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भारतीय पाठक आगे हैं नेट यूजर से

1 November 2009 No Comment

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

newspapers

इंटरनेट के चालीस साल हो चुके हैं। इंटरनेट जब आया था, तो लोग कह रहे थे कि‍ अब अख़बार के दि‍न लद गये। लोग अख़बार नहीं पढ़ेंगे। टीवी क्रांति‍ हुई तो हल्‍ला शुरू हो गया कि‍ अख़बार के दि‍न लद गए। लेकि‍न अख़बार अभी भी जिंदा हैं। भारत में अख़बार के पाठकों की संख्‍या तेजी से बढ़ रही है। अख़बारों का प्रकाशन बढ़ रहा है। कल तक जो अख़बार की मौत पर शोक प्रस्‍ताव पढ़ रहे थे, वे आज प्रेस क्रांति‍ देख कर अवाक हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि‍ आखि‍रकार भारत में प्रिंट क्रांति‍ का रहस्‍य क्‍या है ।

प्रेस क्रांति‍ के कारण भारत में 2007 में दैनि‍क अख़बार के पाठकों की संख्‍या 150 मि‍लि‍यन का आंकड़ा पार गयी। इसकी तुलना में अमेरि‍का में दैनि‍क अख़बार के 97 मि‍लि‍यन पाठक हैं। जर्मनी में 48 मि‍लि‍यन पाठक हैं। इसके वि‍परीत भारत में अख़बारों का सर्कुलेशन छलांग लगा रहा है। अख़बारों की आय में बढ़ोत्तरी हुई है। वि‍ज्ञापनों में इज़ाफा हुआ है। 2007 में वि‍ज्ञापनों से होने वाली आय में 15 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई। अकेले दि‍ल्‍ली से 15 भाषाओं में अख़बार प्रकाशि‍त होते हैं। इनमें अंग्रेज़ी और हिंदी के अख़बारों का क्षेत्रीय रुझान है। जैसे तेलुगू भाषी अख़बारों का होता है। दि‍ल्‍ली में एक ऐसी दुकान भी है, जि‍स पर आपको 117 भारतीय दैनि‍क अख़बार मि‍ल जाएंगे।

अख़बार वालों का मानना है कि‍ भारत में अभी भी व्‍यापक पाठक समुदाय है, जि‍स तक अख़बार को पहुंचना है और इसी चीज को ध्‍यान में रखकर आये दि‍न नये संस्‍करण और नये अख़बार प्रकाशि‍त हो रहे हैं। खासकर छोटे शहरों, कस्‍बों और गांवों के पाठकों तक पहुंचने की होड़ मची हुई है। भारत में कंप्‍यूटर तकनीक का महि‍मागान होने के बावजूद 2007 में 8.5 मि‍लि‍यन लोग ही इंटरनेट का इस्‍तेमाल कर रहे थे।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि‍ जो लोग कंप्‍यूटर का इस्‍तेमाल करते हैं, उनमें एक बड़ा हि‍स्‍सा ऐसे लोगों का भी है, जो इंटरनेट का इस्‍तेमाल नहीं करता। भारत में जि‍स समय प्रेस क्रांति‍ घट रही थी और वि‍ज्ञापनों में उछाल आ रहा था, उस समय अमेरि‍की प्रेस में (सन 2006) गि‍रावट दर्ज की गयी। उल्‍लेखनीय है यह मंदी का साल नहीं था।

भारत के अख़बार 35 फीसदी वयस्‍कों तक पहुंच चुके हैं। वर्ल्‍ड न्‍यूज एसोसिएशन के अनुसार अमेरि‍का में प्रति‍दि‍न 17 फीसदी लोग दैनि‍क अख़बार खरीदते हैं। प्रत्‍येक अख़बार को एक से अधि‍क लोग मि‍ल कर पढ़ते हैं। अमेरि‍कन न्‍यूजपेपर एसोसिएशन के अनुसार वि‍गत दो दशकों में अमेरि‍का में अख़बारों के सर्कुलेशन में नि‍रंतर गि‍रावट आयी है। 1985 में 63 मि‍लि‍यन से गि‍र कर 2005 में सर्कुलेशन घटकर 53 मि‍लि‍यन रह गया।

