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प्रभाष जी के लिए इतनी कटुता, इतनी घृणा?

8 November 2009 9 Comments

♦ गिरीश पंकज

prabhash joshi black & white2

प्रभाष जोशी जी के निधन की खबर दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक तथाकथित राष्ट्रीय अखबार में नहीं छपी। इतनी कटुता…? इतनी घृणा…? अरे भाई, आदमी हमेशा के लिए चल बसा। अब तो दुराग्रह से मुक्त हो जाओ सम्पादकजी… अपनी इसी ओछी मानसिकता के कारण कुछ संपादक मालिक के अच्छे नौकर तो बने रहते हैं लेकिन वे पत्रकारिता के कलंक ही माने जाते है। प्रभाष जोशी का अचानक ऐसे चला जाना उन लोगों के लिए दुखद घटना है जो पत्रकारिता को मिशन की तरह लेते थे और वैसा व्यवहार भी करते थे। जोशी जी के जाने के वाद अब लंबे समय तक दूसरा प्रभाष जोशी पैदा नहीं होगा। राजेंद्र माथुर जी के जाने के बाद प्रभाष जोशी ने उनके रिक्त स्थान को जैसे भर दिया था। एक नये तेवर, नयी दृष्टि के साथ हिंदी पत्रकारिता को उन्होंने एक ऐसा मोड़ दिया, जैसा पहले किसी ने नहीं दिया था। जनसत्ता के साथ जोशी जी के संपादकत्व में जैसे हिंदी पत्रकारिता में एक नये युग की शुरुआत हुई थी।

एक दौर में उन्होंने इस अखबार के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को एक साहस दिया, एक नयी प्रतिरोधी-भाषा दी। समाचार, विचार किस तरह से प्रस्तुत किस तरह प्रस्तुत जाएं, इसको बताने-समझाने का काम प्रभाष जी ने किया। वे साहित्यकार तो नहीं थे, लेकिन उनकी भाषा में लालित्य था। ललित निबंध जैसे लगते थे उनके वैचारिक लेख। उनके लेखों में रस नि:सृत होता था। गहन अध्ययन भी झलकता था। उनमें साफगोई भी थी। जोशी जी किसी के सामने नहीं झुके। प्रबंधन के सामने भी नहीं। अपनी शर्तों पर काम किया, वरना अब तो अनेक संपादक केवल मालिकों की पालकी ढोने का ही काम करते हैं। अब जोशी जी के जाने के बाद कहार किस्म के पत्रकार शायद खुश हो जाएं, लेकिन हिंदी पत्रकारिता को मिशन मान कर चलने वाले पत्रकारों की आंखों में आंसू हैं क्योंकि अब अखबारों से जुड़े पत्रकार तो हजारों हैं लेकिन जोशी जी जैसा संपादक कोई नहीं है। ऐसे पत्रकार के महाप्रयाण की खबर न छापना भयंकर ओछा काम है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है।

जोशीजी देश-विदेश का भ्रमण करते रहते थे। पत्रकारिता या वैचारिक मुद्दों से जुड़े हर बड़े आयोजनों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य-सी हो जाती थी। आयोजन की गरिमा बढ़ानी हो तो लोग प्रभाष जी को बुलाया करते थे। वे अनेक बार रायपुर के आयोजनों में आये। हर बार उनके विचारों से हमें प्रेरणा ही मिली। मंच पर सत्ताधीशों के साथ भी बैठते रहे लेकिन किसी का गुणानुवाद नहीं किया। जो अच्छा लगा, वही कहा। अनेक मौकों पर उन्होंने व्यवस्था की आलोचना भी की। पत्रकारिता की दिशा क्या हो, इस पर वे हम लोगों से बातें करते रहते थे। मेरा अपना सौभाग्य है कि जब मैंने पत्रकारिता की विसंगतियों पर अपना पहला (बहुचर्चित मगर विवादस्पद बना दिया गया) उपन्यास मिठलबरा की आत्मकथा लिखा और वह छपा, तो मैंने अपने स्वभाव के ठीक विपरीत काम करते हुए एक प्रति प्रभाष जी को भी दी थी। वे किसी कार्यक्रम में शामिल होने रायपुर आये थे। हालांकि पुस्तक देने के बाद मैं यही सोचता रहा कि पता नहीं वे उपन्यास पढ़ते भी हैं या नहीं। बेकार ही दे दिया। खैर, कुछ महीनों बाद प्रभाष जी दुबारा रायपुर आये तो मैं भी उनको सुनने गया। गोष्ठी शुरू होने में वक्त था। लोग उनसे मिल रहे थे लेकिन मैं अपनी जगह बैठा रहा। किसी दंभ के कारण नहीं, बस इसी स्वाभिमानी भावना के तहत कि होंगे प्रभाष जी अपनी जगह, मुझे क्या… अब इनसे क्या मिलना जो एक लेखक की कृति का सम्मान ही न कर सकें, उस पर कोई प्रतिक्रिया ही न दे।

