माओवाद पर चिदंबरम के रुख़ के मायने समझिए
♦ चंद्रिका
पी चिदंबरम को मैं भाषा और शब्दों के मायने समझाने की जुर्रत नहीं कर सकता। क्योंकि हमारे और उनके बीच में बहुत बड़ा फर्क है। क्योंकि वे एक राष्ट्र के शीर्ष पद पर हैं और मैं एक राष्ट्र की तलाश में, बिना राष्ट्र का नागरिक। मैं उनकी मजबूरी भी समझता हूं और बदलते हुए बयान के रुख भी। झारखंड और दिल्ली में शब्दों के तेवर का उतार चढ़ाव भी समझने का प्रयास करता हूं। वे जब कुछ नहीं बोलते, उसके मायने भी कुछ-कुछ मेरी समझ में आ ही जाते हैं।
गृह मंत्रालय का वह विज्ञापन आपको याद ही होगा, जो अभी हाल ही में लगभग सभी अखबारों के आधे पन्ने पर छपा था, जिसमें लिखा था कि माओवादी कोई क्रांतिकारी नहीं बल्कि डकैत हैं। यदि मैं सही-सही याद कर पा रहा हूं, तो शायद कुछ ऎसा ही लिखा था। माओवादी पहले आर्थिक राजनीतिक समस्या की उपज थे, फिर लालगढ़ के समय वे आतंकवादी और झारखंड के वक्तव्य में भटके हुए लोग हैं। यानी माओवादी = आर्थिक और राजनीतिक समस्या = आतंकवादी = डकैत = भटके हुए युवा = कोबाड गांधी, और यहां पर मेरा शब्द ज्ञान भहरा कर गिर जाता है। मुझे नहीं पता पर यदि गृहमंत्री चिदंबरम का ही हवाला दिया जाए, तो माओवाद का प्रभावित क्षेत्र भी बढ़कर 20 राज्यों के 223 जिलों में पहुंच चुका है जो कि 2005 में 14 राज्यों में ही था। जबकि सरकार इतनी मज़बूती के साथ खड़ी हो, जबकि सभी तरह की गतिविधियों पर पाबंदी और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो, माओवाद के इतनी तेज़ी से फैलने के क्या कारण हो सकते हैं? यदि यही स्थिति रही, तो क्या यह अनुमान लगाया जाए कि विजन 2020 तक माओवादी… यानी देश का हर राज्य आंतरिक रूप से असुरक्षित हो जाएगा। मैं चिदंबरम के उस देश का मायने जानने की कोशिश करता हूं, जिसे वे सुरक्षित रखना चाहते हैं और जिसे माओवादी असुरक्षित बना रहे हैं। मसलन लालगढ़, नंदीग्राम, बस्तर के सहारे यह जानने का प्रयास करता हूं कि चिदंबरम के राष्ट्र का नागरिक कौन है, जिसे सुरक्षा देने का ज़िम्मा उन्होंने उठाया है। क्या वह टाटा है, सालबोनी है, जिंदल है, एस्सार है?
