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	<title>Comments on: पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया</title>
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		<title>By: रंजन कुमार सिंह</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/surendra-kishor-article-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4390</link>
		<dc:creator>रंजन कुमार सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 11:15:25 +0000</pubDate>
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		<description>सुंरेंद्र किशोर ने प्रभाष जोशी के बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें क्या सच्चाई है, यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन उनके लेख के तथ्यों पर शक करने का कोई कारण भी नहीं है। इसलिए कि प्रभाष जोशी के बारे में मैं जितना जानता हूं, मुझे लगता है कि सुरेंद्र किशोर ने कोई अतिश्योक्तिपूर्ण बातें नहीं लिखी है। 
जहां तक सुरेंद्र किशोर के खुद के महिमामंडन का सवाल है तो तीस सालों की पत्रकारिता करते मैंने उनमें यह गुण कभी नहीं देखा। जबकि उनके समकालीन कुछ अन्य पत्रकारों को देख लीजिए, जिसकी ओर किशोर कुमार ने इशारा किया है, तो समझ में आ जाएगा कि एक पत्रकार अपना महिमामंडन और चापलूसी किस तरह कर सकता है। 
पत्रकार का काम खामियों को उजागर करना है तो अच्छे कामों की तारीफ करना भी है। यदि ऐसा नहीं है तो टाइम्स आफ इंडिया जैसा अखबार अनेक मौकों पर सरकार की अनेक नीतियों की तारीफ करता नहीं दिखता। या फिर कुलदीप नायर से लेकर अरूण शौरी तक सरकार की किसी भी नीति का समर्थन करते ही नहीं। 
सुरेंद्र किशोर पत्रकार हैं और सौ फीसदी पत्रकार हैं। अविनाथ जी ने उनके लिए प्रचारक का शब्द दिया है। अब उनके बारे में भी क्या कहें, बिहार में प्रचालित कहावत है - चलनी हंसे सूप पर...। अविनाश जी प्रभात खबर से क्यों हटें, एनडीटीवी से क्यों हटे फिर मध्यप्रदेश से वापस क्यों होना पड़ा, यह बहुत से पत्रकार जानते हैं। कम से कम उन्हें सुरेंद्र किशोर के बारे में टिप्पणी करने का नैतिक अधिकार नहीं है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुंरेंद्र किशोर ने प्रभाष जोशी के बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें क्या सच्चाई है, यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन उनके लेख के तथ्यों पर शक करने का कोई कारण भी नहीं है। इसलिए कि प्रभाष जोशी के बारे में मैं जितना जानता हूं, मुझे लगता है कि सुरेंद्र किशोर ने कोई अतिश्योक्तिपूर्ण बातें नहीं लिखी है।<br />
जहां तक सुरेंद्र किशोर के खुद के महिमामंडन का सवाल है तो तीस सालों की पत्रकारिता करते मैंने उनमें यह गुण कभी नहीं देखा। जबकि उनके समकालीन कुछ अन्य पत्रकारों को देख लीजिए, जिसकी ओर किशोर कुमार ने इशारा किया है, तो समझ में आ जाएगा कि एक पत्रकार अपना महिमामंडन और चापलूसी किस तरह कर सकता है।<br />
पत्रकार का काम खामियों को उजागर करना है तो अच्छे कामों की तारीफ करना भी है। यदि ऐसा नहीं है तो टाइम्स आफ इंडिया जैसा अखबार अनेक मौकों पर सरकार की अनेक नीतियों की तारीफ करता नहीं दिखता। या फिर कुलदीप नायर से लेकर अरूण शौरी तक सरकार की किसी भी नीति का समर्थन करते ही नहीं।<br />
सुरेंद्र किशोर पत्रकार हैं और सौ फीसदी पत्रकार हैं। अविनाथ जी ने उनके लिए प्रचारक का शब्द दिया है। अब उनके बारे में भी क्या कहें, बिहार में प्रचालित कहावत है &#8211; चलनी हंसे सूप पर&#8230;। अविनाश जी प्रभात खबर से क्यों हटें, एनडीटीवी से क्यों हटे फिर मध्यप्रदेश से वापस क्यों होना पड़ा, यह बहुत से पत्रकार जानते हैं। कम से कम उन्हें सुरेंद्र किशोर के बारे में टिप्पणी करने का नैतिक अधिकार नहीं है।</p>
