इंदिरा गांधी की हत्‍या, सिख जनसंहार और जेएनयू

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

INDIRA GANDHI

ऐसा ग़म मैंने नहीं देखा। बौद्धि‍कों के चेहरे ग़म और दहशत में डूबे हुए थे। चारों बेचैनी थी कैसे हुआ, कौन लोग थे, जि‍न्‍होंने प्रधानमंत्री इंदि‍रा गांधी की हत्‍या की? हत्‍या क्‍यों की? क्‍या खबर है? क्‍या क्‍या कर रहे हो इत्‍यादि‍ सवालों को लगातार जेएनयू के छात्र-शि‍क्षक और कर्मचारी छात्रसंघ के दफ्तर आकर उत्तर पूछ रहे थे। मैंने तीन -चार दि‍न पहले ही छात्रसंघ के अध्‍यक्ष का पद संभाला था। अभी हम लोग सही तरीके से यूनि‍यन का दफ्तर भी ठीक नहीं कर पाये थे। छात्रसंघ चुनाव की थकान दूर करने में सभी लोग व्‍यस्‍त थे कि‍ अचानक सुबह 11 बजे के करीब खबर आयी – श्रीमती गांधी की हत्‍या कर दी गयी है। सारे कैंपस का वातावरण ग़मगीन हो गया, लोग परेशान थे। मैं स्‍वयं नहीं समझ पा रहा था कि‍ क्‍या करूं? श्रीमती गांधी की हत्‍या के तुरंत बाद ही अफवाहों का बाज़ार गर्म हो गया। कि‍सी ने अफवाह उड़ा दी कि‍ यूनि‍यनवाले मि‍ठाई बांट रहे थे। जबकि‍ सच यह नहीं था। छात्रसंघ की तरफ से ख़बर मि‍लते ही हमने शोक वार्ता और हत्‍या की निंदा का बयान जारी कर दि‍या था। इसके बावजूद मामला शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। चारों ओर छात्र-छात्राओं को सतर्क कर दि‍या गया और कैंपस में चौकसी बढ़ा दी गयी। कैंपस में जो दुष्‍ट तत्‍व भी थे, वे हमेशा तनाव और असुरक्षा के वातावरण में झंझट पैदा करने और राजनीति‍क हि‍साब साफ करने की तलाश में रहते थे। खैर, छात्रों की चौकसी, राजनीति‍क मुस्‍तैदी और दूरदर्शि‍ता ने कैंपस को संभावि‍त संकट से बचा लि‍या।

शहर में हत्‍यारे गि‍रोहों ने सि‍खों की संपत्ति और जानोमाल पर हमले शुरू कर दिये थे। ये हमले इतने भयावह थे कि‍ आज उनके बारे में जब भी सोचता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। श्रीमती गांधी की हत्‍या के बाद हत्‍यारे गि‍रोहों का नेतृत्‍व कि‍स तरह के लोग कर रहे थे, आज इसे दि‍ल्‍ली का बच्‍चा-बच्‍चा जानता है। इनमें कुछ लोग अभी ज़‍िंदा हैं‍ और कुछ लोग मर चुके हैं। यहां कि‍सी भी दल और नेता का नाम लेना ज़रूरी नहीं है।

हत्‍या और उसकी प्रति‍क्रि‍या में पैदा हुई प्रति‍क्रि‍या ने सारे देश को गहरा धक्‍का पहुंचाया था। जि‍स दि‍न हत्‍या हुई, उसी दि‍न रात को जेएनयू में छात्रसंघ की शोकसभा थी और उसमें सभी छात्र संगठनों के प्रति‍नि‍धि‍यों के अलावा सैकड़ों छात्रों और अनेक शि‍क्षकों ने भी भाग लि‍या था। आज उस समय के छात्रनेता अपने-अपने क्षेत्र में सम्‍मानजनक पदों पर हैं। सभी संगठनों के लोगों ने श्रीमती गांधी की हत्‍या की तीखे शब्‍दों में निंदा की और सबकी एक ही राय थी कि‍ हमें जेएनयू कैंपस में कोई दुर्घटना नहीं होने देनी है। चौकसी बढ़ा दी गयी। पास के मुनीरका, आरकेपुरम आदि‍ इलाकों में आगजनी और लूटपाट की घटनाएं हो रही थीं। ट्रकों में पेट्रोल, डीजल आदि‍ लेकर हथि‍यारबंद गि‍रोह हमले करते घूम रहे थे। उन्‍होंने कई बार जेएनयू में भी प्रवेश करने की कोशि‍श की लेकि‍न छात्रों ने उन्‍हें घुसने नहीं दि‍या।

