2 नवंबर 2009 : टेलीविज़न के इतिहास में एक अश्लील दिन
♦ विनीत कुमार

हमें स्क्रीन पर तीन-चार बुज़ुर्ग टकले, सिर्फ सिर दिखाई देते हैं। एक के ऊपर एक आपाधापी करते हुए मीडियाकर्मी आगे बढ़ते हैं। बादशाह उन्हें बार-बार बैठने की सलाह देता है। कभी मुस्कराते हुए,कभी आवाज़ में थोड़ी तल्खी बरतते हुए लेकिन इन पर कोई असर नहीं होता। उसी धकमपेल में बादशाह की ओर से घोषणा की जाती है – आपलोग परेशान मत होइए, केक काटे जाने के फोटोग्राफ्स आपलोगों के बीच बांट दिये जाएंगे… यू ऑल आर माइ फ्रैंड्स… तू आ न इधर से… तेरे को तो मैंने पहले भी दिया था… हैव कोल्डड्रिंक प्लीज़। बादशाह इन अनुभवी मीडियाकर्मियों को अपना दोस्त बताते हुए शुक्रिया अदा करते हैं। स्क्रीन पर लगातार फ्लैश होता है – शाहरुख़ लाइव। सिलेब्रेटी को कवर करने का दौरा इस तरह से पड़ता है कि हम ऑडिएंस को सिर्फ टकले सिर दिखते हैं। टेलीविज़न ये एथिक्स भी भूल जाता है कि ऑडिएंस के साथ किस हद तक ईमानदारी बरतनी है। क्या आज हम अपने हिस्से आयी इन तस्वीरों के जरिये टेलीविज़न के हीस्टीरिया फेज का अंदाजा लगा सकते हैं? थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ ये नज़ारा लगभग सभी चैनलों पर था।
पांच-दस-पंद्रह साल, बीस साल से जर्नलिज्म करनेवाले देश के मीडियाकर्मी किंग खान कहे जानेवाले शख्स की केक काटने की तस्वीर लेने के लिए पूरी ताक़त झोंक देते हैं। आपाधापी के बीच वो किसी भी तरह से उस तस्वीर को हम तक लाइव पहुंचाना चाहते हैं। टेलीविज़न ने लाइव देखने का जो रोमांच और दिखाने का जो आंतक हमारे बीच पैदा किया है, उसके पीछे किसी भी तरह के इथिक्स काम नहीं करते। हम सिर्फ टकले सिर और पिछाड़ी देखकर किस प्लेज़र मोड में अपने को पाते हैं, चैनल को इस पर एक बार ज़रूर सोचना चाहिए। बाज़ार की गोद में बैठकर भी पसीना बहानेवाले और उसका पक्ष लेनेवाले मीडियाकर्मियों से एक बार सवाल तो ज़रूर किये जाने चाहिए कि हम अगर आपके चाल-चरित्र को समझते हुए ये समझ रहे हैं कि आपके एजेंडे में सामाजिक विकास और दायित्व का मामला कहीं नहीं है तो फिर क्या देश के ये अनुभवी पत्रकार सिर्फ इस काम के लिए रह गये हैं कि वो हांफते हुए, अपनी हड्डियां चटकाते हुए केक काटने का लाइव शॉट तैयार करें? यहीं से उनकी एक्टिविटी के दो चरित्र हमें साफ तौर पर दिखाई देते हैं। एक चरित्र जहां कि वह लगातार “आइस संस्कृति” ( इनफॉर्मेशन, इंटरटेनमेंट और कनज्यूमरिज्म से पैदा की जानेवाली संस्किकृति) को मज़बूत करता नज़र आता है और दूसरा कि ख़बर हर कीमत पर या जहां हम हैं वहां ख़बर है के दावे के साथ अपने को समाज का पहरुआ साबित करने की कोशिश में लगे रहने की घोषणा करता है। मीडिया के ये दोनों चरित्र ऊपरी तौर पर एक दूसरे के वायनरी नज़र आते हैं लेकिन गंभीरता से देखें तो ये पहले के चरित्र को ही सपोर्ट करता नज़र आता है। ऐसे में सामाजिक मसले के सारे सवाल पहले के चरित्र में इमर्ज कर जाते हैं और एक नये किस्म की ख़तरनाक स्थिति पैदा होती है।
