मशहूर पत्रकार, गांधीवादी चिंतक प्रभाष जोशी का निधन
♦ विनीत कुमार

कहां कहां क्या क्या लिखा गया
♦ पत्रकारिता के युग पुरुष प्रभाष जोशी नहीं रहे
♦ हिंदी पत्रकारिता के समकालीन श्रेष्ठ प्रभाष जोशी (72 वर्ष) नहीं रहे
♦ प्रभाष जी आपने क्रीज़ क्यों छोड़ दी?
♦ प्रभाष जोशी का जाना, माने पत्रकारिता के एक युग का खत्म होना
♦ बेबाक पत्रकार प्रभाष जोशी खामोश हो गए
♦ हिंदी के अंतिम बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी
♦ जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) की प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि
मोहल्ला लाइव पर प्रभाष जोशी
देश के जाने-माने और हिंदी के बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे। गुरुवार रात, भारत-आस्ट्रेलिया मैच देखने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। अफसोसनाक है कि जिस मैच को लेकर देर रात तक हॉस्टल में हो-हुड़दंग होता रहा, उसी मैच के दौरान देश का एक बुद्धिजीवी पत्रकार हमेशा के लिए खामोश हो गया। पटना से जसवंत सिंह की लिखी विवादित किताब के लोकार्पण कार्यक्रम से करीब 11 बजे रात लौटने के बाद जोशी थकान महसूस कर रहे थे। घर के लोगों ने भी सलाह दी कि डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए लेकिन मैच देख कर उस पर कुछ लिखने का लोभ वो रोक नहीं पाये। लेकिन दोनों में से कोई भी काम पूरा किये बग़ैर हमसे विदा हो लिये।
जोशी ने जिस कागद-कारे स्तंभ से अपनी अलग पहचान बनायी, उसका पहला लेख क्रिकेट पर ही था। अंत-अंत तक क्रिकेट उनके जीवन के साथ जुड़ा रहा और एक हद तक क्रिकेट ही उनके मौत का कारण भी बना।
कहना न होगा कि प्रभाष जोशी उन गिने-चुने पत्रकारों में से रहे हैं जिनकी लोकप्रियता सिर्फ पठन-लेखन के स्तर पर नहीं रही है, उन्हें चाहने और माननेवालों की एक लंबी फेहरिस्त है। मीडिया इंडस्ट्री के भीतर सैकड़ों मीडियाकर्मी और पत्रकार ये कहते हुए आसानी से मिल जाएंगे कि आज वो जो कुछ भी हैं, प्रभाषजी की बदौलत हैं। 12 सालों तक जनसत्ता अखबार का संपादन करते हुए उन्होंने एक खास तरह की पत्रकारिता का विस्तार किया। शिमला में उनसे जुड़े प्रसंगों को याद करते हुए अभय कुमार दुबे, संपादक सीएसडीएस ने हमें तब बताया था कि वो अकेले ऐसे संपादक थे जो किसी भी ख़बर के छप जाने के बाद माफी मांगने में यकीन नहीं रखते, छप गया सो छप गया। इसके साथ ही वो एक ऐसे संपादक थे, जिन्होंने मालिक के आगे संपादक की कुर्सी को कभी भी छोटा नहीं होने दिया। बतौर बरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, प्रभाष जोशी एक ऐसे पत्रकार रहे हैं जिनका भरोसा था कि पत्रकारिता के जरिये राजनीतिक स्थिति को भी बदला जा सकता है। वो पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे। इसलिए उन्होंने जितना लिखा उतना ही सामाजिक मसलों पर जाकर लोगों के सामने अपनी बात भी रखी। लोग उन्हें सुनने के लिए बुलाते थे। (एनडीटीवी इंडिया 9.20 बजे 6 नवंबर 09)।
आज से करीब एक साल पहले जब राजकमल की ओर से एक ही साथ पांच किताबों का लोकार्पण किया जा रहा था, उस समय दिल्ली के त्रिवेणी सभाकार को मैंने इस तरह के कार्रयम में पहली बार खचाखाच भरा हुआ देखा था। इतना खचाखच कि देश के नामचीन पत्रकार से लेकर साहित्यकार सीढ़ियों पर बैठे नज़र आये। स्वयं प्रभाष जोशी के शब्दों में आज चार पीढ़ी के लोग मौजूद हैं। कुछेक पत्रकारों को छोड़ दें, तो सभागार में जनसत्ता-परंपरा के अधिकांश पत्रकार पहली बार वहां मौजूद नज़र आये।
