हिंदी से क्यों डरते हैं क्षेत्रीय राजनीति के विषधर
देश को बांटने में लगी ताकतें राष्ट्रभाषा को बनाती रही हैं निशाना
♦ संजय द्विवेदी
क्षेत्रीयता की राजनीति तो वैसे भी किसी देश की एकता की कुचालक ही है। राष्ट्रीयता की भावना को कमज़ोर करके ही क्षेत्रीयता की राजनीति परवान चढ़ती है। यही कारण है क्षेत्रीयता की राजनीति के वाहक अपनी राजनीतिक सफलता सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहला हमला हिंदी पर करते हैं। क्योंकि हिंदी वास्तव में वह सूत्र है, जो सबको जोड़ती है और हमारे राष्ट्रीय संघर्ष की भाषा रही है। राष्ट्रीय आंदोलन में हिंदी ही उस बीज मंत्र का स्वर बनी, जिससे पूरा देश सम्मोहित हो उठा और अंग्रेजी राजसत्ता का कभी न अस्त होने वाला सूर्य डूब गया। यही हिंदी क्यों कभी तमिलनाडु में तो कभी महाराष्ट्र में राजनीति के निशाने पर होती है। राज ठाकरे या किसी तमिल नेता को हिंदी विरोध से क्या ताकत मिलती है जबकि उसे एक पराई भाषा अंग्रेजी से तो कोई खतरा महसूस नहीं होता पर हिंदी उनके रोष का शिकार बनती रही है। राज ठाकरे प्रकरण ने एक बार फिर इस सवाल के सामने हमें खड़ा कर दिया है।
ऐसे में यह विश्लेषण करना बहुत मौजूं है कि आखिर हिंदी सबके निशाने पर क्यों है। नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी दयानंद से लेकर विवेकानंद तक लोगों को जगाने के अभियान की भाषा हिंदी ही बनी। गांधी ने भाषा की इस शक्ति को पहचाना और करोड़ों लोगों में राष्ट्रभक्ति का ज्वार पैदा किया तो उसका माध्यम हिंदी ही बनी थी। दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिंदी में रचकर हिंदी को एक प्रतिष्ठा दी। जानकारी के लिए बता दें कि ये दोनों महानायक हिंदी भाषा नहीं थे। तिलक, गोखले, पटेल सबके मुख से निकलने वाली हिंदी ही देश में उठे जन-ज्वार का कारण बनी। यह वही दौर है, जब आजादी की अलख जगाने के लिए ढेरों अखबार निकले। उनमें ज्यादातर की भाषा हिंदी थी। यह हिंदी के खड़े होने और संभलने का दौर था। यह वही दौर जब भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘भारत दुर्दशा’ लिखकर हिंदी मानस को झकझोरा था। उधर पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘आज’ के संपादक बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, माधवराव सप्रे, मदनमोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी एक इतिहास रच रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता का यह समय ही हमारी हिंदी पत्रकारिता की प्रेरणा और प्रस्थान बिंदु है।
हिंदी की प्रगति के कुछ वाहक और मानक तलाशे जाएं तो इसे सबसे बड़ा विस्तार जहां आजादी के आंदोलन ने, साहित्य ने, पत्रकारिता ने दिलाया, वहीं हिंदी सिनेमा ने इसकी पहुंच बहुत बढ़ा दी। सिनेमा के चलते यह दूर-दराज तक जा पहुंची। दिलीप कुमार, राजकुमार, राजकपूर, देवानंद के ‘स्टारडम’ के बाद अभिताभ की दीवनगी इसका कारण बनी। हिंदी न जानने वाले लोग हिंदी सिनेमा के पर्दे से हिंदी के अभ्यासी बने। यह एक अलग प्रकार की हिंदी थी। फिर ट्रेनें, उन पर जाने वाली सवारियां, नौकरी की तलाश में हिंदी प्रदेशों क्षेत्रों में जाते लोग, गये तो अपनी भाषा, संस्कृति, परिवेश सब ले गये। तो कलकत्ता में ‘कलकतिया हिंदी’ विकसित हुई, मुंबई में ‘बंबईया हिंदी’ विकसित हुई। हिंदी ने अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से