगरों के अतिरिक्त इस सत्र में इसी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से एम.फिल कर रही एक स्टूडेंट उमा साह ने बताया कि उसने ब्लॉग की भाषा पर रिसर्च किया है और वो इस नाते अपनी बात रखना चाहती है। उसने कहा कि ब्लॉग में अभी भी किसी भी तरह की सेंसरशिप नहीं है इसलिए इसमें मुख्यधारा की मीडिया से बहुत आगे जाने की गुंजाइश है और इसे भी हमें चौथे खंभे के तौर पर विकसित किए जाने चाहिए।
अलग-अलग मौके पर उठापटक के बीच ये सत्र यहीं समाप्त होता है। रातभर की यात्रा की वजह से बुरी तरह थका हूं। अकल भाषा और संप्रेषणीयता के सवाल पर मुझे अपनी बात रखनी है। आपसे माफी मांगते हुए कि मैंने कई जगह बिना बारीकी से पढ़ते हुए सत्र के दौरान टाइप की गई लाइनों को चस्पा दिया है। आप उन्हें सुधारकर पढ़ लेंगे। मैं और मेहनत करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हूं। इन सबके बीच दुखद पहलू है कि जिस डिजिटल रिकार्डर से मैं अब तक आपके लिए संगोष्ठियों के ऑडियो वर्जन उपलब्ध कराता रहा वो सभागार की डेस्क पर से सत्र खत्म होने के साथ ही गायब हो गया। एक भावनात्मक जुड़ाव और आर्थिक क्षति की वजह से परेशान हूं। मूड़ खराब है,खुश होने के लिए इतना है कि इलाहाबाद में खाने की व्यवस्था बड़ी दुरुस्त है,मेरे हॉस्टल मेस से कई गुना बेहतर।









सुंदर रिपोर्ट के लिए बधाई। कम से कम पता तो चला कि गुरूजन बिना जाने ही चले आए। नामवर जी की सलाह इस संदर्भ में अर्थहीन है। क्योंकि पहले से ही कानून बने हुए हैं। युवा ब्लागरों के वक्तव्य गंभीर हैं। उनकी इस विधा के मर्म पर नजर है। विस्तार के साथ ब्लागरों के वक्तव्यों को पेश करें। वही इस माध्यम के सिद्धान्तकार हैं।
अच्छी रपट है विनीत की। उनका रिकार्डर खो जाने के दर्द को आसानी से समझा जा सकता हैं।
अब तक की कवायद जानकर लगता यही है कि आनन-फानन में जुटाए-लुटाए गए इस आयोजन का मूल मकसद बेनामियों को नाथना-साधना ही ज़्यादा है। अविनाश, समरेंद्र और मसिजीवी ने बेनामियों का पक्ष साहस के साथ रखा, खुशी की बात है। लेकिन कुछ और बातें भी इन्हें उठानी चाहिए थीं। क्या प्रिंट और इलैक्ट्रानिक में कुण्ठासुर नहीं हैं ? क्या वहां बेनामी या छद्मनामी नहीं हैं ? जहां तक मेरी जानकारी है ब्लाग की दुनिया में सर्वाधिक गालियां राजेंद्र यादव को बकी गयीं हैं और बकने वालों में बेनामियों की संख्या न के बराबर है। क्यों ? विरोधी जानते हैं कि यादव लोकतांत्रिक प्रवृति के व्यक्ति हैं और किसी का कैरियर ख्सराब करने की हद तक नहीं गिर जाने वाले। खुद राजेंद्र यादव ने ब्लाग के दूसरे पहलुओं पर नकारात्मक टिप्पणियां की हैं पर बेनामियों पर आपत्ति जताई हो, मेरी जानकारी में नहीं आया। मैंने पहले भी कहा है कि पहले जवाब उनसे मांगे जाएं जो प्रिंट पर कबीर-हकीर नामों से लिखते रहे हैं। कुण्ठासुर जहां भी जाएगा, कुण्ठासुर ही रहेगा। माध्यम बदलने से क्या किसी का स्वभाव बदल जाएगा या कुण्ठाएं मिट जाएंगीं। अगर हम आज ही यह भी समझ लें कि यह जो नाम दिया गया है ‘कुण्ठासुर’, किस मानसिकता की उपज है, तो कई और बातें साफ हो जाएंगी। आपको पौराणिक ‘असुरों’ के समक्ष बिठाने का सोचा-समझा खेल तो नहीं है कहीं यह ? एक सफ़ाई आएगी कि असली अर्थ है ‘कुण्ठा के सुर’। वह भी गलत नहीं ठहराया जा सकता पर इसे भी ध्यान में रखें। दिखाया यह जा रहा है जैसे हिंदी में कुण्ठा नाम की चीज़ ब्लाग के आने के बाद एकाएक पैदा हो गयी हो। जबकि हिंदी साहित्य के महामनाओं, प्रिंट और इलैट्रानिक के इतिहास में ये किस कदर सदल-बल घुसे पड़े हैं, इन्हें खुद नहीं मालूम क्या ?