सत्ता में गहरी पैठ रखनेवाले पत्रकार प्रभाष जोशी जितने लोकप्रिय रहे हैं, अपने जीवनकाल में उतने ही विवादों में बने रहनेवाले पत्रकार भी। बाबरी मस्जिद के दौरान जनसत्ता में छपनेवाली खबरों, उसकी प्रस्तुति को लेकर वो विवादों में आये, सती-प्रथा को लेकर छपे संपादकीय को लेकर बवाल कटा और हाल ही में एक साइट को दिये गये इंटरव्यू में आलोचना के शिकार हुए। प्रभाष जोशी की ऑइडियोलॉजी को लेकर भी काफी विवाद रहा है। अकादमिक क्षेत्र में राजकमल से प्रकाशित हिंदू होने का धर्म उनकी लोकप्रिय किताबों में से है। लेकिन इधर पिछले दो सालों से हिंदी स्वराज के पुर्नपाठ और विमर्श को लेकर काफी सक्रिय नज़र आये। वो हिंद स्वराज और गांधी के मार्ग के महत्वों की चर्चा करते हुए उनकी विचारधारा का विस्तार करने की बात करते रहे। बीते लोकसभा चुनावों में पैसे देकर पेड खबरें छापने और राजनीति का पिछलग्गू बन जानेवाले अखबारों को लेकर प्रभाष जोशी ने विरोध में एक मोर्चा खोल रखा था और उसे वो राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान का रूप देने जा रहे थे, जिसके चिन्ह हमें हाल के लिखे गये उनके लेखों में साफ तौर पर दिखाई देने लगे थे। उनके इस अभियान में कुलदीप नैय्यर और हरिवंश जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी शामिल रहे हैं।
इन सबके वाबजूद प्रभाष जोशी को एक ऐसे कर्मठ पत्रकार के तौर पर जाना जाएगा जो कि अपनी जिदों को व्यावहारिक रूप देता है, नयी पीढ़ी के लोगों को ग़लत या असहमत होने पर खुल्लम-खुल्ला चैलेंज करता है, अपनी बात ठसक के साथ रखता है और सक्रियता को पूजा और अराधना को पर्याय मानता है। आज प्रभाष जोशी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि अगर हम उनके लेखन का पुनर्विश्लेषण करते हैं, पठन-पाठन के दौरान असहमति का स्वर जाहिर करते हैं, सहमति को व्यवहार के तौर पर अपनाते हैं और पैर पसारती कार्पोरेट मीडिया का प्रतिरोध करते हुए हिंदी पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के तौर पर आगे ले जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनका खास अंदाज में क्रिकेट पर लिखना, इनने, उनने और अपन जैसे शब्दों का प्रयोग अब तक एक खास किस्म की इंडीविजुअलिटी को बनाये रखने के तौर पर लगा, कई बार इससे असहमत भी रहा लेकिन आगे से जनसत्ता में इन शब्दों के नहीं होने की कमी ज़रूर खलेगी। गरम खून के पत्रकारों के बीच कोई तो था जिसे बार-बार पटकनी देने की मंशा से लड़ते-भिड़ते और अपना कद बड़ा होने की खुशफहमी से फैल जाते। आज हमसे लड़ने-भिड़ने वाला नहीं रहा, फच्चर मत डालो को लिखकर चैलेंज करनेवाला नहीं रहा। अब बार-बार याद आएगा कागद-कारे।









क्रिकेट का सदमा ही उनकी जान ले बैठा। भारतीय टीम अप्रत्याशित रूप से हार गई थी।
हिन्दी पत्रकारिता में का एक काल आक्रामक, खोजी शैली की पत्रकारिता और जनसत्ता युग के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा, जिसे उन्होंने नेतृत्व दिया।
बहुत बहुत नमन् उनकी यादों को।
hindi patrakarita ki ek yug ka aant hai Prabhash ji ka jana. aadhunik patrakarita ki Bhasha par agar baat ki jayegi to Prabhash jarur yaad aayenge.
