राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र शशि भूषण की डेंगू से मौत
♦ अविनाश


शशि। हम सब उन्हें इसी नाम से पुकारते थे। उस दिन एनएसडी कैंपस में उन्हें क्रिकेट खेलते देखा था। लड़के-लड़कियां चिल्ला रहे थे, अंकल। जबकि इसी बार उनका सलेक्शन हुआ था। फर्स्ट ईयर के किसी छात्र के लिए ये संबोधन भले ही एक मज़ाक़ हो, लेकिन इसके पीछे की हकीकत ये है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिले से पहले शशिभूषण रंगमंच की दुनिया के लिए पुराने हो चले थे। पंद्रह सालों के अपने रंग इतिहास में ढोलक की बेशुमार थापों और मंच पर अपनी खिलखिलाती अदाओं से उन्होंने रंग दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ रखी थी। आज उनके बारे में इतनी औपचारिकता से लिखने का प्रसंग सिर्फ इतना है कि एक निहायत ही मामूली बीमारी और एक निहायत ही गंभीर लापरवाही ने शशिभूषण को हमसे छीन लिया है।
शशिभूषण की पूरी ट्रेनिंग अभियानों और आंदोलनों से जुड़ी रंग-प्रक्रियाओं के बीच हुई थी। जनसंस्कृति मंच की पटना ईकाई हिरावल के साथ उनका रंग सफर शुरू हुआ अनिल अंशुमन, जो सीपीआईएमएल के सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं, ने ही उन्हें नाटकों की पगडंडी दिखायी थी। लिहाजा वे आंदोलनी गीतों के साथ बहुत सहज थे। ऊंचे आलाप के साथ सुनाते थे, सृष्टिबीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है, कल का गीत लिये होंठों पर आज लड़ाई जारी है। या फिर समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आयी और समय का पहिया चले रे साथी, समय का पहिया चले। थिएटर में धन-धान्य से भरे करियर के पीछे भागते हुए रंगकर्मियों पर उन्हें हमने कबीरी ठाठ से हंसते हुए देखा था, जबकि वे रंगीन कपड़े पहनने के शौकीन थे। झक लाल या बेहद काली कमीज़ पर गूगल्स लगा कर वे अपने अंदर की सादगी से बदला लेने की कोशिश करते थे।
ये किसी के लिए भी बताना मुश्किल हो सकता है कि थिएटर में उनकी ख़ासियत दरअसल क्या थी। वे अभिनेता थे, निर्देशक थे, साजिंदा थे – क्या थे? विशेषज्ञता को लेकर उदासीन हिंदी समाज के थिएटर में किसी के लिए इस तरह से सोचना कठिन है, फिर शशिभूषण कोई अलग रंग-शख्सियत तो थे नहीं! आपने उन्हें पिछले पंद्रह सालों में कहां-कहां नहीं देखा होगा? रंगमंच पर कोरस लीड करने से लेकर लंबे डग भर-भर कर संवाद बोलने तक वे एक अलहदा तरह के रंगकर्मी थे। अभी हाल में उन्होंने अपने निर्देशन में मिर्जा हादी रुस्वा के नॉविल उमराव जान अदा का पटना में मंचन किया था। पिछले साल एनएसडी से पासआउट हुए रंगकर्मी रंगकर्मी रणधीर ने जब इसी साल जून में पटना में शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा अक्करमाशी का पटना में मंचन किया, तो उसकी प्रकाश व्यवस्था शशिभूषण ने संभाली की थी। आज से दस साल पहले फणीश्वरनाथ रेणु की मशहूर कहानी रसप्रिया के कथा मंचन में उन्होंने पंचकौड़ी मिरदंगिया का बेमिसाल अभिनय किया था।
वे एनएसडी के ही एक पूर्व छात्र विजय कुमार के संभवत: ज़्यादा निकट थे। विजय कुमार की एकल प्रस्तुति हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं के शशिभूषण स्थायी ढोलकिया थे। शशिभूषण के हाथों से पड़ी ढोलक की मद्धिम से लेकर ऊंची थाप के साथ जुगलबंदी करते विजय कुमार के हर संवाद पर दर्शक विभोर होते रहे हैं। देश और विदेश में इसकी दो सौ से अधिक प्रस्तुतियां हो चुकी हैं। विजय कुमार जब 99 में रेणु के रंग लेकर पूरे देश का भ्रमण कर रहे थे, तो शशिभूषण उस भ्रमण दल के अभिन्न रंगकर्मी रहे।
ऐसे शशिभूषण को वक्त ने हमसे छीन लिया है। इस छीना-झपटी के कुछ संदेहास्पद पहलुओं पर भी बात करनी चाहिए। दीवाली के एक दिन बाद वे हमारे घर आये थे। पूरे दिन रहे। पढ़ते रहे। सोते रहे। वे गये और दो हफ्ते बाद जब फोन पर बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि नोएडा के अस्पताल में भर्ती हैं। जॉन्डिस हो गया था। अब ठीक हैं। कल छूट जाएंगे। दो दिनों के बाद संदेश मिला वे नहीं रहे। उनका ग़लत इलाज चल रहा था। वे डेंगू की चपेट में थे। प्लेटलेट्स अचानक रिड्यूस हो गया और वे संभल नहीं पाये। सवाल ये है कि उन्हें संभाल कौन रहा था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एक मशहूर रंग प्रतिष्ठान है। उसका एक छात्र बीमार