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उत्तमा की कामायनी : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग

31 October 2009 68 Comments

♦ उत्तमा दीक्षित

युवा‍ चित्रकार उत्तमा दीक्षित की कामायनी पेंटिंग सीरीज़ की मशहूरियत के बारे में सुनकर मोहल्‍ला लाइव ने उनसे इसे प्रकाशित करने की गुज़ारिश की। उत्तमा ने न सिर्फ उस सीरीज़ की महत्‍वपूर्ण पेंटिंग्‍स हमें भेजी, बल्कि उन्‍हें पेंट करने के दौरान के अपने अनुभवों को भी हमसे साझा किया। हम उनके शुक्रगुज़ार हैं : मॉडरेटर

कामायनी मुझे अपनी सबसे प्रिय पेंटिंग सीरीज में से एक है। मुझे नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ने का शौक है, खासकर बड़ी शख्सियतों की पुस्तकें। वाकया आगरा का है। वहां आगरा कालेज में अध्यापन के दौरान एक शिक्षक साथी के साथ जयशंकर प्रसाद की पुस्तकों पर चर्चा चल रही थी। कामायनी पर बात आते ही मुझे लगा, जैसे मेरे भीतर का कलाकार कुछ करना चाहता है। प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम मुझे प्रेरक लगा। कल्पना की उस समय की। मैं जैसे खो सी गयी। मैंने तत्काल पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया और देखते ही देखते मनु का चित्र उतर आया। बेशक, अन्य कल्पनाओं की तरह यह कल्पना भी मुश्किल नहीं थी। पहले चित्र का स्केच मनमुताबिक आना शुरू हुआ तो उत्साह बढ़ा। हालांकि विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में बाद में खासी मेहनत करनी पड़ी। प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण है। सीरीज़ में विशेषता इसकी टेक्चरल क्वालिटी और आंखों पर ज़्यादा काम किये बिना ही उनके भावों को दर्शाने की कोशिश है। चित्रांकन के दौरान मैं कामायनी पढ़ती रही। कुछ पेज तो कई-कई बार पढ़े। मैंने एक साल तक लगातार इस सीरीज पर काम किया। हालांकि पूरी तरह संतुष्टि नहीं हुई। मन को समझाती रही कि संतुष्ट न होना तो कलाकार का गुण ही है, संतुष्ट हुए तो लगे किनारे। मेरी इस सीरीज ने चर्चा भी पायी। ग्वालियर में एक्जीबीशन के दौरान एक हिंदू संगठन ने विरोध किया। पहले दिन नारेबाज़ी हुई। मैंने समझाया कि चित्रों में मौलिकता दिखाना हर चित्रकार का अपना अधिकार है। वो जानता है कि किस समय को किस तरह से व्यक्त किया जाना चाहिए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अपनी प्रदर्शनी में मैंने यह पेंटिंग्स भी लगायीं, सौभाग्य से सराहना भी मिली।

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uttama-dixit-front(उत्तमा दीक्षित। काशी में जन्‍म। बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई-लिखाई। बचपन से पेंटिंग का पैशन। करियर की शुरुआत आगरा कॉलेज में अध्‍यापन से। फिलहाल बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के चित्रकला विभाग में असिस्‍टेंट प्रोफेसर। उनसे uttama.dixit@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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68 Comments »

  • विनीत कुमार said:

    अद्भुत,अब हिन्दी समाज से एक अपील कि एक बार इस चित्र-सीरिज के जरिए कामायनी का पुनर्पाठ करें।..

  • चण्डीदत्त शुक्ल said:

    उत्तमा…अति उत्तम!

  • arvind mishra said:

    Thanks for inviting to this grand and sumptuous visual feast !

  • रावेंद्रकुमार रवि said:

    रहस्य, स्वप्न, आशाएँ, कर्म, काम, वासना,
    आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण
    केवल चेहरों के माध्यम से भी किया जा सकता है!
    उत्तमा जी को एक बार फिर प्रयास करना चाहिए!

  • प्रोफेसर सुप्रिया शाह said:

    बेहतरीन, जयशंकर प्रसाद की कृतियों पर यह सीरीज नयापन लिये हुए है। उत्तमा जी को बधाई, बनारस में भी नामवर सिंह हैं, उनकी कृतियों पर कार्य करें। अच्छा है कि किसी दकियानूसी कलाकार की तरह नही है आपकी सोच।

  • डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said:

    मनु महाराज की सभ्यता का भौंडा प्रदर्शन।
    स्त्री होकर एक स्त्री को नंगा दिखाने में कुछ तो शर्म की होती।
    निन्दनीय!