मैं यथास्थान बैठा ही रहा और अपने किसी परिचित से बतियाता रहा, तभी देखा कि प्रभाष जी तो हाथ जोड़े मेरी ओर ही चले आ रहे हैं। वे मुझे देख कर मुसकरा भी रहे थे। शायद वे मेरे मनोभावों को भी पढ़ चुके हों। वे जब बिल्कुल मेरे पास ही पहुंच गये तो मैं हड़बड़ा कर उठा और नमस्कार किया। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “मैंने आपका उपन्यास पढ़ लिया है। भई, मिठलबरा शब्द मुझे बहुत पसंद आया। इस उपन्यास पर मैं कुछ लिखना चाहता था, लेकिन लिख नहीं पाया। कभी मौका मिला तो लिखूंगा, वैसे मिठलबरा शब्द का मैंने अनेक लोगों से जिक्र किया है।”

जोशी जी की इतनी बात सुन कर मुझे परम संतोष हुआ। उनकी बातें सुन कर मेरा यह भ्रम तो टूटा कि उन्होंने मेरे उपन्यास को पढ़ा ही नहीं होगा। प्रभाष जोशी जैसा व्यक्तित्व किसी कनिष्ठ पत्रकार की कृति को सराहे तो यह उसके लिए गर्व की बात होगी ही। प्रभाष जी से जुड़ा यह अनुभव मैं कभी भूल नहीं सकता। आज जब वे नहीं रहे, तो यह घटना बरबस ही याद आ गयी।

अभी पिछले दिनों वे एक विवाद में फंसे, जिस कारण मैं भी उनसे नाराज़ था। उन्होंने सती प्रथा का महिमा मंडन किया था। यह बात उनके तेवर से मेल नहीं खाती थी। फिर मैंने विश्लेषण किया तो बात समझ में आयी कि उन्होंने उस मानसिकता को सराहा था, जो पति के साथ लंबे समय तक रहने के कारण एक पत्नी की बन ही जाती है। रायपुर का ही एक हादसा है। एक महिला अस्पताल में भरती अपने पति मृत्यु के बाद इतनी विचलित हो गयी कि उसने पास ही स्थित एक तालाब में कूद कर अपनी जान दे दी। यह भी एक किस्म का सती होना ही है। वह अपने पति से बहुत स्नेह करती थी। जब पति न रहा तो उसे अपना जीवन भी निस्सार लगा। सती होने के पीछे इस भावना को समझने की ज़रूरत है और इस भावना का सम्मान भी किया जाना चाहिए। ऐसे दौर में जब किसी के मर जाने से किसी को फर्क नहीं पड़ता। ऐसे दौर में कोई नारी पति के वियोग में जान दे दे, यह बड़ी प्रेरक घटना है, उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं। जोशी जी के मन में सती प्रथा का महिमा-मंडन नहीं था, वरन वे उस भावना का आदर कर रहे थे, जो अब कुछ तथाकथित आधुनिक किस्म की औरतों में नज़र नहीं आती। जोशीजी की आलोचना हुई लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। जो लिख दिया सो लिख दिया।

जोशीजी पत्रकारिता में प्रगतिशील मूल्यों के संवाहक थे। वे बिल्कुल दकियानूस नहीं थे। बेशक वे धोती-कुरता पहनते थे, लेकिन इसके बावजूद वे वैचारिक स्तर पर सूट-बूट में रहने वाले पत्रकारों की भी छुट्टी कर देते थे। समाजवादी सोच के थे। विनोबा और जयप्रकाश नारायण जैसे महान लोगों के साथ काम करने के कारण उन्होंने पत्रकारिता को समाजवादी चिंतन से लबरेज किया।