Tarumitra
प्रभाषजी हिन्दी पत्रकारिता के शिखर थे। उनका हमारे बीच से जाना दुखद है।
बहुत ईमानदार,सुलझी हुई और सहारा देनेवाली आवाज़ शांत हो गई है.इस आवाज़ का इस तरह अचानक शांत हो जाना उस निडर लौ का बुझना है जो बेहद अँधेरे और उलझे वक्त में साथ देने के लिए जलती है.इस आवाज़ के पूरी तरह नियति के द्वारा चुप कर देने को सह सकना इसकी जगह को भर पाना बहुत मुश्किल है.कल रात में राजकिशोर जी को उनके ब्लाग में पढ़ रहा था तो सोच रहा था प्रभाष जोषी और राजकिशोर जनसत्ता की ये दो आवाज़ें हमारे वक्त की उपलब्धि हैं.मैं प्रभाष जी से कभी मिला नहीं पर पढने से कभी चूका नहीं.जब भी उनका कोई इंटरव्यू टी.वी.,रेडियो या बी.बी.सी.पर सुना भूल नहीं पाया.जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद लेने से इंकार किया था तो बी.बी.सी.के संवाददाता रेहान फजल ने पूछा था इसमें कितनी राजनीति है तो उनका जवाब था राममनोहर लोहिया ने कहा था धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म सोनिया गांधी के इस निर्णय में भी राजनीति है पर राजनीति का रास्ता अगर त्याग से होकर जाता है तो वही सच्चा रास्ता है और वह दूर तक जाता है.प्रभाष जोषी यहाँ जिस तरह लेटे हुए हैं उन्हें देखकर आँसू रोकना असंभव है.यही आँसू हैं उनके लिए मेरे पास.मेरी श्रद्धांजली.
प्रभाष जी के जाने से हिन्दी ने अपना सबसे बड़ा जुनूनी हिमायती खो दिया है। उनकी मौत के बाद पत्रकारिता में जो शून्य पैदा हुआ है उसकी सहज ही भरपाई नहीं हो पाएगी। प्रभाष जी जैसा मेधावी और ईमानदार पत्रकार दसियों सालों में तैयार होता है। प्रभाषजी की मेधा,कलम और ईमानदारी का सभी लोहा मानते थे। कारपोरेट पत्रकारिता में पचास साल से भी ज्यादा समय तक काम करने के बाद निष्कलंक पत्रकार का जीवन बिताना , अपनी कलम और ईमानदारी से सबको प्रभावित करना यह सचमुच में विरल बात है। प्रभाषजी के दो प्रधान विषय थे जहां पर उनकी कलम सभी तटबंध तोड़ती हुई चली जाती थी। एक था क्रिकेट और दूसरा था राजनीतिक अनीति।
वे किसी भी क्रिकेट मैच को देखना नही भूलते थे। वे मैच देखने विदेश तक गए और वहां से क्रिकेट पर लिखकर भेजा। राजनीति में अनीति का खेल खेलने वाले किसी भी दल को उन्होंने नहीं बख्शा। उन्हें राजनीति में जो कुछ भी अनीतिपरक लगा उसके खिलाफ जमकर बेबाक लिखा। हिन्दी में राजनीति के अनीतिगत पक्ष पर बेबाक लिखने वाले अकेले सबसे तेज पत्रकार थे। उनकी कलम की मार से देश के सभी प्रधानमंत्री कभी न कभी घायल हुए हैं। सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ उन्होंने अनीति के मामलों पर निर्मम ढ़ंग से लिखा है।
हिन्दी पत्रकारिता की नयी भाषा तैयार करने में उनके संपादकीय व्यक्तित्व की केन्द्रीय भूमिका रही है। उनकी छत्रछाया में प्रतिभाशाली पत्रकारों की एक बड़ी पीढी तैयार हुई,जो आज फलफूल रही है। पत्रकारिता में ईमानदारी की वे जीती जागती मिसाल थे।
प्रभाष जोशी का जाना साधारण घटना नहीं है यह असाधारण घटना है। उनके जाने से हिन्दी प्रेस में भाषा के देशज प्रयोगों का अवसान हो गया है। प्रेस में देशज भाषायी प्रयोगों के वे जनक थे। हिन्दी में पत्रकारों की कमी नहीं है, संपादकों की भी कमी नहीं है। लेकिन हिन्दी पत्रकारिता के ईमानदार प्रतीक पुरूष के रूप में प्रभाष जी ने ही अपनी इमेज स्थापित की थी। उनके जाने से हिन्दी प्रेस के प्रतीकपुरूष का स्थान खाली हुआ हो गया है जिसे भरना अब किसी भी संपादक या पत्रकार के बूते के बाहर है। हम सब उनकी असामयिक मृत्यु से मर्माहत हैं।
SUNKAR SADMA SA LAGA HAIN MUJHE. BHAWAN UNKI ATMA KO SHANTI DEN.
तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह स्तब्ध कर देने वाली खबर आज तड़के एक मित्र से फोन पर मिली। नींद अभी टूटी नहीं थी लेकिन इस खबर से चेतना ऐसी जागी मानो हजारों हजार कांच की बारीक किरचें एक साथ दिमाग में पैबस्त हो गई हों।
प्रभाष जी बड़े पत्रकार थे उन्होंने जनसत्ता जैसा अखबार हमें दिया जिससे पढ़ने के संस्कार मिले। मैं उनकी पेशेवर खूबियों पर नहीं जाना चाहता। मुझे बस उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था।
उनकी कलम की ईमानदारी। इस कठिन समय में सच को लेकर जिद और वो सारी बातें जो मुझे किसी और में नहीं दिखती थीं, वे मुझे उनकी ओर खींचती थीं।कुछ एक अंतरालों को छोड़ दिया जाए कमोबेश 20 वर्षों तक कागद कारे पढ़ता रहा उसी ललक के साथ की आज प्रभाष जी ने क्या लिखा होगा।
क्रिकेट और टेनिस पर लिखे उनके आलेख। खासकर सचिन के खेल पर उसी की तरह बेमिसाल कलम का ही जादू था कि सचिन की उम्दा पारियों के बाद हम ये सोचकर सोते थे कि कल प्रभाष जी क्या लिखेंगे! खबरों के मुताबिक कल रात ११.३० के आस पास उनका निधन हुआ जबकि भारत -ऑस्ट्रेलिया मैच करीब ११ बजे ख़त्म हुआ था।लगता है कहीं सचिन की कल रात की बेमिसाल पारी की खुशी और टीम की नाजुक हार का घालमेल तो उनके लिए जानलेवा नहीं बन गया। अगर ऐसा हुआ है तो तमाम रंज के बावजूद मुझे इस बात की खुशी ताउम्र रहेगी कि एक अद्भुत खेलप्रेमी अपने प्रिय खिलाड़ी को सर्वश्रेष्ठ खेलते देखकर गुजरा और एक शानदार खिलाडी ने अपने ऐसे चहेते को अनोखी भेंट दी मरने से पहले।
प्रभाष जी ने सती अथवा ब्राह्मणों को लेकर हाल के समय में जो भी बयान दिए। उन्हें संदर्भ से काट कर उनका पाठ करने वालों ने ब्लाॅग जगत में जिस भाषा में उनका विरोध किया वो बेहद शर्मनाक था। बात केवल विरोध की नहीं विरोध के स्तर की थी। प्रभाष जी का विरोध करते हुए बातचीत का भाषा एक बेहतर स्तर हो सकता था लेकिन ब्लाॅगियों ने तो उन्हें गली के छोकरे की तरह रगेद ही लिया। क्या अब भी उन्हें अपनी गलतियों का कुछ एहसास होगा।
खैर जो भी हो मेरे लिए तो आज से जनसत्ता पढने की एक बड़ी वजह कम हो गयी। मैं उनसे कभी मिला नही, उन्हें कभी देखा नही लेकिन उनका जाना बड़ी गहरी चोट दे गया.
हिन्दी पत्रकारिता अनाथ हो गई है…
आज सुबह अमर उजाला से ही पता चला कि प्रभाषजी नहीं रहे। दुखद है उनका जाना।
parbhash joshi ka jaana ek aaghat hai hindi patrkarita ke liye.