  • प्रशांत पाठक said:

    निसंदेह आपको बहादुर कहू तो अधिक नहीं होगा लेकिन बात अगर सामाजिक परिवेश की करू तो मनु की यह माया मेरी समझ से बाहर है मौलिकता वाकई एक अधिकार है आपका और मेरा भी लेकिन मौलिकता के नाम पर नारी देह दिखाकर लोकप्रियता लेना नितांत गलत है इन भावो को सामाजिक परिवेश ना पनपने दे बेहतर होगा

  • प्रोफेसर. शकुंतला द्विवेदी (डीयू) said:

    वाह, बेहतरीन रचा है तुमने उत्तमा. मनु और श्रद्धा को जयशंकर प्रसाद ने प्रलय के पश्चात रचा है लेकिन शायद रूपलाल शास्त्री (ऊपर जिन्होंने लिखा है)जैसे पोगापंथियों की वजह से ईमानदार नहीं रह पाए। प्रलय के बाद का चित्रण करना है तो क्या श्रद्धा के लिए स्पेशल साड़ी बनाई जाएगी. फिर मकबूल फिदा हुसैन जैसा प्रचार का भूखा पुरुष रचता और नग्न चित्र के नीचे सरस्वती लिखकर समझाता तो इस जैसे लोगों को परेशानी नहीं होती. महिला रच रही है तो परेशानी हो रही है। मैंने उत्तमा के अन्य चित्र भी देखे हैं, उम्दा कलाकार हैं वो। अपने 32 साल के अध्यापन करियर में हर बात का विरोध करने वाले मैंने तमाम ठेकेदार देखे हैं। मेरी तो पुस्तकों की होली जलाई है ऐसे लोगों ने क्योंकि मातृत्व दर्शाने के लिए मैंने स्तनपान कराती महिला का फोटो लगा दिया था। यही पुस्तक खूब बिकी, मुझे खूब सम्मान मिला। डरना मत, कीप इट अप।

  • डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said:

    प्रोफेसर. शकुंतला द्विवेदी जी!
    आपने मुझे पोंगापन्थी लिखा, अच्छा लगा। परन्तु मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि आप अध्यापन पेशे से जुड़ी होने के बावजूद भी नंगापन को प्रदर्शित करने वाले चित्रों की प्रसंशा करने में अपना बड़प्पन मान रही हैं। लगता है कि आपने मनु और मनुस्मृति का अध्ययन नही किया है। पढ़ाने से पहले पढ़ने की भी आवश्यकता होती है। यह आप भली-भाँति जानती होंगी। यदि मैं यह लिखूँ कि मेरा भी शिक्षण से 35 वर्षों से नाता है तो आप इसे अतिश्योक्ति ही मानेंगी।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    रूपचंद शास्‍त्री जी, आप सचमुच के ‘वि‍द्वान्’हैं। पता नहीं कला में नग्‍नता आपको कैसे नजर आती है। कला में नग्‍नता जैसी कोई चीज नहीं होती,वहां सि‍र्फ कला होती है। आप तो कमाल के पंडि‍त हैं। आपको कला और नग्‍नता में अंतर समझने के लि‍ए पढने की नहीं चुप रहने और समझने की जरूरत है। मौका लगे तो कि‍सी कला स्‍कूल में दाखि‍ला ले लें तो समझ में आ जाएगा कि‍ कला में नग्‍नता नहीं होती। वेब के छोटे पन्‍ने पर समझाना संभव नहीं है। प्रस्‍तुत पेंटिंग अद्भुत हैं। चि‍त्रकार को बधाई है।

  • प्रो. शकुंतला द्विवेदी said:

    35 साल का अनुभव… और ऐसी सोच। कला को जानिए और फिर टिप्पणी करने की आदत डालिए। यह ईश्वरीय वरदान है, इसमें नग्नता देखेंगे तो दुनिया में किसी चीज से संतुष्टि नहीं मिलेगी। मैं इसके बाद कुछ नहीं कहूंगी क्योंकि यह विस्तृत चर्चा का मुद्दा है और आपसे मैं चर्चा करना ही नहीं चाहती। धन्यवाद, ईश्वर संकुचित सोच वालों की सोच का दायरा बढ़ाएं। बहरहाल, वेबसाइट मॉडरेटर को बहुरंगी और सराहनीय कृति की बधाई।

  • Rohit A Chandwaskar said:

    Uttama Ji,

    yeh naari deh ki nagnata ka pradarshan, sankuchit sooch, vagaira vagairah…mujhe jyada samajh me nahi aata…main bhi ek kalakaar hunh aur ek hi baat kahunga..ki aapki technique, composition aur colour sense mujhe achche lage..pls keep it up…raha sawaal ooper likhi baaton ka to yeh sab vishay bahot jaruri hain “charcha” ke liye aur “charcha me bane rehne” ke liye…badhaai ho..sarahniya kaarya..

    dhanyavaad.

    Rohit A Chandwaskar
    http://crohit72.blogspot.com

  • विनीत कुमार said:

    डॉ रुपचंदजी,मैं तो ये सोचकर ही भीतर से कांप गया हूं कि आपने किस तरह की पैंतीस पीढ़ियां तैयार की होगी,हॉरीवल।..अब समझ में आता है कि पढ़ने-लिखने के बाद भी समाज जड़ का जड़ ही कैसे बना रह जाता है। आप एक बार फिर क्लासिकल साहित्यों और रचनाओं को खंगालिए।.अफसोस की आपको माचिस कम पड़ जाएंगे। बहुत तकलीफ हुई आपके कमेंट पढ़कर।.

