पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया
♦ सुरेंद्र किशोर

अधिकतर सत्ताधारी नेता तो यही चाहते हैं कि अखबार उनके अच्छे कामों की तारीफ़ में तो लिखे ही, पर साथ ही उनके गलत कामों को नजरअंदाज भी करता जाये। नेता जब सत्ता में होता है, तो वह जनसंपर्क विभाग के प्रकाशन और किसी पेशेवर अखबार के बीच फ़र्क नहीं कर पाता। वह यह भी समझने लगता है कि पत्रकार या तो मेरा दोस्त हो सकता है या फ़िर दुश्मन। बीच की कोई स्थिति वह स्वीकार ही नहीं कर पाता। यही हुआ और भागवत झा आजाद जनसत्ता पर नाराज हो गये। दिल्ली के एक चर्चित पत्रकार के घर पर प्रभाष जोशी से आजाद साहब की भेंट हुई। उन्होंने जोशीजी से मेरी शिकायत की। आजाद साहब को उम्मीद थी कि जोशीजी वहीं से फ़ोन उठाएंगे और सुरेंद्र किशोर को कहेंगे कि तुम क्यों आजाद साहब के खिलाफ़ लिख रहे हो? पर जोशीजी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने आजाद साहब से कह दिया कि ‘यह बात तो वहीं हो सकती है, जहां सुरेंद्र किशोर भी रहें।’ जोशीजी ने यह बात इस बात के बावजूद कही कि कीर्ति आजाद दिल्ली क्रिकेट क्लब के अध्यक्ष थे और जोशीजी के पुत्र वहां खेलने जाते थे। यानी उनके पुत्र का कैरियर कीर्ति आजाद के रुख पर निर्भर करता था।
कई महीने बाद जब हमारे सहकर्मी कुमार आनंद पटना आये, तो उन्होंने आजादजी से जोशी की मुलाकात का यह प्रकरण मुझे सुनाया। मैंने समझा कि शायद संकोचवश जोशीजी मुझे कोई निर्देश नहीं दे रहे हैं। इसलिए मुझे ही पहल करके उनसे पूछना चाहिए कि अपने लेखन में भागवत झा आजाद के प्रति कैसा रुख अपनाऊं।
मैंने जोशीजी को फ़ोन किया और पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। प्रभाषजी ने छूटते ही कहा कि ‘यह तो आपको खुद तय करना है। आप स्थल पर हैं। आपको तय करना है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। आई कान्ट लेट डाउन माइ रिपोर्टर फ़ॉर माई फ्रेंड।’ उन्होंने बड़ी आसानी से यह बात कह दी, पर इसका कुपरिणाम हुआ उनके पुत्र के क्रिकेट कैरियर पर, जिसे कीर्ति आजाद ने आगे नहीं बढ़ाया। कीर्ति आजाद ने राजनीति के लिए पिता धर्म निभाया। पर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया। क्या किसी अन्य संपादक पिता ने अपने पुत्र के कैरियर को अपने ही हाथों अपने पत्रकारिता धर्म के पालन के लिए नुकसान पहुंचाया होगा? मुझे तो कोई दूसरा उदाहरण नहीं मालूम।
शायद आम लोग नहीं जानते कि एक संपादक के लिए अपने अच्छे-बुरे कामों के लिए अपने किसी संवाददाता को अनुशासित कर लेना कितना आसान है? कोई संवाददाता अपने संपादक की इच्छा के विपरीत एक रपट भी नहीं लिख सकता है। पर जोशीजी ने मुझे हर कदम पर लेखन की मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की। क्योंकि वह जानते थे कि मेरा सुरेंद्र किशोर गलती कर सकता है, पर बेईमानी नहीं कर सकता।