वे प्रखर गांधीवादी चिन्तक, संपादक थे। इसमें दो राय नहीं कि उनके जाने के बाद रचनात्मक पत्रकारिता का एक पुरोधा चला गया। यह एक युगांत भी है। ऐसे युगांत जो दुबारा नहीं आने वाला। बस उनका लेखन ही हमारे सामने रहेगा। आने वाली पीढ़ी अगर पत्रकारिता के चरित्र को उज्ज्वल बनाए रखना चाहती है, सचमुच पत्रकारिता करना चाहती है, तो वह प्रभाष जोशी के रास्ते पर चले। पत्रकार केवल सामाजिक विषयों पर ही न लिखे, वह खेल, विज्ञान आदि अन्य विषयों पर भी पढ़े और लिखे। प्रभाषजी यही करते थे। जितना अच्छा वे किसी राजनीतिक-सामाजिक विषय पर लिखते थे, उससे बेहतर भाषा में वे क्रिकेट पर भी लिखते थे। हिंदी के सुधी पाठक उनके इस शीर्षक को आज तक याद करते हैं, कि “जब तक सूरज-चांद रहेगा, अजहर तेरा नाम रहेगा”। उनके अनेक लेखों ने यह भी स्थापित किया कि खेल पर लिखने के लिए एक यांत्रिक भाषा की ही जरूरत नहीं है, उसे हम बेहद अनौपचारिक भाषा में भी लिख सकते हैं। प्रभाष जी के जाने से हिंदी पत्रकारिता की जो क्षति पहुंची है, उसकी भरपाई पता नहीं कब होगी। फिलहाल मैं उनको अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देकर उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हुए इतना ही सह सकता हूं कि जब-तक सूरज चांद रहेगा, प्रभाष जोशी का नाम रहेगा। उस अख़बार को भी श्रद्धांजलि देने का मन कर रहा है, जिसने जोशी जी की मृत्यु की खबर नहीं छापी। ऐसा करके उस अख़बार ने हिंदी पत्रकारिता का स्याह चेहरा उजागर किया है।

girish pankaj(गिरीश पंकज तीस सालो से पत्रकारिता कर रहे है। अनेक अखबारों के सिटी चीफ और संपादक रह चुके है। फिलहाल अपनी साहित्यिक पत्रिका सदभावना दर्पण का संपादन करते हैं और साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली के सदस्य भी हैं। अक्‍सर ब्‍लॉग भी लिखते हैं। उनसे girishpankaj1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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9 Comments »

  • Pramode Mallik said:

    If a newspaper claiming to be the “number one hindi paper of dill” does not find space to publish story on the death of the greatest journalist of his time, it shows the mind set of the paper. How mean minded, cheap, anti-journalism and anti-people a paper can be, this is an example. It does not reduce the importance of Prabhash jee. Of course it shows the meanness of the paper concerned. If those working with the paper do not protest against this black chapter of hindi journalism, they should think whether they are journalists at all. We all have to earn money for running our families, but even prostitutes have certain values. Rise against this so that you do not feel shame when you see a mirror.

  • aam admi said:

    “…ऐसे दौर में कोई नारी पति के वियोग में जान दे दे, यह बड़ी प्रेरक घटना है, उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।”
    Girishji,
    kabhi aapne patni ke viyog me kisi pati ko jaan dete paya hai? aur gaddari aur vyabhichar jaise lanchchan sirf mahilaon ke sandarbh me hi kyon istemal kiye jate hain? kya mard in sabse achchute hain?
    aur Pramodeji,
    “… even prostitutes have certain values.” kya matlab hai iska?
    kya we insan nahin hain? koi bhi mahila shauk se nahin apnati hai is amanviye kam ko.Kaun dhakelta hai unhe is taraf? sochiye jara.

