“कृपया प्रभाष जोशी का झूठा महिमामंडन न करें”
प्रभाष जी हिंदी के शक्तिशाली और प्रमुख संपादक रहे। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्हें एक्सप्रेस समूह के मालिक का पूर्ण विश्वास प्राप्त था। वे उनके एक तरह के पुत्र या मानस पुत्र जैसे थे, ऐसा प्रभाष जी स्वयं ही कहते थे। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उनके लिखे का व्यापक पाठक वर्ग और उसका हिंदी के पढ़े-लिखे मध्यवर्ग पर थोड़ा बहुत ही सही पर असर था, जो कि विगत वर्षों में हिंदी के किसी भी संपादक का नहीं रहा। शक्तिशाली इस अर्थ में कि समाज के सत्ताशाली वर्ग, राजनेता, प्रशासक, राजनीतिक संगठनों तक उनकी पहुंच और उनका सम्मान था और इसका उन्होंने कभी बेजा इस्तेमाल नहीं किया। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्होंने कभी छुद्र निजी लाभों के लिए अपनी स्थिति को नहीं भुनाया। सचमुच हिंदी में पत्रकारिता की जो गत हो चुकी है और संपादकों का जो चरित्र और व्यक्तित्व है, उनमें प्रभाष जी का एक अलग आभामंडल था। उनके निधन पर मुझे शोक है। ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले दो दशकों में दिवंगत हुए हिंदी के अन्य संपादकों रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, गणेश मंत्री आदि के निधन पर हुआ था। पर एक फर्क देख रहा हूं, उपरोक्त संपादकों में से कौन कद में और योगदान में प्रभाष जोशी से कमतर था? पर किसी का वैसा स्तुतिगान नहीं हुआ, जैसा प्रभाष जी का हो रहा है। बल्कि ये लोग ठीक से समाचार भी नहीं बन पाये। मुझे लग रहा है कि यह ग़लत हो रहा है। प्रभाष जी की तमाम विशेषताओं को मैं स्वीकार करता हूं। परंतु सार्वजनिक व्यक्तित्वों का मूल्यांकन उन पैमानों पर नहीं किया जाता, जिन पर प्रभाष जी का किया जा रहा है। उनके मूल्यांकन का निकष उनके विचारों में अंतर्निहित तत्व और उनके कार्यों की दिशा ही होती है। मैंने प्रभाष जी पर आज नहीं, आठ-नौ साल पहले कथादेश पत्रिका में अपने स्तंभ अखबारनामा में दो-तीन लेख लिखे थे, उन्हें भेज रहा हूं। आज फिर से प्रभाष जी पर उन बहुत सी बातों को लिखने का मन है, जिनसे सत्य प्रकट हो। पर शायद इसमें कुछ समय लगेगा। कोई भी शोक इतना बड़ा नहीं होता कि उसकी छाया में सत्य को दबा दिया जाए। मेरा न तो प्रभाष जी से व्यक्तिगत संपर्क था, न कोई व्यक्तिगत अनुभव, न ही कोई व्यक्तिगत राग-द्वेष। मैं उन्हें, उनके सार्वजनिक वक्तव्यों, उनके कॉलम कागद कारे और उनके तमाम लेखन, भाषण और कार्यों को बहुत गौर से निरखता रहा हूं। आरंभ के लगभग दस वर्षों तक तो मैंने उनके कॉलम कागद कारे की एक-एक किस्त गौर से पढ़ी है। उनकी संप्रेषण क्षमता पर मुग्ध हुआ, उसे सराहा, पर उसकी अंतर्वस्तु और उसमें निहित विचारों में मुझे हमेशा क्षुब्ध किया। प्रभाष जी हिंदी के सबसे बड़े विचारहीन, कुतर्की, और रूढ़िग्रस्त लेखक थे और अपने लालित्यपूर्ण लेखन से उन्होंने प्रतिक्रियावादी विचारों को हिंदी के एक तबके का संस्कार बनाने में सफलता भी पायी। बहुत कुछ है लिखने को। मैं जानता हूं कि भक्त लोग विक्षुब्ध हो उठेंगे – पर पाश की यह पंक्ति ही दोहराऊंगा कि यदि सारा देश उसके शोक में शामिल है, तो उस देश से मेरा नाम खारिज़ कर दो। यद्यपि मुझे उनके न होने का शोक है। पत्रकारिता में अब ऐसे लोग भी कहां बचे? अब तो अपराधी और दलाल संपादकों के रूप में सभी नहीं तो कई जगह ज़रूर विराजमान हैं, पर यह इस बात का तर्क बिल्कुल नहीं बनना चाहिए कि हम व्यक्ति का झूठा महिमामंडन करें : आलोक श्रीवास्तव
कथादेश के स्तंभ अखबारनामा में प्रकाशित
कहां हैं कारे काग़दों के इतिहास-निर्माता?