यह दुखद समाचार पढ़ – जानकार सदमे में हूँ. क्रिकेट के प्रति प्रभाष जी के जुनून से सब वाकिफ थे. क्रिकेट, टेनिस और फूटबाल के बेहद प्रमी. हैदराबाद मैच के पहले वे बाहर से लौटे थे, तबियत भी ख़राब थी. इसके अलावा उन्हें मधुमेह था, दो बार by-pass surgery हो चुकी थी, pace maker अलग से लगा था. इन सब ने मैच की उत्तेजना के साथ एक शानदार और जानदार शख्सियत को हमारे बीच से उठा लिया. मैं उनकी स्मृति को नमन करता हूँ.
अरुण राजनाथ
…अविश्वसनीय!!!
ओह, यह दुखद ख़बर यहां पेरिस में! वे तो बिल्कुल कर्मठ और स्वस्थ थे! उनका जाना हिंदी के बौद्धिक समाज से एक विराट व्यक्तित्व का अनुपस्थित हो जाना है। ईश्वर उनकी स्मृति को गरिमा और सम्मान दे।
प्रभाष जोशी मेरे आदर्श हुआ करते थे। जयप्रकाश नारायण भी आदर्श हुआ करते थे। न मैं पत्रकार हूं, न राजनीति से जुड़ा और न समाज सेवी।
कालान्तर में ये आदर्श अप्रासंगिक हो गये। पर अपने आप में भी बहुत कुछ अप्रासंगिक हो गया।
पर जैसे अपने आप से और अपने अतीत से मोह है, और गर्व भी, वैसे प्रभाष जी से भी है।
आज काफी उदास महसूस करता हूं।
लगता है कि पीठ का दर्द कुछ बढ़ गया है इस उदासी से।
प्रभाष जी के साथ हिंदी पत्रकारिता का एक ठसकदार युग समाप्त हो गया. अब राजनीतिज्ञों और अंग्रेज़ी पत्रकारिता के दबाव में सोने-जागने वालों का युग है.
हिंदुस्तानी पत्रकारिता के इस पुरोधा को विनम्र श्रद्धांजलि.
Prabhasji ka jana behad taklifdeh hai. we hamare liye hamesha ek jivit parasang bane rahenge. unka likha -padha hamare liye sambal bana rahega. unse hamesha sahmat nahi huaa ja sakta tha, kahi kahi we todi jyadati kar jate the, lekin we loktantra or partirodh ki sanskriti se jude patrakar the.
yeh kahana nakafi hai ki hum shok-santripta hain balki unke nidhan ne hume awak kar diya hai. har sanskrtikarmi, lekhak, patrakar apni pehchan or prerana ke liye bar-bar unke vimarshoan or vaicharikata se guzarega. hindi patrakarita ke shalaka purush ko shradhanjali.
Ramnath Goenka ke Jansatta me Prabhash Joshi jaisa sampadak, sone pe suhaga yug tha woh. Aaj bhi satta se takrane ki baat hoti hai to yeh dono seersh purush hi zahen me aatey hain. Unka yun achanak chala jana…. yaqeen nahi hota. Nai nasl ko is parampara ki thati sambhalne layaq banna hoga, hamare adarsh vyaktitwa ab hum-me zinda rahen is layaq charitr banane hongey, warna kori shraddhanjaliyon ka kya matlab.
this is a very sad news that prabhas joshi no more. ab joshiji ke tark sangat,samayi bicharon se ham marhoom ho jayenge. hindi patrakarit jagat me unki lekhani atyant prabhawshali hoti thi. criket jagat me unki tipani ke karan hi me khel jagat me unke bicharon se me khel premi ban gaya tha. afsos ki bat hai ki ab we hame chod kar chale gaye.lekin unke sambedanshil bichar hame mamesha yad dilate rahenge. bhagwan unki atma ko shanti pradan karen. om shanti!
kishore kumar jain guwahati assam
हिन्दी पत्रकारिता के एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ थे प्रभाष जोशी. विश्वास नहीं होता की वे हमारे बीच नहीं हैं.
भारतीय पत्रकारिता के विदुर को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !
