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ऐसी भी क्या जल्दी थी प्रभाष जी!

7 November 2009 No Comment

♦ ब्रजेश कुमार झा

Inconsolable peopleएक शाम हिमांशु का फोन आया। उसने कहा, “क्या करें! प्रभाष जी तो हाथ ही नहीं आ रहे हैं। अब बिना बातचीत के रिपोर्ट कैसे बनाएं।” तत्काल उनकी (प्रभाष जोशी) माताराम की एक बात दिमाग़ में चक्कर काटने लगती है, जिसका ज़‍िक्र स्वयं उन्होंने अपने कागद कारे में किया था, “थारा पांव पै सनि म्हाराज है। तू सकना नी बेठेगो।” सचमुच अपनी अंतिम यात्रा में भी वे कइयों के हाथ नहीं आये। जहां से चले थे, अंतत: कइयों को छकाते वहीं लौट गये।

खैर, कल भरी रात को राय साहब ने पंकजजी को फोन किया। भरी व स्थिर आवाज में कहा, “गोविंद जी (केएन गोविंदाचार्य) कहां हैं? हमलोगों ने प्रभाषजी को खो दिया है।” मनोज जी (प्रथम प्रवक्ता) ने कहा कि और कुछेक लोगों को संक्षिप्त खबर हुई। घटना से ठीक दो-एक दिन पहले तक प्रभाष जोशी और गोविंदाचार्य उत्तरप्रदेश के दौरे पर थे, जहां कुछेक शहरों में हिंद स्वराज पर गोष्‍ठी आयोजित की गयी थी। हिंद स्वराज के सौ बरस पूरे होने पर प्रभाष जोशी की व्यस्तता बढ़ गयी थी। मीडिया में पैकेज सिस्टम के ख़‍िलाफ़ उन्होंने जो अभियान छेड़ रखा था, सो अलग। बहरहाल, इस लड़ाई पर बात फिर कभी।

अभी तो यही कि राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एक बड़ा और अपने तरीके का अकेला व हदतोड़ी संपादक सबों से दूर जा चुका था। सुबह-सबेरे प्रभाष जोशी का पार्थिव शरीर गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित निवास पर लाया गया। उनके गहरे व पुराने साथी रामबहादुर राय (जिन्हें वे अक्सर राय साब के नाम से पुकारते थे) व कई अन्य पार्थिव शरीर के साथ थे। कइयों की आंखें भरी थीं। प्रभाष जोशी के गुज़र जाने की ख़बर ज़्यादातर लोगों को समाचार चैनलों से मिली। कई लोगों को तो खबर भेजी गयी थी। ज़्यादातर लोग आये।

ठेठ इंदौरी अंदाज़ में घूमने-फिरने वाला व्यक्ति कभी न जगने वाली नींद ले रहा था। उनके ऐसे अचानक चले जाने पर यकीन न करने वाले अब भी उस नींद के टूटने का इंतजार कर रहे थे। पर कहां हो पता है, वापस लौटना! कई नामवर लोग वहां मौजूद थे। स्वयं प्रो नामवर सिंह भी आये। गोविंदाचार्य भी सुबह दस बजे तक पहुंच गये। राजेंद्र यादव व अशोक वाजपेयी वहां मौजूद थे।

दोपहर एक बजे के आसपास पार्थिव शरीर को गांधी शांति प्रतिष्ठान लाया गया। दसेक मिनट बाद ही कुछ लोग शव को लेकर हवाई अड्डे की ओर रवाना हो गये। इस पंक्ति के लिखे जाने तक पार्थिव शरीर को लेकर लोग इंदौर पहुंच चुके थे। शहर से करीब साठ किलोमीटर की दूरी पर प्रभाष जोशी का पैतृक गांव है, जहां शनिवार को अंत्येष्टि होगी। पूरे इंदौर में ख़बर आग की तरह फैल गयी थी। जबकि इस शहर में बगल के एक अपार्टमेंट के सज्जन कहते सुनाई दिये – “अखबार के एक आदमी का निधन हो गया है। इसलिए इतने टीवी वाले आये हैं।” सचमुच कितना एकांगी हो गया है यह महानगर।

(ब्रजेश हिंदी के उन सर्जनात्‍मक पत्रकारों में से हैं, जो देश और समाज को सिर्फ मामूली ख़बर की नज़र से नहीं देखते। इन दिनों वे प्रथम प्रवक्‍ता से जुड़े हैं)

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