पिछले तीन दिनों से देश के लगभग सारे हिंदी चैनलों ने अपनी-अपनी इंदिरा खोजने और गढ़ने में अपनी ताक़त झोंक दी। इस इंदिरा यात्रा के जरिये उन सवालों से ऊपरी स्तर पर ही सही, लोकतंत्र के मिज़ाज और ज़रूरतों को समझने की कोशिश की गयी जो कि किसी भी देश के लिए खाद-पानी का काम करते हैं। इन तीन दिनों में फ्रैक्चर्ड डेमोक्रेसी का भी मसला जहां-तहां उठाया गया। अगर चैनलों की इस कोशिश में मौजूदा समय के सवाल जुड़ते तो उन्हें आज दस साल से लगातार अनशन पर बैठीं इरोम शर्मिला का ध्यान आता। उन्हें ये चेहरा उस प्रतिरूप के तौर पर याद आना चाहिए था जो कि प्रशासन के बर्बर हो जाने पर उसके प्रतिरोध में खड़े होनेवाले चेहरे को याद करने के तौर पर याद आते हैं। लेकिन भाव, आस्था और फिर अंधश्रद्धा की गोद में जाकर गिरनेवाले इस देश की ऑडिएंस के लिए चैनलों ने इस प्रतिरूप की सुध लेने के बजाय इंदिरा की स्टोरी करके बाद की थकान मिटाने के लिए शाहरुख़ की तरफ मुड़ना ज़रूरी समझा। वो अब चौबीसों घंटे देश के इस शख्स को दिखा-दिखाकर अवतार की इमेज बनाने में थक कर चूर हो जाएगा लेकिन वो कभी भी इस बात को सामने लाने की कोशिश नहीं करेगा कि मौजूदा हालात में मणिपुर का प्रशासन इरोम के साथ किस तरह की ज़्यादतियां कर रहा है? उसके लाख प्रतिकार के जाने के बावजूद भी किस तरह से नली के जरिये उन्हें खाना खिलाये जाने की जबरन कोशिशें की जा रही है, कैसे उन पर आइपीसी की धारा 309 लगाकर आत्महत्या की कोशिश के आरोप में 21 नवंबर 2000 को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया?
टेलीविज़न में सरोकार की ख़बरों की हिस्सेदारी की मांग करते हुए हमें देश के उन तमाम मीडियाकर्मियों तर्क बेहतर ढंग से याद हैं, जो ये मानते हैं कि जो दिखता है वही तो दिखाया जाएगा? इस मार-काट के धंधे में हम उन ख़बरों को लेकर रिस्क तो नहीं ले सकते जो कि टीआरपी पैद करने की कूव्वत नहीं रखते? तर्क और बहस का फिर उन तालठोंक चैलेंजों की तरफ मुड़ जाना कि तो आप ही सामाजिक सरोकार की ख़बरें दिखाते हुए चैनल चलाकर दिखा दीजिए, हम फिलहाल इस चैलेंज से तौबा करते हुए सिर्फ एक ही सवाल करना चाहते हैं? क्या हम चैनल सिर्फ केक के टुकड़े देखने के लिए देखते रहें, आपाधापी करते मीडियाकर्मियों के टकले सिर और पिछाड़ी देखने के लिए चैनल देखते रहें, सास की आस में दिल में सच और ज़ुबां पर इंडिया का लेबल लगा कर देखते रहें? ये आपका चैनल है, आपको जो जी में आए कीजिए, मन करे तो कैटरीना को रिपोर्टर बना दीजिए जो कि आपने बना ही दिया है लेकिन रह-रहकर सामाजिक विकास औऱ सरोकार का जो दौरा आप पर आता है, उसका हम क्या करें? आप जब ये दिखाते हैं कि इस देश में नक्सलवाद एक गंभीर समस्या है, इसे किसी भी रूप में कुचलनेवाले पी चिदंबरम का हीरोइक इमेज बनाते हैं, इस मसले पर राष्ट्र की चिंता का लेबल चस्पाते हैं, तब इन सारी बातों को हम किस रुप में लें? अगर आपके तर्क पर ये समझा जाए कि आप अपने को बचाये रखने के लिए इसे ज़रूरी मानते हैं कि टीआरपी ऑरिएंटेड होकर काम किया जाए तो फिर ये राष्ट्र, विकास, सरोकार ब्ला, ब्ला सब