मुझे तो नहीं लगता कि इस मीडिया को उतना खतरा सोनिया या राहुल की सत्ता से है जितना कि खुद अपने अंदर घुसे वर्ण/जाति/प्रांत/क्षेत्रवाद आदि-आदि से है। सोनिया या राहुल कहीं अधिक खुली और प्रगजिशील सोच के लोग लगते है अगर हम अपने साहित्यिक महामनाओं के इतिहास और वर्तमान को खुली आंखों से देखें तो।
‘चोखेरबाली’ नामक ब्लाग पर मैं कई दफा कई बहसों में शामिल रहा जहां कि ‘स्वप्नदर्शी’ नाम से एक ब्लागर भी शामिल होते रहे हैं। उनका लेखन इतना संतुलित रहता है कि इन दो महीनों से पहले मुझे कभी ख्याल तक नहीं आता था कि मैं किसी नकली नाम वाले ब्लागर से बात कर रहा हूं।
जो लोग व्यवस्था में जायज-नाजायज तरीकों से सत्ता हासिल कर लेते हैं और उसे अपने आग्रहों के हिसाब से संचालित करते हैं, और विकल्पहीनता की स्थिति या फिर मजबूरी में व्यवस्था के लिए स्वीकार्य हो जाते हैं, खासतौर पर वही मांग करते हैं कि उनसे सवाल करने वाला व्यक्ति किसी ओट में न रह कर सामने आकर उनसे शास्त्रार्थ (शास्त्रार्थ की संस्कृति…!) करे। हालांकि सत्ता अपने आचरण से खुद-ब-खुद ऐसे सवाल पैदा कर चुका होता है, जो उनकी मांग का जवाब होता है। लेकिन एफ-16 में बैठ कर किसी निहत्थे को ललकारना! मजेदार तर्क है। छिप कर सवाल क्यों करते हो, असुविधा होती है। सामने आके लड़ो, ताकि तुम्हें एक झटके में ही खत्म किया जा सके। इक्के-दुक्के मोर्टार-धारियों का उदाहरण रख के सामान्यीकरण करना शायद सही नहीं होगा।
राज्य की सेना और गुरिल्ला सेना की सैद्धांतिक व्याख्या और विश्लेषण करेंगे तो इस सिद्धांत और सूत्र की असली मंशा समझ में आ जाएगी। एक अत्याधुनिक हथियारों से लैस बहादुर का सामना अगर किसी को तीर-धनुष से करना हो, तो वह कौन-सा रास्ता अख्तियार करे…!
