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चित्रों ने खोली ज़ुबान, मर्दों के बारे में क्‍या सोचती हैं औरतें

9 November 2009 18 Comments

♦ चण्डीदत्त शुक्ल

NIDHI SAXENA

NIDHI KI NAYEE PAINTING...

NIDHI KI NAYEE PAINTING1

कौन-सा पुरुष होगा, जो न जानना चाहे कि स्त्रियां उसके बारे में क्या सोचती हैं? ये पता करने का मौक़ा जयपुर में मिला, तो मैं भी छह घंटे सफ़र कर दिल्ली से वहां पहुंच ही गया। मौक़ा था, टूम 10 संस्था की ओर से सात महिला कलाकारों की संयुक्त प्रदर्शनी के आयोजन का। और विषय, द मेल!

मर्द, मरदूद, साथी, प्रेमी, पति, पिता, भाई और शोषक… पुरुष के कितने ही चेहरे देखे हैं स्त्रियों ने। कौन-सी कलाकार के मन में पुरुष की कौन-सी शक्ल बसी है, ये देखने की (परखने की नहीं… क्योंकि उतनी अक्ल मुझमें नहीं है!) लालसा ही वहां तक खींच ले गयी।

जयपुरवालों का बड़ा कल्चरल सेंटर है, जवाहर कला केंद्र। हमेशा की तरह अंदर जाते ही नज़र आये कॉफी हाउस में बैठे कुछ कहते, कुछ सुनते, कुछ खाते-पीते लोग।

सुकृति आर्ट गैलरी में कलाकारों की कृतियां डिस्प्ले की गयी थीं। उदघाटन की रस्म भंवरी देवी ने अदा की। पर ये रस्म अदायगी नहीं थी। पुरुष को समझने की कोशिश करते चित्रों की मुंहदिखाई की रस्म भंवरी से बेहतर कौन निभाता। वैसे भी, उन्होंने पुरुष की सत्ता को जिस क़दर महसूस किया है, शायद ही किसी और ने किया हो पर अफ़सोस… अगले दिन मीडिया ने उनका परिचय कुछ यूं दिया, फ़िल्म बवंडर से चर्चा में आयीं भंवरी…!

इस मौक़े पर चर्चित संस्कृतिकर्मी हरीश करमचंदानी ने 15 साल पुरानी कविता सुनाई, मशाल उसके हाथ में। भंवरी देवी के संघर्ष की शब्द-यात्रा।

एक्जिबिशन में शामिल कलाकारों में से सरन दिल्ली की हैं। वनस्थली से उन्होंने फाइन आटर्स की पढ़ाई की है। उनका पुरुष फूल और कैक्टस के बीच नज़र आता है। कांटे और खुशबू के साथ आदमी का चेहरा। वैसे, लगता है सरन के लिए पुरुष साथी ही है। रोमन शैली का ये मर्द शरीर से तो मज़बूत है पर उसका चेहरा कमनीय है, जैसे चित्रकार बता रही हों… वो बाहर से कठोर है और अंदर से कोमल।

सुनीता एक्टिविस्ट हैं… स्त्री विमर्श के व्यावहारिक और ज़रूरी पक्ष की लड़ाई लड़ती रही हैं। वो राजस्थान की ही हैं। सुनीता ने स्केचेज़ बनाये हैं। उनकी कृतियों में पुरुष की तस्वीर अर्धनारीश्वर जैसी है… शायद आदमी के अंदर एक औरत तलाशने की कोशिश। लगता है, वो पुरुष को सहयोगी और हिस्सेदार समझती हैं।

संतोष मित्तल के चित्र ख़ूबसूरत हैं, फ़िगरेटिव हैं, इसलिए जल्दी ही समझ में आ जाते हैं। कलरफुल हैं, पर चौंकाते हैं। उनके ड्रीम मैन हैं, अमिताभ बच्चन। इस बात पर बहस हो सकती है कि किसी स्त्री के लिए अमिताभ पसंदीदा या प्रभावित करने वाले पुरुष क्यों नहीं हो सकते! पर सवाल थोड़ा अलग है। संतोष के चित्रों में तो फ़िल्मी अमिताभ की देह भाषा प्रमुख है, उनका अंदाज़ चित्रित किया गया है। जवानी से अधेड़ और फिर बूढ़े होते अमिताभ। ख़ैर, पसंद अपनी-अपनी!

