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	<title>Comments on: कवि की अभद्रता के ख़‍िलाफ़ एक हस्‍ताक्षर अभियान</title>
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		<title>By: hridyesh mayank</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/signature-campaign-against-vijayshankar-chaturvedi/comment-page-1/#comment-4423</link>
		<dc:creator>hridyesh mayank</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Nov 2009 04:22:07 +0000</pubDate>
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		<description>कमता नाथ जी

विजय शंकर व्यक्ति नहीं एक प्रवृत्ति है जो अमूमन हर शहर में मिल जाएगी। यदि आप किसी शहर में रह रहे होंगे तो अवश्य आपसे भी ऐसी प्रवृत्तियों का पाला पड़ा होगा। आपको पढ़ के ऐसा तो नहीं लगता कि आप कभी विजयशंकर से मिले भी होंगे। मुंबई शहर का एक एक लेखक उनकी कारगुजारियों से पीड़ित है। उनका इस शहर में और लेखक बिरादरी में होना हम सबके लिए कलंक जैसा है। दो चार शराबियों के कमीनेपन की वजह से यहां कई लोगों ने अपने परिचय से पत्रकार या कवि शब्द हटा दिया है । कवि और पत्रकार के माने एक बदतमीज, बदमिजाज, बेवड़ा व्यक्तित्व बन कर रह गया है। एक जमाने में पत्रकारिता एक जज्बे जैसा था। इन्हीं लोगों ने इस पेशे को बदनाम करके रख दिया है। कामतानाथ जी अपने अल्फाज सहेज कर रखें, कहीं और काम आएंगे। ऐसे व्यक्ति की हिमायत न करें। मेरी तो यही राय है यदि न मानें तो विजयशंकर के निकट जाकर एक बार अवश्य देखें यदि वे आपकी ऐसी तैसी पर न उतर आएं तो मैं अपना सर झुका लूंगा। मुंबई वालों को उसका बहुत अनुभव है। जिस थाली में खाया वहीं छेद किया। सुदीप जैसे कथाकार की जेब में पेशाब करने की टुच्चई सिर्फ वही कर सकता है। ललिता अस्थाना को गाली देने की हिमाकत वही कर सकता है। एक दौर में धीरेंद्र और ललिता का जूठन खाकर जिंदा रहने वाला व्यक्ति उन्हीें को गाली देने की हिम्मत करे, सिर्फ वही ऐसा कर सकता है। आप यदि उसके पक्ष में खड़े रहना चाहते हैं और वाकई साहित्य या पत्रकारिता आपका पेशा है तो वह दिन दूर नहीं ज बवह आपकी जेब में भी पेशाब करेगा और आप पर थूकेगा भी।

हृदयेश मयंक</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कमता नाथ जी</p>
<p>विजय शंकर व्यक्ति नहीं एक प्रवृत्ति है जो अमूमन हर शहर में मिल जाएगी। यदि आप किसी शहर में रह रहे होंगे तो अवश्य आपसे भी ऐसी प्रवृत्तियों का पाला पड़ा होगा। आपको पढ़ के ऐसा तो नहीं लगता कि आप कभी विजयशंकर से मिले भी होंगे। मुंबई शहर का एक एक लेखक उनकी कारगुजारियों से पीड़ित है। उनका इस शहर में और लेखक बिरादरी में होना हम सबके लिए कलंक जैसा है। दो चार शराबियों के कमीनेपन की वजह से यहां कई लोगों ने अपने परिचय से पत्रकार या कवि शब्द हटा दिया है । कवि और पत्रकार के माने एक बदतमीज, बदमिजाज, बेवड़ा व्यक्तित्व बन कर रह गया है। एक जमाने में पत्रकारिता एक जज्बे जैसा था। इन्हीं लोगों ने इस पेशे को बदनाम करके रख दिया है। कामतानाथ जी अपने अल्फाज सहेज कर रखें, कहीं और काम आएंगे। ऐसे व्यक्ति की हिमायत न करें। मेरी तो यही राय है यदि न मानें तो विजयशंकर के निकट जाकर एक बार अवश्य देखें यदि वे आपकी ऐसी तैसी पर न उतर आएं तो मैं अपना सर झुका लूंगा। मुंबई वालों को उसका बहुत अनुभव है। जिस थाली में खाया वहीं छेद किया। सुदीप जैसे कथाकार की जेब में पेशाब करने की टुच्चई सिर्फ वही कर सकता है। ललिता अस्थाना को गाली देने की हिमाकत वही कर सकता है। एक दौर में धीरेंद्र और ललिता का जूठन खाकर जिंदा रहने वाला व्यक्ति उन्हीें को गाली देने की हिम्मत करे, सिर्फ वही ऐसा कर सकता है। आप यदि उसके पक्ष में खड़े रहना चाहते हैं और वाकई साहित्य या पत्रकारिता आपका पेशा है तो वह दिन दूर नहीं ज बवह आपकी जेब में भी पेशाब करेगा और आप पर थूकेगा भी।</p>
