बुद्धिजीवी प्रभाष जोशी को याद करते हुए
♦ प्रमोद रंजन
सुबह सूचना मिली ‘मशहूर पत्रकार, गांधीवादी चिंतक प्रभाष जोशी का निधन’। अभी हफ्ता भी नहीं बीता जोशी यशवंत सिंह की जिन्ना पर लिखी किताब के उर्दू संस्करण के विमोचन समारोह में पटना आये थे। आयोजन में उन्होंने शानदार ढंग से अपनी बात रखी थी।
बहुत से अन्य साथियों की तरह उनकी बेबाकी मुझे भी कुछ बार अच्छी लगी है। तार्किक हो या अतार्किक, वह अपनी बात खुल कर लिखते थे। उनके इस अंदाज़ के कारण भी आज देश में उनके हजारों प्रशंसक हैं।
वह गांधीवादी या ब्राह्मणवादी होने से पहले एक बुद्धिजीवी थे। विचारों के विपरीत ध्रुव पर खड़े होने के बावजूद हम जैसे लोगों ने हमेशा उनके इस रूप को मान्यता दी। एक व्यक्ति के रूप में उनके निधन पर शोकोच्छवास काफी नहीं होगा, एक बुद्धिजीवी के रूप में भी उनके अवदान को याद किया जाना चाहिए।
सोचता हूं, आजीवन जोशी जी की बौद्धिकता किनके पक्ष में रही? एक आदमी जो अन्यत्र किंचित तार्किक था, क्यों समानता का आग्रही नहीं बन सका? वर्ण व्यवस्था का समर्थन कर उन्होंने गांधीवाद का विकास किया या उसकी अवैज्ञानिकता को ही प्रमाणित किया? भारतीय प्रभुवर्ग की गुलामी उन्होंने क्यों स्वीकार की? सिर्फ इसलिए कि वह इन्हीं के बीच पैदा हुए थे? यह तो बौद्धिकता का सीधा प्रतिलोम है। उनका बचपन कुछ अभावों के बीच गुजरा था, काष अपनी उन स्मृतियों, अनुभवों का, उस संवेदना का विस्तार वे भारत के बंचित तबकों की पीड़ा, उनके आक्रोश को समझने तक कर पाते।
जोशी जी के अवदान को याद करते हुए स्वभाविक रूप से बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय की उनकी पक्षधरता याद आती है। मुझे भी उनका वह रूप मोहित करता था। इसलिए एक बार जब अग्रज मित्र कथाकार प्रेमकुमार मणि ने उन्हें ‘कुटिल ब्राह्मणवदी’ कह कर संबोधित किया था तो मैंने उनसे गहरी असहमति जतायी थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय जोशी अपना ब्राह्मण होना भूल कर देश के मुसलमानों के साथ खड़े हो गये थे। लेकिन पिछले दिनों जैसे-जैसे जोशी जी की इस पक्षधरता का कारण समझता गया, हैरान होता गया। यहां उसके विस्तार में जाने का अवकाश नहीं है। फिर भी यह याद करना ज़रूरी है कि जोशी हिंदुस्तान के मुसलमान शासकों के प्रति बेहद उदार थे। और इसका कारण था भारत पर षासन करने वाले मुसलमानों द्वारा ब्राह्मणवादी परंपराओं और जाति-व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाये रखना। एक साक्षात्कार में वह कहते हैं – अकबर समेत जितने भी बड़े मुसमान राजा हुए हैं, वो आपके (हिंदू) धर्म का, आपकी जाति प्रथा का, आपकी परंपरा का सम्मान करते थे. उनसे ज्यादा सम्मान देने वाले और लोग नहीं हुए।
जोशी वास्तव में सांप्रदायिकता के खिलाफ नहीं खड़े हुए थे। वह द्विज हिंदुओं और अशराफ मुसलमानों के झगड़े को अनुचित मानते थे और इन दोनों में समरसता और सहअस्तिव की संभावना देखते थे। वस्तुतः दिवंगत जोशी इस गठजोड़ के इतिहास; और अतीत में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को इससे हुए लाभ को बखूबी समझते थे। मुसलमानों का वंचित तबका कभी उनकी चिंता के केंद्र में नहीं रहा।
सांप्रदायिकता का मामला हो या अखबारों द्वारा खबरों की बिक्री के विरोध का, उन्होंने हमेशा वंचित तबकों की ओर से आयी आवाजों को अनसुना करने, कुचल देने की कोशिश की। ब्राह्मण परंपराओं के विरोध की बात आते ही वह प्रायः अतार्किक प्रलाप करने लगते थे। इसका एक नमूना ‘काले धंधे के रक्षक’ शीर्षक वह लेख भी था, जो उन्होंने गत 6 सितंबर को जनसत्ता में मेरे खिलाफ लिखा था।