पड़ता है और नोएडा के एक मामूली अस्पताल में उसे इलाज के लिए भेजा जाता है। वे हफ्ते भर तक भर्ती रहते हैं और इस दौरान छात्र साथियों के अलावा विद्यालय प्रबंधन इस मसले को गंभीरता से लेता तक नहीं और हमसे हमारा एक दोस्त छीन लेता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए शशिभूषण भले एक छात्र रहे हों, हमारे लिए वो दोस्त थे। हम आपस में दिल साझा करते थे। ऐसे ही बारह साल पहले पटना के विद्याभूषण द्विवेदी की मृत्यु राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रंगअभ्यास के दौरान हो गयी थी। तब उनकी मेडिकल रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से स्कूल ने मना कर दिया था। इस बार भी शशिभूषण की मौत को लेकर विद्यालय गंभीर नहीं है। स्कूल शशिभूषण की बीमारी से हुई स्वाभाविक मौत मान रहा है, जबकि इलाज की पूरी संदेहास्पद प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। शव का पोस्टमार्टम होना चाहिए ताकि पता चल सके कि शशिभूषण की मौत किस बीमारी से हुई और उनको दवाओं के डोज़ किस बीमारी के दिये गये।
आज पटना में शशिभूषण का दाह संस्कार किया जाएगा। सुबह की फ्लाइट से उनके शव की रवानगी है। हम मांग करते हैं कि दाह संस्कार से पहले शशिभूषण के शव का पोस्टमार्टम कराया जाए और एक जांच कमेटी बैठायी जाए। अगर स्कूल ऐसा नहीं करता है, तो शशिभूषण के दोस्तों और उनके चाहने वालों को कड़ा रुख़ अख्तियार करना होगा। हम रंगमित्रों से अपील करते हैं कि इस मसले पर आज शाम छह बजे श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस में बैठें और कुछ ठोस क़दम उठाने की बाबत बात करें।









मृतक को मैं नहीं जानता,पर मुझे याद आगया काशी हिन्दू विश्व विद्यालय का एक स्वर्गीय मित्र.स्नातक में साथ था.एक रात लंका से लौटते समय साईकिल से गिर गया,अस्पताल में कहा गया की सर में मामूली चोट है ,भर्ती करदो सुबह तक हॉस्टल चला जायेगा.वो सुबह कभी नहीं आई.मैं २ बजे भोर में उसे सोता छोड़ ,मित्रों के कहने में आकर होस्टल आगया,तबतक मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट इयर के छात्र चोट का अध्ययन कर रहे थे.हम आर्ट्स वाले क्या जाने चिकित्सा विज्ञानं ऐसा कह कर चुप करा दिया जाता था.
अगली शाम तक मुझे जिम्मेदारी दी गयी,पोस्टमार्टम हाउस के सामने खड़ी माँ और बिहार में छोटे से गाँव में टुटही खेती
करने वाले पिता को सँभालने की……….
दबाव के चलते जाँच कमिटी बनी क्या हुआ नहीं मालूम….आम आदमी की मौत के मायने नहीं होते.शायद आप लोग दिल्ली में हैं
कुछ बन सके तो अपने दिवंगत मित्र की आत्मा की शांति के लिए जीवन के अधिकार पर कुछ करें.
पुरानी घटना नहीं है जब प्रधानमंत्री सबको बेहतर इलाज पर मेडिकल कालेज में प्रवचन देरहे थे और गेट पर अपने बीमार पति को लेकर इधर से उधर भागती ३० साल की युवती विधवा हो गयी,क्योंकि उस बीमार आम आदमी से खास आदमी की सुरक्षा को खतरा था.
बहुत अफसोसनाक…
ओह..जानकर बहुत अफसोस हुआ। एक कलाकार का जाना,एक संवेदनशील का जाना।
Campus mein honewali is tarah ki mauton ka akhir jimmedar kaun hai. phichle dinon JNU mein bhi isi tarah ek horhar chatra ki mrityu ho gayi thi. shashibhushan ka jana sachmuch bahut dukhad hai. koi thok kadam uthana chahiye. NSD ke sakh kaa mamla to hai hi chatron ke bhavishya ka bhi hai.
सृष्टिबीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है, कल का गीत लिये होंठों पर आज लड़ाई जारी है-
जैसा गीत जो कलाकार अपने जीवन में गाता रहा,उसी के कला-बीज को जाने किस हद तक की लापरवाही ने नष्ट कर दिया…यह केवल अफसोस और चिंता वाली बात नहीं है.एन एस डी को अपनी व्यवस्था के बारे में पुनर्विचार करने की जरुरत है.
ek rangkarmi ki maout……behad afasos nak khabar kisi rajneta ki mout se kahi zyada…par kya delhi ke hi saare log jut payenge iss abhiyaan main ?main door desh ka aadmi rangkarm ka safar karte huye Rewa mp se Mumbai aur ab Delhi main par rang karm ki duniya se rishta ab khtam sa ho chala hai….par main aunga aapka saath dene…..
kuch aisa jo kah nahi sakta aur chaah kar bhi aa nahi sakta par meri savednaao ke phool yahin se aprit hain kripya unhe kubool karen….