एक और कलाकार हैं सीता। वो राजस्थान के ही सीमांत ज़िले श्रीगंगानगर की हैं। कलाकारी की कोई फॉर्मल एजुकेशन नहीं ली। पति भी कलाकार हैं, तो घर में रंगों से दोस्ती का मौक़ा अच्छा मिला होगा। उनकी एक पेंटिंग में साधारण कपड़े पहने पुरुष दिखता है। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। वो दस सिर वाला पुरुष है… क्या रावण! एक और कृति में सीता ने उलटे मटके पर पुरुष की ऐसी शक्ल उकेरी है, जैसे किसान खेतों में पक्षियों को डराने के लिए बज़ूका बनाते हैं। तो क्या इसे विद्रोह और नाराज़गी की अभिव्यक्ति मानें सीता?

मंजू हनुमानगढ़ की हैं। पिछले 20 साल से बच्चों को पढ़ाती-लिखाती रही हैं। यानी पेशे से शिक्षिका हैं। उनकी कृतियों में प्रतीकात्मकता असरदार तरीक़े से मौजूद है। तरह-तरह की मूंछों के बीच नाचता घाघरा और दहलीज़ पर रखे स्त्री के क़दम… ऐसी पेंटिंग्स बताती हैं… अब और क़ैद मंज़ूर नहीं।

ज्योति व्यास शिलॉन्ग में पढ़ी-लिखी हैं, पर रहने वाली जोधपुर की हैं। प्रदर्शनी में उनके छायाचित्र डिस्प्ले किये गये हैं। चूड़ियां, गाढ़े अंधेरे के बीच जलता दीया और बंद दरवाज़े के सामने इकट्ठे तोते। ये एक बैलेंसिग एप्रोच है पर थोड़ी खीझ के साथ।

निधि इन सबमें सबसे कम उम्र कलाकार हैं। फ़िल्में बनाती हैं, स्कल्पचर और पेंटिंग्स भी। ख़ूबसूरत कविताएं लिखती हैं और ब्लॉगर भी हैं(संयोग से इनकी पेंटिंग्स ही मोहल्ला लाइव के लिए भेजने को मुझे मिल सकी हैं)। निधि पुरुष के उलझाव बयां करती हैं और इस दौरान उसके हिंसक होते जाने की प्रक्रिया भी। समाज के डर से सच स्वीकार करने की ज़िम्मेदारी नहीं स्वीकार करने वाले पुरुष का चेहरा अब सबके सामने है। जहां चेहरा नहीं, वहां उसके तेवर बताती देह।

एक चित्र में अख़बार को रजाई की तरह इस्तेमाल कर उसमें छिपे हुए पुरुष के पैर बाहर हैं… जैसे कह रहे हों, मैंने बनावट की बुनावट में खुद को छिपा रखा है, फिर भी चाहता हूं, मेरे पैर छुओ, मेरी बंदिनी बनो!

एक्रिलिक में बनाये गये नीले बैकग्राउंड वाले चित्र में एक आवरण-हीन पुरुष की पीठ है। उसमें तमाम आंखें हैं और लाल रंग से उकेरी गयीं कुछ मछलियां। ये अपनी ज़िम्मेदारियों से भागते पुरुष की चित्त-वृत्ति का पुनर्पाठ ही तो है!
उनके एक चित्र में देह का आकार है… उसकी ही भाषा है। कटि से दिल तक जाती हुई रेखा… मध्य में एक मछली… और हर तरफ़ गाढ़ा काला रंग। ये एकल स्वामित्व की व्याख्या है। स्त्री-देह पर काबिज़ होने, उसे हाई-वे की तरह इस्तेमाल करने की मंशा का पर्दाफ़ाश। निधि के पांच चित्र यहां डिस्प्ले किये गये हैं। प्रदर्शनी अभी 10 नवंबर तक चलेगी।