टीआरपी का ही हिस्सा हुआ न? तो फिर आप अपने भीतर वो ताक़त क्यों नहीं पैदा कर पाते कि राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हज़ारों मासूमों का कुचला जाना टीआरपी का हिस्सा बन जाता है, बिना ये जाने हुए कि पुलिस मशीनरी किससे किसको बचाने के लिए गश्त लगा रही है, टीआरपी का हिस्सा बन सकता है, जनता के हाथों पीटा जानेवाला इंस्पेक्टर टीआरपी का हिस्सा बन जाता है लेकिन गांधी की अहिंसा का रास्ता अपनानेवाली इरोम शर्मिला कभी भी हिस्सा नहीं बन पाती।
इस देश की तो फितरत ही रही है कि गांधी, भगत सिंह और शास्त्री जैसे लोगों को आदमी से बढ़कर अवतार की तरह पूजा जाता है लेकिन न तो इस बात की कामना होती है कि हमारे घर गांधी और भगत पैदा हो और अगर इसके चिन्ह कहीं दिखाई देते हैं तो उसे कुचल डालो। इसमें आपकी और टीआरपी की काबिलियत कहां तक है? इस देश में इंडियन ऑयडल खोजना आसान हो गया है, वॉइस ऑफ इंडिया खोजना आसान हो गया है, किंग खान की खोज एक दिन के भीतर हो सकती है लेकिन बदलाव के लिए उभरते चेहरों की या तो पहचान ध्वस्त की जाती है या फिर अपनी पूरी ताक़त इसे मिटा देने में लगा दी जाती है। अब जब आजादी, बदलाव, हैप्पीनेस और मैराथन टीआरपी के खांचे में ही रहकर आनी और होनी है, ऐसे में ज़रूरी है कि टीआरपी के खेल का विस्तार हो।
ख़बरों के चरित्र को लेकर जब भी टेलीविज़न की आलोचना की जाती है तो प्रिंट मीडिया का सिर अपने आप ही उचक जाता है। बरी कर दिये जाने के दर्प से उसकी अकड़ छिपाये नहीं छिपती। लेकिन इस क्रम में आइस यानी सूचना (मीनिंगलेस), मनोरंजन और उपभोक्तावाद के जरिये पैदा की जानेवाली ठंडी संस्कृति को मज़बूत करने में जुटा है, इस पर भी बात करना ज़रूरी है। आधे-आधे पन्ने में नंबर वन हरियाणा का राग अलापनेवाले अख़बारों से ये सवाल होने चाहिए कि तुरही बजाने की कला में लगातार निष्णात होनेवाले महानुभावो, क्या आपके पास एक कॉलम भी नहीं बचा रह जाता कि सरोकारों से जुड़ी ख़बरें उनमें छापी जा सके। क्या सामाजिक गतिविधियों की सूचना जानने के नाम पर हम अख़बार सिर्फ इसलिए खरीदते हैं कि उससे हम जान सकें कि गांधी जयंती के मौके पर खादी पर कितने प्रतिशत की छूट मिली है। ऐतिहासिकता और संदर्भों को इस आइस संस्कृति में लपेट मारने के पहले आपको कई सवालों के जबाब देने होंगे। ख़बरों को धकेलकर आप आंकड़ों की बदौलत राज करने की खुशफहमी में ज़्यादा दिनों तक ज़िंदा नहीं रह सकते।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। बिहार के निवासी, झारखंड से पढ़ाई-लिखाई। फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। ताना बाना और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









sahi tippani hai.film ko gariyate bhi hain aur film se trp badhane ki chinta bhi rahti hai.print film se jude patrakar,star aur bekar ko hikarat ki nazar se dekhta hai,lekin unhen apni dukanon mein sajata bhi hai.is vidambna ko samjhna zaroori hai.
aap lagatar behtar likh rahe hain.badhayi.