जेएनयू से दो कि‍लोमीटर की दूरी पर ही हरि‍कि‍शन पब्‍लि‍क स्‍कूल में सि‍ख कर्मचारि‍यों और शि‍क्षकों की तरफ से अचानक संदेश मि‍ला कि‍ जान ख़तरे में है। कि‍सी तरह बचा लो। आरकेपुरम से कि‍सी सरदार परि‍वार फोन आया, कुछ लोग मेरे घर में आग लगा रहे हैं। मैं बेहद परेशान था। सारे कैंपस में कहीं पर कोई हथि‍यार नहीं था। वि‍चारों की जंग लड़ने वाले हथि‍यारों के हमलों के सामने नि‍हत्‍थे थे। देर रात एक बजे वि‍चार आया, सोशल साइंस की नयी बि‍ल्‍डिंग के पास कोई इमारत बन रही थी, वहां पर जो लोहे सरि‍या पड़े थे, वे मंगाये गये और इस तरह जेएनयू में चौतरफा लोहे की छड़ों के सहारे नि‍गरानी और चौकसी का काम शुरू हुआ। कि‍सी तरह दो तीन मोटर साइकि‍ल और शि‍क्षकों की दो कारें जुगाड़ करके हरकि‍शन पब्‍लि‍क स्‍कूल में पायखाने में बंद पड़े लोगों को जान ज़ोखि‍म में डाल कर कैंपस लाये और सतलज होस्‍टल, जि‍समें मैं रहता था, उसके कॉमन रूम में टि‍काया। बाद में सभी परि‍वारों को अलग-अलग शि‍क्षकों के घरों पर टि‍काया गया। यह सारी परेशानी चल ही रही थी कि‍ मुझे याद आया जेएनयू में उस समय एक सरदार रजि‍स्‍ट्रार था। डर था कोई शरारती तत्‍व उस पर हमला न कर दे। प्रो अगवानी, जो उस समय रेक्‍टर थे कैंपस में सबसे अलोकप्रि‍य थे, उनके लि‍ए भी ख़तरा था। मेरा डर सही साबि‍त हुआ और जब मैं रजि‍स्‍ट्रार के घर गया, तो मेरा सि‍र शर्म से झुक गया। रजि‍स्‍ट्रार साहब अपने बाल कटा चुके थे, जि‍ससे कोई उन्‍हें सि‍ख न समझे। डाउन कैंपस में एक छोटी दुकान थी, जि‍से एक सरदार चलाता था। चिंता हुई, कहीं उस दुकान पर तो हमला नहीं कर दि‍या। जाकर देखा तो होश उड़ गये शरारती लोगों ने सरकार की दुकान में लाग लगा दी थी। मैंने रजि‍स्‍ट्रार साहब से कहा, आपने बाल कटाकर अच्‍छा नहीं कि‍या। आप चिंता न करें, हम सब हैं। यही बात प्रो अगवानी से भी जाकर कही, तो उन्‍हें भरोसा हुआ। कैंपस में सारे छात्र परेशान थे, उनके पास दि‍ल्‍ली के वि‍भि‍न्‍न इलाकों से ख़बरें आ रही थीं, और जि‍सके पास जो भी नयी खबर आती, हम तुरंत कोई न कोई रास्‍ता नि‍कालने में जुट जाते।