प्रियंकर ने सही कहा है कि अनामदास या घूघुति बासूति की तरह लिखने के लिए बहुत लंबा सफर तय करना पड़ेगा।
इनके बरक्स एक बात यह कि इंटरनेट के रूप में या इसके रास्ते यह नए विकल्प के सामने आने का दौर है, जिस तक उनकी भी पहुंच आसान हो रही है, जो अब तक स्थापित मानकों वाले युद्धास्त्रों से वंचित रहे हैं। उन्हें अपने मैदान से लड़ने दीजिए। जब आपके बराबर ताकत हासिल कर लेंगे, तो आपके सामने भी आके लड़ेंगे। लड़ाई का मजा बराबरी में ही आता है।
हमारी व्यवस्था अब तक लाचार बनाने और लाचारों पर वार करके अपना हाथ साफ करने की आदी रही है…।
ब्लाग के बेनामियों को खामख्वाह का हौवा बनाया जा रहा है। वजह साफ़ है-पिछले दिनों नेट पर चली बेबाक बहसें। कहा जा रहा है कि यहां कोई भी आकर कुछ भी लिख रहा है। तो महामनाओं आपको नहीं पता कि गांवों-कस्बों से लेकर महानगरों तक ‘जुगनू का बच्चा’ और ‘घण्टाघर की चोटी पर कव्वा’ और अलां-फलां डायजेस्ट नाम से निकलने वाले एक-दो-तीन पृष्ठीय अखबारों में से ज़्यादातर क्या करते आए हैं !? उनको लेकर आपने सेमिनार किए ! और बड़े अखबार क्या करते आए हैं यह तो अब ब्लाग भी बता रहे हैं और बड़े-बड़े संपादक भी।
एक विषय होना चाहिए/था- ’’सिर्फ ब्लाग के बेनामियों पर आपत्ति क्यों ?’’ बहुत कुछ सामने आ जाएगा।
‘कुण्ठासुर’ से संतोष भदोरिया को क्यो आपत्ति है,समझ से परे है. जे एन यू से लेकर वर्धा तक की उनकी यात्रा कुण्ठासुर’ से युक्त रही है.वर्धा मे भी उनकी कभी हैसियत सामने आकर बात करने कि नहे रही है. हमे नही लगता कि किसी बेनामी पर किसी को क्यो आपत्ति है. स्विस बैंक मे कौन खाता नही खुलवाना नही चाहेगा ,यदि उसकी हैसियत है.टैक्स चुराने की हैसियत है तभी तो सभी लोग चुराने की जुगत करते है. तब यह सवाल क्यो नही उथा.तो तैक्स चुराना उचित पर बेनामी ब्लागर… अरे भाई राम के काल से पापी को मारने अथ्वा बेनकाब करने के लिये ओट लिया जाता रहा है. वर्त्मान मे यदि कोइ ब्लागर कर रहा है तो करने दिजिये. आप सिर्फ़ यह देखे कि उसकी सूचना मे कितना दम है.मूल स्पिरिट है न कि नाम का लिखा जाना. सन्तोश भदोरिआ से कोइ यह पूछे कि पब्लिक मनी का यह दुरुप्योग किस हैसियत मे कर रहे है.विवि से आमन्त्रित कितने अतिथियो को ब्लाग के बारे मे जान्कारी है और वे लोग क्या कभी ब्लोग लिखते भी है या वि वि के धन पर गुलछर्रे उडाते हैं. नरेन्द्र सिन्ह ,श्री राकेश व ललित शुक्ल ने ब्लाग की दुनिया मे कौन सा राकेट लांच्रर दागा है.पर चापलुसी जो एक किस्म्की बेनामी ब्लागरी ही है , की कला मे माहिर भदौरिया इनको जरूर बुलायेगे और हिदी जगत के कुटिल व्यक्तित्व नामवर को भी,. क्या नामवर के अलावा हिन्दी जगत सूना है. यदि हा तो हिन्दी का मर जाना ही श्रेय्स्कर होगा. नही तो फ़िर इन नामवरो,राजेन्द्र यादवो,कालियाओं,अशोक वजपेइयो के कवच से बाहर निकलना होगा.