प्रभाष जी का इस तरह जाना जैसे एक निस्संग व्यक्ति सब कुछ चुपचाप, खामोशी से छोडकर चला जाता है . क्रिकेट के वैसे तो अनेकों महाप्रेमी होंगे, लेकिन प्रभाष जी जैसा को नहीं हो सकता . क्या वे भारत की ऐसी हार ( तीन रनों से ) को बर्दाश्त नहीं कर सके ? तेन्दुलकर की शानदार शतकीय परी और उनके सत्रह हज़ार रनों के पूरा कर लेने की खुशी भी शायद उनके लिए भारी पड गयी. अतिशय खुशी और देश के प्रति उनकी गहरी भावुकता ने उन्हें मानसिक और दैहिक स्तर पर दोहरा घाव किया जिसे वे झेल नहीं पाये. हिन्दी में क्रिकेट पर लिखने वाले ऐसे सम्मोहक समीक्षक अब कहां कोई है. प्रभष जोशी की वाग्मिता शक्ति भी अद्भुत थी, जिसका मैं कायल रहा हूं. विवादास्पद तो वे रहे ही लेकिन उन्होंने अपना स्टैंड कभी नहीं बदला.उनकी स्मृतियों को शत शत नमन.
एम वेंकटेश्वर/हैदराबाद
हिंदी पत्रिकारिता का एक तारा बुझ गया ……ऐसे महान लोग यदा कदा ही जन्म लेते हैं .., उनकी लेखनी और विचार आने वाली पीढी के लिए सदा एक मार्ग दर्शक के रूप में काम आये हैं और आते रहेंगे …..
बहुत बहुत नमन् उनकी यादों को।
MANOJEET SINGH
विनीत साहब
प्रभाष जी पटना से नहीं बल्कि लखनऊ से लौटे थे। पटना से तो दो दिन पहले ही बनारस फिर लखनऊ व प्रयाग आ चुके थे।
जानकारी सुधार के लिए शुक्रिया ब्रजेश भाई। लिखने के बाद अभी पोस्ट और कमेंट पर नजर गयी है..
संदीप,
सुबह मैंने बी.बी.सी. पर जब यह खबर पढ़ी तो तुम्हें फ़ोन लगाया.तुम सो रहे होगे तो रीवा डॉ.साहब(चंद्रिका प्रसाद चंद्र)का नं.मिलाया.वो इन दिनों बीमार हैं सो उनसे भी बात न हो सकी.मेंरे भीतर खालीपन और आँसू जमा हो रहे थे.किसी से बात करके मैं हल्का होना चाहता था.एक ही बात घुल रही थी मन में कि अब जनसत्ता का संपादकीय पेज क्या सोचकर देखूँगा.चुनौती देनेवाले,अन्याय के खिलाफ़ खड़े होनेवाले हस्तक्षेप कहाँ खोजूँगा.
बहुत ईमानदार,सुलझी हुई और सहारा देनेवाली आवाज़ शांत हो गई है.इस आवाज़ का इस तरह अचानक शांत हो जाना उस निडर लौ का बुझना है जो बेहद अँधेरे और उलझे वक्त में साथ देने के लिए जलती है.इस आवाज़ के पूरी तरह नियति के द्वारा चुप कर देने को सह सकना इसकी जगह को भर पाना बहुत मुश्किल है.कल रात में राजकिशोर जी को उनके ब्लाग में पढ़ रहा था तो सोच रहा था प्रभाष जोषी और राजकिशोर जनसत्ता की ये दो आवाज़ें हमारे वक्त की उपलब्धि हैं.मैं प्रभाष जी से कभी मिला नहीं पर पढने से कभी चूका नहीं.जब भी उनका कोई इंटरव्यू टी.वी.,रेडियो या बी.बी.सी.पर सुना भूल नहीं पाया.जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद लेने से इंकार किया था तो बी.बी.सी.के संवाददाता रेहान फजल ने पूछा था इसमें कितनी राजनीति है तो उनका जवाब था राममनोहर लोहिया ने कहा था धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म. सोनिया गांधी के इस निर्णय में भी राजनीति है पर राजनीति का रास्ता अगर त्याग से होकर जाता है तो वही सच्चा रास्ता है और दूर तक जाता है.यह अपने समय की राजनीति के मूल्यांकन की उनकी दृष्टि है.