30 सितंबर, 2000 को मुंबई से प्रकाशित होने वाले सांझ जनसत्ता का जब आखि़री अंक निकला, तो शायद वहां के पत्रकारों के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल था कि उनका अख़बार बंद किया जा चुका है। अमूमन यह हमेशा होता है, अख़बार बंद होने के बाद वहां कार्यरत पत्रकारों को यथार्थ की भूमि पर आने में थोड़ा समय लगता है। यह यथार्थ की भूमि यह जानना है कि वे हिंदुस्तान के उस मामूली कामगार-वर्ग के हिस्से हैं, जो हिंदुस्तान की निष्पक्ष और महान न्यायपालिका और राष्ट्रभक्त पूंजीवादी घरानों के सहअस्तित्व के ठीकरे पर दशकों से जिबह किया जा रहा है। पत्रकार अख़बारों में नौकरी करने के दौरान खुद को प्रेस-मालिकों, उनकी विचारधारा और उनके एजेंडे से इतना ज़्यादा आइडेंटीफाइ करने लगते हैं कि उन्हें प्रेस की शक्ति और प्रेस की महिमा अपनी ही शक्ति और महिमा प्रतीत होने लगती है। वे एक श्रमिक के रूप में खु़द को नहीं देखते, समाज के एक विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति की तरह वे अपनी आत्म-छवि गढ़ते हैं। यथार्थ की भूमि पर आने पर पता चलता है कि ज़मीन तो खिसक चुकी है।
30 सितंबर को सांझ जनसत्ता बंद हुआ। उसके कुछ पहले मराठी का सायंकालीन अख़बार सांझ लोकसत्ता बंद हुआ। बंद होने के समय सांझ जनसत्ता की प्रसार-संख्या लगभग 25 हज़ार रोज़ाना थी। लगभग दर्जन भर उपसंपादक/रिपोर्टर तथा क़रीब इतने ही प्रूफ रीडर तथा अन्य कर्मचारी इसमें कार्यरत थे। प्रबंधन ने एक माह तक इंतज़ार किया कि इनमें से कुछ लोग भविष्य की असुरक्षा से तंग आकर कहीं कुछ जुगाड़ खोज कर चले जाएंगे और उनकी बला टलेगी। पर ऐसा हुआ नहीं, मुंबई में हिंदी पत्रकारिता में नौकरियों के अवसर न के बराबर हैं। जब श्रम मंत्री ने यह कह दिया कि मानसून सत्र तक वे वेतन-आयोग लागू कर देंगे, तब प्रबंधन ने जल्दी मामला निपटाने का मन बनाया। 31 अक्तूबर को प्रबंधन ने सांझ जनसत्ता के पत्रकारों को कहा कि वे एक साल का वेतन लें और दफ़ा हों। एक साल के वेतन का मतलब था अधिकतम एक लाख रुपये। वेतन-आयोग लागू हो जाने के बाद यह राशि बढ़ जाएगी, इसके अलावा प्रबंधन को वेज बोर्ड द्वारा निर्धारित पिछले दो या तीन वर्षों का बढ़ा हुआ वेतन भी देना पड़ेगा। अतः प्रबंधन ने 15 दिन का समय दिया कि इसके भीतर वे मामला आपसी-समझ से निपटा लें। इस आपसी-समझ का एकमात्र मतलब प्रबंधन द्वारा एकतरफ़ा ढंग से दी गयी भीख लेकर बेरोज़गार हो जाना है। अब यह आपसी समझ न बनी तो अदालत का रास्ता ही आख़िरी विकल्प है।
जनसत्ता का मुंबई और चंडीगढ़ संस्करण इसी वर्ष फरवरी में बंद हुआ है। दिल्ली संस्करण भी बंद होने की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है। वैसे यह सूचना काफी ज़ोरों से है कि इसे बंद करने से पहले एक साप्ताहिक अख़बार के रूप में निकाला जाएगा।