यही बात जोशीजी ने देवीलाल से हरियाणा भवन में 80 के दशक में कही थी, जब लालू प्रसाद मेरे खिलाफ़ देवीलाल को उकसा रहे थे। प्रभाष जोशी ने देवीलालजी से कहा था कि ‘आपका लालू प्रसाद गलत हो सकता है, पर मेरा सुरेंद्र किशोर गलत नहीं हो सकता है।’ यह तब की बात है, जब एक्सप्रेस अखबार समूह राजीव गांधी की सरकार से कठिन संघर्ष कर रहा था। राजीव सरकार पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रतीक एक्सप्रेस समूह को ही बरबाद कर देने पर तुली हुई थी। उस कठिन लड़ाई में देवीलाल और आरके हेगड़े जैसे मुख्यमंत्री एक्सप्रेस समूह के बचाव में थे।
इसी पृष्ठभूमि में एक दिन प्रभाष जोशी हरियाणा भवन में देवीलाल से मिलने गये थे। तभी बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता लालू प्रसाद भी वहां पहुंच गये। उसी दिन लालू प्रसाद के बारे में जनसत्ता में मेरी एक खबर छपी थी। उस खबर से लालू प्रसाद मुझ पर सख्त नाराज थे। खबर यह थी कि लोक दल विधायक दल के नेता पद से लालू प्रसाद को हटाने के लिए अधिकतर विधायकों ने एक स्मारपत्र पर दस्तखत कर दिया है, जिसे लोक दल हाइकमान को सौंपा जाना है। ऐसी खबरें नेताओं के बारे में छपती रहती हैं। कई मामलों में ऐसी खबर अपुष्ट तथ्यों के आधार पर भी होती है और बाद में गलत साबित होती है। पर कई बार सही भी रहती है। ऐसी किसी खबर को लेकर आम तौर पर कोई नेता किसी अखबार या फ़िर संवाददाता पर उतना नाराज नहीं होता, जितना लालू प्रसाद नाराज थे।
उन्होंने देवीलाल से कहा कि ‘बाबूजी, जोशीजी आपके पास यहां आकर तो बात करते रहते हैं, पर उनके अखबार में मेरे बारे में गलत-सलत खबर छपती रहती हैं। इन्हें रोकिए। अपने खास समर्थक को गुस्से में देख कर देवीलाल भी आपे से बाहर हो गये। उन्होंने भी नहले पर दहला मारते हुए कहा कि ‘हां, भाई यह तो हमारे खिलाफ़ भी लिखता रहता है। जरा मंगाओ इसकी फ़ाइल।’ एक व्यक्ति ने जनसत्ता की कटिंग लाकर रख दी। देवीलाल जनसत्ता के गपशप कॉलम की खबरों से खास तौर से नाराज थे। उन्होंने अपनी नाराजगी अपने खास हरियाणवी लहजे में जाहिर की। सब जानते हैं कि उनका लहजा कैसा होता था। जोशीजी एक्सप्रेस ग्रुप से देवीलाल की करीबी भी जानते थे। फ़िर भी उन्होंने जनसत्ता का बचाव करते हुए कहा कि मेरा संबंध आपसे अलग है। जनसत्ता में जो कुछ आप लोगों के बारे में छपता है, उसका इस संबंध से कोई मतलब नहीं है। वह सब गुण-दोष के आधार पर छपता है और छपेगा। उसे मैं नहीं रोक सकता। यह सब कह कर जोशीजी हरियाणा भवन से निकल गये। इस तरह जोशीजी ने अखबार की स्वतंत्रता की रक्षा की। इस बात के बावजूद जोशीजी ने देवीलाल को खुश नहीं किया कि उस समय देवीलाल एक्सप्रेस ग्रुप के बचाव में चट्टान की तरह खड़े थे।
इस प्रकरण में एक और आशंका थी। देवीलाल-प्रभाष जोशी संवाद की सूचना मिलने पर रामनाथ गोयनका नाराज भी हो सकते थे। पर उसकी भी परवाह जोशीजी ने नहीं की। हरियाणा भवन के इस संवाद का विवरण बाद में सुनने के बाद जनसत्ता में काम करने का एक बार फ़िर मुझे गर्व हुआ।