पुनश्च 1 – ये कोई रंग-समीक्षा नहीं है। जो देखा, समझ में आया। लिख दिया।
पुनश्च 2 – आनंदित होने, संतुष्ट हो जाने और बेचैन हो जाने के भी तमाम कारण इन चित्रों ने बताये हैं। इन पर सोचना ही पड़ेगा।

[[और अंत में... एक बड़े अधिकारी की पत्नी ने कहा, भंवरी देवी को प्रदर्शनी की शुरुआत करने के लिए क्यों बुलाया गया? मुझसे कहतीं, मैं किसी भी सेलिब्रिटी को बुला देती! अफ़सोस कि ऐसा कहने वाली खुद को कलाकार भी बताती हैं। (कानों सुनी)]]

chandidutt shukla(चंडीदत्त शुक्‍ल। गोंडा, यूपी में जन्म। दिल्ली में निवास। अखबारों-मैगजीन में चाकरी करने, दूरदर्शन-रेडियो और मंच पर तरह-तरह का काम करने के बाद इन दिनों फोकस टीवी के प्रोग्रामिंग सेक्शन में स्क्रिप्टिंग। दूरदर्शन-नेशनल के साप्ताहिक कार्यक्रम कला परिक्रमा की लंबे अरसे तक स्क्रिप्टिंग की है। अब इनसे chandiduttshukla@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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18 Comments »

  • sanjiv salil said:

    aapki rapat jeevant hai. chitron ke vivaran ke sath sambandhit chitr bhee hote to pathak ko darshak bankar adhik aanandaanubhooti hoti.

  • rajeev gupta said:

    the male per chandi dutt ji ka lekh avha laga….chandi ji ko mai pehle bhi padta raha hoon aur esliye mai ye keh sakta hoon ki unke lekho mai khubsurat bhasha ke sath choone wale ahssas bhi hote hai.bathai

  • Ojasi Mehta said:

    Aapne jis khobsurti se unke chitron ko shabdon mein ukera hai mera man aur zyada unhein dekhne ka kar raha hai.Paintings ki gehrayi jyada samajh nahi aati per koshish karungi kuch samajh mein aa jaye…

  • सुशांत झा said:

    चंडीबाबू, ई तो पते नहीं था आप कला समीक्षक भी हैं। कहां से सीख लिए एतना गुर। गुरु…ई ज्ञान कुछ हमको भी उधार दय द न…सही में लगता है कि मैं जयपुर पहुंच गया…। बेहतरीन। जारी रहिए।

  • somadri sharma said:

    Chauncey Mitchell Depew had qouted about woman that ‘A pessimist is a man who thinks all women are bad, An optimist is a man who hopes they are’, whereas Matthew Prior had said that ‘Be to her virtues very kind, Be to her faults a little blind.’..Now what Chandidutt shukla’s prolific pen believes ‘Beauty is the first present Nature gives to women and those women artists are giving back that pleasent expression through ‘THE MALE’ .

    keep on writing.. wishes for u..and thanx for snaps along with write-up..

  • प्रेम said:

    काफी अच्छी समीक्षा की है। पहले तो उन सभी कलाकारों को मेरे तरफ से धन्यवाद जिन्होंने इस सब्जेक्ट पर पेंटिग्स बनाईं। पेटिंग्स काफी खूबसूरत हैं और साफ संदेश भी देते हैं। चंडी दा मैं तो आपको पहले से जानता हूं कि कला को परखने में आप धोखा नहीं खा सकते हैं। आपकी समीक्षा बेहद ही शानदार है। हां पेटिंग्स में जीवंत रंगों की हल्की सी कमी दिख रही है। भंवरी देवी से इसका उद्घाटन कराना काफी सुख देता है। हमारी शुभकामना है कि ये कलाकार अपने जीवन में बहुत आगे जाएं और कला की दुनिया में नाम करें।

  • Dr. Purnima Sharma said:

    अरे चंडीदत्त जी, हमें सच में नहीं मालूम था कि आप कला समीक्षक भी हैं | बहुत अच्छी जीवंत समीक्षा है | आपके लेखन के माध्यम से सारे चित्र आँखों के आगे जीवित हो गए | बिल्कुल ठीक किया आयोजकों ने जो भंवरी देवी से उद्घाटन करवाया | हाँ तथाकथित कलाकारों को निश्चित रूप से ये नागवार गुज़रा होगा | उनकी परवाह कौन करता है ?????? पूर्णिमा

