कवि की अभद्रता के ख़िलाफ़ एक हस्ताक्षर अभियान
♦ जनवादी लेखक संघ, मुंबई
मोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर पिछले कुछ दिनों से विजयशंकर चतुर्वेदी प्रकरण में काफी उत्तर-प्रत्युत्तर छपे हैं। स्वयं विजयशंकर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ का बहिष्कार शीर्षक से एक लंबी टिप्पणी दी है। यह टिप्पणी भ्रामक और मिथ्या है। इसके विपरीत वे इस शहर में पिछले डेढ़ दशक से अभद्र आचरण और घटिया हरकतों में लिप्त रहे हैं। शराब पीकर रात-बेरात फोन करना, स्त्रियों को गाली देना और बकवास करना, लोगों से झगड़ा मार-पीट करना, इनके लिए आम बात है। कई बार ऐसा लगता है कि इस तरह के व्यवहार के लिए श्री विजयशंकर चतुर्वेदी स्वयं को गर्वित महसूस करते हैं। ये बातें नज़रअंदाज़ की जा सकती थीं, बल्कि इतने वर्षों तक प्राय: की जाती रही हैं, लेकिन विजयशंकर खुद को लेखक समाज का हिस्सा मानते हैं। विडंबना यह है कि वे लेखकीय गरिमा और दायित्व का रत्तीभर भी ख्याल नहीं रखते। नशे में तो प्राय: उद्दंड हो जाते हैं। इसी आचरण के चलते एक दशक पहले वे अपने पारिवारिक जीवन को धू-धू जलता देख चुके हैं। तब मुंबई का लेखक समाज ही इनकी मदद को आगे आया था – इस भावना से कि वे अपनी दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त हो कर अपने जीवन को ठीक करने की कोशिश कर सकें। लेकिन खेद है कि बीते वर्षों में श्री विजयशंकर चतुर्वेदी के व्यवहार में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं आया है। बल्कि इधर उनकी उद्दंडता और अराजकता बढ़ी ही है। उन्होंने अपने इस व्यवहार को सही साबित करने की कोशिश भी की है। हम मुंबई के लेखक श्री विजयशंकर चतुर्वेदी के इस उद्दंड, उच्छृंखल और असामाजिक व्यवहार से बहुत आहत और क्षुब्ध हैं। हम इस तरह की प्रवृत्तियों की भर्त्सना करते हैं, श्री विजयशंकर चतुर्वेदी आजकल जिनके ज्वलंत उदाहरण बने हुए हैं।










यार, अब बंद भी कीजिए. दुर्भाग्यपूर्ण है ये प्रसंग और यदि विजय सचमुच खलनायक हैं, तब भी. क्योंकि इस तरह उनकी खल (?) प्रवृत्ति का आप और ज़्यादा प्रचार कर रहे हैं.
ये धन और यश के लोभी संशोधन माकपा (माकपा का मजदूर वर्ग और उसकी क्रांति से नाता कब का टूट चुका है वह तो बस संसद के सुअरबाडे में जलेबियां पार रही है) से सम्बद्ध लेखक संगठन के स्वनाम धन्य रचनाकार अपनी आत्मा के सामने नंगे होकर खुद अपने से सवाल करें कि उन्होंने क्रांति और जनता के लिए क्या किया है। फिर किसी के खिलाफ फतवा जारी करें।
इतनी गलीज और गिरी हुई हरकत संशोधनवादी खजहे कुत्ते ही कर सकते हैं, आश्चर्य की कोई बात नहीं। गरियाओ जमकर गरियाओ, क्योंकि तुम लोगों के पास सकारात्मक करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। कुत्ते भौंकते रहते हैं हाथी अपनी राह चलता रहता है।
विजय शराबी और अराजक हैं मेरी शैतान से दुआ है कि वे इसी तरह से आवारागर्द बने रहें क्योंकि सद गृहस्थ होने से बड़ी गाली मेरी नजर में दूसरी नहीं होती जबकि आदमी अपनी सात पीढि़यों की चिंता में और स्वयं अपने महिमामंडन में मगन रहता है।
विजय को मुंबई से निकालना चाहते हो, कोशिश करते रहो। विफलता ही हाथ लगेगी।