यह सुरक्षा यहीं तक सीमित नहीं रही बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सांस्कृतिक व मानसिक रूप से लोगों को सुरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कहीं वे संसदीय राजनीति से परे किसी अन्य विकल्प पर न सोचने लगें। उडी़सा के पत्रकार लक्ष्मण चौधरी पर राजद्रोह का मुकदमा इसीलिए लगाया जा रहा है। बस्तर के पत्रकार हैं कि पुलिस की बतायी खबरों पर विश्वास तो करते हैं पर इसके अलावा भी उन तक खबरें पहुंच जा रही हैं पर अब यह सब ख़त्म होने जा रहा है। माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में अखबार पढो़ या अपने पडो़स के किसी थाने में जाकर बात कर लो – दोनों से आपको वही सूचना मिलेगी, क्योंकि अखबारों के स्रोत अब वही रह गये हैं। दांतेवाडा़ के एसपी अम्रीस मिश्रा ने आदेश जारी कर दिया है कि मीडियाकर्मियों को देखते ही सूट कर दो। यह एक मौखिक आदेश है, जिसका आने वाले दिनों में लिखित होना संभव है, पर लिखित और मौखिक का कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके पास माओवादियों के कुछ पर्चे मिले हैं आखिर एक पत्रकार यदि निष्पक्षता के साथ खबरें लाना चाहे तो दूसरे पक्ष का स्रोत क्या होगा। संविधान में लिखित रूप से अभिव्यक्ति की आज़ादी व एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक अधिकार होने के बावजूद भी वे कौन से कानून हैं जो पी गोविंदम कुट्टी को पीपुल्स मार्च निकालने से रोकते हैं या दानिस प्रकाशन की पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है या फिर वे आज तक मिली ही नहीं। जहां उन पार्टियों व संगठनों को भी असहमति जाहिर करने का मौका मिले, जो सत्ता तंत्र के खिलाफ हैं। लोकतंत्र की आलोचना भी सत्ता तंत्र में रहते हुए ही की जा सकती है। पी चिदंबरम ने अभी अपने नये बदले हुए रुख के साथ यह भी कह डाला कि माओवादी एक सशस्त्र राजनीतिक पार्टी है। तो क्या यह मान लिया जाए कि गृह मंत्रालय से जारी वह विज्ञापन, जिसमे कोल्ड ब्लड मर्डरर कहा गया था, वह ग़लत था। फिर तो इस ग़लती के लिए एक विज्ञापन गृहमंत्री को निकलवाना ही चाहिए। यदि माओवादी राजनीतिक पार्टी है, तो एक पार्टी को अपना मुखपत्र निकालने की छूट मिलनी चाहिए और देश में बंद उन तमाम माओवादी नेताओं के साथ राजनीतिक कैदी जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। अपराधी के तौर पर उनके साथ हो रहे व्यवहारों को रोका जाना चाहिए। जबकि उन्हें अन्य कैदियों से मिलने-जुलने की छूट तक नहीं है। उन्हें न तो लिखने-पढ़ने की सामाग्री मुहैया होती है और न ही पत्र-पत्रिकाएं। पर समय-समय पर पी चिदंबरम के बदलते बयान को किस रूप में लिया जाए? क्या यह मान लिया जाए की कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से अब तक जो बयान आये हैं वह उनकी बढ़ती समझदारी के रूप में हैं। फिर तो उन्हें माओवादी पार्टी को और समझने का प्रयास करना चाहिए और लोगों को गृहमंत्री के अगले बयान की प्रतीक्षा। ऐसी स्थिति में ही वे सैन्य कार्यवाही छेड़ने जा रहे हैं, जिसमें जनसंहार होना तय है क्योंकि पिछले आंकड़ों पर गौर करें तो माओवादी इलाकों में हुई कार्यवाहियों में नागरिक समाज यानी बहुसंख्या में निर्दोष आदिवासियों की हत्याएं बडे़ पैमाने पर हुई हैं।