तादात्म्य बैठाया, क्योंकि हिंदी के वाहक प्रायः वे लोग थे जो गरीब थे, वे अंगरेज़ी बोल नहीं सकते थे। मालिक दूसरी भाषा का था, उन्हें इनसे काम लेना था। इसमें हिंदी के नये-नये रूप बने। हिंदी के लोकव्यापीकरण की यह यात्रा वैश्विक परिप्रक्ष्य में भी घट रही थी। पूर्वीं यूपी के आजमगढ़, गोरखपुर से लेकर वाराणसी आदि तमाम जिलों से ‘गिरमिटिया मजदूरों’ के रूप में विदेश के मारीशस, त्रिनिदाद, वियतनाम, गुयाना, फिजी आदि द्वीपों में गई आबादी आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी है और हिंदी बोलती है। सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर नवीन रामगुलाम, वासुदेव पांडेय आदि तमाम लोग अपने देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी बने। बाद में शिवसागर रामगुलाम गोरखपुर भी आये।
सच तो यह है कि हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे आप कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।
इसका आकलन करें तो कहीं न कहीं ऐसा नज़र आता है कि हिंदी भाषी लोग इन समाजों पर हावी हो जाएंगे। यह आशंका राज जैसे लोगों को सताती होगी। जबकि यह वायवीय डर है क्योंकि हिंदी जानने से रोजगार का दायरा बढ़ता है, कम नहीं होता। केरल का उदाहरण लें तो वहां हिंदी का विरोध न होने के कारण केरल के लोग देश के हर हिस्से में सफलतापूर्वक काम करते हुए दिखते हैं। इसी तरह हिंदी विरोध के चलते तमिलनाडु ने अपने को हर तरह सिकोड़ लिया। उनके राजनेता भी करिश्माई होने के बावजूद राष्ट्रीय रंगमंच पर कोई आभा पैदा नहीं कर पाये। आज तमिलनाडु में हिंदी विरोध उस रूप में नहीं दिखता। हिंदी के साथ सुविधा यह है कि वह क्षेत्र की आकांक्षाओं के साथ तालमेल बिठाते हुए अपनी शैली विकसित कर लेती है। हैदराबाद में हैदराबादी हिंदी इसका उदाहरण है। सही मायनों में हिंदी की सबको साथ लेकर चलने की ताकत को हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने पहचान लिया था। किंतु क्षेत्रीयता की राजनीति के शार्टकट से जल्दी सफलता पाने को आतुर युवा राज ठाकरे इसे नहीं पहचान पा रहे हैं। पिछले तीन दशकों में शिवसेना और मनसे मिलकर भी अपनी बांटो राजनीति से क्या हासिल कर पाये हैं।
मराठीवाद या क्षेत्रीयतावाद का कोई भी नारा अंततः आपको अलग-थलग कर देता है। शिवसेना भी अगर एक बार वहां सरकार बना पायी तो उसने अपने मराठावाद से आगे राष्ट्रवाद की बात की और भाजपा का साथ लिया। सच्चाई तो यह है कि बांटने की राजनीति अंततः आपको अकेला छोड़ देती है – इस बात को आज भला शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से बेहतर कौन महसूस कर सकता है। राज ठाकरे का भी यही हश्र होना है, आप तय मानिए।
(संजय द्विवेदी। पत्रकारिता के प्राध्यापक। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष। इनसे 123dwivedi@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)









एक दम सटीक बात लिखी है आपने,
क्षणिक तकलीफ जरूर होती है मगर सशक्त हिन्दी इस छोटे मोटे ज्वार भाटों से उबरती रही है.
मगर क्या हम राष्ट्रीयता के मायने भूल जाएँ ?
http://www.bharhaas.blogspot.com
जो भी व्यक्ति जाति,भाषा धर्म, क्षेत्र, चमडे के रंग आदि को आधार बना कर किसी को दबाने की कोशिश करता है वह फासिस्ट है . इस तरह की हर कोशिश का विरोध किया जाना चाहिए.