एक फिल्म आई थी, तारे जमी पर। फिल्म की सफलता के बाद फिल्म के मुख्य कलाकार दर्शील ने एक सवाल उठाया था कि जब उनकी अदाकारी बेहतर है तो उन्हें बेस्ट ‘बाल कलाकार’ की जगह बेस्ट ‘कलाकार’ का पुरस्कार क्यों नहीं दिया जा सकता। मायने यही थे कि किसी चीज को रिकोर्गनाईज किये जाने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है? उसकी गुणवत्ता या फिर उससे जुड़ी हुई उम्र और अनुभव की सीमाएं। मेरे खयाल से गुणवत्ता। इस सन्दर्भ को अब ब्लांिगग जगत से जोड़ना चाहता हूं। ये दौर हिन्दी ब्लौगिंग के पनपने का दौर है। चाहे अनुभव और उम्र के कई पड़ाव पूरे कर चुके ब्लागर हों या फिर नये लोग। दोनों ही ब्लाग की दुनिया के लिए समान हैं, समान तरह से आंके जाने चाहिये। चीजें नई होती हैं तो उनकी संरचना और स्वरुप पर चर्चाएं होती हैं। खासकर रचनात्मकता से जुड़ी चीजें इन चर्चाओं के बिना पनप नहीं पाती। हर्ष की बात है कि हिन्दी ब्लागिंग के लिए ऐसी चर्चाएं होने लगी हैं। बनारस में हो रही गोष्ठी इसकी बानगी है। स्वागतयोग्य है। लेकिन यहां मेरी कुछ शंकाएं और सवाल हंै। ब्लौगिंग जगत में वो कौन लोग हैं जो इस योग्यता का निर्धारण कर रहे हैं कि कौन इस तरह की कार्यशालाओं में सीखने सिखाने की क्षमता रखते हैं। जो ब्लाग की दुनिया को नया स्वरुप देने में समर्थ हैं। जो यह निर्धारण करने के अधिकारी हैं कि इस जगत के क्या मानदंड और क्या इसकी क्या सीमाएं होनी चाहिये। और यह भी कि कौन ब्लागिंग से जुड़ी इस पूरी संरचनात्मक प्रक्रिया में शामिल होने के योग्य हैं कौन नहीं? इस तरह की गतिविधियों में बुलावा भेजे जाने के पीछे कौन सी चीजें हैं जो निर्धारित करती हैं कि इन्हें ही बुलावा भेजा जाना चाहिये। यहां मेरा एक डर प्रभावी होने लगा है कि कहीं इस क्षेत्र में भी हिन्दी साहित्य जगत की तरह स्वयंभू लोगों की एक खेप तो तैयार नहीं हो रही। एक नेटवर्किंग एक लौबीईंग की राजनीति तो यहां पल पनप नही रही। कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोगों की खेप हिन्दी ब्लौगिंग जगत को अपनी बपौती बनाने पे तुल जाने लगी है। कि वही समाचार पत्रों की सुर्खियां बटोरेंगे, वही कार्यशालाओं में वक्ता, प्रवक्ता बनकर शामिल होंगे और कल के दिन जब ब्लौगिंग ना जाने कैसा एक प्रभुत्वशाली कार्यक्षेत्र बन जायेगी, वही लोग काबिज हो जायेंगे सत्ता पर। एक दूसरे को श्रेष्ठ ठहराते। ये एक डर है और अभी एक शुरुआत। और इस शुरुआती दौर में सभी को हक है कि ब्लौगिंग की इस संरचनात्मक प्रक्रिया में अपना योगदान दें और योगदान देने के अडडों में उनकी शिरकत भी सम्भव हो सके।
ब्लौगिंग जगत में युवाओं की भी एक बड़ी खेप है जिसके योगदान को उतना ही महत्व दिया जाना चाहिये जितना अन्य लोगों को। इनमें मीडिया या साहित्य की पढ़ाई कर रहे छात्रों की एक बड़ी संख्या है। मेरा डर मोहल्ला डाट कौम पर छपे बनारस के आयोजन के उस आमंत्रण पत्र पर छपे नामों में ऐसेे युवाओं की अनुपस्थिति से पुख्ता सा हो रहा है। आंखिर उन्हें भी इस तरह के आयोजनों में शिरकत का पूरा हक है खासकर तब जब ऐसे आयोजन सरकारी खर्च पर किये जा रहे हों। अच्छा होगा कि ब्लागिंग की इस दुनिया में चीजें लोकतांत्रिक तरीकें से आगे बढ़ें। सब की शिरकत भले ही सम्भव न हो पर सबका प्रतिनिधित्व तो कम से कम होना ही चाहिये। अगर अभी से गुटबाजी की राजनीति पनपने लगी तो फिर हमारे देश के लगभग हर दूसरे सिस्टम की तरह ब्लागिंग के हाल भी राम भरोसे हो जायेंगे। डर और सच्चाई का फर्क जिंदा रहेगा उम्मीद यही है।
Umeshji ki aapatti 100 feesdi jaayaz hai.