जनसत्ता का 17 वर्षों का जीवन और इतिहास, वहां के संपादकों और पत्रकारों की कार्य-शैली, विचारधारा और उसकी अनंत बारीकियां हिंदी पत्रकारिता को जानने के लिहाज़ से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। एक धमाकेदार और गौरवशाली साथ ही बड़बोली शुरुआत के बाद से पतन की यात्रा में अनेक मोड़ हैं, जिसके अनेक पाठ और अनेक भाष्य हैं। जनसत्ता पिछले डेढ़ दशक की हिंदी पत्रकारिता की एकमात्र कार्यशाला रहा है, जहां वामपंथ और दक्षिणपंथ के सामंजस्य और संघर्ष से एक ऐसी पत्रकारिता जन्मी, जिसने अपने लक्ष्य और स्वरूप की अस्पष्टता के बावजूद हिंदी पाठकों के एक वर्ग में अपनी पैठ बनानी शुरू की ही थी, पर प्रबंधन साथ ही संपादकों एवं संपादकीय-नीतियों की भेंट चढ़ गया। सत्ता के प्रतिपक्ष का आभास देने वाली हिंदी पत्रकारिता का यह आख़िरी प्रहसन था, जो समाप्त हुआ – पर पुराने देशज नाटकों की तरह यवनिका-पतन के पूर्व कई मंचीय कर्मकांड अभी बाकी हैं।
जनसत्ता जब शुरू हुआ तो शायद इसी गुमान में कि पार्टी आधारित और नेता आधारित राजनीति में उसका भी कोई महत्त्व होगा। पर हुआ यह कि नयी आर्थिक नीतियों, संचार-क्रांति, वैश्वीकरण और इनके माध्यम से भारत पर कसते साम्राज्यवादी शिकंजे ने पार्टियों और नेताओं वाली उस राजनीति को ही एक औपचारिकता में बदल दिया। कुछ अख़बारों का रातों-रात 10 लाख प्रसार-संख्या छूने लगना, कुछ का ताश के पत्तों की तरह ढह जाना बड़ा रहस्यमय लगता है। पर इस सारे रहस्य की कुंजी बहुराष्ट्रीय निगमों के उस बाज़ार में है, जो भारत की गांव-गलियों में पसरता जा रहा है। जिन अख़बारों ने उससे तालमेल बिठा लिया और उसके अनुरूप अपना गठन किया, वे बढ़ रहे हैं। ये अख़बार मुद्रित सामग्री के रूप में भारत की गुलाम अर्थव्यवस्था और परजीवी संस्कृति के दस्तावेज हैं। जनसत्ता किसी आदर्शवाद या इस स्थिति के प्रति प्रतिकार के कारण अप्रासंगिक नहीं हुआ, बल्कि मालिकों के अंतर्कलह, प्रबंधन की नासमझी व संपादकीय स्तर पर दिशाहीनता और विभ्रम के नतीजे में अंत को पहुंचा है। यदि वह बना भी रहता, तो एक मुनाफ़ा केंद्रित पूंजीवादी घराने के उत्पाद के तौर पर उसकी नियति थी – हिंदी के अन्य रंगीन अख़बारों की तरह अपने आपको ढालना और वैचारिकता, साहित्य-संस्कृति और सत्ता के प्रतिपक्ष आदि की भंगिमाएं छोड़ना। या तो जनसत्ता हिंदी के लगभग दर्जन भर अख़बारों की ही एक और शक्ल बनकर ज़िंदा रह सकता था। जनसत्ता जिस सामाजिक तेवर को लेकर 1983 से 1990 तक परवान चढ़ा था, उस तेवर का ज़माना बीत गया था। दो ही रास्ते बचे थे – सचमुच में जनता का अख़बार बनना, सचमुच में एक प्रतिपक्ष बनना, जिसका उसने अपनी शुरुआत से ही दावा किया था और दूसरा रास्ता था – उत्तरप्रदेश के सफल बाज़ारू अख़बारों के दिखाये रास्ते पर चलना। पहले रास्ते का मतलब होता एक पूंजीवादी संस्थान का वास्तव में एक मिशन बन जाना। जिसका कि उसने बारंबार दावा किया था, पर जो वह था नहीं। दूसरे का मतलब एक ख़ास क़िस्म की नयी पूंजीवादी दक्षता, आधुनिकीकरण व और भी बड़ा निवेश। लिहाज़ा जनसत्ता का बंद होना, वह जिस रास्ते पर था, उसकी अनिवार्य परिणति है।