दुखी खबर…. वाकई बहुत दुःख हुआ ….शशि भूषण जी नहीं रहे यकीन नहीं हो रहा है, में कोई रंगकर्मी नहीं हौं लेकिन कॉलेज टाइम से अब तक हमेसा थिएटर का हिस्सा बनने की कोशिश की है.और रहा हौं,… में जब दिल्ली विश्वदिल्याया में पढ़ता था उस समय हम दोस्तों के साथ एन एस डी या फिर श्री राम सेण्टर जाया करते थे, और वही गोल चौक एन एस डी और वही ची की दूकान के पास शशि भूषण जी को देखा करते थे, और एक तरह से वो एन एस डी के आस पास वो जान थे,उनको न केवल इंसान बल्कि आस पास के पेड़ पौधे या फिर चिडिया भी जरुर जानते होंगे, क्यूंकि वे कही न कही दिख जाते थे, प्ले देखने जाते थे तो वो कही न कही दिख जाते थे, ज्यादा बात नहीं हो पाठी थी लेकिन एक ऐसे इंसान और रंगकर्मी का जाना वाकई दुःख की बात है, मेरे लिए तो खास कर क्योँ की मैंने उन्हें बहुत देखा है, मुझे जानकर खुसी हुई थी की उनकी एंट्री स्कूल में हुई है…….खबर आई थी न्यूज़ रूम में की कोई एन एस डी का स्टुडेंट की डेथ हुई है, वो भी मुझे से हमारी रिपोर्टर पूछ रही थी की विसुअल्स या खबर आई क्या? मुझे क्या पता था की ये शशि भूषण ही हैं, मैंने उन्हें उनकी फोटोग्राफ से पहचाना वेब साईट पर….पर जो भी हो इनते महत्वपूर्ण स्कूल का रंगकर्मी की इस तरह से मौत वाकई सोचनीय और दुखदाई है….जरुरु इस पर जांच होनी चैये, जाने वाला तो चला गया लेकिन ऐसे और इस हालत में जो कुछ हुआ वह कम दुःख दाई नहीं है…में उनके परिवार के लिए दुआ करता होऊं इस दुःख की घडी में इश्वर उनको शक्ति प्रदान करे, और शशि भूषण हमेसा हम लोगू के दिलू में रहेंगे….
मनोजीत सिंह
[पत्रकार] ,नयी दिल्ली
jis vidyalaya mein rangkarmi ka jivan surakshit nahin hai, wahan rang-karm ka jivan kitana surakshit hai…………. pata nahin ???
par kuch sawaal hain jinke jawaab chahiyen hi chahiyen.
us hospital se contract kis aadhar pe kiya gaya?
40 k.m. door ke hospital se contract kyom?
faculty aur student ke liye alag hospital kyon?
us hospital ko vidyalaya ki taraf se pramanit kisne kiya?
10 dinon tak hospitalise hone par vidyalaya ki taraf se koi dekhnewala kyon nahin gaya?
aur in sab ke baad is poore ghatna ki jaanch se vidyalaya kyon bhaag rahi hai?
aur bhi kai sawaal hai jinke jawaab chahiye……………….
बहुद दुख हुआ। ईश्वर शशि जी की आत्मा को शांति प्रदान करें।
shashi nahin hain hamare beech aaaj, ye koi samanya si ghatna nahin hai ki hum shok sabha karen aur shraddhanjali dekar khud ki duty puri samjhen. Ye ek aisi ghatana hai, jo ki hamari iss vyawastha ke hone par prashnchinh lagati hai. Bhai ek taraf hum puri duniya ke logon ke liye prestigious KHEL par kharch aur aayojan mein lage hain, wahin usi Delhi ke sarvpratisthit NATIONAL SCHOOL OF DRAMA ke ek chaatra ki maut mahaj galat treatment ke karan hoti hai. Kya aapko aisa nahin lagta ki aur kitne log har din rajdhani aur isse dur isi kaaran se nahin marte honge? haan ye to haal hoga hi kyun ki jis sarkari chatri mein hum chalte hain usmein bhrashtachar ka shistachar bhi hai, shayad yah bhi ek kaaran hai ki koi awaaz uthti hee nahin aur kai baar tathakathit bade akhbaar bhi Prabhash Joshi ki mrityu ki khabar ko bhi ahmiyat nahin dete. Shashi ki maut ki zimmedari kya NSD ko nahin leni chahiye?
Shashi k maut bahut nindnie hai.N.S.D ko sharm karni chahey
RAWAN natya sanstha k dawara 5nov ko patna k Dagkbagala chawra par .N.S.D k director anuradha kapoor ka putla dahan kiya gaya.Aur N.S.D birodhi nare lagae.Iska ka netrito sikandar-e-azam aur manish mahiwal ne kixa.
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