आज मैं पत्रकारिता में जो कुछ भी हूं, उसमें जनसत्ता, एक्सप्रेस समूह और प्रभाष जोशी का सबसे बड़ा योगदान है। ऐसा महसूस करनेवाले जनसत्ता के अनेक अन्य स्टॉफ़ भी हैं। बिहार में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान जनसत्ता और उसके संपादक प्रभाष जोशी की एक अन्य तरह की उदारता भी देखने को मिली। ऐसा नहीं कि मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में कभी नहीं लिखा। जब तक लालू प्रसाद बिहार के आरक्षण विरोधियों से लड़ते रहे, मैं लगातार उनके पक्ष को पाठकों तक पहुंचाता रहा। मैं आरक्षण समर्थक रहा हूं। पर मुझे लालू समर्थक मान लिया गया। पर जब लालू-राबड़ी सरकार के घोटाले एक-एक करके बाहर आने लगे, तो मैंने जनसत्ता में अपनी पुरानी भूमिका निभायी।
दूसरी ओर लालू प्रसाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ़ कुछ अधिक ही अभियान चलाते रहे हैं। प्रभाष जोशी उनके इस पक्ष के समर्थक रहे हैं। जोशीजी को लगता था कि देश की एकता-अखंडता के लिए भाजपा के खिलाफ़ देश भर में सक्रिय शक्तियों को उनका समर्थन मिलना चाहिए। पर जनसत्ता के संपादक रहते हुए जोशीजी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि तुम लालू प्रसाद के खिलाफ़ इतना क्यों लिखते हो। कोई संपादक अपने संवाददाता को इतनी स्वतंत्रता देता हो, यह संभवत: जनसत्ता में ही संभव रहा है।
ऐसे अखबार से इस्तीफ़ा देने का निर्णय मेरे लिए दुखद था। दरअसल मैं जनसत्ता में रहता, तो 2005 में ही रिटायर हो जाता। तब तक मेरी एक भी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी नहीं हो पायी थी। मैंने मन-मसोस कर अजय उपाध्याय का दैनिक हिंदुस्तान ज्वाइन करने का ऑफ़र स्वीकार कर लिया। यह 2001 की बात है। अजय उपाध्याय तब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक थे। मैंने जब हिंदुस्तान ज्वाइन किया, तो प्रमोद जोशी ने एक बात कही। उन्होंने कहा, अरे सुरेंद्रजी, अजयजी ने आप पर कौन सा जादू कर दिया कि जनसत्ता छुड़वाने का जो काम राजेंद्र माथुर आपसे नहीं करा सके, वह काम हमारे संपादक ने कर दिया। उनसे मैं क्या कहता कि मेरी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने ही मुझे यहां खींच लाया है। मेरा दिल अब भी जनसत्ता में ही बसता है। राजेंद्र माथुर ने कई बार कोशिश की थी कि मैं नभाटा ज्वाइन करूं। तब प्रमोदजी नभाटा में ही थे। वह इस बात को जानते थे।
आखिर जनसत्ता में ऐसा क्या रहा है कि कोई व्यक्ति कम पैसे में भी उसकी नौकरी स्वीकार करे? इसका जवाब जनसत्ता व प्रभाष जोशी तथा उसके परवर्ती संपादकों के व्यक्तित्व में खोजना होगा। हालांकि जनसत्ता और उसके पूरे परिवार का व्यक्तित्व गढ़ने में प्रभाष जोशी का ही तो हाथ रहा है।
(सुरेंद्र किशोर। बेदाग़ पत्रकार। पत्रकारों के बीच बेहद सम्माननीय। कर्पूरी ठाकुर के नज़दीक रहे। लालू राज के धुर विरोधी। नीतीश राज के प्रचारक। 18 वर्षों तक जनसत्ता में काम किया। पटना में रहते हैं। इन दिनों फ्रीलांसिंग करते हैं और कभी कभी ब्लॉग भी लिखते हैं। उनसे surendarkishore@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