  • Brajesh nigam said:

    जहाँ हर सर झुक जाए वही मंदिर है, जहाँ हर नदी मिल जाये वही समंदर है ज़िन्दगी हर मोड़ पर एक युद्ध है जो हर युद्ध जीत जाये वही सिकंदर है

  • Dr. Devendra Sharma said:

    रहने दीजिए शास्त्री जैसे लोगों को बहस में, मत भगाइये। यह उत्तमा जी जैसे कलाकारों के लिए उत्तम है। इस तरह के सिरफिरे न होते तो बड़े कलाकार नहीं होते। नारी के ठेकेदार हैं यह क्या। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि किसी नारी के प्रति रही कुंठा इन्हें इस तरह का विरोधी बनाती है। उत्तमा जी की कला उम्दा है, भविष्य उज्ज्वल। सुंदर रंग संयोजन और पात्र प्रस्तुति के लिए बधाई।

  • ASHA VASHISHTHA said:

    कला उन्नयन की दिशा में वेबसाइट की यह सार्थक पहल है। कलाकार की कला भी अच्छी है। बहस होना तो अच्छा है ही। वेबसाइट संचालक और कलाकार दोनों को मेरी शुभकामनाएं।

  • roshan premyogi said:

    apki kalakritiyan achhee hain
    rahi baat sameekchha ki to veh bina kareeb se dekhe ho nahi sakati
    kabhi lucknow me exibitiob lagaiye

  • akhilesh dixit said:

    Uttama ji aapke is kaam se kam se kam kamayani ka punarpaath bhi ho sakega. Vaise jahan tak mujhe yaad hai Doodh nath sing ji ne kamayani par ek nayee drishti daalte hue ek pustak likhi hai abhi mujhe naam nahin yaad aa raha hai.

    Doosri baat ye ki lagbahag tees saal pahele kamayani parhte waqt jo tasveerein kalpna ke kshitij par ubharti theeN unki dhundhli yaado ko aapne taza kar diya. koi teen dashak pahele ya uske aaspaas kamayani ka manchan lucknow meiN sri kunwar kalyan singh ji ke nirdeshan meiN hua thaa jisme Sraddha ka role jinhone kiya tha wo ab meri jeevan sangini haiN wo baat aur ki tab maiN unheN janta bhee nahi tha.

    Aapki is painting series meiN Ida bhi hogi hi aisa mera sochna hai aur agar nahiN bhi hai to kuch ‘Comments’ uski kami poori kar rahe haiN.

    Chalte chalte ek baat- Sringar,srijan aur yatharth ke rishte ki abhinnta ko dhyan meiN rakh kar kabhi apni koochi ki drishti premchand
    ke Godan par bhi dalne ka vichar kareiN,shyad kuch ban pade.

    shukamnao sahit

    akhilesh dixit
    Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya,
    Wardha,
    Maharashtra.

  • प्रो. जय सिंह नीरद said:

    उत्तमा जी, जयशंकर प्रसाद की कामायनी का आपने नए तरीके से निरुपण किया है। मुझे स्त्री का नंगापन पसंद नहीं आया लेकिन आपके समर्थन में लिखे तर्कों से भी मैं सहमत हूं। चूंकि आप महिला हैं तो मेरा यह एतराज भी कमजोर पड़ जाता है। आप काम करती रहिए, आपके सितारों के चमकने का योग है।

  • matukjuli said:

    उत्तमाजी के चित्रों पर एक नजर

    जिस तरह का मनुष्य परमात्मा ने बनाकर धरती पर भेजा है उसमें सौन्दर्य है. उस सौन्दर्य में कुछ लोग और निखार ले आते हैं और कुछ अभागे उसे और कुरूप कर देते हैं !
    आज तक मैंने नहीं देखा कि परमात्मा ने वस्त्र पहनाकर किसी मनुष्य को धरती पर भेजा हो. वस्त्र मनुष्य पहनाता है. ऐसा भी वस्त्र हो सकता है जिससे सुन्दरता निखरे और ऐसा भी हो सकता है जिससे संुदरता बिखरे और नष्ट हो जाय. लेकिन जिस रूप में परमात्मा के घर से मनुष्य आता है, वह तो सदा सुंदर होता है. इसलिए वस्त्र तो मेरी समझ में आता है, नग्नता नहीं आती. मैं ढूँढ़कर भी इन चित्रों में नग्नता नहीं खोज पाया.
    नग्नता और निर्वस्त्रपन में अंतर होता है. इन चित्रों में वस्त्र नहीं हंै, क्योंकि उस समय वस्त्र बने ही नहीं थे, मृगछाल अवश्य लोग पहनते थे अपने कटि प्रदेश को ढँकने के लिए. कामायनी में श्रद्धा निर्वस्त्र नहीं है. परिधान धारण किये हुए है. कामायनीकार उसका मनोरम सौन्दर्य खींचते हैं-
    नील परिधान बीच सुकुमार
    खिल रहा मृदुल अधखुला अंग;
    खिला हो ज्यों बिजली का फूल
    मेघ-वन बीच गुलाबी रंग.
    गांधार देश के नीले रोम वाले मेषों के मसृण चर्म उनके कांत वपु को ढँक रहे थे. लेकिन उत्तमाजी ने अपने चित्रों में श्रद्धा को वस्त्र नहीं पहनाया. यह उनकी इच्छा! इसलिए हम यह तो कह सकते हैं कि उनके चित्र निर्वस्त्र हैं, आवरणरहित हैं, लेकिन उन्हें हम नग्न नहीं कह सकते. नग्नता की परिभाषा क्या है ? नग्नता का एक लक्षण श्री रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी की टिप्पणी से प्रकट होता है. जिसे आदमी ढँकना चाहता है और ढँके हुए है, वही अगर उघड़ जाय तो उसे नग्न कह सकते हैं. मयंकजी अपनी यौन-कुंठा को ढँके हुए हैं, उनकी टिप्पणी से वह उघड़ गयी और वे नग्न हो गये ! इसकेा नग्नता कहेंगे! जो व्यक्ति नग्न होगा, उसे पूरा संसार नग्न ही दिखायी पड़ेगा. वह तो कपड़े के भीतर भी वही देख लेगा!
    निर्वस्त्र होने के बावजूद इन चित्रों में कामोत्तेजना नहीं है. वैसे कामोत्तेजना जगने में बुरा क्या है, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया ! चित्रों में स्त्री के सुडौल स्तन खुले है ,ठीक है, लेकिन स्त्री के हाथ कटि प्रदेश के नीचे चिकुर-जाल के पास क्या करने गये हैं ?
    मैं कला की बारीकी नहीं समझता हूँ , फिर भी कला मुझे आकृष्ट करती है. उत्तमाजी के ये चित्र सुंदर हैं लेकिन इनमें वह कहीं नहीं दिखायी पड़ा जिसे चित्रित करना उनका उद्देश्य है. उत्तमाजी कहती हैं कि मुझे मनु के माध्यम से मन और श्रद्धा के माध्यम से दिल दिखाना है. मन का स्वभाव क्या है ? मन का लक्षण है चंचलता . जो कभी स्थिर न रहे उसे मन कहते हैं. मुझे मनु के चित्र में कहीं भी कोई चंचलता नहीं दिखाई पड़ती. दिल का अर्थ है भाव विभोर अवस्था. श्रद्धा में थोड़ा-थोड़ा यह उतरा है, लेकिन उल्लेखनीय रूप में नहीं. मेरे पास साधारण आँखें है।. उन आँखों से मुझे ये चित्र साधारण मालूम पड़े. लेकिन इन साधारण आँखों ने राधा-कृष्ण के कई रेखा-चित्रों में गजब की भाव-भंगिमाएँ देखी हैं. स्वभावतः अंदर-अंदर तुलना चलने लगती है.
    मुख्य बात यह है कि चित्र हमेशा विशेष का होता है, सामान्य का नहीं. ‘मन’ और ‘दिल’ एक सामान्य अवस्था का नाम है. विशेष अवस्था में मन और दिल की अनेक विशिष्ट भंगिमाएँ होती हैं. उन विशिष्ट भंगिमाओं को चित्रित करना चित्रकार और कवि-कलाकार का काम होता है. कामायनी एक श्रेष्ठ चित्रकाव्य है. कुछ चमकते हुए बिम्बों के कारण ही यह आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर है. मुझे इनके चित्र मोहित करते हैं. आरंभ से अंत तक न जाने कितने सुंदर चित्र हैं! अगर उन्हीं चित्रों में से किसी खास भंगिमा को पकड़कर उत्तमाजी कूँची से उसे उकेरतीं तो चित्रों में एक विशिष्टता आ जाती. चित्र देखकर ही कोई कुहुक उटता कि हाँ- कामायनी से है ! तब खासियत की बात है. अभी तो संदर्भ बताना होगा तब जाकर कोई खोजेगा, हो सकता है कोई ठीक पाये , कोई ठीक न पाये. कामायनी का प्रथम छंद ही देखिये, कैसा विशिष्ट और अनुपम है-
    हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह
    एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय-प्रवाह
    इस चित्र की मार्मिकता को समझना और फिर उसे चित्र कला में उद्घाटित कर देना एक असाधारण बात है. ‘पुरुष’ के लिए ‘एक’ विशेषण बतलाता कि वह एकाकी है. ‘एक’ शब्द मनु के अकेलेपन की पीड़ा की पूरी टीस है. वह पीड़ा गलकर ‘भींगे नयनों’ से बह रही है. सामने अथाह विनाशकारी समुंदर लहरा रहा है जिसने उसका सबकुछ लील लिया है. स्वयं वह उस प्रलय के गर्भ से बाहर अगर हो पाया है तो हिमगिरि के उत्तुंग शिखर के कारण ही. इसीलिए उसकी छाँह को ‘शीतल’ बताया गया है.
    मैं उत्तमाजी से निवेदन करूँगा कि एक बार फिर से जो चित्र उन्हें पसंद आये, उन्हें रेखाओं और रंगों से एक नया रूप देने की कोशिश करें. उसके नीचे संबंधित पंक्तियाँ डाल दें, ताकि दर्शकों को भी पता चले कि जो उन्होंने उतारा है, वह कहाँ से उतारा है. और कितना उतरा है.
    चित्र अगर शार्प हो तो पंक्ति कलाकार न भी लिखे तो भी वह भीतर-भीतर गूँजने लगती है. या कहना चाहिए चित्र देखकर अगर कामायनी की कोई पंक्ति याद आ जाय तो समझना चाहिए कला सफल हो गयी. उत्तमाजी के चित्रों के साथ ऐसा नहीं है
    कलाकार से निवेदन करना समझपूर्ण नहीं है, क्योंकि वह तो उनके हृदय की उमड़न है. कब किस बात पर मन उमड़ेगा कौन जानता है. लेकिन ज्योंही कला सार्वजनिक होती है लोग अपनी अपेक्षाएँ लादना शुरू करते हैं. मैं कुछ लाद नहीं रहा हूँ. सिर्फ दिशा-संकेत कर रहा हूँ. उत्तमाजी की कूँची से एक से एक श्रेष्ठ चित्र बाहर आये.
    मेरी असीम शुभकामनायें.
    मटुक नाथ चैधरी

