हाथ का लिखा, दिल के बोल
♦ रवीश कुमार

‘‘पहले करता था तो कोई नहीं कहता था। अब वैसी ही भागमभाग करूं तो सब कहते हैं कि नहीं। और अंदर से भी आवाज आने लगती है कि रुको। पर मैं न बाहर की सुनता हूं न अंदर की। फिर भी इस बार जरा ज्यादती हो गयी। पिछले रविवार को लखनऊ, दोपहर कानपुर, रात फिर लखनऊ, सुबह दिल्ली और शाम इंदौर और दूसरे दिन वापस दिल्ली।’’
प्रभाषजी ने यह बात छह जनवरी 1994 को कागद कारे में लिखी थी। अपने पागलपन के अर्थ को समझाने के लिए। बताने के लिए कि इतनी व्यस्तता के बाद भी क्रिकेट के लिए जगह बचती है। पांच नवंबर 2009 को दुनिया छोड़ कर जाने से पहले वे दुनिया का चक्कर लगा आये। पटना, वाराणसी, लखनऊ, दिल्ली और फिर मणिपुर की यात्रा पर निकलने वाले थे कि शरीर ने इस बार ना कह दिया। क्रिकेट के तनाव और रोमांच ने उनकी धुकधुकी इतनी तेज कर दी होगी कि वे अपनी थकान और हार की हताशा को संभाल नहीं पाये।
हम सब एनडीटीवी इंडिया के न्यूजरूम में बात कर रहे थे कि अगली सुबह प्रभाष जी सचिन के सत्रह हजार पूरे होने पर क्या लिखेंगे। कुछ आंसू होंगे, कुछ हंसी होगी और कुछ पागलपन। नये-नये शब्द निकलेंगे और इस बार लिखेंगे तो उनकी कलम दो हजार शब्दों की सीमा को तोड़ चार हजार शब्दों तक जाएगी। शुक्रवार का ‘जनसत्ता’ देख लीजिए। उसमें प्रभाष जी का नाम तक नहीं है। जिस अखबार को बनाया वह भी उनकी मौत की खबर आने से पहले छप गया। तेंदुलकर की एक तस्वीर के साथ छह नवंबर का ‘जनसत्ता’ घर आ गया। उसने भी प्रभाष जी का इंतजार नहीं किया। इस बार प्रभाष जोशी ने अपने अखबार की डेडलाइन की कम और अपनी डेडलाइन की परवाह ज्यादा की!
धोती-कुर्ता पहन कर हाथ से लिखने और दिल से बोलने वाले वे आखिरी गांधीवादी और गंवई पत्रकार संपादक थे। दरअसल यही हिंदी पत्रकारिता का खालीपन है कि जिसने भी प्रभाष जोशी को उनके जाने के बाद याद किया, कई बार आखिरी शब्द का इस्तेमाल किया। साफ है कि किसी ने प्रभाष जोशी बनने की कोशिश नहीं की। आज हिंदी के पत्रकार समृद्धि के मुकाबले में सबके बराबर हैं लेकिन पत्रकारिता कभी इतनी कमजोर नहीं रही। हिंदी के पत्रकार कभी इतने बेजान नहीं लगे। पेशेवर संस्कार इस तरह खत्म हो जाएंगे कि हर ओहदेदार पत्रकार यह कहता मिलेगा कि प्रभाष जोशी आखिरी संपादक थे।
दरअसल प्रभाष जोशी की विरासत से छुटकारा पाना हो तो हर विश्लेषण में आखिरी लगा दीजिए। साफ है पत्रकार प्रभाष जोशी से प्रभावित तो होते रहे लेकिन प्रेरित नहीं हुए। बात साफ है उनके जैसा होने में असीम मेहनत और त्याग चाहिए। ये दोनों काम अब हिंदी के पत्रकारों के बस की बात नहीं। कुछ अपवादों की बात का यहां कोई मतलब नहीं है। हिंदी का हर पत्रकार कम मेहनत और कर्णप्रिय मगर प्रभावशाली विचारों के सहारे खुद को पार लगा रहा है। चिंता करना उसकी आदत है और कोशिश करने का काम प्रभाष जोशी जैसे बुजुर्गों के हवाले कर देना है।
हिंदी पत्रकारिता के इस पतन-काल में बची हुई चिंगारी का चले जाना भयानक सर्दी में बदन के ऊपर से गरम कंबल का हट जाना है। टीवी पर बंदरों की तरह लपकते-उचकते और अखबारों में कमजोर खबरों को अनुप्रासों से चमकाने के इस दौर में हिंदी पत्रकारिता समन्वयी हो गयी है। प्रभाष जोशी बहत्तर साल की उम्र में इस समन्वय को तोड़ने के लिए घूम रहे थे। हिंदी अखबारों कीनेताओं से पैसे लेकर खबरें छापने की करतूत के खिलाफ लिखने लगे। उन संपादकों और पत्रकारों से लोहा लेने लगे जो खबरों को छोड़ रहे थे और वक्त को परिभाषित कर रहे थे। टाइम चेंज कर गया है, हमारे समय के इस सबसे बड़े मिथक से लोहा लेने का काम प्रभाष जोशी ने ही किया। वे पागलों की तरह घूमने लगे। पटना, वाराणसी, इंदौर, भीलवाड़ा। कार से घूमते कि कम से कम देश दिख जाए। कुछ लिखा जाए। ड्राइंग रूम में बैठ कर कुछ भी नहीं लिखा। जब भी लिखा कहीं से घूम-फिर कर आने के बाद लिखा।