अपने मुंह मियां मिट्ठू । प्रकरण है, प्रभाष जी के निधन का और यह महोदय अपनी तारीफ के पुल बांध चले। कमाल के पत्रकार हैं सुरेंद्र किशोर। श्रद्धांजलि-लेख का 60 फीसदी हिस्सा उन्होंने खुद पर खर्च कर डाला है। भाई सुकि जी, निधन प्रभाष जी का हुआ है, आपका नहीं।
बहरहाल, भगवान आपको लंबी उमर दे। ( ताकि प्रभात खबर के माध्यम से बिहार-झारखंड के पाठकों का मनोरंजन होता रहे)
सुरेंद्र किशोर जी ने अपनी तारीफ का पुल बांधते हुए लिखा है – ‘आज मैं पत्रकारिता में जो कुछ भी हूं, उसमें जनसत्ता, एक्सप्रेस समूह और प्रभाष जोशी का सबसे बड़ा योगदान है।’
कई ब्लॉगों पर नामी लोगों के लेख पढकर यह तो सहज ही विश्वास हो जाता है कि प्रभाष जोशी जी ने हिंदी पत्रकारों की कई पीढियों को प्रभावित किया था। संवारा था।
लेकिन सुरेंद किशोर जी को यह भ्रम क्यों है कि वह ‘पत्रकारिता में कुछ हैं’। एक पत्रकार की पहचान सचेत पाठकों के बीच होती है। और इन पाठकों के बीच इनकी पहचान सरकारों के चारण की है।
और, अविनाश जी, आपने इनके परिचय मे जो ‘नीतीश सरकार के प्रचारक’ होने की बात लिखी है। उसे देखकर मजा आया। पर सच्चाई यह है कि वे लालू राज के विरोधी नहीं थे। शायद आप संयुक्त बिहार की पत्रकारिता के बारे में नहीं जानते, उस समय यह महोदय लालू प्रसाद का गुणगान किया करते थे। यह सज्जन दरअसल, जब जैसा तब तैसा वाले हैं। हमारे यहां प्रचलित एक मुहावरे का प्रयोग गलत नहीं होगा- ‘बिन पेंदी का लोटा’।
Thik kaha hai. Apni Tarif se bhara hai Surendra Kishor ka lekh. Wah Prabhash ji ki Mirtu par Apni Roti Sek Rahe Hain.
लेख सचमुच लेखक की अपनी प्रशंसा से भरा है। वैसे मैने इन पत्रकार का नाम पहली बार सुना है। लगता नहीं कि ये इतने बडे पत्रकार हैं, जितना खुद को बता रहे हैं। शायद बिहार-झारखंड में इन्हें लोग जानते होंगे और वहां के पत्रकारों के सम्माननीय भी होंगे। लेकिन यहां मध्यप्रदेश में तो न मैंने इनका कभी नाम सुना है, न ही कभी कुछ पढा है । वैसे किसी सरकार का प्रचारक होना किसी ‘पत्रकार’ का काम तो नहीं ही हो सकता।
सुरेंद्र किशोर ने अपने लेख में सच्चाई का बयान किया है। …और ऐसा करते हुए उन्होंने बहुत सारी बातों का उल्लेख नहीं किया है, जो इस मौके पर प्रासंगिक नहीं था। यदि वे सारी बातों का उल्लेख करते तो न जानें नए किस्म के पाठकों और पत्रकारों पर और भी क्या बीतती।
प्रभाष जोशी के निधन की खबर सुनकर उनके आवास पर जितने भी पत्रकार या सामाजिक सरोकारों वाले लोग पहुंचे, सबों ने एक स्वर से कहा – हिंदी का आखिरी संपादक अब इस दुनिया में नहीं रहा। और तो और नव भारत टाइम्स के संपादक रामकृपाल सिंह ने ईटीवी के कैमरे के सामने यही बयान दिया था। सुरेंद्र किशोर ने भी तथ्यों के आधार पर अपना नहीं, बल्कि प्रभाष जोशी के तेवर, उनके बड़प्पन और उनकी ईमानदारी का बयान किया है। लेकिन आज का जो दौर है, उसमें ये बातें लगभग अप्रासंगिक हो गईं है। ऐसे में सुरेंद्र किशोर की बातों का उल्टा अर्थ लगा लेना हैरानी की बात नहीं है।