यह हाथी है? अरे हत्यारा है यह। तुम कामता, जिस तत्परता से तुम जवाब दे रहे हो, सभी जान चुके हैं कि तुम विजय शंकर ही हो, जो कामता के नाम उसके पक्ष में प्रतिक्रियाएं लिख रहा है। जनवादी लेखक संघ या उसकी पार्टी का राजनीतिक दृष्टिकोण गलत हो सकता है, उसमें और भी कई खामियां हो सकती है्र। उन पर अलग से बात करो। विजय इस शहर में जिस कमीनेपन का व्यवहार करता रहा है, उसे उचित ठहराने के लिए जनवादी लेखक संघ की पार्टी लाइन वगैरह की आलोचना का क्या अर्थ निकलता है। तुम कहना चाहते हो कि विजय अराजक है। तुम अराजक का अर्थ जानते हो। विजय यदि अराजक भी होता, तो बेहतर ही होता, वह तो दरअसल अपराधी मानसिकता का व्यक्ति है। और जिन लेखकों ने दस्तखत किए हैं, वे जनवादी लेखक संघ के नहीं हैं, उनमें से दो-चार ही जनवादी लेखक संघ के लोग हैं, इस विरोध पत्र में मुंबई के सभी विचारों के लेखकों के दस्तखत हैं। और सुन लो मुंबई मंे दूरियां और व्यस्तताएं इतनी हैं, कि ये दस्तखत करवाने में भी काफी समय लग गया। अगर तुम चाहोगे तो मुंबई के एक-एक लेखक का दस्तखत इस मामले में लिया जा सकता है, अगर तुम चाहोगे तो लेखक समुदाय से इतर विजय जिन जिन जगहों पर रहा है, वहां के इसके पचासों पड़ोसियों का दस्तखत भी लिया जा सकता है, और जहां जहां इसने नौकरियां की हैं, वहां के इसके वर्तमान और पूर्व सहकर्मियों का दस्तखत भी लिया जा सकता है। और तुम इतने सारे लोगों को सदगृहस्थ कह कर साबित क्या करना चाहते हो? ये सभी अलग अलग प्रवृत्तियों के लोग हैं, अलग अलग स्वभाव और सामाजिक पृष्ठभूमि के, और जो अराजक शब्द तुम विजय की कमीनगियों के लिए इस्तेमाल कर रहे हो, तो सुन लो कि इनमें से कुछ अराजक प्रवृत्ति के लोग भी हो सकते हैं। तुम अराजकता का अर्थ राजनीतिक शब्दकोशों में ढूंढ लो। विजय महज एक महत्वाकांक्षी कवि और एक घटिया इंसान है। यह जिस रास्ते पर चलता रहा है, उसका अंत किसी अंधी गली में ही होगा। अराजक व्यक्ति ऐसा नहीं होता। यह सुदीप की जेब में पेशाब कर चुका है – सार्वजनिक रूप से, लेखकों की पत्नियों को फोन पर गंदी गालियां दे चुका है, लोगों से इसके दुव्र्यवहार और कमीनेपन के अनगिनत किस्से हैं, जिसकी एक करुण परिणति इसकी पत्नी के आत्मदाह में हुई थी। अगर यह इतना ही अराजक है तो यह जिस रिलायंस कंपनी में कई वर्षों से काम कर रहा है, वहां अपनी अराजकता का एक छोटा-सा नमूना प्रस्तुत भर कर दे, तो इसे पता चल जाएगा कि समाज क्या होता है, सदगृहस्थ क्या होता है और अराजकता क्या होती है। वहां यह शालीनता का नाटक करता है। इसकी अराजकता को झेलने के लिए इसके परिवार के लोग, पड़ोसी और लेखक-कवि-पत्रकार ही क्यों हैं? क्योंकि वे इसकी हरामजदगियों को इतने सालों से इसी लिए सहन करते रहे कि भई अपने ही बीच का आदमी है, तुम्हारी तरह वे भी यही समझते रहे कि यह अराजक है और कवि-लेखकों की अराजकता को नजरंदाज किया जाना चाहिए। इसे अपनी पत्नी को मौत तक पहुंचाने की सजा नहीं मिला। इन्हीं सब कारणों से इसका हौसला इतना बढ़ता गया कि इसने अब मुंबई के लेखकों आदि के घर फोन कर उनकी पत्नियों को गाली देना शुरू किया। क्या इस कुकर्म की इसे कोई चेतावनी नहीं दी जानी चाहिए? कोई प्रतिरोध नहीं किया जाना चाहिए?