  • jayanti jain said:

    Great,excellent art,body is truth,existential,and natural,nudity is mental

  • संजय ग्रोवर said:

    एकाध सज्जन ने एतराज़ उठाया है कि यह संजय ग्रोवर टिप्पणियों में हरदम अपनी कविता, कहानी क्यों चेपते हैं ! अरे भाई, जब तक अपना उपलब्ध है, उधार काहें लें। अब इसका क्या करें कि यहां भी एक शे‘र निकल आया। पढ़िए तो:-

    नज़र उतनी ही ज़्यादा बेहया थी /
    बदन को जितना ज़्यादा ढांपता था //

  • शरद कोकास said:

    उत्तमा जी मै सिर्फ आपकी पैंटिंग्स पर बात करना चाहता था लेकिन यहाँ कला की परम्परा पर बात हो रही है । कुछ इसी तरह की बातें खजुराहो के erotic art को लेकर हुई होंगी जब शिल्पियों ने वहाँ चित्र उकेरे होंगे और अजंता एलोरा तथा प्राचीन शैलाश्रयों मे प्राकृतिक रंगों से बनाये शैलचित्रों को लेकर भी । इन लाखों वर्षों में कला का इतना विकास हो चुका है कि यह किसी साधारण मनुष्य की समझ से परे है। न केवल कला बल्कि साहित्य में भी यह घटित हो चुका है लेकिन इसे सायास ही जानना होगा । आप कलाकार हैं इसलिये कला के इतिहास को जानती होंगी बस कला के प्रति समर्पण भाव से काम कीजिये और बाज़ारवाद के मोह से बचे रहिये । चित्रों मे बहुत कुछ कहने की बातें है और केवल एक शब्द उत्तम कह कर इनकी व्याख्या नही की जा सकती । चित्रों की व्याख्या होती भी नहीं उन्हे बिना उत्तेजित हुए अपनी परमपरा और मनुष्य के इतिहास की समझ के आधार पर महसूस करना होता है । जिस तरह से एक कविता में अनेक अर्थ खोजे जा सकते है उसी तरह एक चित्र के निहितार्थ भी अनेक हो सकते हैं चित्रकार केवल शीर्षक से संकेत कर सकता है , पंक्तियाँ देने से दर्शक उस पंक्ति या उस परिवेश के इर्द गिर्द सोचने को बाधित हो जाता है । -शरद कोकास “पुरातत्ववेत्ता ” http://sharadkokas.blogspot.com

  • pradip BHU said:

    hi maim aap ka penting bahute achcha laga ofter saw good textur and realestic aproch .i am impresed after see your penting ‘I hope will be again make a great stsblitys ………at the last I look a nice penting ..
    have nice time

  • डा.ऋतुराज आनंद said:

    वाह क्या बात है उत्तमा जी, कामायनी पर सीरीज बनाई और फिर लोगों की वाहवाही लूटी। विवादित हुईं, खैर यह तो आपके हित में ही है। मैं भी आपकी इस सीरीज के समर्थक लाबी में खड़ा हूं। चित्रकार की आलोचना करना उसके साथ अन्याय है। और आपकी तो कृतियां भी शानदार हैं। कभी चंडीगढ़ आएं तो बताइये। यहां कला के काफी मुरीद हैं, यहां प्रदर्थनी लगाइये।

  • DR. LUVKUSH MISHRA said:

    मटुकजी ने जितना ध्यान जूली पर लगाया, उतना ही आपकी आलोचना लिखने पर. शायद जूली की वजह से किसी महिला की बढ़ाई न कर पाना मजबूरी होगी उनकी। मटुकजी यह भूल गए कि कला इतना टिपिकल सब्जेक्ट नहीं है जिसकी संदर्भ देकर विवेचना की जाए। कला मन को सुकून देने का नाम है, मोनालिसा को देखती करुणा दिखेगी लेकिन भाव अलग पैदा होंगे। उत्माजी की कला भी मन को छू रही है। स्वागतयोग्य कलाकार हैं यह।

  • anurag bajpai said:

    कला में कलर और बैकग्राउंड का ही खेल है, जो आप बहुत अच्छी ढंग से समझती हैं। आप शायद भूल गईं हों, मैंने लखनऊ अकादमी में आपसे मुलाकात की थी। आप उस समय क्षेत्रीय कला प्रदर्शनी के आयोजन का दायित्व संभाल रही थीं। अकादमी में आपकी कला देखी है मैंने, और अब नेट पर आपकी प्रोफाइल्स, पिकासा और मोहल्लालाइव पर देख रहा हूं। आपकी कला में प्रतिदिन निखार महसूस कर रहा हूं। ब्लाग पर कलम का कमाल भी दिखाई देता है। आप नक्षत्र बनें मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें।

