इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लगी इंग्लिश देवी की मूर्ति
♦ रवीश कुमार
24 अक्तूबर 2009 को नयी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इंग्लिश देवी अवतरित हो गयीं। चंद्रभान प्रसाद की चार साल पुरानी परिकल्पना एक मूर्ति के रूप में साकार हुई है। चंद्रभान चाहते हैं कि दलित का हर बच्चा अंग्रेजी में पारंगत हो। अंग्रेजी जानेगा, तो वो विश्व की तमाम मुख्यधाराओं से संवाद कर सकेगा। हिंदी भाषी चंद्रभान इस मूर्ति के ज़रिये हिंदी-इंग्लिश का फरियौता नहीं करना चाहते। उनका मक़सद है कि कम से कम समय में दलित साक्षरता को हासिल किया जाए और अंग्रेजी माध्यम में उनकी निपुणता उनके लिए दुनिया के दरवाज़े खोल देगी। इस मौके पर कुछ ऐसे दलित भी बुलाये गये थे, जो उद्योगपति बन चुके हैं। जिनका कारोबार पचास से पांच सौ करोड़ रुपये का है। सिर्फ एक भाषा की कमी से वो दुनिया के सामने हीरो नहीं हैं। अंग्रेज़ी के कारण।
इस मौके पर नरेंद्र जाधव, दिग्विजय सिंह, चंदन मित्रा, निवेदिता मेनन, आशीष नंदी, बिबेक देबरॉय, ब्रिटिश काउंसिल के प्रमुख केविन सहित कई दलित अफसर मौजूद थे। प्रसिद्ध इतिहासकार गेल ओमवेत ने लार्ड मैकाले के जन्मदिन पर केक काटा। नीचे तीन तस्वीरों में से एक गेल ओमवेत की है, जो केक काट रही हैं। पहली दो तस्वीरें इंग्लिश देवी की है। एक हाथ में कलम, दूसरे में किताब, पांव के नीचे कंप्यूटर और सर पर हैट। सबने इस मौके में मैकाले को आधुनिक भारत का जन्मदाता बताया। जिसे लोग क्लर्क पैदा करने की फैक्ट्री कह कर खारिज़ करते रहे, उस शख्स की तारीफ की गयी। वरना गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था आज भी एक खास जाति के लोगों के लिए रह जाती। मैकाले ने आधुनिक स्कूल-कालेज की कल्पना की और तालीम के दरवाज़े सबके लिए खुले।
दलित शिक्षा आंदोलन में इंग्लिश की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जाता रहा है। अंबेडकर ने भी कहा था, अंग्रेजी शेरनी का दूध है। दलित मध्यमवर्ग की अब अगली पहचान इंग्लिश से बनेगी। ऐसा दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद मानते हैं। इसीलिए वो कामयाब दलित उद्योगपतियों को पहली बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बुलाते हैं। पांच सौ करोड़ के उद्योगपतियों को आईआईसी का पता भी नहीं मालूम था। इंग्लिश देवी पर बहस और विवेचना होती रहेगी। मंत्र यह है कि कोई दलित बच्चा पैदा हो तो उसके एक कान में एबीसीडी और दूसरे कान में वन टू थ्री बोला जाए। आमीन।




(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडिटर। नामी ब्लॉगर। कस्बा नाम से मशहूर ब्लॉग। दैनिक हिंदुस्तान में ब्लॉगिंग पर एक साप्ताहिक कॉलम। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं। उनसे ravish@ndtv.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









ठीक ही कह रहे हैं भाई चंद्रभान प्रसाद. गुरुकुलिए तो इतने चालू निकले कि जब अंग्रेजी वाली गाड़ी पर सवार होने की बारी आयी तो सबसे पहले लपके, और कहने लगे कि आप लोग न पड़ो इसके पीछे इससे तो केवल कलर्क निकलेंगे. मंत्रालयों से लेकर जिला न्यायालयों तक में ऐसे काबिज हुए कि बाकियों को कलर्की करने का मौक़ा भी न मिल पाया.
विश्वविद्यालयों में भी ऐसे कुछ घाघ बैठे हैं कि खुद तो जाने कहां-कहां जाकर अंग्रेजी सीख आए और विद्यार्थियों को प्रवचन देते हैं कि चिंता न करो, नहीं आती है अंग्रेजी तो कोई बात नहीं.
सेमिनारों में हम इसी उधेरबून में रह जाते हैं कि हिंदी में कुछ बोलना ठीक होगा या नहीं. तब तक अंग्रेजी में उल-जुलूल टाइप का इंटरवेंशन करके कोई मसले को और उलझा देता/ती है. पर यहां मेरे कहने का मतलब ये नहीं कि मुझे अंग्रेजी आती तो मैं भी सेमिनारों में सिंग फंसाता.
जहां तक अंग्रेजी देवी की मूर्ति की बात है तो सिर्फ एक ही बात कहना चाहूंगा कि अब आइआइसी या आइएचसी में ही टहलती न रह जाएं ये देवी माई. दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरे गांव में एक भी दलित आज तक कास्ट सर्टिफिकेट का लाभ नहीं ले पाया है, लाभ तो दूर की बात उन्हें ये ही पता नहीं है कि ऐसी कोई सर्टिफिकेट भी होती है. यहां अंग्रेजी देवी किस तरह मदद करेंगी, उस पर भी मंथन होना चाहिए.
क्यो इतना अंग्रेजी अंग्रेजी चिल्ला रहे हैं भाई? यह आज़ाद देश है और सभी को अपने अपने को एक्क्स्प्रेस करने का राइट है. जिसको एंग्लिश में स्टडी करना होगा, करेगा. करके एलीट क्लास में जायेगा. विदाउट इंग्लिश, प्रोग्रेस नही होगा कंट्री का. कंविंस अभी तक नहीं हुए? लिमिट क्रॉस कर देते हैं आपलोग भी.
duniya ke tammam budhijivio ko ek saath bula kar vichar karna to theak hai magar tab aur saarthak kadam hota jab dalito ke bachhe is sammelan mai bulai hote.
janab is galatfahmi mai na rahiye ki 500 krore rupai ki company ka malik ab dalit raha hai…
asal mai dalit kahte hi kisi fhatehaal, kuposhan ke shikar ,bairojgar aur samaj kai hashiye par kisi keedye kisi jindgi jine wale majboor ki yaad aati hai, ravish ji
i thik it would be not helpful to dalit coommunity.
es prayas ka tahe dil se swagat kiya jana chahiye.. AMBEDKER SAHEB ne hindi me likha hota to unke lekhan ki kitni puchh hoti !!! aaj educated dalit ki ak bdi problem ye english hi hai..jatiwaad log sidhe kehte hain ki daliton ko english nhi aati..
JNU me pdhte hue mere jaise tamaam dalit students ne es dard ko jana bhoga hai… us kadwe anubhav ke aadhaar per hum to yhi kahenge ki her dalit ko aaj english medium me education lene ki jarurat hai… CHANDRBHAN PRASAD BADHAAI KE PAATR HAIN…!!!
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