जोशी जी के बुद्धिजीवी रूप को याद करते हुए एक और बात अखर रही है। मित्रों ने मुझे बताया है कि कल रात (6 नवंबर, 2009) को भारत-आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट का खेल था। खेल में भारत की हार देखकर जोशी जी को दिल का दौरा पड़ा और इसी से उनका निधन हो गया। हो सकता है, यह सही न हो। जोशी जीवन के 73 वें साल में थे और इस उम्र में मृत्यु के लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता नहीं होती।
लेकिन जोशी जी के कुछ प्रशंसक इसी कारण उन्हें संथरा कर मृत्यु का वरण करने वाली जैन साध्वी की भांति महिमामंडित कर रहे हैं। ये प्रशंसक नहीं जानते कि ऐसा कर वे दिवंगत जोशी के महत्व को कम कर रहे हैं। भारत की टीम को हारता देख इतना भयंकर आघात महसूस करने वाली बौद्धिकता न वैश्विक हो सकती है, न ही संतुलित कही जा सकती है। इस देश के इतिहास और समकाल के बारे में जोशी जी को विषद जानकारी थी। जाहिर है, क्रिकेट में हार से अधिक चिंताजनक गरीबी, भुखमरी, प्राकृतिक आपदाएं, सरकारी दमन, नरसंहार हैं। जोशी आरंभ में खेल पत्रकार थे। जीत-हार के प्रति ऐसा लगाव ‘खेल-भावना’ भी के विपरीत है। ऐसी प्रतिक्रिया न किसी खेल-प्रेमी की हो सकती है, न ही देश-प्रेमी की। मैं यह बात दिवंगत जोशी जी के खेल पत्रकार वाले रूप के प्रशंसक के तौर पर कह रहा हूं। समाज और राजनीति पर उनकी टिप्पणियों से हम जैसे लोगों का विरोध उनके दिवंगत होने के बावजूद जारी रहेगा। हां, भारतीय प्रभुवर्ग के एक प्रमुख बुद्धिजीवी के रूप में उनके विचारों से टकराते हुए उनके बेबाकीपन के लिए हम एक गर्मजोशी भरी आत्मीयता हमेशा महसूस करेंगे।
(6 नवंबर, 2009)
(प्रमोद रंजन। प्रखर युवा पत्रकार एवं समीक्षक। अपनी त्वरा और सजगता के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। पिछले दिनों पटना से निकलनेवाली विचारोत्तेजक पत्रिका जन विकल्प का उन्होंने संपादन किया। साथ ही प्रभात ख़बर में कुछ दिनों तक काम किया। नौकरी छोड़ने के बाद तीन पुस्तिकाएं लिखकर नीतीश कुमार के शासन के इर्द-गिर्द रचे जा रहे छद्म और पाखंड को उजागर करने वाले वह संभवत: सबसे पहले पत्रकार बने।)













प्रिय प्रमोद रंजन भाई, प्रभाष जी के निधन पर आपकी टिप्पणी पढी ।
हिंदी पत्रकारिता को जोशी जी का कैसा अवदान रहा इस पर शोध होना चाहिए। निधन से महज पांच छह दिन पहले प्रभाष जी, जसवंत सिंह की किताब के उर्दू संस्करण का विमोचन करने पटना आए थे। तब उन्होंने साफ-साफ कहा था कि मुसलमानों को न तो नीतीश के पीछे और न ही लालू के पीछे चलना चाहिए, बल्कि अपनी राजनीति खुद करनी चाहिए। उन्होंने जसवंत सिंह को मुसलमानों के बड़े नेता के रूप में प्रोजेक्ट भी किया था। उनका यह भी मानना था कि मुसलमानों की खराब हालत में सुधार की शुरूआत बिहार से ही हो सकती है। बिहार को उन्होंने क्रांति की भूमि माना था। उस दिन जसवंत सिंह, एम.जे अकबर और प्रभाष जी को सुनने के लिए बिहार के मुसलमान बड़ी संख्या में जुटे थे। भारत विभाजन का जिम्मेदार कौन, पर जमकर बहस हुई थी। विभाजन के बाद भारत के अंदर जो विभाजन है उसे किस तरह से बढ़ाया गया या बढाया जा रहा है उस पर कई खंडों में बहस होनी चाहिए।
जोशी जी की बेबाकी के कायल हम जैसे हजारों युवा रहे हैं। उनसे मेरी पहली मुलाकात पत्रकार सियाराम यादव जी के साथ पटना में हुई थी। तब देर तक प्रभाष जी के साथ बातें भी हुईं थीं। वह सब अब ज्यादा खल रहा है।
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