  • himanshu dubey said:

    मटुकजी कृपया प्रेमी मन से उत्तमा की पेंटिंग्स की पुनर्विवेचना करें। आपने अन्याय किया है उनके साथ। आपसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी। मोहल्लालाइव पर आपकी टिप्पणी की घोर निंदा हुई, आपके जवाब का इंतजार है। समझ नहीं आता कि आपने खुद तो इतना बोल्ड कदम उठाया, चर्चा में आने के लिए आपने अपनी छात्रा से ही विवाह कर लिया। और यहां तो पोगांपंथी हो गए आप। सूप तो सूप, छलनी भी बोलने लगी जिसमें इतने छेद।

  • मुनींद्र शंकर त्रिवेदी said:

    मटुकनाथ की वजह से लिखना पड़ा, कला में नैतिकता ढूंढने चले हैं जबकि व्यक्तिगत जीवन में इसे भुला बैठे। जयशंकर प्रसाद ने क्या लिखा है और उत्तमा ने क्या बनाया, सब देखा और सब जानते हैं। सिर्फ मयंक जी की आलोचना करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। मुंह में राम, बगल में छुरी।

  • matukjuli said:

    लगता है या तो मेरी टिप्पणी पढ़ी ही नहीं गयी या पढ़ी गयी तो इतनी जल्दबाजी में कि समझी ही नहीं गयी. एक बार फिर से पढ़ने का अनुरोध है.

  • DINKAR said:

    उम्दा शैली, बेहतरीन कला संयोजन, पौराणिक पात्रों के इस तरह के प्रस्तुतिकरण ने जयशंकर प्रसाद की कामायनी को और रोचक बना दिया है। मैंने चित्र देखने के बाद कामायनी का पुनर्पाठ किया। पहले जो दृश्य महसूस नहीं कर पाता था अब जैसे वह मेरे नेत्रों के समक्ष सजीव थे। जयशंकर प्रसाद की कृतियों पर मेरी वेबसाइट निर्माणाधीन है। चाहूंगा कि कामायनी पर ये और ऐसे अन्य चित्र मुझे मिल जाएं। हिंदुस्तान से कई पुस्तकें लाया हूं प्रसाद की। न्यूजर्सी में हिंदीयूएसए से संपर्क किया है। उसी के सहयोग से यह कार्य शुरू किया है। यह भी इच्छा है कि वेबसाइट के उदघाटन पर आपके चित्रों की संक्षिप्त प्रदर्शनी आयोजित हो। अगर आप चाहें तो। रही बात नग्नता की तो भई यह कला है, यह सुंदर नहीं होगी तो कौन पूछेगा।
    प्रो. दिनकर मोदी
    modidinkar1969@yahoo.uk.co

  • ASAD ULLAH said:

    uttama ji, you are doing good. keep it up and dont mind the hurdles. atr is above all. india is a country of narrow minded peoples also..

  • MANOJEET SING said:

    Hmmmmmmmm ! Quite interesting !!!

  • Nishant said:

    कामायनी तो नहीं पढ़ी… चित्र मन को मोह रहे.
    बहुत सुन्दर!

  • हिमांशु said:

    अदभुत चित्र हैं यह । कामायनी का अभिनव प्रस्तुतिकरण ।

  • RAJNISH PARIHAR said:

    मुझे तो सभी चित्र अच्छे लगे…!किसी ने प्रस्तुती दी है तो आनंद लीजिये,काहे विवादों में पड़ते है???इस काम के लिए हमारे नेता लोग है ….

  • डा. रंजीत सिंह उप्पल said:

    क्या बात है. पहले अमर उजाला देखा, फिर यह और आपका ब्लाग। कामयाबी की तरफ सधे कदम हैं आपके। शुभकामनाएं

  • देवेंद्र सिंह खालसा said:

    कीप इट अप, इट विल बी हेल्पफुल इन योर करियर आल्सो.

  • राजशेखर said:

    क्या बात है उत्तमा जी फेमस हो रही हैं आप। आपने कामायनी का जिस तरह से चित्रांकन किया है वह सराहना के योग्य है। अन्य साहित्यकारों की कृतियां भी अपना विषय बनाइये।

  • Dr. Avnish awasthi said:

    यह अविनाश जी की अच्छी पहल है। कला भी हमारे जीवन का अहम हिस्सा है तो फिर इससे परहेज क्यों किया जाये।

  • Kaavya Mathur said:

    you have done well. load this art on your blog and picasa web also.

  • अंशुमाली रस्तोगी said:

    आपके बनाए चित्र देखे। ध्यान से देखे। उन पर तमाम प्रतिक्रियाएं भी पढ़ीं। इस बात की खुशी है कि काफी लोग आपके चित्रों व आपकी अभिव्यक्ति से संतुष्ठ दिखे। पर किन्हीं शास्त्रीजी को आपकी कला और चित्र भौंडे या कहूं भारतीय संस्कृति पर हमला जैसे लगे-दिखे। यह उनकी एकतरफा सोच है। इसका कोई मतलब नहीं। आपके चित्र यकीनन बेहद उम्दा है। मैं इनकी तारिफ करता हूं। यहां कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे कामुक या अश्लील कहा-लिखा जाए। कला तो कला है। कला को हमें कलाकार की नजरों से भी देखने-समझने की कोशिश करनी चाहिए। कला के बहाने बात जब संस्कृति-सभ्यता पर आकर टिक जाती है तो विवाद पैदा होने लगते हैं। हमारे यहां विवादों पर स्वस्थ बहसें नहीं हो पातीं। यह दुखद है। बहरहाल, आपको इन शानदार चित्रों के लिए दिल से शुभकामनाएं।