विनीत आपने बिल्कुल सही कहा है… आपने जो सवाल उठाएं हैं वो बिल्कुल सही हैं… लेकिन करें भी तो क्या करें… भारतीय मीडिया जिस दिशा में जा रही है… उसके लिए कुछ हद तक तो हम भी जिम्मेदार हैं… हम का मतलब आप और मैं नहीं… बल्कि देश की जनता है… इरोम शर्मिला पर अगर आधे घंटे का प्रोग्राम बनाया जाए तो.. यही जनता ये कहकर चैनल बदल लेती है.. कि क्या है यार.. पता नहीं क्या दिखा रहे हैं… लेकिन जब वही शाहरुख खान मुस्कुराते हुए… केक काटते नज़र आते हैं.. या दिल्ली मैराथन में शीला दीक्षित को झप्पी देते हुए दिखायी देते हैं.. तो दर्शक फौरन उसी चैनल पर चिपक जाता है… मेरा सवाल सिर्फ यही है कि अगर टेलीविजन या प्रिंट मीडिया अपनी जिम्मेदारियों से कोसों दूर है.. तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है… ज़रा फर्ज कीजिए… सिगरेट पान बेचने वाला एक छोटा सा दुकानदार.. हर ब्रैंड की सिगरेट रखता है… लेकिन उसकी नेवी कट जितनी बिकती है.. उतनी बैंसन एंड हेजेज़ नहीं बिकती…ज़ाहिर उसके स्टॉक में अगले दिन से नेवी कट ही ज्यादा होगा… ठीक वैसे ही आजकल न्यूज चैनल्स हो गए हैं… सीरियस न्यूज.. समाज से सरोकार रखने वाली खबरें… या न्यूज चैनलों की भाषा में कहें तो डाउन मार्केट चीज़ें लोग देखना पसंद नहीं करते… उन्हें तो जितना उलूल जूलूल दिखा तो वही पसंद आता है… मैं तो कहता हूं दर्शक छोड़ दें इस तरह के न्यूज चैनलों को देखना… उस तरह के न्यूज पेपर्स को पढ़ना.. फिर देखिए… ये सुधरते हैं कि नहीं सुधरते हैं…
आलोकजी,एक हद तक आपकी बात से सहमत हुआ जा सकता है कि जब ऑडिएंस ही ये सब देखना चाहती है तो फिर चैनल क्या करे? जब फालतू की खबरें पाठक पढ़ते हैं तो फिर अखबार क्या करे? मुझे भी लिखते हुए ये सारी चीजें ध्यान में आती है। लेकिन इस मामले मैं दो बातें कहना चाहता हूं। एक बात के प्रसंग शायद थोड़ा बदल जाए तो माफ करेंगे। अभी डेढ़ साल के टेलीविजन सीरियलों पर गौर करें। सास-बहू सीरियलों के बरक्स सामाजिक मसलों को लेकर पहले बालिका वधू,उतरन,लाडो फिर दर्जनों सीरियल अलग-अलग चैनलों पर सामाजिक मसलों को लेकर प्रसारित करने शुरु किए गए। अबकी बार के हंस के स्त्री विशेषांक में इन सीरियलों पर लिखते हुए मैंने साफ तौर पर कहा कि अगर सीरियल सास-बहू से हटकर सामाजिक मसलों पर आकर बात करने लगे हैं तो हमारे सामने ये बिल्कुल साफ हो जाना चाहिए कि ये आलोचकों के लिखने की वजह से नहीं हुआ है बल्कि ये स्वयं चैनल की इकॉनमी है आप गौर करेंगे कि इन सीरियलों के शुरुआती एपिसोड को देखकर जिस तरह की पॉपुलरिटी मिली कि लोग बाकी के प्रोग्राम देखना ही भूल गए। लोग सामाजिक मसलों को बेहतर तरीके से पचा रहे थे और जो सेग्मेंटेड और फ्लोटेड ऑडिएंस थी वो भी इसमें शामिल होने लगी। आगे पच्चीस-तीस एपीसोड के बाद इन सीरियलों में क्या हुआ? आप देखेंगे कि सबों को धीरे-धीरे मेलोड्रामा में तब्दील कर दिया गया। टीआरपी तो पहले से आ रही थी लेकिन ऐसा करना क्यों जरुरी हो गया कि सारे सीरियल सामाजिक मुद्दों से हटकर हाइपर इमोशनल मोड में चले