एक शिखर सूना

♦ ओम थानवी

prabhash joshi black & white

दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी की दस साल की रिहायश छोड़कर मैं गये साल गाजियाबाद की वसुंधरा बस्ती में चला आया तो उसकी एक वजह यह भी थी कि प्रभाष जी वहां बस चुके थे। बीस बरस उनके साथ काम किया, अब एक ही इमारत – जनसत्ता एपार्टमेंट्स – में साथ रहने का मौका मिलेगा : इससे खुशगवार अहसास किसी जनसत्ताई को दूसरा क्या हो सकता था!

लेकिन वक्त की करवटें जब-तब बड़ी क्रूर होती हैं। सवा साल के साथ में जब लगने लगा कि उनके साथ किसी नये रिश्ते का आविष्कार हो रहा है, संपादक से अभिभावक बनते हुए वे बतरसी अंदाज में सामने आने लगे हैं, सहसा उन्होंने आंखें मूंद लीं।

उनका निधन हिंदी समाज के लिए एक दुखद घटना है, मगर मेरे जैसे अनेकानेक शिष्यों के लिए एक हादसा। सहमति ही नहीं, असहमतियों में भी उनकी उपस्थिति हमारे लिए एक बड़ा संबल थी। एम्स के शव-लेपन गृह से वसुंधरा के घर तक उनकी शिथिल देह ने जब उनके न रहने का संदेश पुख्ता कर दिया है, फिलहाल यह समझ पाना मुश्किल है कि ‘सांप्रदायिकता’ के मिजाज से लेकर शब्दों के भेद और कुमार गंधर्व या मल्लिकार्जुन मंसूर की तानों के अर्थ समझने के लिए अब कोई कहां जाएगा?

प्रभाषजी के काम, उनके योगदान का मूल्यांकन आने वाले वक्त में होगा। पर विदाई की घड़ी में उनके व्यक्तित्व की कुछ छवियां बरबस याद आती हैं।

मेरे नजदीक सबसे अहम रहा है भाषा के प्रति उनका सरोकार। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की खांचों में बंधी भाषा को तोड़ा। उनका प्रयोगधर्मी रुख ‘प्रजानीति’ और ‘आसपास’ के दिनों में भी दिखाई देता था, लेकिन ‘जनसत्ता’ उन्होंने एक नये भाषाई तेवर के साथ शुरू किया। सहयोगियों को उन्होंने सरल, सीधी और मारक भाषा लिखने की बाकायदा दीक्षा दी। कभी-कभी उनके कुछ प्रयोग चर्चा का विषय भी बने। लेकिन इसमें शायद ही किसी को शक हो कि ‘उल्लेखनीय है’ जैसे एकरस जुमलों वाली हिंदी आज पत्रकारिता में हर तरफ ‘मालूम हो – खयाल रहे’ का स्वीकार अर्जित कर चुकी है।

उस सरल, बोलचाल वाली हिंदी में उन्होंने पत्रकारिता में विचार की जगह बनायी : यह उनका भाषा के खाते में दूसरा यश। वे भवानी बाबू के मुरीद थे; कविता की कवि लोग जानें, पत्रकारिता में वे वही भाषा लिखते और लिखवाते थे, जो हम बोलते हैं। जिन्होंने उन्हें सभाओं में बोलते हुए सुना है, वे जानते हैं कि उनके बोले हुए को कागज पर हू-ब-हू उतार कर छापा जा सकता था। और तो और, उनकी हस्तलिपि में भी एक सुघड़ लय थी।

सहज हिंदी में यह सार्थक-पत्रकारिता का आगाज था। अफसोस यही है कि हिंदी में यह सिलसिला कायम न हो सका। अरसे तक अखबारों में वही नीरस और कागजी हिंदी बनी रही। फिर, प्रभाषजी के देखते-देखते, हिंदी में अंग्रेजी घालमेल वाली ऐसी फूहड़ भाषा दाखिल हो गयी, जो लिखने वालों को रास आती थी और टीवी-रेडियो पर बोलने वालों को भी। इस भाषा में विचार भरी पत्रकारिता हो सकती है, इसमें संदेह करने की हजारहा वजहें हैं। यह अकारण नहीं है कि भाषाई फूहड़ता के साथ पत्रकारिता में नैतिक पतन का मुद्दा उन्हें आखिरी दिनों में सबसे ज्यादा सालता रहा। मुझे अच्छी तरह याद है एक दफा स्व राजेंद्र माथुर ने मुझे अपने घर ले जाते वक्त रास्ते में मुस्कराते हुए कहा था – मैं दरअसल अपने अखबार में वह (काम) करना चाहता हूं, जो ‘जनसत्ता’ कर रहा है। उस वक्त मैं ‘राजस्थान पत्रिका’ में काम करता था और माथुर साहब मुझे दिल्ली आने का न्योता दे रहे थे।