जनसत्ता में सुरेंद्र किशोर की जैसी हैसियत बनी और अंत तक रही, बेशक अपनी लेखनी की बदौलत, यदि वे अपने समकालीन कुछ अन्य पत्रकारों की तरह चाहते तो पारिवारिक कारणों से भारी मन से जनसत्ता छोड़कर कहीं और जाने की नौबत नहीं आती। वे जनसत्ता के किसी संस्करण के संपादक रहते, ठाठ वाले संपादक। कम लोगों को पता है कि जब कलकत्ता से जनसत्ता का प्रकाशन शुरू होना था तो प्रभाष जोशी ने सुंरेंद्र किशोर को स्थानीय संपादक बनने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन प्रशासनिक दाव-पेंच से परे विशुद्ध पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने इस प्रस्ताव को विनम्रता पूर्वक ठुकरा दिया था।
जहां तक मेरी जानकारी है, या सुरेंद्र किशोर को जानने वाले लोग बताते हैं, उन्होंने कभी न किसी की धौंस सही, न किसी की ताबेदारी की। तथ्यों के आधार पर जो सही लगा बिना किसी गुणा-भाग के लिखते गए।
किसी अमित कुमार ने लिखा है कि उन्होंने पहली बार सुंरेंद्र किशोर नामक पत्रकार का नाम सुना है। मुझे नहीं मालूम कि अमित जी हिंदुस्तान के किस कोने में रहते हैं और अखबारों से उनका कितना सरोकार रहा है। लेकिन मैं उन्हें बताना चाहूंगा कि हिंदी पट्टी में सुरेंद्र किशोर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।
रही बात नीतीश सरकार के प्रचारक होने की तो सुंरेंद्र जी को जानने वालों को इस आरोप पर असहमति होगा। जरूरी नहीं कि लोगों की नजरों में ईमानदार बने रहने के लिए सही काम को गलत ही ठहराते रहा जाए। क्या बिहार में बदलाव की बयार नहीं है? क्या पटना से मुजफ्फरपुर की 71 किमी की यात्रा पहले ही तरह ही पांच घंटे में तय करनी पड़ती है? क्या बिहार में पहले की तरह ही अपहरण उद्योग फल-फूल रहा है? य़दि नहीं तो क्या इस बदलाव पर टिप्पणी करना गुनाह है?
प्रभाष जोशी ने जनसत्ता जैसा अखबार दिया तो सुरेंद्र किशोर जैसे पत्रकार भी दिए। हिंदी पत्रकारिता के इस धरोहर पर आंच नहीं आए, यह सुनिश्चित करना सजग पाठकों का धर्म है, जो मूल्यों पर में आई गिरावट से चिंतित रहते हैं।
सुरेंद्र किशोर जी ….माफ कीजिएगा ‘किशोर कुमार’ जी, साइबर दुनिया का यह उसूल होना चाहिए कि आप लोगों को उनके सही नाम से संबोधित न करें।
वैसे, भाई किशोर जी, वह ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ जिसके बारे में कथित रूप से बहुत कम लोगों को पता है ? क्या प्रभाष जी ने अपनी किसी किताब में लिखा है कि वे सुरेंद्र किशोर को कोलकाता का संपादक बनाना चाहते थे। लेकिन इन ‘इमानदार’ पत्रकार ने वह ऑफर ठुकरा दिया। कौन लोग गवाह हैं इस वाकये के ? और अगर संपादक बना रहे थे तो वेतन भी बढता फिर यह पारिवारिक मजबूरी वाली बात कहां से आ गयी ?