गए। आप समझ सकते हैं कि अगर इन सीरियलों को शुरुआती अंदाज में ही दिखाया जाता तो चैनल को कई चीजों से टकराना पड़ जाता। इन सीरियलों में फैशन गायब हो गए थे,ज्वेलरी गायब हो गए(बालिका वधू छोड़ दें तो) इससे बाजार पर नकारात्मक असर पड़ने की गुंजाइश पैदा हो रही थी। तर्क आधारित समाज बनने के खतरे से टेलीविजन घबरा गया औऱ सबों की दिशा सास-बहू सीरियलों की तरह आंसू और इमोशन की तरफ मोड दी गयी। यही काम कभी दूरदर्शन ने किया था। पहले हमलोग,बुनियाद जैसे कार्यक्रम दिखाए फिर वक्त की रफ्तार,जुनून,स्वाभिमान और अब फिर गुलजार का बनाया तहरीरःमुंशी प्रेमचंद। अब बताइए एक बार जब आपने ऑडिएंस की पसंद को डिस्ट्रक्ट कर दिया तो उसे उसी मिजाज में आने में समय तो लगेगा ही न। न्यूज चैनलों को अगर इस नजरिये से देखें तो आप समझ सकेंगे कि ऑडिएंस अगर देखती है तो चैनल क्या कर सकते हैं? क्या खबरों के नाम पर जितने भी प्रयोग किए गए वो इनसे पूछकर और सर्वे कराकर किए गए। अपराध,धर्म,पाखंड औऱ लाइव के नाम पर भौंडेपन के नाम पर जो अफीम की गोलियां बांटी गयी उसे लेकर कोई आधार है इन चैनलों के पास? इस हिसाब से अगर समझने की कोशिश करें तो टेस्ट को डीकन्सट्रक्ट करके नए किस्म के टेस्ट पैदा करने का काम इऩ चैनलों ने तो किया ही है न। हमें पता है कि कई अच्छी मेहनत से तैयार की गयी स्टोरी की टीआरपी नहीं आती। लेकिन आप इस तर्क से उन स्टोरी को भी तो शामिल करें जिसमें अच्छी स्टोरी औऱ खबरों को भी देखा,सराहा जाता है।
दूसरी बात कि ये मानते हुए कि कोई भी संस्थान टीआरपी को ओवरटेक करके चैनल नहीं चला सकते लेकिन अगर पसंद का नाप-जोख ये टीआरपी करते हैं तो नापसंद करने के आंकड़े पर भी तो सोचने चाहिए। किसी प्रोग्राम को अगर 55-60 हजार लोगों ने पसंद किया तो कितने लाख लोगों ने पसंद नहीं किया,इसका कहीं कोई आंकड़ा है क्या? इस सिरे से किसी चैनल कभी सोचने की कोशिश की। टीआरपी और प्रोग्राम के बीच ऑडिएंस पर्सेप्शन और नजरिया भी है,मुझे लगता है कि अगर चैनल इस एंग्लि से सोचना शुरु करे तो ऑडिएंस के देखने और न देखने की दुहाई देने वाले तर्क बहुत मजबूत साबित नहीं होंगे। आपके इसी तर्क को नकवीजी की जुबान से पिछले चार साल से मैं सुन रहा हूं। वो कहते हैं कि ऑडिएंस पैसिव है,वो प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती। हमें फोन करे,लेटर लिखे देखिए हम सुधरते हैं कि नहीं। अब असाइन्मेंट से मां-बहन की गालियां सुनने के लिए कोई कितनी बार फोन करेगा,आप समझ सकते हैं। इस पर कभी ने नहीं सोचा। इसलिए मुझे लगता है कि ये तर्क बहुत मजबूत नहीं है। अगर ये मजबूत होता तो ड्रामेबाजी के ही नाम पर रजत शर्मा को चैल की ब्रांड इमेज के लिए ऑडिएंस के बीच टोह लेने की जरुरत नहीं पड़ती और कहना नहीं पड़ता कि अब हम ये नहीं दिखाया करेंगे,वो दिखाया करेंगा। यकीन मानिए हम ये तर्क देते हुए/सुनते हुए जितना पसंद पर बात कर लेते हैं,उतना नापसंद किए जाने के आंकड़े जुटाने के जहमत नहीं उठाते।
आपने कमेंट किया,अच्छा लगा। आगे भी बातें होती रहेंगी।..