<p>हृदयेश मयंक</p>
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		<title>By: ramesh yadav</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/signature-campaign-against-vijayshankar-chaturvedi/comment-page-1/#comment-4415</link>
		<dc:creator>ramesh yadav</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Nov 2009 14:45:50 +0000</pubDate>
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		<description>बड़ी बड़ी बातें बघार रहा यह कामता कितना बड़ा जाविादी व्यक्ति है जिसने मेरे नाम के आगे लगे यादव सरनेम का जनश्रुति की सहायता लेते हुए मजाक उड़ाने की पुरजोर कोशिश की है। हालांकि ऐसा कर इसने अपने आप पर थूका है। एक और जनश्रुति है कि काना काजी, लंगड़ा पाजी। क्या मोहल्ला के सम्मानीय पाठकों को पता है कि यह कामता भेंगी आंख वाला व्यक्ति है? आधा काना। तो इसकी दृष्टि हर तरह से कमजोर है। (मुआफ कीजिएगा मुहल्ला जी, मैं इस गलीज आदमी को उसी की भाषा में जवाब देने पर मजबूर हूं।) अब एक और बात बता दूं कि यह कामता मुंबई में विजय की तरह ही हरामजदगियां करता रहा है। आखिरकार इसे मुंबई छोड़ना पड़ा। माकपा को सीख दे रहा यह कपटी तब शिवसैनिकों के मुखपत्र सामना से जुड़ा हुआ था। यह घेार दक्षिणपंथी मानसिकता का जातिवादी आदमी है। और बेहद अवसरवादी। यही वजह है कि यह कहीं भी किसी भी शहर में टिक नहीं पाया है। कामता, अगर तुझे चतुर्वेदियों में से ही लगाव है, तो गीत चतुर्वेदी को चुन। जिसने तुमसे उम्र में छोटा होने के बावजूद बड़ी सफलता पाई है। बड़ी मेहनत और लगन से वह आगे बढ़ा है। गीत का नाम इसलिए ले रहा हूं कि तुम उसे बहुत अच्छी तरह से जानते हो। उसकी शरण गहो, तो पान खाने को मिलेंगे। विजय के साथ रहोगे तो कान ही कटवाओगे। लेकिन तुम बड़े सठ हो, तुम ऐसा नहीं करोगे। एक और जनश्रुति है कि आपका अक्स आपके दोस्त होते हैं। तुम क्या हो और किस प्रवृत्ति के व्यक्ति हो, इसका अंदाजा तुम्हारी दोस्ती से लग चुका है। आवारागर्द बने रहने का विजय को दिए तुम्हारे आशिवर्चन उसका बहुत अहित कर रहे हैं। तुम्हारी शैतानी दुआ लगातार उसकी पोल खोल रही है। यही बात मंदबुद्धि प्रणव प्रियदर्शी पर लागू हेाती है। न प्रणय की कोई किसी भी स्तर पर साख है, न ही तुम्हारी। दोनों ही खजहे कुत्ते की तरह भौंकते रहो। तुम ही एक्सपोज हो रहे हो। विजय कुमार , सलाम बिन रजाक, सैयद रियाज, धीरेंद्र अस्थाना, अनूपसेठी, आलोक भटटाचार्य जैसे दर्जनों नामचीन लोगों ने अगर हस्ताक्षर किए हैं, तो यह मामूली बात नहीं है। किसी ने जबरन यह काम नहीं करवाया है। यह मुंबई के इतिहास में पहली बार हुआ है। विजय एक औसत दर्जे का प्रतिभाहीन कवि है। इसी की उम्र के आसपास के इससे अच्छे कवि मुंबई में कई हैं, जो चुपचाप बिना शोरगुल के अपना काम कर रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं । यहां तक कि गीत चतुर्वेदी भी मुंबई का ही है। राकेश जी ने सही ही लिखा है कि विजय नाम का यह धूर्त रिलायंस कंपनी में आखिर क्यों शालीन बना रहता है? यह एक बड़ा सवाल है। वहां क्यों अपने सहयोगियों को गली नहीं देता है। दरअसल इसे पता है कि ऐसी स्थिति में इसे कंपनी से बाहर का रास्ता फौरन दिखा दिया जाएगा।

