येर्रागुड्डा की रौनक फिर से वापस आ सकती है या नहीं?
(अ)सत्यम और हैदराबाद का एक मोहल्ला
♦ चंदन पांडेय

झूठ के ऊंचे पहाड़ों पर टिके सत्यम की दास्तान सबके सामने है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे छात्रों ने सत्यम से जुड़े सभी आंकड़ों को रट लिया होगा। कितने करोड़ का हवाला हुआ? कितने कर्मचारी प्रभावित हुए? कौन-कौन से बड़े नाम जुड़े हैं? सॉफ्टवेयर की दुनिया के दूसरे खिलाड़ियों पर इसका क्या असर होगा? इन विषयों पर कितनी स्याही खर्च की गयी होगी, ये किसी को शायद ही पता हो। इसलिए सत्यम से जुड़ी तमाम बड़ी बातों को रोज़ होने वाली चर्चा पर छोड़ते हुए हम अपनी बात एक मोहल्ले, उसके निवासियों तथा उनके रोज़गार की करते हैं।
सत्यम के उठते-गिरते इतिहास के साक्षी हैदराबाद का एक मोहल्ला है – येर्रागुड्डा। बीती सदी के आठवे दशक में जब सत्यम अस्तित्व में आया, उससे पहले येर्रागुड्डा नाम की जगह गेहूं की खेती के लिए विख्यात थी। सत्यम के प्रादुर्भाव ने यहां के निवासियों को परोक्ष रूप से रोज़गार मुहैया कराया। सॉफ्टवेयर हब और विशेषकर सत्यम के स्वप्निल उछाल के बाद अमीरपेट – येर्रागुड्डा मार्ग पर सैकड़ों सॉफ्टवेयर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खुल आये, इंजीनियर्स और सॉफ्टवेयर टेक्निकल्स की मांग में हुई बेतहाशा वृद्धि इन ट्रेनिंग सेंटरों के उभरने में बड़ी मददगार साबित हुई। यहां सैप और ओरेकल मॉड्यूल की ट्रेनिंग लेने वालों की भीड़ लगी रहती थी। आजकल इन खाली सड़कों को देख कोई उस भीड़ का अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता। इन कोचिंग सेंटरों के मालिकों का कहना है कि यह उनके व्यवसाय का सबसे बुरा दौर है – एक तरफ़ आर्थिक मंदी और दूसरी तरफ़, सत्यम के फ्रॉड का खुलासा।
वी एस टेक्नोलॉजिज के संचालक, कुर्रा श्रीनिवास कहते हैं, “अब हमने कोचिंग सेंटर बंद करने का फ़ैसला कर लिया है।” श्रीनिवास बताते हैं, “कुछ दिनों पहले तक सैप और ओरेकल मॉड्यूल के हरेक बैच में 10 से 15 छात्र रहा करते थे। अब ये संख्या गिर कर 2 से 3 रह गयी है।”
पूजा कॉलेज ऑफ़ सैप सर्टिफिकेशन के प्रबंधक देशिनी उमाकांत का कहना है, “यहां तक कि पाठ्यक्रम से संबंधित पूछताछ के मामलों में भी भारी गिरावट आयी है। पहले जहां पूछताछ के लिए सौ से अधिक फोन एक दिन में आते थे, अब वो संख्या घट कर हद से हद पांच और छह रह गयी हैं। व्यवसाय में अस्सी फीसदी की सीधी गिरावट आयी है।” एक दूसरे परेशान हाल प्रबंधक का कहना है, “छात्र कहां हैं? कोचिंग का खर्च ही चला पाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में बंद करने के अलावा कोई दूसरा चारा नही है।” वैसे इस प्रबंधक का मानना है कि रामलिंगा राजू के फ्रौड के खुलासे का समय ( मंदी का) बहुत ग़लत था।
कोचिंग संस्थानों के ही हाल को फोटोकोपियर्स भी पहुंचे हैं। एक फोटोकॉपी वाला, जिसने पिछले सात आठ वर्षों में एक बार भी गर्म चाय पी लेने मौका नहीं पाया होगा, अब चाय पर चाय पी रहा है और समय के साथ सत्यम को कोस रहा है।