एक बार लोहियाजी ने भी कहा था कि हिंदी वो भाषा है जिसमें असम के चायबगान में एक बिहारी मजदूर एक उड़िया मजदूर से बात करता है। राज ठाकरे जिस चुनौती को नहीं देख पा रहे हैं वो है अंग्रेजी की। जिसका विकल्प अगर इस देश में कोई भाषा हो सकती है तो वो हिंदी ही है। लेकिन राज की राजनैतिक शैली एक सवाल जरुर उठाती है। टाईम्स आफ इंडिया ने इस पर अपनी राय दी है कि एमएनएस के विधायकों को निलंवित नहीं बल्कि निष्काषित कर देना चाहिए था और रिक्त सीटों पर फिर से चुनाव करवाया जाए-क्योंकि इसमें उस क्षेत्र की जनता का कोई दोष नहीं जिसे चार साल तक बिना प्रतिनिधितित्व के रखा जाए।
लेकिन सवाल उससे आगे का है। अगर मनसे के विधायकों को निष्काषित करके वहां फिर से चुनवा करवाया भी जाता है तो वे फिर से जीत कर आ जाएंगे और इस बात को राज ठाकरे जैसे नेता पूरे सूबे में प्रचारित करेंगे जिसमें मीडिया चाहे अनचाहे उनके प्रचारक का रोल अदा करेगा। तो ये कोई समाधान नहीं है। वक्त आ गया है कि राज ठाकरे टाईप की पार्टी को संसद में कानून बनाकर प्रतिबंधित किया जाए या कम से कम प्रतीकात्मक रुप से उन विधायकों के जीनवभर चुनाव लड़ने पर और कोई सार्वजनिक पद लेने पर पाबंदी लगाई जाए। ऐसा 60 के दशक में किया जा चुका है जब केंद्र सरकार ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर डीएमके की अलगाववादी आकांक्षाओं पर अंकुश लगाया था।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि धृतराष्ट्र की भूमिका में अगर कोई दिखता है तो वो कांग्रेस पार्टी है जिसने चुनाव जीतने के लिए राज ठाकरे को जानबूझकर बढ़ावा दिया है। इतिहास सोनिया और राहुल गांधी से इसका जवाब जरुर मांगेगा। बीजेपी या शिवसेना तो वैसे भी उस राज्य के संदर्भ में चर्चा करने के काबिल नहीं रह गए हैं।
हिंदी पट्टी की बात की जाए, खासकर लालू -मुलायम की बात की जाए तो इनकी तस्वीरें टीवी स्क्रीनों और अखबारों में लगाने लागक नहीं रह गई हैं। यहीं वो जोंक हैं जिन्होने अपने पूर्ववर्तियों के सुर में सुर मिलाते हए हिंदी पट्टी को बर्बाद किया है। आज इनके पास कितनी दौलत है अगर इसकी सही जांच की जाए तो न जाने कितने ‘कोड़ों’ को शर्म आ जाए। आज हिंदी पट्टी का यूथ अगर दर-दर की नौकरी के लिए मुम्बई-पूणें से लेकर लुधियान तक में भटक रहा है और गालियां खा रहा है तो इसके जिम्मेवार हमारे भ्रष्ट सियासतदान है जो अबूआजमी प्रकरण के बाद टीवी पर हमें ज्ञान देते देखे गए हैं। बेहतर हो कि हमारा गुस्सा पटना-लखनऊ के नेताओं की तरफ हो-राज ठाकरे ने एक और मौका मुहैया कराया है। ये मौका ऐतिहासिक है।
यह वाकई हास्यपद है कि राज ठाकरे को हिन्दी का विरोध करना तथा उसको लेकर बवाल करना तो ध्यान में है लेकिन अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से उन्हे कोई गुरेज नही है। एक बार फिर मनसे ने अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है या यूँ कहे कि महाराष्ट्र चुनाव में मिली हार के बाद पैदा हुआ तनाव या गुस्सा है जिसे निकालने के लिए एक बार फिर हिन्दी भाषा को हथियार के रुप में इस्तेमाल किया गया है। राज ठाकरे के पास यदि ठोस कारण है तो उन्हे तुरन्त फिल्म उघोग में हिन्दी भाषा के प्रयोग पर भी सवाल उठाने चाहिऐ, जवाब उन्हे कुछ ही घंटो में मिल जायगा या फिर मिनटों में।
कोई हिंदी के खिलाफ़ फ़तवा दे रहा है, कोई वंदे मातरम के खिलाफ़ ।
बस अब बॉलीवुड और हिन्दी फ़िल्मों का बहिष्कार बाकी रह गया है , मुंबई में ।
अगर इन फ़तवे बाजों को समय पर नहीं रोका गया तो इनके हौसले बढते जायेगे और देश को टृच्ची राजनीति की बडी कीमत चुकानी पडगी ।
अब ज़रूरत है कि यू पी बिहार के राजनेता अपनी माटी में ही रोजगार पैदा करें और वहां के लिओग भी अपनी निष्ठा इसके लिए झोंकें. केवल सत्ता को ही दोषी ना मानें. भ्रष्टाचार, बीईमानी आदि कई मुद्दे हैं, जिन पर सोचना होगा कि क्यों एक छात्र यूपी बिहार से बाहर निकला कर आता है, क्यं एक मजूर चार पैसे की आस में इधर आ जाता है और क्यों वहां के लोग अपनी ईमानदारी में नहीं रह पाते? यह सबके लिए नहीं है, मगर बाबूगिरी और राजनीते ने तो वहां का बेडा गर्क किया ही है ना.