रमेश यादव</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बड़ी बड़ी बातें बघार रहा यह कामता कितना बड़ा जाविादी व्यक्ति है जिसने मेरे नाम के आगे लगे यादव सरनेम का जनश्रुति की सहायता लेते हुए मजाक उड़ाने की पुरजोर कोशिश की है। हालांकि ऐसा कर इसने अपने आप पर थूका है। एक और जनश्रुति है कि काना काजी, लंगड़ा पाजी। क्या मोहल्ला के सम्मानीय पाठकों को पता है कि यह कामता भेंगी आंख वाला व्यक्ति है? आधा काना। तो इसकी दृष्टि हर तरह से कमजोर है। (मुआफ कीजिएगा मुहल्ला जी, मैं इस गलीज आदमी को उसी की भाषा में जवाब देने पर मजबूर हूं।) अब एक और बात बता दूं कि यह कामता मुंबई में विजय की तरह ही हरामजदगियां करता रहा है। आखिरकार इसे मुंबई छोड़ना पड़ा। माकपा को सीख दे रहा यह कपटी तब शिवसैनिकों के मुखपत्र सामना से जुड़ा हुआ था। यह घेार दक्षिणपंथी मानसिकता का जातिवादी आदमी है। और बेहद अवसरवादी। यही वजह है कि यह कहीं भी किसी भी शहर में टिक नहीं पाया है। कामता, अगर तुझे चतुर्वेदियों में से ही लगाव है, तो गीत चतुर्वेदी को चुन। जिसने तुमसे उम्र में छोटा होने के बावजूद बड़ी सफलता पाई है। बड़ी मेहनत और लगन से वह आगे बढ़ा है। गीत का नाम इसलिए ले रहा हूं कि तुम उसे बहुत अच्छी तरह से जानते हो। उसकी शरण गहो, तो पान खाने को मिलेंगे। विजय के साथ रहोगे तो कान ही कटवाओगे। लेकिन तुम बड़े सठ हो, तुम ऐसा नहीं करोगे। एक और जनश्रुति है कि आपका अक्स आपके दोस्त होते हैं। तुम क्या हो और किस प्रवृत्ति के व्यक्ति हो, इसका अंदाजा तुम्हारी दोस्ती से लग चुका है। आवारागर्द बने रहने का विजय को दिए तुम्हारे आशिवर्चन उसका बहुत अहित कर रहे हैं। तुम्हारी शैतानी दुआ लगातार उसकी पोल खोल रही है। यही बात मंदबुद्धि प्रणव प्रियदर्शी पर लागू हेाती है। न प्रणय की कोई किसी भी स्तर पर साख है, न ही तुम्हारी। दोनों ही खजहे कुत्ते की तरह भौंकते रहो। तुम ही एक्सपोज हो रहे हो। विजय कुमार , सलाम बिन रजाक, सैयद रियाज, धीरेंद्र अस्थाना, अनूपसेठी, आलोक भटटाचार्य जैसे दर्जनों नामचीन लोगों ने अगर हस्ताक्षर किए हैं, तो यह मामूली बात नहीं है। किसी ने जबरन यह काम नहीं करवाया है। यह मुंबई के इतिहास में पहली बार हुआ है। विजय एक औसत दर्जे का प्रतिभाहीन कवि है। इसी की उम्र के आसपास के इससे अच्छे कवि मुंबई में कई हैं, जो चुपचाप बिना शोरगुल के अपना काम कर रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं । यहां तक कि गीत चतुर्वेदी भी मुंबई का ही है। राकेश जी ने सही ही लिखा है कि विजय नाम का यह धूर्त रिलायंस कंपनी में आखिर क्यों शालीन बना रहता है? यह एक बड़ा सवाल है। वहां क्यों अपने सहयोगियों को गली नहीं देता है। दरअसल इसे पता है कि ऐसी स्थिति में इसे कंपनी से बाहर का रास्ता फौरन दिखा दिया जाएगा।</p>
<p>रमेश यादव</p>
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	<item>
		<title>By: shyam</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/signature-campaign-against-vijayshankar-chaturvedi/comment-page-1/#comment-4414</link>
		<dc:creator>shyam</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Nov 2009 14:31:30 +0000</pubDate>
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		<description>मोहल्ला जी
परनाम

कहां गया यह बाघ का बिल्ला विजयषंकर?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मोहल्ला जी<br />
परनाम</p>
<p>कहां गया यह बाघ का बिल्ला विजयषंकर?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Ravi</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/signature-campaign-against-vijayshankar-chaturvedi/comment-page-1/#comment-4379</link>
		<dc:creator>Ravi</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 14:32:43 +0000</pubDate>