कोचिंग संस्थान के मालिकों की तरह अब्राहम एल, वर्सन जेरोक्स सेंटर के मालिक, भी आयी हुई मुश्किल से निजात ढूंढ पाने में असफल हैं। उनका कहना है कि फोटोकॉपी के उनके व्यवसाय में पचास फीसदी कि गिरावट आयी है। वे कहते हैं, “मैंने सुना है, जो छात्र मेरी दुकान पर आया करते थे, घर चले गये हैं।” इसके साथ वो यह भी जोड़ देते हैं कि पर्याप्त व्यवसाय न होने के कारण दुकान बंद करनी पड़ सकती है।
वैसे यहां के कोचिंग संस्थानों ने अपनी अनोखी विश्वसनीयता अर्जित की है। सत्यम के साथ अस्तित्व में आये ये कोचिंग संस्थान भारतीय छात्रों को ही नहीं, विदेशी छात्रो को भी लुभाते हैं। इसके दो महतवपूर्ण कारण हैं : जिन पाठ्यक्रमों की फीस दिल्ली और बंगलूर में तीस हज़ार और चालीस हज़ार रुपये है उन्हीं पाठ्यक्रमों के लिए इन कोचिंग संस्थानों की फीस दस हज़ार रुपये है। छात्रों का कहना है कि यहां की फैकल्टी भी काफी अच्छी है। शहर के तकनीकी विशेषज्ञ भी इन सर्टिफिकेट्स को खूब महत्व देते हैं। इनकी विश्वसनीयता का आलम यह है कि आधे पाठ्यक्रम को पूरा कर पाने वाले सर्टिफिकेट्स ने भी बढ़िया से बढ़िया नौकरियां लोगों को दिलायी हैं। लोगों का कहना है कि अब ये बीते ज़माने की बातें होंगी।
बुरे दिनों से शिकायत सी एच महेश को भी है। सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर इंस्टाल करने के व्यवसाय से जुड़े महेश भी व्यवसाय के दुर्दिन के आगे असहाय हैं। फ़िर भी ये अपनी तकलीफ बताने के बजाय सड़क के दूसरी ओर बैठी के लक्ष्मी नाम की बुधी महिला की ओर इशारा करते हैं, जो चुप बैठी हुई है। फलों के जूस की दूकान की मालकिन इस बूढ़ी महिला की दुकान पर कहां तो कतार में खड़ा होना पड़ता था एक ग्लास जूस के लिए, अब कुछेक ग्राहक ही रह गये हैं।
छात्रावास भी आधे से अधिक खाली पड़े हैं। सैप मॉड्यूल के एक छात्र कौशल कुमार का कहना है कि इन छात्रावासों की रिहाइश में चालीस फीसदी तक की कमी आयी है। आईटी क्षेत्र में अपना भविष्य ढूंढ रहे दिल्ली के एक छात्र अखिलेश का कहना है, “बैठ कर इंतज़ार कर सकने का संसाधन सबके पास मौजूद नहीं है। वैश्विक मंदी और सत्यम को धन्यवाद कि हम जैसों के लिए निकट भविष्य में रोज़गार की कोई संभावना नहीं दिख रही है। लग रहा है आने वाले दिनों में गिरावट को बढ़ते ही जाना है।” अखिलेश फिलहाल हैदराबाद में रुके हुए हैं और नौकरी के सुखद संदेश का इंतज़ार कर रहे हैं।
अगर आप पहले कभी येर्रागुड्डा आ चुके हों, उन दिनों जब यहां रौनक रहा करती थी, तो अभी एक बार फ़िर ज़रूर आएं। पसरी हुई वीरानी में आपको आपकी पिछली यात्रा की अनुगूंज लगातार सुनाई देगी। ऐसे में आप एक बार को ही सही, पर ये ज़रूर सोचेंगे कि येर्रागुड्डा को फ़िर से इसकी रौनक वापस की जा सकती है या नहीं?
(चंदन पांडेय। युवा कथाकर। बनारस से पढ़ाई-लिखाई। सुनो नाम की कहानी से मशहूरियत मिली। इन दिनों करनाल में रहते हैं और सामाजिक मुद्दों पर विभिन्न माध्यमों में लगातार लिख रहे हैं। अभी अभी उनका एक इंटरव्यू तहलका में आया है। उनके ब्लॉग का नाम है नयी बात। उनसे chandanpandey1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)













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