साथियो
जलेस ने भी आखिर बता ही दिया कि एक विजयशंकर उस पर कितना हावी हो चुका है। जिसे भी कविता की थोड़ी भी तमीज है वह (आलोक भट्टाचार्य सहित)मानता है कि विजय सबसे अच्छे न सही, पर अच्छे कवि हैं। इस कवि ने जलेस की भूमिका पर सवाल किया था। इस सवाल से सहमति-असहमति अपनी जगह – पर जलेस इस सवाल से ही इस कदर बौखला गया कि विजय पर पिल पड़ा। अब यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि कुछ लोग नाम बदल-बदल कर विजय से अपनी कुढ़न निकालते रहे। अब तो जलेस खुद इस अभियान में शामिल हो चुका है। लिहाजा, कुछ व्यक्तियों पर दोष मढ़ने का कोई मतलब नहीं है।
सवाल यह है कि जलेस ने विजय के बहिष्कार का एलान किया और विजय ने जलेस का। मामला बराबर हो गया। अब जलेस क्यों इतना चिंतित है कि एक व्यक्ति विजयशंकर के पीछे हस्ताक्षर अभियान चलाने की जरूरत महसूस कर रहा है? क्या बहिष्कार के अपने एलान पर भरोसा नहीं है? क्या उसे लगता है कि उसके एलान का मुंबई के रचनाकारों पर खास असर नहीं पड़ेगा? आखिर क्यों उसे एक-एक लेखक, कवि के पास पहुंच कर उससे हस्ताक्षर लेना पड़ रहा है? क्याइसलिए कि अगर एलान बेअसर होने लगे तो एक-एक लेखक को यह दिखा सकें कि देखिए आपने हस्ताक्षर किया था? क्या यह मान लिया जाए कि जलेस को इस विजयशंकर विरोधी अभियान के अलावा अपने लिए और कोई सकारात्मक काम बच गया नहीं लगता?
जो कुछ लोग लगातार विजय को धमकी देते रहे हैं, उनकी बात करने का मतलब नही। उनकी कायरता तो इसी बात में झलकती है कि वे अपने शब्दों के साथ खुद अपना नाम तक जोड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे।
लेकिन जलेस क्या चाहता है यह उसे साफ करना चाहिए। क्या उसे विजयशंकर के अस्तित्व पर एतराज है? क्या वह विजय को जबरन शहर से निकालना चाहता है या जैसा कि हृदयेशजी ने अपने पत्र में परोक्ष धमकी दे ही दी थी, अकेलेपन में डालकर विजय को मारना चाहता है? अगर ऐसा है तो आपको एहसास हो या न हो पर आप यानी जलेस विजय के इस आरोप को सच साबित कर रहे हैं कि जलेस प्रतिभा को तराशने के बजाय उसकी कब्र खोदने का काम करता है।
और अगर आप सब अपनी ताकत (संख्या बल) के अहंकार में चूर यह समझ रहे हैं कि एक व्यक्ति की अराजकता या उसकी शराब पीने की आदत का फायदा उठाते हुए आप झूठ-सच का भेद मिटा देंगे और उस व्यक्ति को मरने पर मजबूर कर देंगे तो आपको भी अपना इलाज कराने की जरूरत है।
साहित्य सृजन और रचनाकर्म के दावों की बात तो दूर विजय पर तमाम झूठे-सच्चे आरोप लगाते हुए आप लोग मनुष्यता से कितना दूर हो गए हैं यह भी सोचिए।
प्रणव
जहालत की हद होती है।
तुमने लिखा है –
1- विजय सबसे अच्छे न सही पर अच्छे कवि हैं।
– विजय सबसे अच्छे या अच्छे कवि हैं, इस मुददे का इस बात से क्या मतलब कि यह व्यक्ति रात रात फोन कर लोगों को यहां तक कि उनकी पत्नियों को गाली देता है
2-जलेस ने विजय के बहिष्कार का ऐलान किया और विजय ने जलेस का। मामला बराबर हो गया। जलेस विजय के पीछे हस्ताक्षर अभियान चलाने की जरूरत क्यों महसूस कर रहा है?