पर विरोध का मुद्दा है – और वह एकमात्र मुद्दा है – प्रबंधन का कर्मचारियों के प्रति बेईमानी और लंपटता से भरा आपराधिक रवैया। उनके आर्थिक हितों को उठाईगीरों और ठगों की तरह हड़पने की कोशिशें। एक्सप्रेस जिस समय इन उत्पादों को बंद कर रहा है, उस वक्त भी उसके पास अरबों रुपये की चल-अचल संपत्ति है, जिसमें से बहुत बड़ा हिस्सा लोकतंत्र के चौथे खंभे के नाम पर उन्हीं सरकारों से वसूला गया है, जिसके प्रतिपक्षी की भूमिका में उसने अपनी आत्मछवि जनता के सामने रखी थी। कर्मचारियों के न्यायपूर्ण ढंग से बनने वाले भुगतान इन संपत्तियों का तिनका भी नहीं हैं, पर इसके लिए हर पूंजीवादी समूह ठगी और ब्लैकमेलिंग की हर कारगर तकनीक अपनाता है। उससे भी दुखद है, वहां कार्यरत कर्मचारियों की स्वाभिमान तथा अधिकारों के प्रति उदासीनता, यथास्थितिवाद और दैन्यभाव। यदि कोई भी कंपनी बंद हो रही है तो जिन कर्मचारियों ने अपने जीवन के बेहतर वर्ष वहां दिये हैं, जिन्हें अब नये सिरे से अपनी जीविका का साधन ढूंढ़ना होगा, उन्हें एकतरफ़ा तौर से साल भर का वेतन देकर निकालना ग़लत है। साल भर का वेतन भी इसलिए कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, 1948 के तहत ये सभी कर्मचारी स्थायी कर्मचारियों की श्रेणी में आते हैं और अख़बार बंद होने का मतलब उनकी नौकरियां ख़त्म होना नहीं है। प्रबंधन उन्हें दूसरे विभागों में कार्य देने के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य है। यह एक लाख रुपये देना एक तरह की ब्लैकमेलिंग है कि अभी तो हम तुम्हें एक लाख दे भी रहे हैं। लेकर नौकरी छोड़ो, नहीं तो नौकरी से तो हम किसी-न-किसी बहाने निकाल ही देंगे, एक लाख रुपये भी गंवाओगे। मध्यमवर्गीय डर और असुरक्षा तथा निहित स्वार्थों के चलते कर्मचारियों पर प्रबंधन की ब्लैकमेलिंग का यह अस्त्र आसानी से कामयाब हो जाता है। फरवरी में मुंबई के जनसत्ता के बंद होने के बाद यही हुआ था। कर्मचारी अपनी रीढ़ें सीधी करके लड़ नहीं पाते, इसका एक कारण पत्रकारों के राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यूनियन नेताओं की घोर अवसरवादिता और प्रबंधन से मिली-भगत और भ्रष्टाचार का हाल के वर्षों का एक अद्भुत इतिहास भी है – इन पत्रकार-संगठनों के शीर्ष नेताओं की कीर्ति-गाथा का ताज़ा उदाहरण मणिसाना वेतन-आयोग की पक्षपात से भरी पूंजीवादी अख़बार-घरानों की जी-हुजूरी के शिल्प वाली रिपोर्ट है।
सांझ जनसत्ता 6 फरवरी, 1992 को मुंबई से शुरू हुआ था। थोड़े ही समय में इस सायंकालीन अख़बार ने अपनी अच्छी पैठ बना ली थी। वस्तुतः मुंबई शहर का चरित्र और जीवन इस प्रकार का है कि यहां सायंकालीन अख़बारों की अपनी ख़ास जगह है। हिंदीभाषियों की विशाल आबादी के कारण शाम के अख़बार का जल्द ही अपनी जगह बना लेना स्वाभाविक ही था। इसके संपादक सतीश पेंडढेकर बताते हैं कि अपने शुरुआती साल में यह 1 लाख की प्रसार-संख्या के आसपास रहा, जो कि शाम के अख़बार के लिए काफी थी।
