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देश के थिएटर को एनएसडी के चंगुल से मुक्‍त कराया जाए

10 November 2009 2 Comments

♦ मृत्‍युंजय प्रभाकर

सबसे बड़ा सवाल यह है की एनएसडी के प्रोफ़ेसर्स या उनके परिवार के लोग क्या बीमार पड़ने पर उसी अस्पताल में इलाज करवाते हैं? जवाब है नहीं। फिर ये दोहरापन क्‍यूं। अपने लिए तो अच्‍छे डॉक्‍टर और अस्‍पताल, छात्रों के लिए किडनी और निठारी रैकेट में शामिल एनएमसी। कहा जाता है कि इसके मालिक की सांठगांठ बड़े-बड़े लोगों से है। तभी तो वो किसी को भी ख़रीद सकते हैं। नोएडा पुलिस पोस्‍टमार्टम करवाने से छह घंटे तक इनक़ार करती है। जब उनके बहुत बड़े अधिकारी का फोन आया तब वो पोस्‍टमॉर्टम के लिए राज़ी हुए। इससे आप समझ सकते हैं उनके इलाज की हकीक़त। हर कोई जानता है दिल्‍ली में डेंगू का इलाज सिर्फ अपोलो, एम्‍स जैसे बड़े संस्‍थानों में बेहतर तरीक़े से संभव है। उस पर भी जब मामला dengue shock का हो, तो कैसे कोई उसे 15 घंटे तक उस हॉस्‍पीटल में छोड़ सकता है। यह तो जान बूझ कर उसे मौत के मुंह में ढकेल देना है। हैरानी इस बात की है कि हॉस्‍पीटल में भर्ती करवा छात्रों को भाग्‍य भरोसे छोड़ दिया जाता है। इलाज सही चल रहा है या नहीं यह भी कोई देखने नहीं जाता। ये क्‍या लापरवाही नहीं है? हॉस्‍पीटल ने हर दूसरे दिन उसे अलग अलग बीमारी से शिकार बताया। आख़ि‍र में मामला dengue shock का निकला। जबकि डॉक्‍टरी रिपोर्ट में मौत की वजह हार्ट अटैक बतलायी गयी है। आख़ि‍र इतनी भिन्‍नता क्‍यों?

सवाल यह भी उठाया जाना चाहिए कि 22 साल के थिएटर कैरियर वाले लड़के को एनएसडी की ज़रूरत क्‍यों पड़ती है? इसकी वजह यह है कि थिएटर के नाम पर आने वाला सारा फंड या तो दलाल संस्‍कृतिकर्मियों के हाथ में है या एनएसडीयन्‍स के। जो इनसे अलग ईमानदारी से थिएटर करना चाहते हैं, उनके लिए जीवन जीने की और थिएटर करते रहने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं। एनएसडी बताये कि एनएसडी द्वारा आयोजित वर्कशॉप्‍स और कार्यक्रमों में कितने गैर एनएसडीयन्‍स को काम दिया जाता है। जो एनएसडी में रहते हुए लाइट छूता तक नहीं, वो बाहर आकर लाइट पढ़ाता है। वो नाटक भी लिख लेगा, सेट भी कर लेगा, एक्टिंग भी और डिज़ायन भी और म्‍यूज़‍िक भी और आयोजन की व्‍यवस्‍था भी वही संभालेगा। आख़ि‍र इतना dogamtism किसलिए? उनके छात्रों के फेलोशिप, प्रोडक्‍शन ग्रांट सब तय है। भले ही वो नाटक करें या न करें। कुछ को तो मैं भी जानता हूं, जिसने मिनि‍स्‍ट्री ऑफ कल्‍चर का प्रोडक्‍शन ग्रांट उठाया, पर नाटक नहीं किया। इनविटेशन छपवा कर पैसे उठा लिया। बिना कोई नाटक डायरेक्‍ट किये उन्‍हें संगीत नाटक अकादमी का पुरस्‍कार भी मिल जाएगा। लाइट का भी और स्क्रिप्‍ट राइटिंग का भी, एक्‍ट‍िंग का भी। ये क्‍या तमाशा लगा रखा है?

एनएडी के प्रोफेसर सालों भर क्‍लास भले न लें, पर ऑटोनॉमस बॉडी का फ़ायदा उठा कर किसी नाटक में लाइट, सेट या कुछ भी कर एक्‍स्‍ट्रा पैसा ज़रूर उठाएंगे। एक एक आदमी कई कई पोस्‍टों पर बैठा है। एनएसडी के लोगों के ख़ून में पैसा घुस गया है और वो नहीं चाहते कि बाहर के लोगों को उसमें हिस्‍सेदारी देनी पड़े।

इसी कारण इन्‍होंने एनएसडी को एक क्‍लोज़ बॉडी बना लिया है। अलग-अलग लॉबी हैं, पर हैं एनएसडीयन। मिल-बांट कर खाते हैं। सबकी अपनी लॉबी। जो आता है, अपने लोगों को उपकृत करता है। भले ही उसमें योग्‍यता हो या न हो। हां, एनएसडीयन्‍स हो, बस। यही कारण है कि नाटक में कैरियर बनाना चाहने वालों को एनएसडी के लिए मरना पड़ता है। या तो नहीं होने पर निराश होकर मरे या अंदर जाकर। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि देश के थिएटर को एनएसडी के चंगुल से मुक्‍त कराया जाए। तभी हम कुछ कर पाएंगे और शशि जैसे लोगों को बचा पाएंगे।

इंडियन एक्‍सप्रेस में छपी ख़बर

shashi indian express

mrityunjay prabhakar(मृत्‍युंजय प्रभाकर। शशि भूषण के मित्र। रंगकर्मी-पत्रकार। पटना में रंगकर्म के बाद जेएनयू में एडमिशन। वहीं रहते हुए सहर थिएटर ग्रुप बनाया। हाल ही में सहर की प्रस्‍तुति ध्रुवस्‍वामिनी ख़ासी चर्चा में रही। फिलहाल नई दुनिया में नौकरी, पत्रकारिता। इनसे mrityunjay.prabhakar@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

2 Comments »

  • Vibha Rani said:

    आप बिलकुल सही कह रहे हैं. सभी जगह के नाटक फेस्ट्वलों में भी अधिकतर यहीं के लोग मिलेंगे. अभी यहां जब नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल हो रहा था, ओ मैंने पाया कि इसके अधिकांश नाटक एनएसडी वालों के हैं. मैंने अपनी समीक्षाओं में भी यह लिखा था. किसी दूसरे की गुंजाईश ही इतनी कम हो जाती है कि पूछें मत. अब नाटक करने के लिए भी या तो आप एनएसडी के हों या बहुत बडे रसूखवाले. वरना बस इधर उधर शो करते रहिये. कोई पूछनेवाला नहीं. हमारे एक दोस्त ने बताया, जानती हैं एनएसडी का फुल फॉर्म? जवाब मिला: नॉट सीरियस अबाउट ड्रामा. यह कम से कम मुंबई का सच तो है ही.

  • alok nandan said:

    एनएसडी में गिरोहबाजी बहुत दिनों से चल रही है..आपने सही कहा है इनके मुंह में खून लगा हुआ है..और देश के थियेटर को कुंद करने में लगे हुये हैं…छात्रों के चुनाव की प्रक्रिया में तो घालमेल है ही..इसको संचालित करने में भी खूब घालमेल है.

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