अख़बारों ने पन्ने निकाले, जागरण/नभाटा ने अंडरप्ले किया
देर रात प्रभाष जी का इंतक़ाल हुआ। दिल्ली के अख़बार तो नहीं, लेकिन कई क्षेत्रीय अख़बारों ने अपने शहरी संस्करणों में इस मनहूस ख़बर को छापी। लेकिन दूसरे दिन लगभग अख़बारों ने सम्मानपूर्वक प्रभाष जी को याद किया। उन पर पूरा का पूरा पन्ना निकाला। प्रभात खबर से लेकर नई दुनिया तक में उनके साहस से भरे पत्रकारीय जीवन को भावपूर्ण तरीके से याद किया। लगभग अख़बारों के प्रधान-समूह संपादकों ने उन पहले पन्ने पर एडिटोरियल लिखा। लेकिन खबरों के धंधे में जागरण की खबर लेने वाले प्रभाष जोशी से इस अखबार ने उनकी मौत की खबर अंडरप्ले करके बदला लिया। ये एक अख़बार की छोटी मानसिकता का परिचय देता है। जाहिर है, ऐसे अख़बार पाठकों के साथ धंधा तो कर सकते हैं, उनसे दिल का रिश्ता नहीं बना सकते। दूसरी ओर नवभारत टाइम्स ने तो प्रभाष जी के निधन की ख़बर छापी तक नहीं। हम कुछ अख़बारों की कतरनें यहां रख रहे हैं: मॉडरेटर














dukhad hai jagran ki soch.
prabhash jee ko newspaper me jagah dena aur nahi dena yeh management ka faisla hoga par itna tai hai ki jis paper ne unke asamyik jane ki khabar nahi di hai wae ab pachta rahe honge.
हां, प्रभाषजी ठीक ही कहा करते थे कि अख़बार अख़बार नहीं पैसा कमाने और पूंजीपतियों की गुलामी के अड्डे बन चुके हैं। खुदा-न-खास्ता अगर कहीं यह ख़बर देश के किसी बड़े पूंजीपति से जुड़ी होती तो अख़बार उसके जनाजे से लेकर उसकी कब्र तक की टोह ले रहे होते। वाकई इन अख़बारों ने बेहद असंवेदनशीलता का परिचय दिया है।
इस मामले को चलताउ ढंग से लेने के बजाय आप इसके माध्यम से अखबार के चरित्र को समझ सकते हैं। कोई खबर किसी के व्यक्तिगत पसंद और नापसंद का मामला कैसे बनकर रह जाता है? इस खबर के जरिए आप हिन्दी अखबारों के बीच की बर्बर स्थिति को आप समझ सकते हैं। एबीटी के प्रकाशन हाउस से निकलनेवाला अंग्रेजी अखबार The Times Of India ने action on pitch cut short his acerbic pen शीर्षक से करीब 600 शब्दों में खबर छापा।..हमें हिन्दी अखबारों को लेकर क्रिटिकल होना पड़ेगा।
कोई विज्ञापन नुमा खबर लगा दी होगी ? सो प्रभाष जी के लिए जगह नहीं बची रही होगी |
एनबीटी यानी नवभारत टाइम्स पढ़ें.
गहरे दु:ख का विषय है कि हिन्दी जगत की खबरे कोई भी अंग्रेज़ी अखबार नही छापते. यहां तक कि राष्ट्रीय महत्व के समाचार ( हिन्दी जगत से जुडे ) भी कोई अंग्रेज़ी का अखबार शायद ही कभी छापता हो. प्रभाष जोशी जैसा महान पत्रकार अपनी अप्रतिम सेवाएं देश और दुनिया के लिए देकर चला गया लेकिन किसी अंग्रेई के अखबार ने यह खबर नहीं छापी. ऐसा हमेशा होता है, लेकिन कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती. आज देश के सभी छोटे बडे हिन्दी के समाचार पत्रों ने इस पत्रकारिता जगत के शिखर पुरुष को भाव भीनी श्रद्धांजलि समर्पित की है लेकिन अंग्रेज़ी के अखबारों में सन्नाटा छाय़ा रहा. क्या इन अंग्रेज़ी अखबारोम का कोई राष्ट्रीय दायित्व नहीं है ? क्या ये विदेशी समाचार पत्र हैं, या कि इनका भारतीयता से कोई सरोकार नहीं है ?
प्रभाष जी को हमारा नमन !!
क़ाग़ज़ पर ऊकेरे गए चंद हर्फ़ नहीं होंगे…तो क्या प्रभाष जी की कीर्ति धूमिल हो जाएगी? ऊपरवाला ऐसे लोगों को भी सदबुद्धि दे जो उनकी मौत की ख़बर को भी अंडरप्ले करने में अपनी ‘बहादुरी’समझते हैं। ऐसे कायरों को उनकी क़ायनात मुबारक।
jagran bharat ka sabse ghatia akhbar hai ye hairat ki bat hai ki UP ke pathak is akhbar ko kaise jhel lete hai.
ऐसा न कहें प्रवीणजी कि किसी अखबार ने कुछ लिखा ही नहीं। आपने उपर का कमेंट शायद पढ़ा ही नहीं। संभव है कि औऱ भी अंग्रेजी अखबारों ने किया हो। आप एक बार क्रॉस चेक कर लें.
bhaskar ne joshi ji ko yad kiya ye achchi bat hai lekin khabron ke dhande men ye samachar patr bhi gale tak dhanse hua tha.shravan garg ne pahle page par bhaskar ko yad kiya hai,indore bhaskar ne ek page bhi diya hai lekin lekin shravan garg ke lekh men ek shabd bhi prabhash joshi ke us abhiyan ke bare men nahi hai jo unhonne khabron ke dhande ke bare men cheda hua tha.kya sabit karta hai? maine apne shahar gawalior main ise kafi nazdeek se dekha aur mahsoos kiya hai.
इस तरह की सोच रखने वाले दुकानदारों का बुरा हश्र होते हुए देखा है मैंने…
शर्मनाक!!!!!!!!!!
सबसे पहले तो प्रभाष जोशी जी के लिए सहृदय श्रृद्धांजलि…।
प्रभाष जी के जाने से पत्रकारिता क्षेत्र का जितना भारी नुकसान हुआ है, उसे कहकर या बताकर नहीं बल्कि महसूस करके ही जाना जा सकता है। सत्ता को हमेशा उसकी जिम्मेदारियां चेताने वाली पत्रकारिता करने वाले प्रभाष जी के मॄत्यु की खबर बहुत नजर अंदाज रूप में छापकर या पूरी तरह ना छापकर दैनिक जागरण या नवभारत टाइम्स ने अपने जिस रूप को दिखाया है वह बहुत नया नहीं है। पिछले आम चुनावों के दौरान पैसा लेकर खबर छापने वाले अखबारों के खिलाफ प्रभाष जी ने जो आन्दोलन आरंभ किया था, उनका (मृत्यु की खबर को गंभीरता से ना लेने वालों का) यह कृत्य शायद इसी बदले की भावना से प्रेरित हो। लेकिन जो भी हो, उन्हें माफी मागनी चाहिए….।
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