उनकी कमी इसलिए भी खलेगी कि उनके बाद के बचे हुए लोगों ने खुद को खाली घोषित कर दिया है। लेकिन प्रभाष जी इस कमी का रोना कभी नहीं रोये। बम-बम होकर जीया, बम-बम होकर घूमा और बम-बम होकर लिखा। नर्मदा को मां कहा और गंगा से कह दिया कि तुमसे वैसा रिश्ता नहीं बन पा रहा जैसा मां नर्मदा और मौसी क्षिप्रा से है। मालवा के संस्कारों को हिंदी के बीच ऐसे मिला दिया कि लोग फर्क ही नहीं कर पाये कि ये मट्ठा है या लस्सी।
‘जनसत्ता’ अखबार में जाना होता था तो एक नजर प्रभाष जोशी को खोजती थी। कॉलेज से निकले थे तो धोती-कुर्ते वाला संपादक अभिभावक की तरह लगता था। हिम्मत नहीं हुई उनके पास फटक जाएं। बाद में पता चला कि उनके पास तो कोई भी आ-जा सकता है। गांव बुला लीजिए गांव चले जाएंगे और उनके साथ जन्मदिन मना लीजिए तो केक काटने आ जाएंगे। उनकी इसी भलमनसाहत ने उन्हें आम आदमी का संपादक बना दिया। वे विजिटिंग कार्ड वाले संपादक नहीं थे। मुझसे चूक हो गयी। एनडीटीवी के दफ्तर में आते-जाते वक्त दूर से नमस्कार और उनका यह कह कर जाना कि अच्छा काम करते रहो, लगता था कि बहुत मिल गया।
एक बार उनके निर्माण विहार के घर में गया। क्रिकेट पर स्पेशल रिपोर्ट बना रहा था। दीवार पर बगल में अपनी तान में खोये कुमार गंधर्व की तस्वीर और सिर के ऊपर चरखा कात रहे गांधी की तस्वीर। समझ में आ गया कि ये आजकल वाले सुपर स्टार झटका टाइप पत्रकार नहीं हैं। ऐसा कैसे हो रहा है कि जिस शख्स से सिर्फ एक बार मुलाकात हुई, उसके बारे में लिखने के लिए इतनी बातें निकलती जा रही हैं। कागद कारे पढ़ने के बाद मन ही मन उनसे बात-मुलाकात होती रहती थी। सहमति-असहमति चलती रहती थी।
क्रिकेट की सामाजिकता को मेरी नजरों के सामने से ऐसे घुमा दिया कि मैं सोच में पड़ गया। आजकल हिंदी में क्रिकेट के विशेषज्ञ पत्रकार हैं। लेकिन वे स्कोर बोर्ड के जोड़-तोड़ से आगे नहीं जा पाये। उनके लिए क्रिकेट पत्रकारिता क्रिकइंफो से रिकार्ड ढूंढ़ने जैसा है। काश मैं पूछ पाता कि प्रभाष जी आप जब लिखते हैं कि क्रिकइंफो से रिकार्ड चेक करते हैं। क्रिकइंफो ने पत्रकारों का काम आसान कर दिया। उसके बेहतर रिकार्ड संयोजन से काफी मदद मिलती है। लेकिन क्या पत्रकारों ने इसका फायदा क्रिकेट के दूसरे हिस्सों को समझने के लिए उठाया। शायद नहीं। अगर प्रभाष जी क्रिकेट की रिपोर्टिंग के आदर्श रहे तो बाकी खेल पत्रकारों ने उसे आगे बढ़ा कर समृद्ध क्यों नहीं किया।
‘जनसत्ता’ एक दस्तावेज है। प्रभाष जोशी उसके इतिहासकार हैं। जो लिखा दिल और दिमाग से लिखा। तमाम भावनात्मक उतार-चढ़ाव के बीच भी विवेक की रेखा साफ नजर आती थी। उनके आलोचक भी हैं। होने चाहिए। जिस व्यक्ति ने सब कुछ लिख दिया हो, उसके आलोचक नहीं होंगे तो किसके होंगे। वे अपने सही और गलत को हमारे बीच लिखित रूप में छोड़ गये हैं। जिसे जो उठाना है, उठा ले।