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		<title>By: Virendra Jain</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/surendra-kishor-article-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4343</link>
		<dc:creator>Virendra Jain</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 23:51:37 +0000</pubDate>
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		<description>सरोज सागर जी  की बात से सहमत हूं। इसमें कोई शक नहीं कि सुरेंद्र किशोर पत्रकार नहीं, प्रचारक हैं। उनके ब्‍लॉग पर मौजूद लगभग सभी लेख इसी टाइप के हैं। हिंदुस्‍तान और जनसत्‍ता  में छपे इनका  लेख जब भी पढा है तो यह लगा है लिखने वाले में कहीं न कहीं वायसनेस है। 

और इस तर्क में भी कोई दम नहीं हैं कि कोई सरकार अच्‍छा काम कर रही है तो पत्रकार उसकी चापलूसी में जुट जाएगा। पत्रकार का काम उसकी कमियों को जनता के सामने लाना है।  तारीफ के पुल बांधना नहीं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सरोज सागर जी  की बात से सहमत हूं। इसमें कोई शक नहीं कि सुरेंद्र किशोर पत्रकार नहीं, प्रचारक हैं। उनके ब्‍लॉग पर मौजूद लगभग सभी लेख इसी टाइप के हैं। हिंदुस्‍तान और जनसत्‍ता  में छपे इनका  लेख जब भी पढा है तो यह लगा है लिखने वाले में कहीं न कहीं वायसनेस है। </p>
<p>और इस तर्क में भी कोई दम नहीं हैं कि कोई सरकार अच्‍छा काम कर रही है तो पत्रकार उसकी चापलूसी में जुट जाएगा। पत्रकार का काम उसकी कमियों को जनता के सामने लाना है।  तारीफ के पुल बांधना नहीं।</p>
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		<title>By: सरोज सागर</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/surendra-kishor-article-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4337</link>
		<dc:creator>सरोज सागर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 13:35:33 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://mohallalive.com/?p=6873#comment-4337</guid>
		<description>भाई अजय की भावना से सहमत हूं। रंजन ने बहुत गलत किया है। उन्‍होंने बातें ठीक लिखीं हैं लेकिन अपशब्‍द का प्रयोग कर सारा गुड-गोबर कर दिया। मैं अपने तईं इसकी भर्त्‍सना करता हूं। सुरेंद्र किशोर बेसलेस पत्रकार सही, लेकिन इस तरह एक अपशब्‍द कहकर रंजन  ने खुद को कुंठित साबित कर दिया है।

दूसरी बात यह कहना चाहूंग अजय भाई कि मोहल्‍ला पर पिछले छह महीने से आ रहा हूं लेकिन कभी भी मैंने गाली का प्रयोग नहीं देखा । इस तरह का अपशब्‍द कहने की भी यह पहली घटना देख रहा हूं।

अविनाश जी से आग्रह है कि वे रंजन का दूसरा कमेंट जिसमें उन्‍होंने सुरेंद्र जी के लिए &#039;साला&#039; शब्‍द का प्रयोग किया है, उसे मिटा दें। यह आपकी साइट की गरिमा के लिए जरूरी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई अजय की भावना से सहमत हूं। रंजन ने बहुत गलत किया है। उन्‍होंने बातें ठीक लिखीं हैं लेकिन अपशब्‍द का प्रयोग कर सारा गुड-गोबर कर दिया। मैं अपने तईं इसकी भर्त्‍सना करता हूं। सुरेंद्र किशोर बेसलेस पत्रकार सही, लेकिन इस तरह एक अपशब्‍द कहकर रंजन  ने खुद को कुंठित साबित कर दिया है।</p>
<p>दूसरी बात यह कहना चाहूंग अजय भाई कि मोहल्‍ला पर पिछले छह महीने से आ रहा हूं लेकिन कभी भी मैंने गाली का प्रयोग नहीं देखा । इस तरह का अपशब्‍द कहने की भी यह पहली घटना देख रहा हूं।</p>
<p>अविनाश जी से आग्रह है कि वे रंजन का दूसरा कमेंट जिसमें उन्‍होंने सुरेंद्र जी के लिए &#8216;साला&#8217; शब्‍द का प्रयोग किया है, उसे मिटा दें। यह आपकी साइट की गरिमा के लिए जरूरी है।</p>