  • प्रेमरंजन said:

    आम आदमी ने जो सवाल पूछा है, अगर जरा भी गैरत बची हो, गिरीश पंकज और प्रमोद मलिक को अपने-आप पर शर्म करनी चाहिए…
    इन जैसे स्त्री विरोधी जो लोग स्त्रियों के खिलाफ इस तरह की कुत्सित मानसिकताओं के शिकार हों, उन्हें दूसरों से पूछने का क्या हक बनता है कि दूसरे क्या कर रहे हैं।
    इन्हें बताना चाहिए कि जिन बातों की अपेक्षा ये स्त्रियों से करते हैं, पितृसत्ता ने पुरुषों के क्या कुछ ऐसे ही मानदंड निर्धारित किए हैं…
    शर्मनाक…

  • गिरीश पंकज said:

    शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए प्रेम रंजन जी जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश भी की है कि ‘यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है’. ये है मानसिकता. साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल जायेगी तो वो मूल्य कहाँ जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? यह सफाई देने की बात नहीं है कि मै प्रगतिशील सोच वाला हूँ लेकिन प्रगतिशीलता और व्यभिचार में अंतर है. प्रभाष जी वाले लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह लेख के सन्दर्भ को आगे बढ़ाने वाली बात है. मैंने लिखा है- ”उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” सबके लिए यह बात नहीं है. हो भी नहीं सकती, अच्छी औरते अभी भी बची हुई है, जो पति के साथ सती होना पसंद करती है, यह उनकी अपनी भावना है. सती प्रथा का मै समर्थक नहीं हूँ.हो भी नहीं सकता लेकिन मै उस भावना को नमन करता हूँ जो भावना औरत को बड़ा बनाती है. पत्नी वियोग में कोई पति भी जान दे दे तो वह भावना भी प्रणम्य है. एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है…? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. जोशी जी ने उसी भावना का सम्मान किया था, मै भी करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे कि ‘ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा रहा है? छिः…इसे तो मध्य युग में होना था’, लेकिन मै हूँ और अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ. स्त्री-शक्ति पर मेरी अनेक कवितायेँ है जो बताती है कि मेरी सोच क्या है, चिंतन क्या है. मेरा ब्लॉग देख ले, मेरी रचनाये देख ले, तो शायद दृष्टी खुल जाये, लेकिन ऐसे लोगो की दृष्टी कुछ ज्यादा ही खुल जाती है. बहरहाल, स्त्री के प्रति मेरा नजरिया क्या है, इसे समझाने के लिए अपनी ही ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ-
    सुन्दर, कोमल कली लडकियां
    होती अकसर भली लडकियां
    कितना मीठा मन रखती हैं
    ज्यों मिसरी की डली लडकियां
    मत बांधो पैरो में बंधन
    अन्तरिक्ष को चली लडकियां
    पीडाओं को सह लेती है
    संघर्षों में पली शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए प्रेम रंजन जी जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश भी की है कि ‘यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है’. ये है मानसिकता. साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल जायेगी तो वो मूल्य कहाँ जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? यह सफाई देने की बात नहीं है कि मै प्रगतिशील सोच वाला हूँ लेकिन प्रगतिशीलता और व्यभिचार में अंतर है. प्रभाष जी वाले लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह लेख के सन्दर्भ को आगे बढ़ाने वाली बात है. मैंने लिखा है- ”उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” सबके लिए यह बात नहीं है. हो भी नहीं सकती, अच्छी औरते अभी भी बची हुई है, जो पति के साथ सती होना पसंद करती है, यह उनकी अपनी भावना है. सती प्रथा का मै समर्थक नहीं हूँ.हो भी नहीं सकता लेकिन मै उस भावना को नमन करता हूँ जो भावना औरत को बड़ा बनाती है. पत्नी वियोग में कोई पति भी जान दे दे तो वह भावना भी प्रणम्य है. एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है…? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. जोशी जी ने उसी भावना का सम्मान किया था, मै भी करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे कि ‘ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा रहा है? छिः…इसे तो मध्य युग में होना था’, लेकिन मै हूँ और अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ. स्त्री-शक्ति पर मेरी अनेक कवितायेँ है जो बताती है कि मेरी सोच क्या है, चिंतन क्या है. मेरा ब्लॉग देख ले, मेरी रचनाये देख ले, तो शायद दृष्टी खुल जाये, लेकिन ऐसे लोगो की दृष्टी कुछ ज्यादा ही खुल जाती है. बहरहाल, स्त्री के प्रति मेरा नजरिया क्या है, इसे समझाने के लिए अपनी ही ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ-
    सुन्दर, कोमल कली लडकियां
    होती अकसर भली लडकियां
    कितना मीठा मन रखती हैं
    ज्यों मिसरी की डली लडकियां
    मत बंधो पैरो में बंधन
    अन्तरिक्ष को चली लडकियां
    लड़के जब नाकारा निकले
    मान-बाप को फली लडकियां
    गिरी हुयी दुनिया दिखलाती
    ससुरालों में जली शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए प्रेम रंजन जी जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश भी की है कि ‘यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है’. ये है मानसिकता. साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल जायेगी तो वो मूल्य कहाँ जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? यह सफाई देने की बात नहीं है कि मै प्रगतिशील सोच वाला हूँ लेकिन प्रगतिशीलता और व्यभिचार में अंतर है. प्रभाष जी वाले लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह लेख के सन्दर्भ को आगे बढ़ाने वाली बात है. मैंने लिखा है- ”उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” सबके लिए यह बात नहीं है. हो भी नहीं सकती, अच्छी औरते अभी भी बची हुई है, जो पति के साथ सती होना पसंद करती है, यह उनकी अपनी भावना है. सती प्रथा का मै समर्थक नहीं हूँ.हो भी नहीं सकता लेकिन मै उस भावना को नमन करता हूँ जो भावना औरत को बड़ा बनाती है. पत्नी वियोग में कोई पति भी जान दे दे तो वह भावना भी प्रणम्य है. एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है…? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. जोशी जी ने उसी भावना का सम्मान किया था, मै भी करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे कि ‘ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा रहा है? छिः…इसे तो मध्य युग में होना था’, लेकिन मै हूँ और अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ. स्त्री-शक्ति पर मेरी अनेक कवितायेँ है जो बताती है कि मेरी सोच क्या है, चिंतन क्या है. मेरा ब्लॉग देख ले, मेरी रचनाये देख ले, तो शायद दृष्टी खुल जाये, लेकिन ऐसे लोगो की दृष्टी कुछ ज्यादा ही खुल जाती है. बहरहाल, स्त्री के प्रति मेरा नजरिया क्या है, इसे समझाने के लिए अपनी ही ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ-
    सुन्दर, कोमल कली लडकियां
    होती अकसर भली लडकियां
    कितना मीठा मन रखती हैं
    ज्यों मिसरी की डली लडकियां
    मत बंधो पैरो में बंधन
    अन्तरिक्ष को चली लडकियां
    तो, मुझे शर्मिंदा होने की ज़रुरत नहीं है, शर्मिन्दा वे लोग होते रहे जो पतन को उत्तर आधुनिकता समझ बैठे है, जो स्त्री के देह -स्वातंत्र्य को ही उसकी आधुनिकता का उत्स मान रहे है. खैर, बहुत कुछ लिखा जा सकता है. फिलहाल इतना ही काफी है.