याद आ रहा है कि‍ जि‍स समय आरकेपुरम में सि‍ख परि‍वारों के घरों में चुनकर आग लगायी जा रही थी, उस समय जब ख़बर आयी, तो दो लड़के जेएनयू से घटनास्‍थल पर मोटर साइकि‍ल से गये थे। हमने ठीक कि‍या था और कुछ न हो सके तो कम से कम पानी की बाल्‍टी से आग बुझाने का काम करना। यह ज़ोख़‍िम का काम था। इन बहादुर साथि‍यों ने आरकेपुरम में जि‍न घरों में आग लगायी गयी थी, वहां पानी की बाल्‍टी का जम कर इस्‍तेमाल कि‍या। हत्‍यारे गि‍रोह आग लगा रहे थे। जेएनयू के छात्र पीछे से जाकर आग बुझा रहे थे। पुलि‍स का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था।

कैंपस में चौकसी और मीटिंगें चल रही थीं। आसपास के इलाकों में जेएनयू के बहादुर छात्र अपनी पहलकदमी पर जाकर आग बुझाने का काम कर रहे थे। सारा कैंपस इस आयोजन में शामि‍ल था। श्रीमती गांधी के अंति‍म संस्‍कार होते ही उसके बाद वाले दि‍न हमने दि‍ल्‍ली में शांति‍मार्च नि‍कालने का फ़ैसला लि‍या। मैंने दि‍ल्‍ली के पुलि‍स अधि‍कारि‍यों से प्रदर्शन के लि‍ए अनुमति‍ मांगी। उन्‍होंने अनुमति‍ नहीं दी। हमने प्रदर्शन में जेएनयू के शि‍क्षक और कर्मचारी सभी को बुलाया। जेएनयू के अब तक के इति‍हास का यह सबसे बड़ा शांति‍मार्च था। इसमें सारे कर्मचारी, छात्र और सैंकड़ों शि‍क्षक शामि‍ल हुए। ऐसे शि‍क्षकों ने इस मार्च में हि‍स्‍सा लि‍या था, जि‍न्‍होंने अपने जीवन में कभी कि‍सी भी जुलूस में हि‍स्‍सा नहीं लि‍या था। मुझे अच्‍छी तरह याद है, वि‍ज्ञान के सबसे बडे वि‍द्वान शि‍वतोष मुखर्जी अपनी पत्‍नी के साथ जुलूस में आये थे। वे कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के संस्‍थापक आशुतोष मुखर्जी परि‍वार में से आते थे (ठीक से याद नहीं आ रहा बेटा थे या नाती)। जुलूस में तकरीबन सात हजार लोग कैंपस से नकले थे। बगैर पुलि‍स की अनुमति‍ के हम सबने यह शांति‍ जुलूस नि‍काला था। मैंने शि‍क्षक संघ के अध्‍यक्ष कुरैशी साहब को झूठ कह दि‍या था कि‍ प्रदर्शन की अनुमति‍ ले ली है। क्‍योंकि‍ मैं जानता था, अवैध जुलूस में जेएनयू शि‍क्षक शामि‍ल नहीं होंगे। मेरा झूठ पकड़ा गया। पुलि‍स के बड़े अधकारि‍यों ने आरकेपुरम में रोका और कहा आपके पास प्रदर्शन की अनुमति‍ नहीं है। आपको गि‍रफ्तार करते हैं। मैंने पुलि‍स ऑफीसर से कहा, तुम जानते नहीं हो, इस जुलूस में बहुत बड़े लोग चल रहे हैं। वे तुम्‍हारी वर्दी उतरवा देंगे। उनके गांधी परि‍वार से गहरे रि‍श्‍ते हैं।