गलती से अलाहाबाद बनारस हो गया है।
“अभिव्यक्ति के नए माध्यम पर बात करने आयी मीनू खरे ने अपना पूरा समय ब्लॉग के इतिहास,अभिव्यक्ति के संवैधानिक प्रावधानों के वर्णन में खपा दिया। उनकी प्रस्तुति से ब्लॉग-इतिहास की एक अच्छी समझ बनने की संभावना हो सकती थी लेकिन एक तो विषय से भटक जाने औऱ दूसरा कि रवि रतलामी की ओर से पहले ही सत्र में इन सब बातों पर चर्चा कर दिए जाने की वजह से ऑडिएंस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी और कुछ भी निकलकर सामने नहीं आने सका। जबकि मीनू ने आते ही घोषणा की थी कि बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी।”
विनीत जी आपने मेरे नाम से यह टिप्पणी किसकी प्रस्तुति के बारे में लिखी है?आप द्वारा उल्लेखित विषय “अभिव्यक्ति के नए माध्यम” तो मेरा टॉपिक ही नही था और न ही ब्लॉगिंग इतिहास पर मैने कोई प्रस्तुति की. मेरा टॉपिक था “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निहित खतरे” जिसमें मैने कानूनी प्रावधानों की चर्चा ज़रूर की और यह मेरे टॉपिक के अनुरूप था.बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी का यह आशय था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल करने वाले लोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अपराधी भी सिद्ध हो सकते है और सज़ा के पात्र बन सकते है. इसके लिए मैने साइबर अपराध के प्रसिद्ध केसेज़ की चर्चा भी की.
इस तथ्यहीन रिपोर्टिंग पर आश्चर्य ही व्यक्त कर सकती हूँ.निवेदन है कि लिखने से पहले, कंटेंट न सही मगर कम से कम टॉपिक तो याद रखा ही करें.
शुभकामनाएँ.
ब्लागिंग आम आदमी के हाथ में अपनी स्वतंत्रता और विचारधारा को व्यक्त करने का बहुत बड़ा हथियार है। अब जो समाज का मठाधीश तबका है इसमें अपनी दखलदांजी बढ़ाता जा रहा है। ये व्याकरण और सही शब्दों का प्रयोग आम आदमी के भावनाओं आवेगों और इच्छाओं को प्रकटीकरण को रोकने का औजार है। ब्लाग की दुनियां को भी स्वच्छता के नाम पर कंट्रोल करने की साजिश चल रही है। ब्लाग और दूसरे माध्यम में मूलभूत अंतर यह है कि अगर आपको ब्लाग पसंद नहीं है उसमें अश्लीलता है तो उसपे मत जाएं। जबकि संचार के दूसरे माध्यमों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। अब तक जो जो बातें यह सभ्य समाज दबा के बैठा हुआ था। वह सब बात आज ब्लाग पर खुल के आ रहा है। खासतौर पर वर्णवादी व्यवस्था और सामंतवाद जातिवाद के खिलाफ खुलकर लोग ब्लाग पर लिख रहे हैं और इन बुराईयों के समर्थकों का इंटरनेट पर मुंह काला कर रहे हैं और लोगों तक उनका काला चेहरा पहुंचा भी रहे हैं। इसमें स्टेट के दखल के नाम अभी से हीं ब्लागरों को डराया जा रहा है कि हमारी भाषा में लिखो बरना लिखना बंद करवा देगें। तुमको जेल में डलवा देगें। लेकिन दुनियां में जैसे जैसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। दिन व दिन ऐसे तत्वों का काम दूरुह होता जाएगा। मुझे लगता है कि दुनियां भर के ब्लागरों को एकजूट होकर राज्य की मशीनरी के हस्तक्षेप से बचने के लिए एक अंतरराष्टीय नियम और बंधन हर देश में लागू करवाना चाहिए कि वे ब्लागरों की स्वतंत्ररा और लिखने की स्वतंत्ररा का हनन किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे।
उमेश ने सही सवाल उठाया है। यह सम्मेलन किसके लिए करवाया गया है ?