यह सही है कि टीवी पर आ रहे कार्यक्रमो को नापसन्द करने वाले दर्शको से उनकी राय नही पूछी जाती । इसका कोई मध्यम भे नही है । अखबारो और पत्रिकाओ मे आप लाख लिखते रहे आपकी आवाज़ नककारखने मे तूती की तरह साबित होगी । बाज़र और मनोरंजन जगत के अपने अंतरसम्बन्ध है जिनसे आम अदमी वाकिफ नही है । उसे इससे कुछ करना भी नही है सिर्फ शिकार होना उसकी नैयति है । । विरोध के लिये उसके पस कोई मंच भी नही है दर असल परिवार को इही लग अलग इकाइयों मे बाँत दिया गया है । हर सदस्य की रुचियाँ अलग अलग हो गई है । बाज़ार इसीका फायदा उठाता है । हमारे जैसे लोग व्यक्तिगत स्तर पर इसका विरोध कर सकते है जैसे मैने और मेरे परिवार ने विगत दो वर्षॉ से टीवी देखना बन्द कर दिया है और हम जीवन मे इसकी कोई ज़रूरत ही महसूस नही कर रहे है। मित्रो से हम फिर भी इस विषय पर चर्चा कर सकते है । -शरद कोकास , दुर्ग छ.ग.
विनीत जी बेहद शुक्रिया आपका मेरे संदेहों को दूर करने के लिए… मैंने जो भी तर्क दिए उनका मकसद आपकी बातों को काटने का बिल्कुल नहीं था… बल्कि मैंने सिर्फ सिक्के दूसरे पहलू को दिखाया… ये बात यकीनन सौ फीसदी सही है कि चैनलों के पास सिर्फ ये कहने के कि क्या करें साहब दर्शक ही कुछ बोलते नहीं… और कुछ भी नहीं है… मुझे लगता कि मेरी तरह आप भी कलर्स नाम के नए चैनल के कुछ सीरियल्स को ज़रूर देखते होंगे.. ज़ाहिर तौर इनमें कुछ नयापन है… क्रिएटीविटी है… उबाऊ नहीं हैं… लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि दर्शकों को इसलिए पसंद आ रहे हैं क्योंकि वो बेस्ट हैं… नहीं… दर्शक इन सीरियल्स को इसलिए पसंद कर रहे हैं कि एक दशक से सास-बहू सागा ने उन्हें बोर कर दिया था… सास-बहू से हटकर उन्हें कुछ मिला तभी उनकी नज़रे वहां पर अटकीं… रही बात न्यूज चैनल्स की तो… मुझे लगता है… दर्शकों के हाथों में रिमोट है… जो सेकंडों में फैसला करता है कि उन्हें क्या देखना चाहिए और क्या नहीं… अपवाद न हों तो आपने पिछली बार डीडी न्यूज कब देखा था… शायद आपको याद भी नहीं होगा… एक वर्ग है जो डीडी न्यूज देखता है… लेकिन उनके घरों में केबल टीवी नहीं है… और जिनके घरों में केबल टीवी है वो डीडी की बजाए प्राइवेट न्यूज चैनल्स ही देखते हैं… मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि दर्शकों का टेस्ट क्या है… इसे भांप पाना अभी भी बेहद मुश्किल है.. नहीं तो सीरीयस न्यूज दिखाने वाला… सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरों पर कार्यक्रम बनाने वाला डीडी.. देश का नंबर वन चैनल होता… आपकी इस बात से मैं बिल्कुल सहमत हूं कि टैम के आंकड़ों की बदौलत देश की जनता क्या देखना चाहती है इसका निर्धारण बिल्कुल नहीं किया जा सकता… क्योंकि सिर्फ कुछेक हज़ार टीआरपी मीटर लगाकर आप सवा अरब जनता की राय कैसे जान सकते हैं… और जहां तक पसंद नापसंद की बात है… तो रिमोट इसमें हमारी बहुत ज्यादा मदद करता है.. रिमोट हमें अपनी मर्जी के चैनल को देखने का रास्ता दिखाता है… कुछ हद तक चैनलों की मजबूरी भी समझनी चाहिए… आप ये ना समझें की मैं चैनलों की तरफदारी कर रहा हूं या उनकी वाकलत कर रहा हूं… चैनलों के रेवेन्यू में एक बड़ा हिस्सा उन विज्ञापनों का होता है.. जो उन्हें टीआरपी के दम पर हासिल होता है… जिस चैनल की जितनी टीआरपी.. जितना मार्केट शेयर.. उस चैनल को उसी हिसाब से विज्ञापन भी मिलते हैं… चैनल हर वक्त अपने इसी मार्केट शेयर को बचाने में लगा रहता है… वो हर वक्त यही सोचता