अफसर डर गया बोला, मैं आपको छोडूंगा नहीं। मैंने कहा जुलूस ख़त्‍म हो जाए, तब पकड़ कर ले जाना, मुझे आपत्ति‍ नहीं है। इस तरह आरकेपुरम से पुलि‍स का दलबल हमारे साथ-साथ जुलूस में चलने लगा और यह जुलूस जि‍स इलाके से गुज़रा, वहां के बाशिंदे सैंकड़ों की तादाद में शामि‍ल होते चले गये। जुलूस जब कैंपस में जब लौट कर आया तो अपना समापन भाषण देने के बाद मैंने सबको बताया कि‍ यह जुलूस हमने बगैर पुलि‍स की अनुमति‍ के नि‍काला था और ये पुलि‍स वाले पकड़ कर ले जाना चाहते हैं। वहां मौजूद सभी लोगों ने प्रति‍वाद में कहा था, छात्रसंघ अध्‍यक्ष को पकड़ोगे, तो हम सबको गि‍रफ्तार करना होगा। अंत में पुलि‍स बल बि‍ना गि‍रफ्तार किये चला गया।

मामला इससे और भी आगे बढ़ गया। वहां पर लोगों ने सि‍खजनसंहार से पीड़‍ि‍त परि‍वारों के वि‍स्‍थापि‍त शि‍वि‍रों में जाकर सहायता करने का प्रस्‍ताव दि‍या और इसके बाद जेएनयू के सभी लोग शहर से सहायता राशि‍ जुटाने के काम में जुट गये। प्रति‍दि‍न सैंकड़ों छात्र-छात्राओं की टोलि‍यां कैंपस से बाहर घर-घर सामग्री संकलन के लि‍ए जाती थीं और लाखों रुपयों का सामान एकत्रि‍त करके लाती थीं। यह सामान पीड़‍ि‍तों के कैंप में बांटा गया। सहायता कार्य के लि‍ए कैंप भी चुन लि‍या गया। बाद में प्रत्‍येक पीड़‍ि‍त परि‍वार के घर जाकर छात्रसंघ और शि‍क्षक संघ ने घर के उपयोग के सभी बर्तनों से लेकर राशन तक पहुंचाया। उस समय हम सब नहीं जानते थे कि‍ क्‍या कर रहे हैं। सभी भेद भुलाकर सि‍खों की सेवा का जो कार्य जेएनयू के छात्रों ने कि‍या था, वह हिंदुस्‍तान के छात्र आंदोलन की अवि‍स्‍मरणीय घटना है। यह काम चल ही रहा था कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल के सातों वि‍श्‍ववि‍द्यालयों के छात्रसंघों के द्वारा इकट्ठा की गयी सहायता राशि लेकर तत्‍कालीन सांसद नेपालदेव भट्टाचार्य मेरे पास पहुंचे कि‍ यह बंगाल की मदद राशि‍ है। मैं यह क्षण भूल नहीं सकता कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल सबसे पहले मदद के काम में आगे आया।

इसका हमें सुपरि‍णाम भी मि‍ला। अचानक जेएनयू के छात्रों का धन्‍यवाद करने सि‍खसंत और अकाली दल के प्रधान संत स्‍व हरचंद लोंगोवाल, सरदार महीप सिंह और सुरजीत सिंह बरनाला के साथ कैंपस आये। संत लोंगोवाल ने झेलम लॉन में सार्वजनि‍क सभा को संबोधि‍त कि‍या था। उन्‍होंने कहा था अकाली दल की कार्यकारि‍णी ने जेएनयू समुदाय को धन्‍यवाद भेजा है। सि‍खजनसंहार की घड़ी में सि‍खों के जानोमाल की रक्षा में आपने जो भूमि‍का अदा की है, उसके लि‍ए हम आपके ऋणी हैं।सि‍खों की मदद करने के लि‍ए उन्‍होंने जेएनयू समुदाय का धन्‍यवाद कि‍या। हमारे सबके लि‍ए संत लोंगोवाल का आना सबसे बड़ा पुरस्‍कार था। सारे छात्र उनके भाषण से प्रभावि‍त थे।

jag(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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