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लगे रहो, यह दिल्ली है…

7 November 2009 No Comment

♦ अमलेश राजू

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बिहार के मधेपुरा जिले के एक गांव से आकर दिल्ली में पत्रकारिता करने के बारे में कभी सोचा भी नहीं था। पटना में टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार रहे जितेंद्र सिंह की अगुवाई में चल रहे एकमात्र संस्थान एसएन सिन्हा पत्रकारिता संस्थान से पढ़ाई करने के दौरान ही जिन कुछ वरिष्ठ और अनुभवी लोगों को देखने-सुनने का अवसर मिला, उनमें प्रभाष जी भी एक थे। प्रभाष जी से मिलने का अवसर भी गांधी संग्रहालय के सचिव और निदेशक डॉ रजी अहमद से सान्निध्य के कारण बहुत जल्द हो गया। 1993 में पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की, तो फिर पटना में आने वाले हर बड़े लोगों से मिलने, जिसे मधेपुरा जिले के एक छोटे से गांव के युवक के लिए संभव नहीं था, होता गया।

1995-96 में एक किताब के विमोचन समारोह के दौरान प्रभाष जी पटना गये तो रजी साहब ने नाश्ते पर उनसे परिचय कराने के बहाने मुझे भी बुलाया। वहीं प्रभाष जी ने कहा कि दिल्ली आकर पत्रकारिता करो तो दुनिया देखने का मौका मिलेगा। हालांकि प्रभाष जी ने मुझे जनसत्ता में नौकरी नहीं दी है, पर जनसत्ता से उनके जुड़े होने ने ही मुझे वर्तमान संपादक ओम थानवी से मिलने को प्रेरित किया। जनसत्ता दफ्तर में वे जब भी आते थे, मैं उन्हें पटना के प्रभाष जी के हिसाब से एक बार ज़रूर देख लेता था। पर उनसे बात करने की हिम्मत नहीं होती थी। हां, कई बार वे रजी साहब का हालचाल पूछने के बहाने इतना भर कहते थे कि लगे रहो यह दिल्ली है।

आज जब वे नहीं है, तो उनकी याद इस मायने में आती है कि अगर वे पटना से मुझे दिल्ली नहीं आने को कहते तो इतना बड़ा संसार देखने का मौका नहीं मिलता। मुझे लगता है कि जब तक दिल्ली में रहूंगा, उनकी याद आती रहेगी।

amlesh raju(अमलेश राजू। युवा पत्रकार। जनसत्ता में लंबे अरसे से काम। अपराध बीट देखते रहे हैं। जनसत्ता में सुंदर रिपोर्टिंग के लिए उन्‍हें 2007 का मातृश्री पुरस्कार मिल चुका है। पटना से पत्रकारिता शुरू की। नवभारत टाइम्‍स के लिए लंबे समय तक प्रतिबद्ध फ्रीलांसिंग की। उनसे amleshraju@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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