इसी तरह ब्रि‍टेन में भी अख़बारों का सर्कुलेशन गि‍रा है। 2001 से 2005 के बीच में ब्रि‍टेन में अख़बारों का सर्कुलेशन तीन फीसदी कम हुआ। जबकि‍ जर्मनी में इसी अवधि‍ में अख़बारों का सर्कुलेशन 11 फीसदी गि‍रा। इसके वि‍परीत भारत में 2001 से 2005 के बीच में दैनि‍क अख़बारों का सर्कुलेशन 33 फीसदी बढ़ा है। भारत में अभी बहुत बड़ा हि‍स्‍सा है, जो साक्षर है लेकि‍न अख़बार नहीं पढ़ता। साथ ही जि‍स गति‍ से साक्षरता अभि‍यान चल रहा है, उसके कारण भी भवि‍ष्‍य में अख़बारों के पाठक बढ़ने की अनंत संभावनाएं हैं। भारत के अख़बारों में रसीली ख़बरों से लेकर ठोस खबरें रहती हैं। इनके कारण पाठकों को अख़बार पढ़ने में मज़ा आता है। सर्कुलेशन बढ़ने का अन्‍य कारण है अख़बार की कीमत कम होना। आमतौर पर दो रुपये में अख़बार मि‍ल जाता है। तकरीबन 11मि‍लि‍यन अंग्रेजी अख़बार बि‍कते हैं, इसकी तुलना में हिंदी के 34 मि‍लि‍यन अख़बार बि‍कते हैं। उल्‍लेखनीय है भारत में तकरीबन 300 बड़े दैनि‍क अख़बार हैं। रूथ डेविड ने फॉरबिस मैगजीन में लिखा है कि मीडिया के नये आंकड़े बताते हैं कि नये विदेशी पूंजी निवेश की भारत में अनंत संभावनाएं हैं। भारत में लोग ज़्यादा चैनल देखना चाहते हैं। प्रतिवर्ष इस क्षेत्र में 20 फीसद आय में इज़ाफ़ा हो रहा है। 2011 तक समग्र आय 22.5 बिलियन डॉलर का आंकडा पार कर जाएगी। उपभोक्ता की आय में निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। प्रिंट मीडिया को 22 करोड़ लोग पढ़ रहे हैं। इसके अलावा आंकड़े बताते हैं कि 37 करोड़ लोग हैं, जो कि‍सी भी मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते। भारतीय प्रिंट उद्योग में 2006 में 90.80 मिलियन डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश हुआ। नव्य-उदारतावादी नीतिगत बदलाव के साथ प्रिंट उद्योग में मात्र 26 फीसद का ही निवेश किया जा सकता है और प्रबंधन का नियंत्रण विदेशी नागरिक के हाथ में नहीं होगा। यानी पूंजी विदेशी होगी किंतु मीडिया पर प्रबंधन भारतीय लोगों के हाथों में ही होगा।

भारतीय मीडिया परिदृश्य में 2006 तक इंटरनेट के ग्राहकों की संख्या सवा तीन करोड़ से ज़्यादा थी। इनमें दो करोड़ दस लाख नियमित ग्राहक हैं। तकरीबन 59 मिलियन पीसी साक्षर हैं और ये इंटरनेट विज्ञापनों के लक्ष्यीभूत श्रोता हैं। 2008 तक इंटरनेट के नियमित ग्राहकों की संख्या साढ़े तीन करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगी। एक अनुमान के अनुसार टेलीविजन उद्योग की आय 22 फीसद प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक यह 4.34 बिलियन डॉलर से बढ़ कर 11.78 बिलियन हो जाने की संभावना है। जबकि प्रिंट उद्योग की आय 13 फीसद सालाना की दर से बढ़ रही है। यानी 2.90 बिलियन डालर से बढ़ कर 5.27 बिलियन डॉलर हो जाने की संभावना है। विश्व समाचार परिषद के आंकड़ों के अनुसार भारत में दैनिक अख़बारी संस्कृति का स्वस्थ ढंग से विकास हो रहा है। दैनिक अख़बारों का सर्कुलेशन आठ फीसदी की दर से बढ़ा है। जबकि इसी अवधि में ब्रिटेन में दैनिक अख़बारों का सर्कुलेशन 4.5 फीसदी की दर से बढ़ा है। गार्जियन के अनुसार, भारतीय अख़बारों में आया यह उछाल आगे भी जारी रहेगा। भारत की आबादी 100 करोड़ से ज़्यादा है और लाखों लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसके कारण प्रतिदिन नये पाठक पैदा हो रहे हैं। भारत में साक्षरता दर अभी 60 फीसद है और भविष्य में इसमें सुधार होगा। अर्थव्यवस्था में तेजी से विकास हो रहा है।

भारत में शिक्षित मध्यवर्ग का विकास हो रहा है। मुख्यभाषा के रूप में हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी स्थानीय भाषाओं की कीमत पर अपनी ज़मीन बना रही हैं। भवि‍ष्‍य में कुछ मीडि‍या कंपनि‍यां मुफ्त में अख़बार बांटने की योजना भी बना रही है। इनका मानना है भारत के लोग गरीब हैं और वे अख़बार पढ़ते और पढ़ाते हैं। अत: विज्ञापन के प्रचार के लिहाज से मुफ्त में अख़बार बांटना फायदे का सौदा है।

jag(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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