हिंदी पत्रकारिता में प्रतिभा की आज भी कमी नहीं है। उन प्रतिभाओं में भरोसे और प्रयोग की भयंकर कमी ने खालीपन को और बढ़ा दिया है। प्रभाष जोशी ने अपना भरोसा खुद ढूंढ़ा। उन नौजवान पत्रकारों के बीच जाकर उसे और बढ़ाया जो उन्हें सुनने के लिए तैयार थे। उनके लिए वक्त निकाला। दरअसल यही मुश्किल है प्रभाष जोशी को याद करने में। कब आप उनके बारे में बात करते-करते पत्रकारिता की बात करने लगते हैं और कब पत्रकारिता की बात करते-करते प्रभाष जोशी की बात करने लगते हैं, पता नहीं चलता। दोनों को अलग कर लिखा ही नहीं जा सकता। उनका खुद का इतना लिखा हुआ है कि उनके बारे में आप जितना लिखेंगे, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा। शायद इसलिए भी कि वे हम सबके लिए बहुत कुछ छोड़ गये हैं।
शुक्रवार की सुबह एम्स में उनके लिए ताबूत आया तो उस पर लिखा था – मॉर्टल रिमेन्स ऑफ प्रभाष जोशी। जो छोड़ गये वह तो हिंदी पत्रकारिता की परंपरा का है। बाकी बचा तो बस प्रभाष जोशी का नश्वर शरीर। वह भी राख में बदल कर नर्मदा मां की अविरल धारा की गोद में खेलने चला गया। (जनसत्ता से साभार)
(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडिटर। नामी ब्लॉगर। कस्बा नाम से मशहूर ब्लॉग। दैनिक हिंदुस्तान में ब्लॉगिंग पर एक साप्ताहिक कॉलम। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं। उनसे ravish@ndtv.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









यह हमारी हिन्दी पट्टी का चरित्र है. और हम बडे अमर, बडे धांसू और बडे ये और वो होने का दम्भ पाले रहते हैं. मरने के बाद भी यहां की कटुता खतम नहीं होती जनाब. राम का देश है, जिस राम ने मरणासन्न रावण के पास लक्ष्मण को भेजा था कि रावण से नीति की बातें सीख ले. उसी देश में एक विचारक की यह गति. अब तो हम इतने ढीठ गो गये हैं कि हमें शर्म तक नहीं आती.
‘… phir bhi Ravish aapse ummeeden hain, aur aapke paas (sahi)waqt aur madhyam bhi hai un ummeedon ko pura karne ka! Agar kisi aur me na mubtila hon to isey bhi junoon ki shakl di ja sakti hai…!
Aapka kya khayal hai?
धन्य हैं वो लोग जिन्हें प्रभाष जी के साथ काम करने का मौका मिला……
Prabhasji ko janmin tarike se yad kiya hai ravish ji ne. unka sara likha-padh hamare samane hai. padhane me achchha lagata tha unka likha har shabd, dhyan rahe asahamati ki waha bharpur jagah hai. unke likhe se hamesha sahamati nahi ban sakati thi. yeh sambhav bhi nahi hai, lekin prabhas joshi ki anupasthiti ka bad artha hai. we hindi patrakarita ke ek bade nam the. unka likha hamare liye is mayane mein important hai ki we jiwan anubhavoan ki sukshma padtal karte hain.
unhone jo kaha , likha we sbhi barik mulyankan ke kabil hain.
unke achanak jagman ne hame awak rakh diya hai. abhi to lekahan or vachik kshetra me dhuwandhar bating kar rahe the.
Leave your response!
Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)जनमत
Tag Cloud
abraham hindiwala alok mehta anil chamadia anil yadav arundhati roy ashutosh ibn7 bihar blog debate dainik bhaskar dalit dilip mandal first narendra memorial award gorakhpur harivansh hindi hindi cinema Hindi Literature hindi media jagadishwar chaturvedi jansatta kabaadkhaana kapil sibal mahatma gandhi international hindi university MF Hussain nai dunia namwar singh pankaj srivastav politics prabhash joshi prabhat khabar rahul dev rajendra yadav rajya sabha rangnath singh ravish kumar TRP udayan sharma uday prakash vibha rani Vibhuti Narayan Rai vineet kumar vn rai yogi adityanath मीडिया मंडी मोहल्ला मुंबईArchive