एक हैं करीना कपूर…


हम सभी जानते हैं उन्हें। हिंदी फिल्मों में कपूर खानदान की विरासत को संभाल रही करीना कपूर उसे नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दम नहीं रखतीं। उनमें दंभ है। उन्हें लगता है कि 75 साल में अर्जित कपूर खानदान की प्रतिष्ठा का उन्हें फायदा तो मिलेगा ही। मिला भी। फिल्मों में आयीं तो अच्छी शुरुआत नहीं होने पर भी उन्हें मौके मिलते रहे। एक ज़माने में उन्हें फ्लॉप फिल्मों की श्रेष्ठ हीरोइन कहा जाता था। अगर उनकी फिल्मों पर गौर करें तो ज़्यादातर बिजनेस और क्वालिटी के हिसाब से कमज़ोर रही हैं। उन्होंने चमेली और ओमकारा जैसी कुछ अच्छी फिल्में की हैं। इन फिल्मों का श्रेय किसे मिलना चाहिए? आप जानते हैं। बातचीत करो तो वह खुद को डायरेक्टर की हीरोइन बता कर अपनी ज़िम्मेदारी और अयोग्यता से पल्ला झाड़ लेती हैं।
इस साल उनकी दो फिल्में आयीं – कमबख़्त इश्क और मैं और मिसेज खन्ना। दोनों ही फिल्मों में उन्होंने वाहियात अभिनय किया। याद करें, तो 2007 में आयी जब वी मेट के बाद उन्होंने दर्शकों को संतुष्ट नहीं किया है। उनमें एक उम्फ है, जिसकी वजह से वह पर्दे पर कामुक लगती हैं। इस उम्फ में नैसर्गिक सौंदर्य से अधिक उन जानकारों का योगदान है, जो आजकल हर किसी को आकर्षक बना देते हैं। आप गौर करें कि करीना कपूर की फिल्मों में उनके किरदारों और अभिनय से ज़्यादा डिज़ाइन और स्टाइल की बातें होती हैं। आप उनसे अभिनय और किरदार की बात पूछें तो मुंह में कड़वे स्वाद का भाव चेहरे पर ले आती हैं और बताती हैं कि यू नो… यू नो… वी आर… यू नो…
यस वी नो करीना कपूर। आप को ओवरटेक कर चुकी हैं कैटरीना कैफ और प्रियंका चोपड़ा। आप कपूर खानदान के मुग़ालते में न रहें। ज़्यादा मेहनत करें और काम पर घ्यान दें। फिल्मों में विरासत में कुछ भी नहीं मिलता। खुद आप के पापा उदाहरण हैं। फिल्मों के लोकतंत्र में परिवारवाद की सीमाएं हैं। आप को फिल्में मिल सकती हैं। मिलती रह सकती हैं, लेकिन महारानी या टॉप की हीरोइन तो दर्शक ही बनाते हैं। बॉक्स ऑफिस पर उनके धनदान से ही कलाकार महान और पापुलर होते हैं।
♦ अब्राहम हिंदीवाला











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