  • डा. अश्वनी भगत said:

    कामायनी पर आपकी यह सीरीज अच्छी लगी। रंगों का प्रयोग आपने बहुत सोच-समझकर किया है। आम तौर पर कलाकारों में यह हठ देखी जाती है कि वह जो बनाएंगे लोग उसे पसंद करेंगे और वह मनमर्जी से रचने लगते हैं। आपने चूंकि आंखों और अन्य संकेतों से बात कहलाने की कोशिश की है, इसलिये यह गहराई तक ले जाती है।

  • देवश्री said:

    कला के लिए मैं क्या बोलूं वो तो खुद बोल रही है। बोल ही नहीं रही बल्कि हल्ला काट रही है। जय हो

  • PRANJAL CHATTERJEE said:

    it is better if you exhibit it in allover india.

  • Rakesh Arya said:

    badhaai uttama ji

  • Saagar said:

    bahut achche… very nice… I impressed…. hard work… Congratulation!!!! Uttama Ji. Keep it up!!!! Go Ahead… don’t worry. World will follow you one day…

  • DR. JITENDRA RAGHURAJ said:

    it is nice to see this.

  • Dr, Arvind Jaiswal said:

    अच्छी कला है। खास बात है प्रस्तुतिकरण। संभवतया पहली बार हिंदी के किसी साहित्यकार पर इतनी बेहतर कला देखी है मैंने। पूर्वांचल विश्वविद्यालय से जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर मेरा शोध है, जिसकी टापिक है जयशंकर प्रसाद की कामायनीः एक आलोचनात्मक अध्ययन। सटीक पाता हूं आपका चित्रण। जल्द ही आपसे संपर्क करूंगा। आप चाहेंगी तो मैं अपनी प्रकाशनाधीन पुस्तक में आपके चित्र प्रयोग करना चाहूंगा।

  • डॉ. विश्वनाथ गायकवाड said:

    कामायनी में श्रद्धा का चित्रण जैसा हुआ है बेशक आपने वैसा नहीं किया लेकिन तब श्रद्धा के पास कपड़े कहां थे? क्योंकि प्रलय पश्चात का यह वर्णन है आपका चित्रण मनमोहक है और मेरी नजर में यथार्थ के करीब भी। न जाने क्यों लोग बेवजह कला का विऱोध करने लग जाते हैं। कलाकार को इससे विचलित नहीं होना चाहिये। मैं भी कलाकार हूं और करीब 22 साल से इस फील्ड में सक्रिय हूं। मुझे इस बार की तरह हर बार यह विरोध बेवजह ही लगा। मकबूल फिदा हुसैन को मैं हिंदुस्तानी कलाकारों की अलग श्रेणी में रखता हूं। उनकी कला और नीचे लिखकर आब्जेक्ट के नाम समझाने की शैली से मैं इत्तेफाक लेकिन वह भी क्या बनाते हैं, उऩकी मर्जी। बहरहाल, बेहतर सृजन और उत्कृष्ट विचारों के लिए आपको बधाई और अच्छे भविष्य के लिए मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें।

  • VIJAY SINGH said:

    when an artist creat, it is art and you have done it. congrats

  • Alok Bhandari said:

    एक कला समीक्षक के तौर पर मेरा यही कहना है कि यह कला उत्तम है। कला वर्जनाओं से आगे की दुनिया है लेकिन यदि विषय रोचक हो और चित्रण नायाब तो कहने ही क्या। आगे भी जब कला का सृजन करें तो याद रखिएगा कि आप दर्शक होतीं तो क्या पसंद करतीं। तब भी निश्चित ही आप कामायनी जैसी कोई सीरीज रचने में कामयाब होंगी। ईश्वर आपकी मदद करें।

  • Hitesh Kumar (meet) said:

    आपकी पेंटिंग देखी, जवाब नहीं है इनका लेकिन हमारा देश आरम्भ से ही बेकद्रों का देश है…इसलिए इनके बारे में सोच कर आपको परेशान होने की जरुरत नहीं… आप अपना कार्य अनवरत करती हैं.. हम आपके साथ है… कभी दिल्ली में भी अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी करवाइए… जिस से हमें भी उन्हें देखने का मौका मिले… ओर आपसे मिलने का भी…

  • सात्विक अवस्थी said:

    न जानें क्यों लगता है कि कलाकार आज के माहौल में भी सबसे ईमानदारी से सृजन में जुटे हैं। बेशक आपको अपने विचार चित्रों में सहेजने की आजादी है और आपने इसका कहीं दुरुपयोग भी नहीं किया है। इसी तरह सृजन के लिए मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

  • shruti patvardhan said:

    accha kaam hai aapka

  • डा. राखी सारस्वत said:

    जयशंकर प्रसाद की कामायनी का यह प्रजेंटेशन पसंद आया। श्रद्धा के रूप में सौंदर्य का आपने शानदार वर्णन किया है। मुझे तो नहीं लगता है कि कुछ ऎसा है जिसकी आलोचना की जानी चाहिये।

  • Vivek Kulshreshtha said:

    great combination of writing and painting….. wish you all the best. I believe you have already achieved some level of being artist.