डियर, पुराने जमाने का रोना बंद करें कि हाय वह प्रभाष जी का युग क्या था और हाय अब यह क्या हो रहा कि बिहार सरकार का प्रचारक जब अपने प्रचार में लेख लिखता है तो लोग बुरा मान जाते हैं ! यह जन-निगारनी का युग है। प्रभाष जी कमियों पर भी इन्हीं ब्लॉगों पर चर्चा हुई थी। और अब संयोग से आपके (मतलब सुरेंद्र किशोर के) पाखंडों की चर्चा हो रही है।
सुरेंद्र किशोर को जानने वाले क्या कहते हैं, यह आप जानें। मेरे जैसे पाठक ने जब भी उनका लेख पढा है उसमें षडयंत्र अथवा चापलूसी की बू ही पायी है। प्रभाष जी के पासंग भी नहीं हो सकते ऐसे चापलूस पत्रकार।
कौन कहता है कि बिहार में बदलाव की लहर है ? यादव राज से भुमिहार राज आ गया, यही बदलाव है। और आपके सुरेंद्र जी को दुख है कि राजपूत राज क्यों नहीं आ रहा। उनके लेखों तक में यह बात निर्लज्जता से प्रकट होती है। पटना से मुजफफरपुर तक की सडक की आपने बात की है। पटना से हाजीपुर तक एनएच 19 और फिर हाजीपुर से मुजफफरपुर तक एनएच 77 है। क्या बिहार सरकार अब एनएच का भी निर्माण करवाने लगी है ? वैसे बिहार सरकार के वरिष्ठ प्रचारक आपके सुरेद्र किशोर अपने लेखों मे कुछ भी करवा दे सकते हैं।
और आप खुद ही बताएं कि क्या बिहार में अपहरण बंद हो गया है ? अपहरण करने वाले गिरोह ठेकेदार बन गये और इसे अगर अपरहण की घटनाओं में 15 फीसदी की कमी आ गयी तो आपकी नजर में यह शांति बहाल होना है।
अगर जयप्रकाश नारायण ने सिर्फ लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे पाखंडी राजनेता दिए और प्रभाष जोशी ने महज सुरेंद्र किशोर और हरिवंश जैसे पत्रकार तो इन स्वर्गीय आत्माओं की महानता पर संदेह करना चाहिए। जाहिर है, ऐसा नहीं है, प्रभाष जोशी को चाहने वालों में अनेक ऐसे भी हैं जो ईमानदारी पूर्वक, बिना आत्म प्रशंसा के आपना काम कर रहे हैं।
भाई किशोर जी, मैं हिंदुस्तान के के किसी कोने में नहीं रहता। इसके मध्य में रहता हूं। जिसे मध्यप्रदेश कहते हैं। जबलपुर में। सरोज जी की ही तरह अखबारों से मेरा नाता भी महज पाठक का है। आपकी टिप्पणी देखने के बाद यहां के कई लोगों से सुरेंद्र किशोर के बारे में पूछा लेकिन उन्हें कोई नहीं जानता।
मोहल्ला पर ही प्रभाष जोशी के निधन पर गिरीश पंकज जी समेत रवीश , दिबांग, ओम थानवी, हरिवंश, प्रमोद रंजन के भी लेख हैं, जिन्हें मैं और यहां के मेरे साथी पत्रिकाओं, ब्लॉग, टीवी व अखबारों के माध्यम से जानते हैं। जबकि सुरेंद्र किशोर समेत कई नाम ऐसे भी हैं, जिनसे अपरिचित हैं। इसलिए मैं नहीं समझता कि आपके सुरेंद्र किशोर जी को नहीं जानकर मैंने कोई अपराध किया है।
दूसरी बात यह कि आपके कमेंट की भाषा साफ संदेह पैदा कर रही है कि यह उन्हीं कथित पत्रकार सुरेंद्र किशोर द्वारा लिखा गया है। आप लिखते हैं कि ” यदि वे (सुरेंद्र किशोर) सारी बातों का उल्लेख करते तो न जानें नए किस्म के पाठकों और पत्रकारों पर और भी क्या बीतती।” भैया, इस तरह की जानकारी तो सिर्फ सुरेंद्र किशोर के पास ही हो सकती है कि वे और क्या लिख सकते थे।
बेहतर हो आप जो भी हो अपन लोग के सामने आकर बात करें। तब हम आपको भी जान जाएंगे और आपके सुरेंद्र किशोर जी को भी।
सुकि जी (बिना गड़बड़ाए हुए इस प्रसिद्ध शख्स ईयत को सुरेंद्र किशोर पढ़ियेगा) के परिचय में यह भी लिखना चाहिए था-
-सबसे बड़े आत्मप्रचारक पत्रकार,
-सबसे बड़े चापसूल पत्रकार,
-सबसे बड़े बेसलेस पत्रकार,
-सबसे निर्लज्ज बेबाक पत्रकार…
-आदि-आदि
जब प्रभाष जोशी के निधन के मौके पर ये महोदय अपना इतना महिमामंडन करते हैं तो अपनी मरने के बाद कितना करेंगे…!!!