– क्योंकि यह कोई मामला बराबर करने का मसला नहीं है। विजय द्वारा लगातार लोगों के साथ किए गए दुव्र्यवहार के प्रतिकार का मसला और उसकी हरकतों पर रोकथाम का मसला है।
3- जलेस क्या चाहता है उसे साफ करना चाहिए
– जलेस यह चाहता है कि विजयशंकर इस बात की लिखित माफी मांगे कि उसने हाल ही में शैलेश सिंह और धीरेंद्र अस्थाना की पत्नी को फौन पर अश्लील बातें कहीं और गालियां दीं। और इस बात का वचन दे कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा। तुम प्रणय उसके इतने शुभचिंतक बन रहे हो, उसे क्यों नहीं समझाते कि उसे जो भी अराजकता करनी हो, वह अपने रिलायंस के आफिस में करे, लोगो ंकी पत्नियों के साथ बदसलूकी करने की बजाय।
तुम इस सारे मामले में विजय की सृजनात्मकता, उसकी महानता, उसका कवि होना काहे घसीट रहे हो। भइया तुम्हें इतनी तमीज नहीं है कि यह समझ सको कि अगर कोई व्यक्ति फोन करके लोगों के घर पर उनकी पत्नियों के साथ गाली गलौज करे तो उसके साथ क्या किया जाना चाहिए। यह सारा मामला इतना खिंचा ही इसलिए कि इस अमनुष्य को अपने किए का कोई खेद ही नहीं। और इसके जीवन इतिहास के पन्ने भी इसीलिए पलटे गए ताकि यह सामने लाया जा सके कि इसके इस लुंपेन आपराधिक चरित्र का परिणाम इसकी पत्नी के आत्मदाह के रूप में हो चुका है। इसने अपनी बेटी का भविष्य बरबाद कर दिया है। और अब भी यह फोन करके रातों को लोगों को गालियां देता है। स्त्रियों को अश्लील गालियां देता है।
प्रणव, तुम डिफेंड किस चीज को कर रहे हो? अगर तुम विजय के इतने बड़े शुभचिंतक हो तो उसे दस झापड़ मार कर यह समझाओ कि बेटा ये हरकतें बंद करो, वरना किसी भी दिन लेने के देने पड़ जाएंगे। मगर तुम तो उसको इतना गौरवान्वित कर रहे हो और विवेकहीन बातें कर रहे हो। अगर कल को तुम्हारे इस गौरवान्वयन से उसकी ये हरकतें जारी रहती हैं और फिर से उसके जीवन में कुछ भयानक घटित हो जाता है, तो तुम क्या खुद को माफ कर पाओगे। तुम्हारे जैसे दोस्तों की शह पर वह आज यहां पहुंचा है कि उसके नाम पर लोग थूकते हैं। तुम उसके दोस्त हो या दुश्मन — जरा अपने गिरेबान में झांक कर देखो।
जनश्रुति है कि अहीरों में बुद्धि का लेशमात्र भी नहीं होता तुम इसे क्यों सच साबित करने पर तुले हो यादव जी।
विजय से हमारी बात हो गयी है उसके ऊपर लगे सारे आरोप मनगढ़ंत और झूठे और लोगों की निजी कमीनगी से प्रेरित हैं।
मैं कामता प्रसाद, विजय शंकर नहीं हू।
मैं मुंबई में वर्षों रह चुका हूं तुम लोगों को यकीन क्यों नहीं हो रहा।
खजहे कुत्तों की तरह विजय के अमानवीय होने की तोतारटंत बंद करो। मैं छाती ठोंक कर कहता हूं ब्लाग्स पर विधवाविलाप करने की बजाय पुलिस के पास जाओ, अगर तुम्हें लगता है कि विजयभाई तुम जैसे लोगों की पत्नियों को गरिया रहे हैं। काहे को मूर्खताभरी बातों में समय जाया करते हो। ठोस परेशानी पर ठोस कार्रवाई।
यह बात 12 बजे के बाद तुम्हारे भेजे में घुसेगी अभी नहीं। अब कोई यह न कहे कि कामता प्रसाद विजय शंकर है। हस्ताक्षर अभियान चलाकर तुम अधमरे लोग क्या साबित करना चाहते हो। रिलायंस की विजय की नौकरी तुम्हारी आंखों की किरकिरी है समझा जा सकता है।
और हां राकेश जी अराजक का मतलब आत्महंता नहीं होता, असमाजिक नहीं होता, मनुष्यविरोधी नहीं होता। क्या आप जैसे वरिष्ठों को यह समझाना पडेगा।
भाइयो, बहुत हो चुका. आज ही जबलपुर से लौटा तो पता चला कि यह प्रसंग अब तक चल ही रहा है. संगठन में शक्ति होती है यह अब अनुभव हो गया. मुंबई जलेस में शक्ति है यह भी जाहिर हो गया. यह जानकर सुकून मिला कि मुंबई जलेस ने वर्गशत्रु की पहचान आखिरकार कर ही ली और वह है विजयशंकर.