  • Dr. Anu Raj said:

    woh!! it is great uttama.

  • vijay said:

    Matuk nath jee, pata nahi ye vichar aapka hai ya juli je ka kyonki apne nam ki jagah matukjuli likha hai,ho sakta hai bhagwan sankar ke bad aap ardh narishwar ho gayen hon.Agar ye vichar aapka hai to mughe samagh mein aata hai kyonki aapke jaise insan se aisi hi umeed ki ja sakti hai. maine uttma jee ke paintings ke bare mein aur logon ke vichar bhi padhe lekin aapke jaisa explain kisi aur ne nahi kiya.uttmajee ka painting ek kalakar ki kala ka maulik pardarsan hoga lekin aapko (jaisa ki aapne likha hai ki aapko kala ka jyada gyan nahi hai.)usme nihit nagnata hi aakarsit karti hai.nagnata nirlajata aur kunda ka jita jagta udharan aap khud hain.juli ji ke sath aapko aapki patni ne nagn awastha men hi pakda tha isliye nagnta pe aapke anubhaw per hame koi sak nahi hai. uttama ji jaise kalakaro ki aad men aap aap apne kukarmo ko jayaj batana chahte hain.
    UTTAMA JI KO UNKI SANDAR KALA KE LIYE BADHAYI.

  • KALAL KRISHNA said:

    अच्छी कला है आपकी उत्तमा जी। आप इसी तरह विरोध की परवाह किए बगैर काम करती रहिए। एक खास बात है आपके काम में, वो है संयोजन।

  • Mohalla Live » Blog Archive » कलाओं पर ये कैसा पहरा…? said:

    [...] मोहल्‍ला लाइव पर उत्तमा की एक और पोस्‍ट : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग [...]

  • रविकांत said:

    बहुत खूब उत्तमा जी,

    विषय भले ही पुराना हो और कई लोगों ने पहले भी कूचियाँ चलायीं हैं. लेकिन आपकी तस्वीरों में दम है. एक ताजगी. ढेर साड़ी शुभकामनाएं.

    रविकांत

  • anil kumar gupta said:

    aapne aalochana ke liye kuchh v nhi likha hai…. thanks
    with regards
    Anil gupta
    HT meerut

  • धर्मेन्‍द्र said:

    उत्‍तमाजी,
    आपके द्वारा बनाये कामायनी पर आधारित चित्र देखकर अपने विश्‍वासों की पुष्टि हुई अर्थात आपके साहस से संबल मिला । कामायनी मैं भी पढाता हँू । कामायनी ही क्‍यों और भी ढेरों कविताऍं हैं पढ्ाते पढ्ाते समझाते समझाते महसूस करने और व्‍यक्‍त करते कुछ रह जाता है वही लोगों का भय । कलाओं पर इतने पहरे तो पहले भी नहीं थे । हर ऐरा गैरा नत्‍थू खैरा उठता है और हमें सभ्‍यता और संस्‍क़ति समझाने लगता है । सचमुच क्‍या ये सभ्‍यता और संस्‍कति जानते हैं । क्‍या सचमुच इनका सभ्‍यता और संस्‍कति से कोई लेना देना है । बस यही लगता है बार बार हे ईश्‍वर इन्‍हें माफ कर देना ये नहीं जानते ये क्‍या कर रहे हैं । ईश्‍वर की ये बहुत बात करते हैं , ईश्‍वर सचमुच इन्‍हें विवेक प्रदान करे । मूढता से दूर करे । इसी प्रार्थना के साथ बहुत बहुत शुभकामनाऍं
    धर्मेन्‍द्र

  • mahendra raja jain said:

    I think Uttama ji should contact the publisher of Kamayanai with a propsal that an illustrated edition of Kamayani is long overdue. The publisher should be reminded about YAMA of Mahadevi which is perhaps the only book of its kind and is now out of print . If illustrated edition of Kamayani is published, I am more than confident that the publisher will very soon not only recover the production costs (whatever it is) but it will also be a commercial success. I am sure that all university and college libraries, including art colleges will buy it , also foreign libraries. If the publisher is in any doubt, he should contact me. (Only hoest publishers, please) I am prepared to gamble.

    mahendra raja jain

  • KISHORE CHOUDHARY said:

    पेंटिंग की समझ नहीं है पर पहले लुक में कुछ होता है जो प्रभावित कर ही लेता है. आपका काम बेहतरीन है.

  • राजेंद्र शर्मा said:

    मैं दिल्ली की धूमीमल आर्ट गैलरी में आपकी कला देखी थी, शायद तीन साल पहले। आप निरंतर बेहतर काम कर रही हैं। मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें।

  • Mohalla Live » Blog Archive » पुरुष ने बनाये स्‍त्री के चित्र, स्‍त्री ने रखे अपने विचार said:

    [...] लाते रहे हैं। हमने उत्तमा दीक्षित के कामायनी प्रसंग को सामने रखा, फिर उनकी ये सोच भी जाहिर [...]

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