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		<description>लात का भूत बातों से नहीं मानता। अब विजय शंकर की समझ में बात आ गई है कि उसकी चाल किसी भी स्तर पर नहीं गलने वाली। उसने इस बार भुजा उठाकर कोई बात नहीं कही (भाइयो, यह भुजा अब मरोड़ दी गई है) उसने लिखा है कि उसके पक्ष में भी लोगों ने लिखा और विपक्ष में भी। गौर फरमाया जाए कि पक्ष में सिर्फ इसके बेवड़े मित्रों प्रणव प्रियदर्शी और कामता ने कुतर्क दिए हैं, जिन्हें मुंबई छोड़े एक अरसा हो गया है। एक दिल्ली में बैठ कर चतुराई दिखा रहा है, तो दूसरा लखनऊ में। जब कि इसके खिलाफ कितने लोग हैं, इसका प्रमाण हस्ताक्षरित पत्र है। लोग खुलकर सामने आए हैं। आखिर क्यों? प्रणव और कामता की इन बड़े लेखकों के सामने क्या साख है और क्या औकात? निश्चित रूप से अब तक विजय की रूह तक कांप चुकी होगी, क्योंकि अब उसने जरा भी किसी के साथ भी बदतमीजी की, तो सीधे पुलिस स्टेशन में एफ आई आर दर्ज करवा दी जाएगी। इसे जरा भी नहीं बख्शा जाएगा।
रवि</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लात का भूत बातों से नहीं मानता। अब विजय शंकर की समझ में बात आ गई है कि उसकी चाल किसी भी स्तर पर नहीं गलने वाली। उसने इस बार भुजा उठाकर कोई बात नहीं कही (भाइयो, यह भुजा अब मरोड़ दी गई है) उसने लिखा है कि उसके पक्ष में भी लोगों ने लिखा और विपक्ष में भी। गौर फरमाया जाए कि पक्ष में सिर्फ इसके बेवड़े मित्रों प्रणव प्रियदर्शी और कामता ने कुतर्क दिए हैं, जिन्हें मुंबई छोड़े एक अरसा हो गया है। एक दिल्ली में बैठ कर चतुराई दिखा रहा है, तो दूसरा लखनऊ में। जब कि इसके खिलाफ कितने लोग हैं, इसका प्रमाण हस्ताक्षरित पत्र है। लोग खुलकर सामने आए हैं। आखिर क्यों? प्रणव और कामता की इन बड़े लेखकों के सामने क्या साख है और क्या औकात? निश्चित रूप से अब तक विजय की रूह तक कांप चुकी होगी, क्योंकि अब उसने जरा भी किसी के साथ भी बदतमीजी की, तो सीधे पुलिस स्टेशन में एफ आई आर दर्ज करवा दी जाएगी। इसे जरा भी नहीं बख्शा जाएगा।<br />
रवि</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: rishikesh</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/signature-campaign-against-vijayshankar-chaturvedi/comment-page-1/#comment-4369</link>
		<dc:creator>rishikesh</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 08:13:41 +0000</pubDate>
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		<description>मेरे प्रिय जनवादियों, आप लोगों ने विजय शंकर का सच जग जारि करने का पुनीत कार्य दस साल पहले किया होता तो शायद इसकी बीवी जिंदा रहती और एक बेटी अनाथ होने से बच जाती। कैसे अब इस कुकवि की टें बोल गई है, देखा जा सकता है। बधाई मोहल्ला जी, आपने हिंदी जगत पर बहुत बड़ा अहसान किया है। कम से कम हम मुंबई के लोग तो आपके जीवन भर आभारी रहेंगे। ऐसे कपटियों की पोल तो खुलनी ही चाहिए। आपने हस्ताक्षरित आलेख के साथ जो इस कुकवि का पिस्तौल और खूून के बीच चित्र सजाया है, वह ही इसकी वास्तविक शक्ल दिखाने के लिए काफी है।
परनाम।
0 रिषिकेश</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे प्रिय जनवादियों, आप लोगों ने विजय शंकर का सच जग जारि करने का पुनीत कार्य दस साल पहले किया होता तो शायद इसकी बीवी जिंदा रहती और एक बेटी अनाथ होने से बच जाती। कैसे अब इस कुकवि की टें बोल गई है, देखा जा सकता है। बधाई मोहल्ला जी, आपने हिंदी जगत पर बहुत बड़ा अहसान किया है। कम से कम हम मुंबई के लोग तो आपके जीवन भर आभारी रहेंगे। ऐसे कपटियों की पोल तो खुलनी ही चाहिए। आपने हस्ताक्षरित आलेख के साथ जो इस कुकवि का पिस्तौल और खूून के बीच चित्र सजाया है, वह ही इसकी वास्तविक शक्ल दिखाने के लिए काफी है।<br />
परनाम।<br />
0 रिषिकेश</p>
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