उस बहिष्कार वक्तव्य के बाद यह मेरी पहली टिप्पणी है. इस दरम्यान मेरे पक्ष-विपक्ष में बहुत लिखा-कहा गया. दुर्भाग्य की बात यह है कि जो मेरे पक्ष में अलग-अलग लोगों ने कहा उसे मेरे द्वारा ही लिखा-कहा माना गया. इसमें मैं बहुत अधिक मदद नहीं कर सकता लेकिन इतनी अपील जरूर करता हूँ कि जो भी लोग मेरे पक्ष में लिख रहे हैं कृपया वह बंद करें क्योंकि ऐसा करके वह आग में घी का ही काम करेंगे. मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि अब के बाद मैं कुछ नहीं लिखूंगा.
ताज़ा पत्र में जिन लोगों के दस्तखत हैं उनमें से कुछ वरिष्ठ लोगों ने गारंटी ली थी कि अब यह प्रसंग समाप्त हो गया है. लेकिन पुनः यह सब देख कर मन सचमुच भारी हो रहा है. मुंबई में बीस वर्ष जीवन बिताया है, कुछ लोगों की इसमें सकारात्मक भूमिका रही तो कुछ की नकारात्मक. आज मेरा जो कुछ भी व्यक्तित्व है इन्हीं दोनों तरह की भूमिकाओं की वजह से है. इस बीच कुछ भद्रताएं तो कुछ अभद्रताएं भी हुई होंगी, लेकिन मैं उन सब अभद्रताओं के लिए सम्बंधित पक्षों से क्षमा चाहता हूँ और एक बार फिर अपील करता हूँ कि मेरे पक्ष में आगे बिलकुल कुछ न लिखा जाए. धन्यवाद!
विजयशंकर के पक्ष में किस्म किस्म के कुतर्क गढ़ने वाले इन दोनों महानुभावों प्रणव प्रियदर्शी और कामता से पूछना चाहती हूं कि अगर विजय इन दोनों की पत्नियों को शराब के नशे में धुत्त होकर गाली देता, तो उनका क्या रुख होता? अगर विजय की पहली पत्नी इन दोनों की बहन होती, तो वे इसके साथ किस तरह का बर्ताव करते? अगर विजय की संतान ये दोनों होते, तो उनकी इस बाप के बारे में क्या सोच होती?