जनसत्ता व सांझ जनसत्ता के विभिन्न कर्मचारियों से बातचीत के बाद जो तथ्य सामने आये वे इस प्रकार थे :
- प्रबंधन ने पिछले कई महीनों से यह आदेश दिया हुआ था कि सांझ जनसत्ता की डेडलाइन रात में 11 बजे रहेगी यानी जो अख़बार शाम का है, उसकी ख़बरें एक दिन पहले ही तय हो जाएंगी। अमूमन जिस दिन का अख़बार है, उसी दिन 10 बजे सुबह के आसपास उसका संपादकीय काम समाप्त होता है और 12 बजे तक छप कर वह बाज़ार में पहुंचता है और शाम तक बिकता है। शाम के अख़बार की डेडलाइन उसके प्रकाशन के एक दिन पहले ही रखने का सीधा मतलब है कि उस अख़बार में उस दिन की किसी भी महत्त्वपूर्ण ख़बर को कोई स्थान नहीं मिलेगा। उसमें और सुबह के दैनिक में एक ही जैसे समाचार होंगे। यह एक ही कारण अख़बार को ख़त्म करने के लिए पर्याप्त था।
- जब मुंबई से मध्यप्रदेश के दैनिक नवभारत ने अपनी शुरुआत की तो जनसत्ता के लोगों ने प्रबंधन से जानना चाहा कि उसकी क्या रणनीति रहेगी तो प्रबंधन के ज़िम्मेदार अधिकरी ने कहा, ‘कोई रणनीति नहीं रहेगी। जैसे चल रहा है, वैसे ही चलेगा।’ नवभारत का मूल्य डेढ़ रुपये था। जनसत्ता ने उसके आने के बाद अपने मूल्य को ढाई से बढ़ाकर तीन रुपये कर दिया। परिशिष्ट पहले ही ख़त्म कर दिया गया था। पृष्ठों का आकार छोटा कर दिया गया था। अख़बार का स्तर गिर गया था और मूल्य दूसरे प्रतियोगी अख़बारों से दोगुना। मुंबई भौगोलिक दृष्टि से 60 और 70 किलोमीटर लंबी मध्य व पश्चिम तथा लगभग 30 किलोमीटर लंबी हार्बर उपनगरीय रेलवे लाइनों के दोनों तरफ़ बसा है। यानी शहर कुल 150 किलोमीटर की लंबाई के दोनों ओर बसता है। स्टेशनों पर 200 से ज़्यादा बुक स्टॉलों के अलावा पूरे शहर भर के चप्पे-चप्पे पर कई हज़ार अख़बारों के स्टॉल आदि हैं। मुंबई में अख़बारों की बिक्री का एक बड़ा ज़रिया ये स्टॉल हैं। जनसत्ता इन स्टॉलों पर पहुंचता ही नहीं था। अलग से जनसत्ता का प्रसार और विज्ञापन विभाग नहीं था।
- अख़बार को पाठकों तक पहुंचना है, यह न तो प्रबंधन ने कभी सोचा, न ही सामग्री और स्वरूप तय करते संपादकों ने। संपादकों के विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं ने अख़बार का सबसे ज़्यादा नुकसान किया और उसे एक संतुलित मंच नहीं बनने दिया। ये विचारधारात्मक पूर्वाग्रह कभी सती-प्रथा के समर्थन के चरम पर पहुंचते रहे, कभी धुर भाजपा विरोध के चरम पर। इससे प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी दोनों क़िस्म के पाठक अख़बार से कटते चले गये।
- दिल्ली के मुख्य संस्करण के अलावा इस अख़बार के स्थानीय संपादकों के पदों पर चंडीगढ़, मुंबई, कलकत्ता में ऐसे लोगों को चुना गया, जिनकी पत्रकारिता के क्षेत्र में न तो कोई विशेष योग्यता थी, न ही ख़ास अनुभव। वहां के पत्रकारों के मुताबिक इनमें से एकाध ने तो निजी स्वार्थों के लिए अख़बार का ज़बर्दस्त दोहन किया। अख़बार में कार्यरत पत्रकारों को कोई प्रोत्साहन, प्रमोशन, बेहतर अवसर कभी नहीं दिया गया।