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		<title>By: अजय कुमार मिश्र</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/surendra-kishor-article-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4334</link>
		<dc:creator>अजय कुमार मिश्र</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 12:46:41 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://mohallalive.com/?p=6873#comment-4334</guid>
		<description>सुंरेंद्र किशोर के आलेख पढ़ने के बाद मैं इस विश्वास के साथ टिप्पणियां पढ़ने लगा कि पाठकों के बीच स्वस्थ बहस हो रही होगी। लेकिन जैसा कि सुना था कि मोहल्ला ब्लाग पर गाली-गलौज के अलावा और कुछ नहीं होता, सचमुच मेरा पहला अनुभव भी ऐसा ही रहा। आप किसी टिप्पणी से सहमत और असहमत हो सकते हैं, लेकिन बहस के दौरान गाली-गलौज का इस्तेमाल से संस्कार का पता चलता है। फिर तो ऐसे संस्कारों वाले लोगों से किसी तटस्थ पत्रकार या व्यक्ति के बारे में सार्थक बहस की उम्मीद करना बेकार ही है। 
मैं बिहार मूल का हूं और पाटलीपुत्र टाइम्स से लेकर आज तक में काम किया। अब दिल्ली में सरकारी सेवक हूं। लेकिन पत्रकारिता से लगाव बना रहा और किसी भी पत्रकार से कम पत्र-पत्रिकाएं मैं नहीं पढ़ता। जहां तक सुरेंद्र किशोर का सवाल है, मैं उन्हें जितना जानता हूं और जनसत्ता और दैनिक हिंदुस्तान के पाठक होने के नाते जितना पढ़ा, कह सकता हूं कि वह निष्पक्ष पत्रकार हैं। हो सकता है कि नीतीश सरकार के पक्ष में किसी टिप्पणी से पाठकों में भ्रम की स्थिति बनी हो, लेकिन वे वैसा हैं नहीं। 
कई साल पहले एक बार सुरेंद्र किशोर ने लालू सरकार की तारीफ की थी कि उन्होने कैसे सांप्रदायिक ताकतों से निबटा। इसके बाद तेजी से अफवाह फैली कि लालू ने सुरेंद्र किशोर को मैनेज कर लिया।, जबकि बिहार के लोग इस बात के गवाह हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं था। 
यह सही है कि प्रभाष जोशी सुरेंद्र किशोर को काफी मानते थे और उनकी काबिलियत के कायल भी थे। एक बार जनसत्ता संवाददादओं की पटना के परिसद में हुई बैठक में मैंने इस बात को शिद्दत से महसूस किया था। तब मैं वहां इसलिए था कि जोशी जी ने मिलने के लिए बुलाया था। वह जिलों से आए संवाददाओं से कह रहे थे कि आप सबों को अपने-अपने जिले का सुरेंद्र किशोर बनना है।  
मैं अपने पोस्ट के जरिए सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि बहस कीजिए, गाली-गलौज नहीं। सतही भाषा का इस्तेमाल न करें। 
रही बात किशोर कुमार की तो मैं उनके बारे में भी जानता हूं। वह कभी जनसत्ता के कलकत्ता संस्कारण में काम करते थे। इसलिए यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सुरेंद्र किशोर ने ही किशोर कुमार के नाम से उपर टिप्पणी की है। बेशक आप किशोर कुमार की बातों से सहमत-असहमत हो सकते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुंरेंद्र किशोर के आलेख पढ़ने के बाद मैं इस विश्वास के साथ टिप्पणियां पढ़ने लगा कि पाठकों के बीच स्वस्थ बहस हो रही होगी। लेकिन जैसा कि सुना था कि मोहल्ला ब्लाग पर गाली-गलौज के अलावा और कुछ नहीं होता, सचमुच मेरा पहला अनुभव भी ऐसा ही रहा। आप किसी टिप्पणी से सहमत और असहमत हो सकते हैं, लेकिन बहस के दौरान गाली-गलौज का इस्तेमाल से संस्कार का पता चलता है। फिर तो ऐसे संस्कारों वाले लोगों से किसी तटस्थ पत्रकार या व्यक्ति के बारे में सार्थक बहस की उम्मीद करना बेकार ही है।<br />