मैं उनके साथ नहीं जुड़ पाया, इसकी अलग दास्तान है। लेकिन हिंदी के और अखबारों में व्याप्त बेचैनी की तरफ इशारा करने वाला यह प्रसंग मुझे मौके-बेमौके याद आता है और कचोटता है। भाषा के साथ विचार के हलके में प्रभाषजी के अनूठे काम का एक श्रेष्ठ उदाहरण सांप्रदायिकता की राजनीति पर उनकी लोहार-वाली चोटें हैं। हिंदुत्व के नाम पर हुए खून-खराबे और वोट की राजनीति पर जितना साफ और बेलौस उन्होंने लिखा, किस और पत्रकार ने लिखा होगा? गांधीजी के अनुयायी वे इस अर्थ में भी थे कि आस्थावान धार्मिक थे, पर धर्म की राजनीति के जैसे जानी दुश्मन। इसके खिलाफ उन्होंने जमकर लिखा। कभी इस तेवर की वजह से उन्हें सशंकित या भयभीत नहीं देखा। उन्होंने कभी सुरक्षाकर्मी नहीं रखे, न किसी जलसे में वह कहने से हिचके जो वे लिखते भी थे।

उनके निडर अंदाज का एक अनुभव याद करना मौजूं होगा। तब मैं ‘जनसत्ता’ के चंडीगढ़ संस्करण का संपादक था। आतंकवाद चरम पर था। आतंकवादियों ने पत्रकारों के लिए अपनी तानाशाही की एक आचार-संहिता घोषित की। मैंने दिल्ली आकर प्रभाषजी से बात की। उन्होंने ‘द ट्रिब्यून’ के प्रधान संपादक की राय जानने के लिए फोन मिलवाया। उधर से यह सुनने को मिला कि आचार-संहिता लागू करने की आखिरी तारीख भले दूर हो, वे उसे लागू कर चुके हैं। पंजाब के सबसे बड़े अखबार के इस समर्पण पर प्रभाषजी कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, इन (आतंकवादियों) की ऐसी-तैसी। जब हम वहां (चंडीगढ़) से अखबार निकाल रहे हैं तो कीमत चुकाने को भी तैयार रहना चाहिए। और आचार-संहिता उन्होंने बगल में रखी रद्दी की विशाल टोकरी के हवाले कर दी। जैसा कि महान शख्सियतों में होता है, प्रभाषजी में कुछ चीजों को लेकर दीवानापन था और कुछ अंतर्विरोध भी थे। संगीत और क्रिकेट के लालित्य को उन्होंने दिल से पहचाना था। कुमार गंधर्व को वे कार से लेकर रसोई तक में डूबकर सुन सकते थे। क्रिकेट रात भर जागकर देखते थे। स्वभाव से भावुक थे। अक्सर आंखें छलछला आती थीं। बाइपास सर्जरी के बाद यह भावुकता बढ़ी। पर कहते थे – यार, रोएंगे नहीं तो जीएंगे कैसे!

सुनते हैं, गुरुवार की रात सचिन तेंदुलकर के आउट होने पर उनके दिल की धड़कन गड़बड़ा गयी। हालांकि उनके अजीज दोस्त हरिकृष्ण दुआ ने ऐसा नहीं माना। उन्होंने कहा, सचिन की पारी देखकर वे खुश ही हुए होंगे, आहत नहीं। असल तनाव लगातार हो रहे सफर का रहा होगा। सफर सचमुच उन्हें आराम की जगह नहीं देता था। चार रोज पहले पटना में जसवंत सिंह की किताब के हिंदी संस्करण का ‘लोकार्पण’ किया। फिर लखनऊ गये। वहां से बनारस। वहां दिल में हलचल महसूस की। पर दिल्ली लौटकर कल मणिपुर जाने वाले थे। यह उनके जीवट का उदाहरण है। और कुछ लापरवाह तबीयत का भी। कहते थे, अभी बहुत ‘कागद कारे’ पचहत्तर की उम्र तक करूंगा, बाद में बचा हुआ काम। लेकिन इसके लिए जरूरी अनुशासन उनमें कहां था। अक्सर रेल या विमान आखिरी घड़ी में ही पकड़ते थे। कार्यक्रमों में देर से पहुंचते थे। मगर ललित तबीयत के धनी शख्स से हम नीरस अनुशासन की उम्मीद ही क्योंकर कर सकते हैं! जो हो, हिंदी की दुनिया आज वैसी नहीं रही जैसी कल थी।

उनका जाना सचमुच एक शिखर को सूना करके जाना है। कद्दावर संपादक हिंदी के इतिहास में बहुत हुए हैं। पर प्रभाषजी हमारे दौर की हिंदी पत्रकारिता का कद आप थे। (जनसत्ता से साभार)

om thanvi(ओम थानवी। भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। पहले रंगकर्मी। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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