मुझे तो लगता है कि यह समारोह साहित्य की पुरानी बिमारियों को इंटरनेट की दुनिया में लाने का पहले चरण था।
विनीत ने शिमला से रिपोर्टिंग की तो जावरीमल्ल पारिख ने कहा था कि उनकी रिपोर्ट तथ्यों को गलत तरीक से प्रस्तुत करती है। उन्होंने इलाहाबाद से यही काम किया तो लेखक खुद कह रहीं हैं कि विनीत ने उनके बारे मंे गलतबयानी की है। वास्तविकता क्या है इसे स्पष्ट करें।
मीनूजी को मैं अपने ब्लॉग पर भी जबाब दे चुका हूं। वो इस बात को शायद समझ नहीं पा रही हैं। मैंने जो विष्य लिखा है,दरअसल वो पूरा का पूरा सत्र उसी विषय पर था जिसके अंदर कई उपशीर्षक थे। मीनूजी ने वहां हिन्दी ब्लॉगिंगःअभिव्यक्ति के खतरे उपशीर्षक पर बात कर रही थीं। अब वो इस बात को समझ ही नहीं पा रही हैं कि मैंने शीर्षक लिखा है,माइक्रो होकर उपशीर्षक नहीं। जो वहां बैनर लगाए गए थे उसमें शीर्षक ही थे उपशीर्षक नहीं। तथ्यहीन बात किसने की है,ये वहां के मौजूद ब्लॉगर बेहतर तरीके से जानते हैं। भाई रंगनाथ जहां तक सवाल शिमिला रिपोर्टिंग की है तो कम से कम दस लोग तो वहां जरुरु थे जो मेरे लिखे पर लगातार नजर बनाए हुए थे। मौखिक रुप से तो उन्होंने मुझसे असहमति जरुर जतायी लेकिन किसी ने ये नहीं कहा कि मैंने किसी भी तथ्य के साथ छेड-छाड़ की है। मीनूजी को इस बात से चोट पहुंची है कि मैंने उऩके लिए निगेटिव मार्क्स लगाए हैं।..तो यह भी मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा है,वहां मौजूद लोगों ने जिस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की है,वही लिखा है।
और हां जहां तक सवाल शिमला रिपोर्ट को लेकर जवरीमल्ल पारख के कमेंट पर कुछ नहीं कहने का है तो क्या कहूं- उन्होंने लिखा कि मैंने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की है। अब आप पता कर लें कि क्या वो वहां मौजूद थे और पूरी परिचर्चा में शामिल थे कि उन्हें मालूम हो गया कि हमने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की है। किसी के आत्मबल को कम करने के लिए ये तरीका चमत्कारिक तो जरुर हो सकता है जिसे पढ़कर लगे कि सचमुच मैंने ऐसा कुछ किया है लेकिन भाई रंगनाथ आप उनके बारे में भी तो जानकारी लें जो कि बिना वहां मौजूद रहे ही इस तरह के आरोप लगा रहे हैं। वैसे मीनूजी की तो ये एक बहुत ही सीनियर ब्लॉगर से शिकायत रही कि आपने मेरी तस्वीर क्यों नहीं लगायी और लगा देने पर उन्हें थैंक्यू कहा। अब मैं किस-किस व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा करता फिरुं। लेकिन हां इतना जरुर कहूंगा कि बोलनेवाले को ये तो जरुर याद रखना चाहिए कि उसने क्या बात की है?..इस रिपोर्ट को लिखने के दौरान जहां कहीं भी चूक हुई है मैंने सबों से व्यक्तिगत तौर पर माफी मांगते हुए उसे दुरुस्त कर दिया है।
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