कामता और प्रणव कोई कुतर्क मत करना और न ही विजय के महान कवि होने का राग अलापना। सिर्फ और सिर्फ मेरे पूछे गए सवाल का जवाब देना – और अगर भीतर कोई अंतरात्मा हो, तो उसे टटोल कर देना।
सरिता सिंह
सरिता सिंह का जवाब क्यों नहीं देते ये दोनों महानुभाव प्रणव प्रियदर्शी और कामतानाथ? क्या इनके मुंह में दही जम गई है या जुबान छिल गई है? बहुत सही लिखा है सरिता सिंह ने। नारी जाति का अपमान करने वाले विजय का साथ ये दोनों चंगू मंगू जिस अंदाज में बिना सच को समझे काफी समय से दे रहे हैं, इनकी भी मानसिकता पर संदेह किया जा सकता है।
सविता
मेरे प्रिय जनवादियों, आप लोगों ने विजय शंकर का सच जग जारि करने का पुनीत कार्य दस साल पहले किया होता तो शायद इसकी बीवी जिंदा रहती और एक बेटी अनाथ होने से बच जाती। कैसे अब इस कुकवि की टें बोल गई है, देखा जा सकता है। बधाई मोहल्ला जी, आपने हिंदी जगत पर बहुत बड़ा अहसान किया है। कम से कम हम मुंबई के लोग तो आपके जीवन भर आभारी रहेंगे। ऐसे कपटियों की पोल तो खुलनी ही चाहिए। आपने हस्ताक्षरित आलेख के साथ जो इस कुकवि का पिस्तौल और खूून के बीच चित्र सजाया है, वह ही इसकी वास्तविक शक्ल दिखाने के लिए काफी है।
परनाम।
0 रिषिकेश
लात का भूत बातों से नहीं मानता। अब विजय शंकर की समझ में बात आ गई है कि उसकी चाल किसी भी स्तर पर नहीं गलने वाली। उसने इस बार भुजा उठाकर कोई बात नहीं कही (भाइयो, यह भुजा अब मरोड़ दी गई है) उसने लिखा है कि उसके पक्ष में भी लोगों ने लिखा और विपक्ष में भी। गौर फरमाया जाए कि पक्ष में सिर्फ इसके बेवड़े मित्रों प्रणव प्रियदर्शी और कामता ने कुतर्क दिए हैं, जिन्हें मुंबई छोड़े एक अरसा हो गया है। एक दिल्ली में बैठ कर चतुराई दिखा रहा है, तो दूसरा लखनऊ में। जब कि इसके खिलाफ कितने लोग हैं, इसका प्रमाण हस्ताक्षरित पत्र है। लोग खुलकर सामने आए हैं। आखिर क्यों? प्रणव और कामता की इन बड़े लेखकों के सामने क्या साख है और क्या औकात? निश्चित रूप से अब तक विजय की रूह तक कांप चुकी होगी, क्योंकि अब उसने जरा भी किसी के साथ भी बदतमीजी की, तो सीधे पुलिस स्टेशन में एफ आई आर दर्ज करवा दी जाएगी। इसे जरा भी नहीं बख्शा जाएगा।
रवि
मोहल्ला जी
परनाम
कहां गया यह बाघ का बिल्ला विजयषंकर?
बड़ी बड़ी बातें बघार रहा यह कामता कितना बड़ा जाविादी व्यक्ति है जिसने मेरे नाम के आगे लगे यादव सरनेम का जनश्रुति की सहायता लेते हुए मजाक उड़ाने की पुरजोर कोशिश की है। हालांकि ऐसा कर इसने अपने आप पर थूका है। एक और जनश्रुति है कि काना काजी, लंगड़ा पाजी। क्या मोहल्ला के सम्मानीय पाठकों को पता है कि यह कामता भेंगी आंख वाला व्यक्ति है? आधा काना। तो इसकी दृष्टि हर तरह से कमजोर है। (मुआफ कीजिएगा मुहल्ला जी, मैं इस गलीज आदमी को उसी की भाषा में जवाब देने पर मजबूर हूं।) अब एक और बात बता दूं कि यह कामता मुंबई में विजय की तरह ही हरामजदगियां करता रहा है। आखिरकार इसे मुंबई छोड़ना पड़ा। माकपा को सीख दे रहा यह कपटी तब शिवसैनिकों के मुखपत्र सामना से जुड़ा हुआ था। यह घेार दक्षिणपंथी मानसिकता का जातिवादी आदमी है। और बेहद अवसरवादी। यही वजह है कि यह कहीं भी किसी भी शहर में टिक नहीं पाया है। कामता, अगर तुझे चतुर्वेदियों में से ही लगाव है, तो गीत चतुर्वेदी को चुन। जिसने तुमसे उम्र में छोटा होने के बावजूद बड़ी सफलता