सीताराम यचुरी ने अपने एक आलेख में माओवाद को इस आधार पर खारिज किया कि गढ़चिरौली में चुनाव बहिष्कार के फरमान को नकार कर लोगों ने दिखा दिया है कि वे किसके साथ हैं पर वे पूरी स्थितियों को छुपा गये कि यह मतदान नहीं बल्कि पुलिस बंदूक का भय था, जिसने ग्रामीणों को बटन दबाने के लिए बाध्य किया। जब पुलिस यह फरमान जारी करे कि जो मतदान नहीं करेगा वह गोली खाने को तैयार हो जाए तो मौत या मत के विकल्प में आपका क्या चुनाव होगा।
गढ़चिरौली में मतदान कैसा रहा, यह गढ़चिरौली प्रेस क्लब के पत्रकारों से पूछा जाना चाहिए, जो मसेली गांव में जबरन मतदान करवाती पुलिस को कवर करने गये तो लाठियां खायीं और बंधक बनाकर रखे गये। महाराष्ट्र के गोंदिया, सतरा, यवतमाल जैसे इलाके, जहां माओवादियों का प्रभाव नहीं है, वहां भी लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया। पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में मत डालने का फीसदी कम हुआ है। यदि मत फीसदी ही स्वीकार्यता या नकार को तय करती है तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि दुकानों, स्कूलों, फैक्ट्रियों को जबरन बंद कराने व टीवी पर लगातार सेलिब्रिटीज के प्रचार के बाद भी 54 फीसदी लोगों ने मुंबई में चुनाव को नकार दिया और 46 फीसदी ही वोट पडे़। क्या इसे संसदीय लोकतंत्र को खारिज़ हुआ मान लिया जाए।
पर यह उदारीकरण का दौर है और चिदंबरम व मनमोहन सिंह… क्षमा करें, शायद मुझे इनके पीछे “जी” लगाना चाहिए वरना मैं इस अपमान के लिए किसी जनसुरक्षा अधिनियम का अपराधी हो सकता हूं… उदारीकरण के इस दौर में अपना उदार रुख अपनाते हुए ये माओवादियों के साथ बात करने को तैयार हैं। शर्त यह है कि माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़ दें। जबकि दूसरी तरफ माओवादियों के उन्मूलन के लिए 40 हजार विशेष दल के जवानों का चुनाव किया जा चुका है जो आगामी दिनों में संयुक्त कार्यवाही में भाग लेंगे।
ऎसा पहली बार नहीं है जब सरकार इतनी उदार हुई हो बल्कि इससे पहले राज्य के स्तर पर आंध्र, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कई बार ये प्रस्ताव रखे जा चुके हैं पर वार्ताएं या तो असफल हुई हैं या फिर सरकार की शर्त पर माओवादी वार्ता करने को तैयार ही नहीं हुए हैं। 1995 में दिग्विजय सिंह के प्रस्ताव पर माओवादी नेता गोपन्ना ने भी शर्त रखी थी और वह थी विशेष शसस्त्र बल हटाने, पुलिस बल न बढ़ाने, लोगों को नुक़सान का मुआवज़ा देने और ऎसे बेकसूर गिरफ़्तार लोग जिन्होंने महज माओवादियों को रास्ता दिखाया या खाना खिलाया, उन्हें रिहा करने की पर शर्तें नामंजूर हुई और वार्ताएं असफल। जिन्हें होना भी था क्योंकि माओवाद आज महज सरकार की कमियों से उत्पन्न एक स्थिति ही नहीं है बल्कि यह एक असमानता युक्त व्यवस्था से असंतुष्टि भी है। जो अपने क्षेत्र विस्तार के साथ ही विचारों में भी व्यापक होता गया है। माओवाद दिनों-दिन अपनी संरचना व क्रियान्वयन में भी व्यापक होता गया है तभी आज ऎसी स्थिति बन पायी है कि महिलाओं की बड़े हिस्से पर भागीदारी के साथ उनका शीर्षस्थ पदों पर पहुंचना संभव हुआ है। शायद गृहमंत्री इन्हें डकैतों के टोली की सरगना कह दें।