  • सरोज सागर said:

    देख रहे हैं प्रेम रंजन जी, कैसे खुल रही है स्‍वर्गीय प्रभाष जोशी की पोल। जोशी जी के ये अनुयायी दरअसल बता रहे हैं कि प्रभाष जोशी वास्‍तव में क्‍या थे। इधर एक जगह ऐसे ही एक अनुयायी का लेख मैंने पढा, जिसमें उन्‍होंने बताया था कि जोशी जी भले ही बाबरी मस्जिद के विध्‍वंस के खिलाफ रहे हों लेकिन वे राममंदिर के समर्थक थे।

    मेरे विचार से स्‍त्री विमर्श करने वाली लेखिकाओं को भी इस पर गौर करना चाहिए। और हो सके तो प्रभाष जोशी के लेखन को खारिज करने की मुहिम चलानी चाहिए।

    मैंने जोशी के निधन के बाद लगभग 50 लेख उनकी प्रशंसा में पढे। सब में एक ही बात कि जनसत्‍ता को यहां पहुंचा दिया वहां पहुंचा दिया। अरे भाई, कहां पहुंचा दिया, यहां रांची में तो मुश्किल से मिलता है और सुनता हूं महज कुछ हजार कॉपियां इसकी छपती हैं। हम जैसे लोगों को यह अखबार पसंद है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह महान अखबार है। हम इसे लेखों के लिए पढते हैं, खबरों के लिए नहीं।