- ये अफ़वाहें हैं कि समूह के मालिक विवेक गोयनका ने लगभग हर बैंक से कर्ज़ लिया है। इसके अलावा पब्लिक-शेयर के रूप में काफी पैसा उगाहा है और अब वे दुबई में न्यूज़-प्रिंट का प्लांट लगा कर ब्रिटेन या स्विट्जरलैंड में रहते हैं। एक-डेढ़ साल से वे भारत नहीं आये हैं। उनकी पत्नी ही कारोबार देखती हैं। उन्हें इसका अनुभव नहीं है, और कंपनी के मुख्य कर्ताधर्ता शेखर गुप्ता के भी ‘आज तक’ में जाने की बातें हवा में है।
- दत्ता सामंत के नेतृत्व में 1984 में हुई हड़ताल के बाद से मालिकों ने इस बात की सावधानी बरती थी कि पत्रकार समूह में संगठित न हो पाएं। इसके लिए उन्होंने अपने ही पिट्ठुओं को यूनियन नेता बनवाया और उन्हें पालते रहे।
ये और ऐसे ही अनंत कारण हैं। पहले मुंबई और चंडीगढ़ में जनसत्ता, फिर अब मुंबई में सांझ जनसत्ता का बंद होना पूंजीवादी घरानों तथा ऐसे घरानों जहां से अंग्रेज़ी के अख़बार भी निकलते हैं, के प्रबंधन पर गहरा सवाल है। आज तक हिंदुस्तान के बड़े अख़बार मालिकों ने अपने प्रबंधन के शीर्षस्थ अधिकारियों की योग्यता और दक्षता के इस पहलू पर कभी गौर ही नहीं किया कि जब हिंदी अख़बारों के विशाल बाज़ार का विस्फोट हो रहा है तो क्यों उन्हें अपने हिंदी प्रकाशन समेटने पड़ रहे हैं?
अब बारी दिल्ली के जनसत्ता की है। बारी अब उन प्रभाष जोशी की परीक्षा की भी है, जो अक्सर अपने कॉलमों में जनसत्ता के कर्मचारियों का ज़िक्र इस तरह करते रहे हैं जैसे वे सचमुच एक परिवार का ही आत्मीय अंश हों, एक्सप्रेस-समूह सच का कोई बहुत बड़ा पैरोकार हो, और पत्रकारिता (जो कि मौजूदा ढांचे में पूंजीवादी उपक्रम है और उसी के उद्देश्यों से संचालित और उसके अंतर्विरोधों से भरपूर है) कोई बहुत पवित्र चीज़ हो। यह उनका नैतिक कर्तव्य बनता है कि मुग्ध भाव से वे जिस गांधीवाद का ज़िक्र करते रहे हैं और बड़ी दृढ़ता की भंगिमा में आदर्शवादी लेखन करते रहे हैं, उसका कम-से-कम आंशिक प्रमाण अवश्य दें। उन्हें गांधीवादी शस्त्रों, उपवास से लेकर कोर्ट-कचहरी तक की लड़ाई, जुलूस, प्रदर्शन – हर चीज़ में अग्रिम मोर्चे पर कर्मचारियों के साथ रहकर सिर्फ़ यह साबित करना है कि जैसा कुछ वे पत्रकारिता के माध्यम की बदौलत खुद को दिखाते रहे हैं, वह सिरे से मिथ्या नहीं था, क्योंकि यह सिर्फ़ जनसत्ता के पत्रकारों/कर्मचारियों के हितों का मामला नहीं है। यह उस बुनियादी संघर्ष का मामला है, जो श्रम और परजीविता के बीच हर युग में अलग-अलग रूपों में गतिमान रहा है। यह उन मूल्यों का मामला भी है, जो सिर्फ़ जीने से ही प्रमाणित होते हैं, न कि मात्र लिखने-बोलने से।