है कि अब कौन सा ड्रामा दिखाउं की थोड़ी बहुत टीआरपी मिल जाए…पिछले छह महीनों में एनडीटीवी इंडिया ने अपने में जितने बदलाव किए हैं… वो आपको भी ज़रूर दिखे होंगे… आखिर एनडीटीवी को बदलने की क्या जरूरत पड़ गयी.. क्यों उसके कुछ कार्यक्रम आजतक… इंडिया टीवी और स्टार न्यूज जैसे नज़र आते हैं… वो इसलिए क्योंकि उसे भी अब अपनी टीआरपी की चिंता हो गयी है… इंडिया टीवी इसी ड्रामेबाज़ी को दिखा दिखा कर टॉप थ्री चैनल्स में से एक हो गया है… लोग इंडिया टीवी को गालियां देते हैं… लेकिन देखते भी उसे ही हैं… क्यों… क्यों उसे देखना छोड़ नहीं देते… वो नहीं कर सकते… क्योंकि उन्हें खबरों को इस तरह से देखने की आदत हो गयी है… न्यूज एक्स ने चैनल शुरू होने से पहल दावा किया था कि वो बाकी भारतीय चैनलों की तरह नहीं होगा… लेकिन उसका क्या हुआ.. ये ना तो आपसे छुपा है और ना ही हमसे… जैसे-जैसे दर्शकों का टेस्ट बदलता जाएगा… न्यूज चैनल वैसे वैसे ही अपने आपको ढालते जाएंगे…
आलोकजी,मैं आपकी बातों से काफी हद तक सही हूं। आप बिल्कुल सही संदर्भ में बात कर रहे हैं। एनडीटीवी वाली बात आपकी बिल्कुल सही है। मैंने आज से सात महीने एक पोस्ट लिखी हवा हो जाएगा एनडीटीवी। जिसमें उसके रेवन्य से लेकर बाकी चीजों की विस्तार से चर्चा की थी और कहा था कि अगर यही हाल रहा तो एनडीटीवी इतिहास बन जाएगा। साथ में यह भी लिखा था कि अगर वो अपने को बचाने के लिए बदलता है तो एनडीटीवी नहीं रह जाएगा। यानी दोनों ही स्थिति में वो एनडीटीवी नहीं रह जाएगा। आज देखिए आप जिस संदर्भ में इसकी चर्चा कर रहे हैं,वो साफ झलक रहा है। एनडीटीवी ने अपनी क्रेडिविलिटी और चैनलों के झुंड में काफी हद तक अलग होने की पहचान खो दी है। इसलिए मुझे लगता है जो बात मैं कह रहा हूं या फिर जो बात आप कह रहे हैं,उस पर लंबे विमर्श की गुंजाइश है। मुझे लगता है हममें से दोनों कोई निश्चित फार्मूला में रहकर बात नहीं कर रहे हैं जो कि अच्छी बात है। हमें चाहिए कि इस बहस को आग तक ले जाएं और लोग भी शामिल हों औऱ इस मसले पर बात करें कि क्या टीआरपी के भीतर बेहतर टेलीविजन की गुंजाइश है औऱ क्या चैनल को टेलीविजन स्त्रीन से आगे जाकर स्पेस बनाने की जरुरत नहीं है। एक बार फिर आपका शुक्रिया कि आप मेरी बातों को सही संदर्भ में समझ रहे हैं।
सॉरी,सही हूं को सहमत हूं पढ़े।
क्या ऐसा नहीं हो सकता या यह आन्दोलन नहीं चलाया जा सकता कि लोग टीवी ही ना देखें. गान्धी जी ने जब विदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी, तब जनता ने साथ दिया था. और हम जो टीवी को गरिया रहे हैं, हमारी यह आवज़ अरण्य रोदन की तरह है. क्या इसके बदले यह नहीं किया जा सकता कि ऐसे आम आदमी, औरत, बच्चे की बात आप लिखें, उनके काम को हाइलाइट करें जो अपने जीवन के लिए य अपने आस पास के लिए कुछ बेहतर कर रहे हों. उन्हें आगे बढाइये ना. ये बढे हुए शाहरुख, अमिताभ और आमिर और सलमान और बिपाशा और करीना और कटरीना को ही आगे बढा कर हम भी तो वही सब कर रहे हैं जो ये चैनलवाले कर रहे हैं.
dear vineetji , it is not true that the people are demanding such ‘WAHIYAT’ programes.the media itself has to decide its character.it is true that the king khan or the shenshah can fill the glasses and irome sharmila [thanks she is not tagore] can not. the choice is obvious. what is remained hereinafter to comment.
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