  • SYED FARHAT ALI said:

    bahut acche aapki is samiksha ko badh kar ke to aisa laga mai bhi jaipur ka chakkar laga aaya hu wo bhi baghair flight ticket jaise saari tasveer mere dimaagh me banti chali gayee ho aur ek baat ye ki aksar log bade bade kalakaron ko mukhya atithi ke taur par bula lete hai magar unme wo baat nahi dikhti ho tv ya film ke parde par dikhti hai, mai to bahut kush hu ki bhawnri devi ko bulaya

  • सुभाष नीरव said:

    भाई चंडी जी, आपकी यह समीक्षा प्रभावकारी है। मैंने सभी कलाकारों के चित्र तो नहीं देखे पर आपकी समीक्षा शैली ने जैसे चित्र आँखों में बना दिए हों। क्या ही अच्छा होता कि हर कलाकार के दो दो, तीन तीन चित्र बानगी के तौर पर दिए जाते। एक जीवन्त कला समीक्षा के लिए बधाई !

  • डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said:

    भाई, आपने तो पूरी प्रदर्शनी को ही सजीव कर दिया. मेरे खयाल से तो रिपोर्ट इसी तरह की होनी चाहिए. आपकी रिपोर्ट पढ़कर इस बात पर अफसोस भी हुआ कि मैं इतनी अच्छी प्रदर्शनी देखने से वंचित रहा, जयपुर में ही होने के बावज़ूद.बहुत उम्दा और स्तीक रिपोर्ट के लिए बधाई.

  • rakesh mutha said:

    उनके एक चित्र में देह का आकार है… उसकी ही भाषा है। कटि से दिल तक जाती हुई रेखा… मध्य में एक मछली… और हर तरफ़ गाढ़ा काला रंग। ये एकल स्वामित्व की व्याख्या है। स्त्री-देह पर काबिज़ होने, उसे हाई-वे की तरह इस्तेमाल करने की मंशा का पर्दाफ़ा
    wah chandiduttji
    achha laga aapko padhker ..pradarshni mene nahi dekhi magar aapki nazro se aapki kalam ke jariye muje laga ki mein sayad dekh aaya pradarshni ..achi dhara pravah bhasha hai aapki..dhanyawad

  • randhirsinghsuman said:

    मेरे पैर छुओ, मेरी बंदिनी बनो!nice

  • अजित वडनेरकर said:

    सुंदर समीक्षा।
    ज़रूरी है आज के दौर में
    इन गतिविधियों पर पैनी समीक्षात्मक दृष्टि डालना
    और उसे व्याख्यायित करना।

    किसी ज़माने में हम दिनमान
    को उसकी कला-समीक्षाओं के लिए
    भी खरीदा करते थे।

  • kavita said:

    adbhut ,jivant sameeksha.ghar baithe hi pradarshani ki sair karva di saath hi poori vyakhya bhi kar di dhanyavad.

  • tara chandra gupta said:

    bahut sundar samiksha hai. aaj ke daur me mahilaon ke kya vichar hain jankar pata chal gaya. dhanvad

  • Kiran Nitila Rajpurohit said:

    बहुत बढिया दत्त साहब!!!
    अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति।
    कलाकार का नजिरया खूब बतलाया। सच ही है हर औरत पुरुष् के बारे में अलग राय रखती है

  • Dileepraaj Nagpal said:

    Jaipur Me Rahte Hue Ye Pradarshni Nahi Dekh Paya Tha. Akhbaaron Me Padha Ki Bhanwari Devi Aayi ThiTo Afsos Aur Badh Gaya Ki Unse Mil Nahi Saka. Samiksha Acchi Ki Hai Aapne. Badhayi…

  • Mohalla Live » Blog Archive » पुरुष ने बनाये स्‍त्री के चित्र, स्‍त्री ने रखे अपने विचार said:

    [...] हुई एक ख़ास कला प्रदर्शनी के बहाने औरतों की नज़र में क्या है पुरुष इसकी चर्चा भी हुई। आज एक और कला-नोट [...]

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