बहरहाल, किसी ने ठीक ही कहा है कि अब प्रभाष जोशी, देवीलाल या भागवत झा आजाद आकर तो यह बताने से रहे कि उन्होंने सुकि महोदय को किसका संपादक बनाने का ऑफर दिया था। हां, सुकि जी जरा सा गड़बड़ा गए कि उन्होंने बस संपादक पद की ही मांग की। कह देना चाहिए था साले को अगर वे ईमानदार और सम्माननीय नहीं होते तो प्रधानमंत्री पद तो प्रभाष जोशी हाथ में लिए खड़े थे इनके लिए। बहरहाल, देखिए औऱ इंतजार कीजिए नीतीश बाबू कितना परसादी इनके कटोरे में परोसते हैं…
सुंरेंद्र किशोर के आलेख पढ़ने के बाद मैं इस विश्वास के साथ टिप्पणियां पढ़ने लगा कि पाठकों के बीच स्वस्थ बहस हो रही होगी। लेकिन जैसा कि सुना था कि मोहल्ला ब्लाग पर गाली-गलौज के अलावा और कुछ नहीं होता, सचमुच मेरा पहला अनुभव भी ऐसा ही रहा। आप किसी टिप्पणी से सहमत और असहमत हो सकते हैं, लेकिन बहस के दौरान गाली-गलौज का इस्तेमाल से संस्कार का पता चलता है। फिर तो ऐसे संस्कारों वाले लोगों से किसी तटस्थ पत्रकार या व्यक्ति के बारे में सार्थक बहस की उम्मीद करना बेकार ही है।
मैं बिहार मूल का हूं और पाटलीपुत्र टाइम्स से लेकर आज तक में काम किया। अब दिल्ली में सरकारी सेवक हूं। लेकिन पत्रकारिता से लगाव बना रहा और किसी भी पत्रकार से कम पत्र-पत्रिकाएं मैं नहीं पढ़ता। जहां तक सुरेंद्र किशोर का सवाल है, मैं उन्हें जितना जानता हूं और जनसत्ता और दैनिक हिंदुस्तान के पाठक होने के नाते जितना पढ़ा, कह सकता हूं कि वह निष्पक्ष पत्रकार हैं। हो सकता है कि नीतीश सरकार के पक्ष में किसी टिप्पणी से पाठकों में भ्रम की स्थिति बनी हो, लेकिन वे वैसा हैं नहीं।
कई साल पहले एक बार सुरेंद्र किशोर ने लालू सरकार की तारीफ की थी कि उन्होने कैसे सांप्रदायिक ताकतों से निबटा। इसके बाद तेजी से अफवाह फैली कि लालू ने सुरेंद्र किशोर को मैनेज कर लिया।, जबकि बिहार के लोग इस बात के गवाह हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं था।
यह सही है कि प्रभाष जोशी सुरेंद्र किशोर को काफी मानते थे और उनकी काबिलियत के कायल भी थे। एक बार जनसत्ता संवाददादओं की पटना के परिसद में हुई बैठक में मैंने इस बात को शिद्दत से महसूस किया था। तब मैं वहां इसलिए था कि जोशी जी ने मिलने के लिए बुलाया था। वह जिलों से आए संवाददाओं से कह रहे थे कि आप सबों को अपने-अपने जिले का सुरेंद्र किशोर बनना है।
मैं अपने पोस्ट के जरिए सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि बहस कीजिए, गाली-गलौज नहीं। सतही भाषा का इस्तेमाल न करें।
रही बात किशोर कुमार की तो मैं उनके बारे में भी जानता हूं। वह कभी जनसत्ता के कलकत्ता संस्कारण में काम करते थे। इसलिए यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सुरेंद्र किशोर ने ही किशोर कुमार के नाम से उपर टिप्पणी की है। बेशक आप किशोर कुमार की बातों से सहमत-असहमत हो सकते हैं।