इन सारी स्थितियों को समझते हुए या न समझते हुए क्या शसस्त्र कार्यवाहियों से एक विचार को उड़ाया जाना मुमकिन है। भले ही 40 हज़ार के बजाय 4 लाख की फोर्स तैनात क्यों न कर दी जाए। क्योंकि सरकार के पास पैसे और बारूद की इतनी बड़ी और सरकारी भाषा में वैध ताकत है कि उसके आगे माओवादियों की सशस्त्र सेना निहायत छोटी होगी। पर दोनों में मूलभूत अंतर है कि माओवादी भाड़े पर नहीं खरीदे गये हैं। इसकी पूरी संभावना है कि सरकारी सेना इनका नेस्तनाबूत कर दे, पर इस पर पूरा यकीन है कि यदि व्यवस्था की संरचना में सवाल बचे रहे तो वह फिर से निर्मित हो जाएगी।
यदि इतिहास हमें भविष्य निर्मित करने की समझ देता है तो पिछले चार दशकों यानी 40 वर्षों में नक्सलबाड़ी से आज तक माओवादियों के संघर्ष और सत्ता द्वारा उनके उन्मूलन को लेकर अख्तियार किये गये अब तक के तरीकों से सीखना होगा जो कि मामूली नहीं रहे हैं। छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का हिस्सा था, जब नक्सली उन्मूलन के महानिरीक्षक अयोध्यानाथ पाठक बनाये गये। उस समय नक्सली इलाकों में पुलिसकर्मी शिक्षक के वेश में जाया करते थे और नक्सली गतिविधियों पर नज़र रखते थे। यह माना गया कि नक्सली गांव वालों के साथ इतने घुले मिले होते हैं कि कई बार पहचान ही मुश्किल हो जाती है और इस तरीके को अपनाते हुए तत्काल पुलिस अधीक्षक सुदर्शन ने ग्रामीणों के साथ अपने तौर तरीकों में बदलाव लाया। जब वे ग्रामीणों के बीच जाते तो ज़मीन पर बैठते। पता नहीं गांव वालों ने पुलिस के इस बदले हुए रूप को किस तरह लिया पर मीडिया को यह तरीका काफी पसंद आया और पुलिस का यह उदार चरित्र बड़े पैमाने पर प्रसारित किया गया। तरीका यह भी अख्तियार किया गया कि पुलिस कई दिनों तक जंगलों में नक्सली दल बनकर घूमती रही। 1990-92 के आस-पास जनजागरण अभियन चलाये गये और गांव-गांव जाकर यह बताया गया कि नक्सली अपराधी हैं। एनएसजी जैसी एजेंसी जो कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सुरक्षा प्रदान करती है, उसे तैनात किया गया। इस तरह के अन्य कई प्रयोग किये गये।
वहां के तत्कालीन डीआईजी पन्नालाल ने दावा किया कि बहुत जल्द ही राज्य इस समस्या से मुक्त हो जाएगा। उस समय के गृह राज्यमंत्री गौरी शंकर शेजवार ने तो यह भी कह डाला कि नक्सलवाद आखिरी सांसें ले रहा है। यह बात 1993 की है। तब से अब तक 16 वर्ष बीत चुके हैं। ये सारे प्रयोग और दावे आज खारिज़ हो चुके हैं। अगर जुनून में न हो तो वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा कोई पुलिस वाला भी लगा सकता है। 1997 में देवप्रकाश खन्ना, जो वहां के डीजीपी थे, ने अपनी पुस्तक “हम सब अर्जुन हैं” में इसे स्पष्ट भी किया है और व्यवस्था की संरचना व नक्सलवाद की समस्या को नये दृष्टि से रखने का प्रयास किया है। अंततः उस समय यह मान लिया गया कि नक्सलवाद के लिए कोई भी फौरी कार्यवाही महज आदिवासियों को नष्ट करना और उनका कत्लेआम होगा, इसलिए इसका एलोपैथिक इलाज किया जाना चाहिए।
(चंद्रिका। पत्रकार, छात्र। फ़ैज़ाबाद (यूपी) के निवासी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बाद फिलहाल महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अध्ययन। आंदोलन। मशहूर ब्लॉग दखल की दुनिया के सदस्य। उनसे chandrika.media@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)











mujhe yah ektarfa lekh laga.. dono pahloo ko naa dekh bas ek pahloo par likha gaya lekh..
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