मैं बिहार मूल का हूं और पाटलीपुत्र टाइम्स से लेकर आज तक में काम किया। अब दिल्ली में सरकारी सेवक हूं। लेकिन पत्रकारिता से लगाव बना रहा और किसी भी पत्रकार से कम पत्र-पत्रिकाएं मैं नहीं पढ़ता। जहां तक सुरेंद्र किशोर का सवाल है, मैं उन्हें जितना जानता हूं और जनसत्ता और दैनिक हिंदुस्तान के पाठक होने के नाते जितना पढ़ा, कह सकता हूं कि वह निष्पक्ष पत्रकार हैं। हो सकता है कि नीतीश सरकार के पक्ष में किसी टिप्पणी से पाठकों में भ्रम की स्थिति बनी हो, लेकिन वे वैसा हैं नहीं।<br />
कई साल पहले एक बार सुरेंद्र किशोर ने लालू सरकार की तारीफ की थी कि उन्होने कैसे सांप्रदायिक ताकतों से निबटा। इसके बाद तेजी से अफवाह फैली कि लालू ने सुरेंद्र किशोर को मैनेज कर लिया।, जबकि बिहार के लोग इस बात के गवाह हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं था।<br />
यह सही है कि प्रभाष जोशी सुरेंद्र किशोर को काफी मानते थे और उनकी काबिलियत के कायल भी थे। एक बार जनसत्ता संवाददादओं की पटना के परिसद में हुई बैठक में मैंने इस बात को शिद्दत से महसूस किया था। तब मैं वहां इसलिए था कि जोशी जी ने मिलने के लिए बुलाया था। वह जिलों से आए संवाददाओं से कह रहे थे कि आप सबों को अपने-अपने जिले का सुरेंद्र किशोर बनना है।<br />
मैं अपने पोस्ट के जरिए सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि बहस कीजिए, गाली-गलौज नहीं। सतही भाषा का इस्तेमाल न करें।<br />
रही बात किशोर कुमार की तो मैं उनके बारे में भी जानता हूं। वह कभी जनसत्ता के कलकत्ता संस्कारण में काम करते थे। इसलिए यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सुरेंद्र किशोर ने ही किशोर कुमार के नाम से उपर टिप्पणी की है। बेशक आप किशोर कुमार की बातों से सहमत-असहमत हो सकते हैं।</p>
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		<title>By: ranjan</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/08/surendra-kishor-article-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4332</link>
		<dc:creator>ranjan</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 11:24:47 +0000</pubDate>
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		<description>जब प्रभाष जोशी के निधन के मौके पर ये महोदय अपना इतना महिमामंडन करते हैं तो अपनी मरने के बाद कितना करेंगे...!!!
:)

बहरहाल, किसी ने ठीक ही कहा है कि अब प्रभाष जोशी, देवीलाल या भागवत झा आजाद आकर तो यह बताने से रहे कि उन्होंने सुकि महोदय को किसका संपादक बनाने का ऑफर दिया था। हां, सुकि जी जरा सा गड़बड़ा गए कि उन्होंने बस संपादक पद की ही मांग की। कह देना चाहिए था साले को अगर वे ईमानदार और सम्माननीय नहीं होते तो प्रधानमंत्री पद तो प्रभाष जोशी हाथ में लिए खड़े थे इनके लिए। बहरहाल, देखिए औऱ इंतजार कीजिए नीतीश बाबू कितना परसादी इनके कटोरे में परोसते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जब प्रभाष जोशी के निधन के मौके पर ये महोदय अपना इतना महिमामंडन करते हैं तो अपनी मरने के बाद कितना करेंगे&#8230;!!!<br />
 <img src='http://mohallalive.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>बहरहाल, किसी ने ठीक ही कहा है कि अब प्रभाष जोशी, देवीलाल या भागवत झा आजाद आकर तो यह बताने से रहे कि उन्होंने सुकि महोदय को किसका संपादक बनाने का ऑफर दिया था। हां, सुकि जी जरा सा गड़बड़ा गए कि उन्होंने बस संपादक पद की ही मांग की। कह देना चाहिए था साले को अगर वे ईमानदार और सम्माननीय नहीं होते तो प्रधानमंत्री पद तो प्रभाष जोशी हाथ में लिए खड़े थे इनके लिए। बहरहाल, देखिए औऱ इंतजार कीजिए नीतीश बाबू कितना परसादी इनके कटोरे में परोसते हैं&#8230;</p>
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