भाई अजय की भावना से सहमत हूं। रंजन ने बहुत गलत किया है। उन्होंने बातें ठीक लिखीं हैं लेकिन अपशब्द का प्रयोग कर सारा गुड-गोबर कर दिया। मैं अपने तईं इसकी भर्त्सना करता हूं। सुरेंद्र किशोर बेसलेस पत्रकार सही, लेकिन इस तरह एक अपशब्द कहकर रंजन ने खुद को कुंठित साबित कर दिया है।
दूसरी बात यह कहना चाहूंग अजय भाई कि मोहल्ला पर पिछले छह महीने से आ रहा हूं लेकिन कभी भी मैंने गाली का प्रयोग नहीं देखा । इस तरह का अपशब्द कहने की भी यह पहली घटना देख रहा हूं।
अविनाश जी से आग्रह है कि वे रंजन का दूसरा कमेंट जिसमें उन्होंने सुरेंद्र जी के लिए ‘साला’ शब्द का प्रयोग किया है, उसे मिटा दें। यह आपकी साइट की गरिमा के लिए जरूरी है।
सरोज सागर जी की बात से सहमत हूं। इसमें कोई शक नहीं कि सुरेंद्र किशोर पत्रकार नहीं, प्रचारक हैं। उनके ब्लॉग पर मौजूद लगभग सभी लेख इसी टाइप के हैं। हिंदुस्तान और जनसत्ता में छपे इनका लेख जब भी पढा है तो यह लगा है लिखने वाले में कहीं न कहीं वायसनेस है।
और इस तर्क में भी कोई दम नहीं हैं कि कोई सरकार अच्छा काम कर रही है तो पत्रकार उसकी चापलूसी में जुट जाएगा। पत्रकार का काम उसकी कमियों को जनता के सामने लाना है। तारीफ के पुल बांधना नहीं।
सुंरेंद्र किशोर ने प्रभाष जोशी के बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें क्या सच्चाई है, यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन उनके लेख के तथ्यों पर शक करने का कोई कारण भी नहीं है। इसलिए कि प्रभाष जोशी के बारे में मैं जितना जानता हूं, मुझे लगता है कि सुरेंद्र किशोर ने कोई अतिश्योक्तिपूर्ण बातें नहीं लिखी है।
जहां तक सुरेंद्र किशोर के खुद के महिमामंडन का सवाल है तो तीस सालों की पत्रकारिता करते मैंने उनमें यह गुण कभी नहीं देखा। जबकि उनके समकालीन कुछ अन्य पत्रकारों को देख लीजिए, जिसकी ओर किशोर कुमार ने इशारा किया है, तो समझ में आ जाएगा कि एक पत्रकार अपना महिमामंडन और चापलूसी किस तरह कर सकता है।
पत्रकार का काम खामियों को उजागर करना है तो अच्छे कामों की तारीफ करना भी है। यदि ऐसा नहीं है तो टाइम्स आफ इंडिया जैसा अखबार अनेक मौकों पर सरकार की अनेक नीतियों की तारीफ करता नहीं दिखता। या फिर कुलदीप नायर से लेकर अरूण शौरी तक सरकार की किसी भी नीति का समर्थन करते ही नहीं।
सुरेंद्र किशोर पत्रकार हैं और सौ फीसदी पत्रकार हैं। अविनाथ जी ने उनके लिए प्रचारक का शब्द दिया है। अब उनके बारे में भी क्या कहें, बिहार में प्रचालित कहावत है – चलनी हंसे सूप पर…। अविनाश जी प्रभात खबर से क्यों हटें, एनडीटीवी से क्यों हटे फिर मध्यप्रदेश से वापस क्यों होना पड़ा, यह बहुत से पत्रकार जानते हैं। कम से कम उन्हें सुरेंद्र किशोर के बारे में टिप्पणी करने का नैतिक अधिकार नहीं है।
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