पाई है। बड़ी मेहनत और लगन से वह आगे बढ़ा है। गीत का नाम इसलिए ले रहा हूं कि तुम उसे बहुत अच्छी तरह से जानते हो। उसकी शरण गहो, तो पान खाने को मिलेंगे। विजय के साथ रहोगे तो कान ही कटवाओगे। लेकिन तुम बड़े सठ हो, तुम ऐसा नहीं करोगे। एक और जनश्रुति है कि आपका अक्स आपके दोस्त होते हैं। तुम क्या हो और किस प्रवृत्ति के व्यक्ति हो, इसका अंदाजा तुम्हारी दोस्ती से लग चुका है। आवारागर्द बने रहने का विजय को दिए तुम्हारे आशिवर्चन उसका बहुत अहित कर रहे हैं। तुम्हारी शैतानी दुआ लगातार उसकी पोल खोल रही है। यही बात मंदबुद्धि प्रणव प्रियदर्शी पर लागू हेाती है। न प्रणय की कोई किसी भी स्तर पर साख है, न ही तुम्हारी। दोनों ही खजहे कुत्ते की तरह भौंकते रहो। तुम ही एक्सपोज हो रहे हो। विजय कुमार , सलाम बिन रजाक, सैयद रियाज, धीरेंद्र अस्थाना, अनूपसेठी, आलोक भटटाचार्य जैसे दर्जनों नामचीन लोगों ने अगर हस्ताक्षर किए हैं, तो यह मामूली बात नहीं है। किसी ने जबरन यह काम नहीं करवाया है। यह मुंबई के इतिहास में पहली बार हुआ है। विजय एक औसत दर्जे का प्रतिभाहीन कवि है। इसी की उम्र के आसपास के इससे अच्छे कवि मुंबई में कई हैं, जो चुपचाप बिना शोरगुल के अपना काम कर रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं । यहां तक कि गीत चतुर्वेदी भी मुंबई का ही है। राकेश जी ने सही ही लिखा है कि विजय नाम का यह धूर्त रिलायंस कंपनी में आखिर क्यों शालीन बना रहता है? यह एक बड़ा सवाल है। वहां क्यों अपने सहयोगियों को गली नहीं देता है। दरअसल इसे पता है कि ऐसी स्थिति में इसे कंपनी से बाहर का रास्ता फौरन दिखा दिया जाएगा।
रमेश यादव
कमता नाथ जी
विजय शंकर व्यक्ति नहीं एक प्रवृत्ति है जो अमूमन हर शहर में मिल जाएगी। यदि आप किसी शहर में रह रहे होंगे तो अवश्य आपसे भी ऐसी प्रवृत्तियों का पाला पड़ा होगा। आपको पढ़ के ऐसा तो नहीं लगता कि आप कभी विजयशंकर से मिले भी होंगे। मुंबई शहर का एक एक लेखक उनकी कारगुजारियों से पीड़ित है। उनका इस शहर में और लेखक बिरादरी में होना हम सबके लिए कलंक जैसा है। दो चार शराबियों के कमीनेपन की वजह से यहां कई लोगों ने अपने परिचय से पत्रकार या कवि शब्द हटा दिया है । कवि और पत्रकार के माने एक बदतमीज, बदमिजाज, बेवड़ा व्यक्तित्व बन कर रह गया है। एक जमाने में पत्रकारिता एक जज्बे जैसा था। इन्हीं लोगों ने इस पेशे को बदनाम करके रख दिया है। कामतानाथ जी अपने अल्फाज सहेज कर रखें, कहीं और काम आएंगे। ऐसे व्यक्ति की हिमायत न करें। मेरी तो यही राय है यदि न मानें तो विजयशंकर के निकट जाकर एक बार अवश्य देखें यदि वे आपकी ऐसी तैसी पर न उतर आएं तो मैं अपना सर झुका लूंगा। मुंबई वालों को उसका बहुत अनुभव है। जिस थाली में खाया वहीं छेद किया। सुदीप जैसे कथाकार की जेब में पेशाब करने की टुच्चई सिर्फ वही कर सकता है। ललिता अस्थाना को गाली देने की हिमाकत वही कर सकता है। एक दौर में धीरेंद्र और ललिता का जूठन खाकर जिंदा रहने वाला व्यक्ति उन्हीें को गाली देने की हिम्मत करे, सिर्फ वही ऐसा कर सकता है। आप यदि उसके पक्ष में खड़े रहना चाहते हैं और वाकई साहित्य या पत्रकारिता आपका पेशा है तो वह दिन दूर नहीं ज बवह आपकी जेब में भी पेशाब करेगा और आप पर थूकेगा भी।
हृदयेश मयंक
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