हिन्दी के विद्वान (???????) तथाकथित रुप से अत्यधिक मोहग्रस्त हैं । किस जगह लिखी हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा हैं। यह भारत कि राजभाषा हैं मात्र। अगर एक मिनट के लिेए यह मान भी लिया जाए तो तो फिर विवेकानन्द और दयानन्द को अहिन्दीभाषी घोषित करने का मकसद कया हैं.। लेखक खुद सबसे पहले अपने लेख को अखंड करें तब राज ठकरे या किसी को नसीहत दे तो बेहतर। वैसे भी हमारे अनुसार हिन्दी कि मृत्यु हिन्दुस्तान के लिए फायदेमंद होगी, कैसे यह समय आने पर कहेगें हम।
संजय जी आपने बिलकुल सही लिखा है कि “हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे कोई कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।” प्रांतीय/क्षेत्रिय दलों के नेताओं का इस प्रकार के सिरफिरे कृत्य करके क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा देना शोभा नहीं देता है। ऐसा करके वे जिस शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं, वस्तुत: वह शक्ति स्वय में ही आधारहीन और खोखली है।
मेरा दुर्लभ देश आज अवनति से आक्रांत हुआ,
अंधकार से मार्ग भूलकर भटक रहा है भ्रांत हुआ।
तो भी भय की बात नहीं है हिन्दी1 पार लगावेगी,
अपने मधुर स्निग्द्ध नाद से अनन्त भाव जगावेगी।
यह विश्वास है।
हिन्दी भाषा का अपमान और हमला करने वाला देश द्रोही की श्रेणी में आता है.ऐसे लोगों को नहीं बख्शना चाहिए. यह एक प्रकार की पाशविक हिंसा और क्रूरता ही है कि महाराष्ट्र विधान सभा में सरे आम एक विधायक को हिन्दी में शपथ ग्रहण के अवसर पर बेइज़्ज़त किया गया और हिन्दी जो कि निश्चित ही राष्ट्रभाषा है उसका इस तरह घोर अपमान किया गया.जो हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं मानते उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है.मराठीवाद की तरह ही हिन्दीवाद भी एक बहुत बडी राष्ट्रीय भावना और चेतना है. यह समूचे राष्ट्र की चेतना है. हिन्दी का गौरव मराठी का भी गौरव है.हिन्दी में बोलने से मराठी का मान कम नहीं होता, बल्कि बढता है.अंग्रेज़ी के उपयोग की तुलना में भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिन्दी का प्रयोग तो संवैधानिक ही है. किसी बःई मुद्दे पर असहमतियां स्वीकार्य हैं लेकिन हमला और हिंसा भारतीय संस्कृतिक आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है. हिन्दी के प्रयोग का अधिकार हर भारत वासी को देश के किसी भी प्रदेश में बेरोकटोक करने का अधिकार है ( संवैधानिक ) और इसे कोई नहीं छीन सकता. प्रान्तीयता, स्थानीयता, क्षेत्रीयता जैसी संकुचित सोच को भडका कर राजनेता जो वोट बैंक की सस्ती राजनीति कर रहे हैं, वे अन्त में कहीं के नहीं रहेंगे. कल की घटना देश के हित्में नहीं है. हमें समूचे देश की एकता की भावना को सुदृढ बनाना है न कि संकुचित प्रांतीयता को बढावा देना चाहिए.
एम वेंकटेश्वर
सर आपने सच को जिस तरह से शब्दों में बयां किया है, वह स्वागत योग्य है। इत्तेफाक से मैं भी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल का ही छात्र रहा हूँ, तो एक छात्र होने के नाते मुझे इस बात का गर्व है कि, आज भी माखनलाल में बेहतरीन शिक्षक मौजूद हैं, जो पत्रकारिता जगत को और समाज के रोशन करने में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं।
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ????????
ना मराठी इन की बाप की बपोती हैना हिन्दी कुछ दोगलो की रखेल है कोई तों इन दोगलो से कहे की राखी सावंत तुम्हारे ही घर की बेटी थी क्यों ना सभाल पाए और अब जब की वाला साहेब ठीक से उठ-बैठ नहीं पते हैतों समाना मे सम्पदयाकी और आर्टिकल कोन लिख रहा होगा,कोई पूछे तों राज और उद्धव ठकारे से बेटा- बेटी और वीबी किस भाषा मे पडी लिखी है कुत्ते की भोक और शेर की दहाड़ मे अंतर होता है मेरे दोस्त ………………..
जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली
हिंदी बिंदी वाणी रहे ,सुनो हरवोलन की बोली
जाने किके जाये तुम, जाने किन की बोली
सबरी गुईया (भाषा)मिल जुल कहे
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
हरबोला जू कह रहे,हर-हर बम-बम बोली
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