मैं इस समय में ऐसा अभागा हूँ जिसने आज तक एक भी क्रिकेट मैच पूरा नहीं देखा.पर प्रभाष जोषी का क्रिकेट पर लिखा शायद ही छोड़ा हो.वे क्रिकेट के कवि थे.मैं ख़ुद को हल्का करने के लिए आज कक्षाओं में जबरन प्रभाष जोषी पर ही बोलता रहा.एक बात जो मेंरे मुह पर बार बार आ रही थी वो ये कि प्रभाष जी को अभी दुनिया से जाना नहीं था.वो अलविदा कह गए इसमें यही तसल्ली की बात है कि क्रिकेट के इस प्रेमी को मैच देखते ही मरना था.कुछ और करते हुए वो संसार से विदा होते तो शायद उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती.लंच में घर आकर जब तुम्हारा लेख देखा तो इस बात से भर आया कि ऐसी ही बात तुम उसी वक्त में लिख रहे थे.
मैं एक बात अक्सर सोचता हूँ कि आज जब बड़े से बड़ा पत्रकार ज़्यादा तनख्वाह की पेशकश पर कोई भी अखबार छोड़ सकता है तब प्रभाष जी ने अपना सर्वोत्तम जनसत्ता के लिए दिया.पेशे में सरोकार इसी रास्ते आते हैं.बड़े जनसमूह से कोई इन्हीं शर्तों पर जुड़ता है.करियरिस्ट अवदान सफल होता है पर सार्थक उदात्त श्रम ही होता है.अपने इसी स्वाभाव के कारण प्रभाष जी अवसरवाद के प्रबल आलोचक बने होंगे.उनकी भाषा सबको समझ में आती थी तो यह व्याकरण की नहीं इमानदारी की वजह से था.मैं तो उन पर लगभग निर्भर करने लगा था कि इस विषय पर प्रभाष जी को पढकर अंतिम राय बनाउँगा.अब ऐसी कोई आश्वस्ति मेरे सामने नही होगी.
पिछले दिनों जगदीश्वर चतुर्वेदी आदि उनका जिस तरह चरित्र हनन कर रहे थे उससे मैं बहुत आहत था.सुबह इन्हीं महोदय की मोहल्ला लाइव पर श्रद्धांजली देखी तो चर्चित लेखक कांतिकुमार जैन का आचरण याद आ गया.कांतिकुमार जैन ने शिवमंगल सिंह सुमन का ऐसा ही चरित्र हनन चंद्रबरदाई का मंगल आचरण नामक संस्मरण लिख कर किया था.इसके कुछ ही दिनों बाद जब उनकी मृत्यु हुई तो हंस में ही बड़ी विह्वल श्रद्धांजली लिखी.ऐसे समर्थ लोग अपनी ही बात की लाज नहीं रख पाते.यह ज्यादा चिंताजनक है.
प्रभाष जी का मूल्यांकन करने को काफ़ी लोग हैं.हम कहाँ लगते हैं.मैं उनके अवदान को किसी पैमाने में कस सकूँ इस लायक भी नहीं.सिर्फ़ तुमसे कुछ बाँटना चाहता हूँ.क्योंकि यह दिली मजबूरी लग रही है.यहाँ तमिलनाडु में बारिश का मौसम शुरू ही हुआ है.पिछले तीन दिन से बारिश हो रही है.सुबह खबर पढ़ने के बाद जब मैं खाना खाने बैठा तो लगा शमशान से लौटा हूँ और प्रभाष जी के अंतिम संस्कार के बाद पत्तल फाड़ने की हृदय विदारक रस्म में बैठा हूँ.मैं दिन भर समझना चाहता रहा कि जिससे एक बार भी नही मिला उसके बारे में ऐसा क्यों लग रहा है जैसे अपने ही घर का कोई बुजुर्ग हमेशा के लिए छोड़कर चला गया.इसे नियति भी मान लूँ तो इससे उदासी बढ़ती है कि अब चरमपंथियों,अवसरवादियों,भ्रष्टों,सरोकारों से विमुख लोंगों को कौन ललकार कर लिखेगा?किसकी विनम्र हिदायतें श्रेष्ठ का सम्मान करना सिखाएँगी?
-शशिभूषण
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