    जोशी के कार्यकाल में ही इस अखबार ने सती प्रथा का समर्थन किया और पिछले दिनों एक लेखक ने सबूत के साथ बताया था कि बाबरी मस्जिद विध्‍वंस के समय इस अखबार ने कैसी भूमिका निभायी थी। इसके बावजूद इन लेखकों की निर्लज्‍जता पर गौर कीजिए कि वे उन्‍हें माफी मांगने कह रहे हैं जिन्‍होंने जोशी जी की कमियों की ओर इशारा किया था।

  • aam admi said:

    ….अच्छी औरते, गद्दारी करती औरते और व्यभिचार करती औरते….
    Girishji,

    is tarah ke classification karne aur certificate baantne se bachiye. aap hote kaun hain achchai, gaddari aur vyabhichar ki paribhasha nirdharit karnewale.

  • girish pankaj said:

    bhagvan k liye mujhe stree virodhin samjhe. striyo par meree anek rachnatmak kavitaye hai. lekh hai khaniyaan hai. prabhasjji ke lekh me ek sandarbh ke roop me jo tippanee maine kee hai, use hi pakad kar mat baith jaye bhayee. prabhash joshi ka nidhan huye 4 din bhi nahee huye aur kuchh log unhe gariyane se baaj nahi aa rahe. ham log kya itane patit ho gaye hai…? cheezo ko gaharai se n samajhna aur lathee bhanjane lagna hi jab mansikata ho jaye to aap kisee ko bhi kharij karate rahe.

  • सरोज सागर said:

    गिरीश पंकज जी, प्रभाष जोशी मेरे लिए व्‍यक्ति नहीं विचार हैं। ‘थे’ नहीं ‘हैं’। और मैं समझता हूं एक समतावादी नागरिक के लिए इस तरह के विचारों का विरोध जरूरी है।

    हां, उन्‍हें गरिया कौन रहा है ? एक शेर याद आ रहा है-

    ”हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
    वोह कत्‍ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती”

    ब्‍लॉगों में झांकिए जनाब, प्रभाष जी को श्रद्धांजलि के नाम पर कैसी राजनीति हो रही है। कोई किसी को माफी मांगने कह रहा है तो कोई इसी बहाने अपनी ही तारीफ के पुल बांध दे रहा है।

    क्‍या ये कथित रूप से माफी मंगवाने वाले प्रभाष जी के निधन पर अपनी रोटी सेंकने के फेर में नहीं हैं ??

  • गिरीश पंकज said:

    सरोज जी, आपकी बातों से सहमत हूँ, आपने जिस शालीनता के साथ बात रखी है, तरीका यही होना चाहिए. बाकी लोग भी इसी स्तर पर बात रखें, तो लगे की संस्कार जिंदा है. खैर. प्रभाषजी की आड़ में कौन-कौन रोटियाँ सेंक रहा है, मै समझ नहीं पा रहा. बहुत अधिक ब्लॉग भी नहीं देख पाता, अपने ब्लॉग में अपनी कविताये लिख देता हूँ. फिर अपने लेखन में लग जाता हूँ. चाहता हूँ समाज की बेहतरी के लिए कुछ करू. मै यही चाहता हूँ कि नैतिक मूल्य बने रहें. स्त्री हो या पुरुष. एक और बात, किसी व्यक्ति के निधन के बाद हम कम से कम तत्काल तो उसे कोसने का घिनौना कम नहीं करते. बशर्ते वह खलनायक न हो. यह हमारी संस्कृति है. प्रभाष जी कम से कम खलनायक तो नहीं थे शायद. खैर, अब हमें कुछ अच्छे चिंतन की और लगना चाहिए. कीचड उछालने की संकृति से बचना चाहिए. और किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना ही नहीं चाहिए, हाँ, गलत प्रवृत्तियों पर बात होती रहे. होनी चाहिए. लेकिन आपकी शालीनता का मै कायल हूँ. अपनी ही तारीफ के पुल बांधने वाले भी है. आप क्या कर सकते है. यही समाज है. तरह-तरह के लोग है. हमें अच्छा इन्सान बने रहना है.

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