यह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही है, जिसने हिंदुस्तान में भिखारियों और बेरोज़गारों की फौज गढ़ रखी है, यहां की कृषि-व्यवस्था को चैपट कर दिया है। मुल्क विदेशों में गिरवी पड़ा है। पूंजीवाद की इन्हीं कारस्तानियों की सर्वोच्च कड़ी रोजगार प्राप्त श्रमिकों को बेरोजगार करना और बेरोज़गार करते वक्त उनके पूंजीवादी क़ानूनों में भी स्वीकृत आर्थिक हितों और जायज कंपनसेशन का भुगतान न करना और इसके लिए षड्यंत्र-पर-षड्यंत्र रचना है। यह क़तई सिर्फ़ उन थोड़े से कर्मचारियों का मामला नहीं है। यह संपूर्ण पूंजीवादी प्रणाली से जुड़ी हिंसक लूट का मामला है, जिसके परिणाम दूर तक जाते हैं। यह जनसत्ता के कर्मचारियों को भी याद रखना चाहिए और निहित स्वार्थों के बजाय विफलता की कीमत पर भी अपने आर्थिक अधिकारों की लड़ाई लड़नी चाहिए।
कुछ ही महीनों में यह दिखेगा ही हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के ये सामयिक पृष्ठ कारे कागद ही रह जाते हैं या इन पर सचमुच कोई इबारत अंकित होती है।
कथादेश, दिसंबर, 2000… जारी
(आलोक श्रीवास्तव। कवि-पत्रकार। धर्मयुग में लंबे समय तक रहे और धर्मयुग बंद होने पर कर्मचारियों की तरफ़ से मुक़दमा लड़ा। सुप्रीम कोर्ट तक गये और जीत हासिल की। टाइम्स जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी को आईना दिखाया। वेरा उन सपनों की कथा कहो कविता संग्रह को खासी चर्चा मिली। उनसे samvad.in@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)









आलोक जी
दोनों आलेख सुबह ही पढ़ चुका था. आपसे पूरी तरह सहमत हूं . जो लोग प्रभाष जी को आज महिमामंडित कर रहे हैं उनमें से कई ने सती प्रकरण पर उनके विरुद्ध झंडे उठा रखे थे. वास्तविकता यह है कि लोग चलती गाड़ी के पीछे दौड़ रहे हैं — पाखी में अपूर्व जोशी ने आलोक मेहता के नई दुनिया के सम्पादकीय पर प्रश्न चिन्ह लगाया है जिसमें उन्होंने नक्सलियों को तालिबानॊ की भांति का आतंकवादी कहा है. आलोक मेहता सत्ता के व्यक्ति हैं . वही कहना और लिखना उनकी विवशता है जो सत्ता को पसंद हैं—इसके निहतार्थ हैं. प्रभाष जी का मामला भी कुछ कुछ ऎसा ही था.
आपकी बोल्डनेस के लिए नमन.
रूपसिंह चन्देल
आलोक जी ने सही लिखा. प्रभाष जी के विचारों का झोलझाल अब विमर्श की वस्तु है – यदि उन पर लिखा जाये तो इस इलाके में क़दम रखना ही होगा. मैं कई समर्थ और समझदार लोगों को प्रभाष जी की आरती उतारते देख रहा था और उससे खिन्न भी था. पहले रंगनाथ की टिप्पणी और अब इस पोस्ट से आश्वस्त हुआ.
प्रभाष जोशी के निधन की खबर मिलते ही मैंने उसी सुबह मोहल्लाlive पर एक पोस्ट लिखी थी जिसकी अंतिम लाइन कुछ इस तरह से थी-
आज प्रभाष जोशी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि अगर हम उनके लेखन का पुनर्विश्लेषण करते हैं,पठन-पाठन के दौरान असहमति का स्वर जाहिर करते हैं,सहमति को व्यवहार के तौर पर अपनाते हैं और पैर पसारती कार्पोरेट मीडिया का प्रतिरोध करते हुए हिन्दी पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के तौर पर आगे ले जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनका खास अंदाज में क्रिकेट पर लिखना,इनने,उनने और अपन जैसे शब्दों का प्रयोग अब तक एक खास किस्म की इन्डीविजुअलिटी को बनाए रखने के तौर पर लगा,कई बार इससे असहमत भी रहा लेकिन आगे से जनसत्ता में इन शब्दों के नहीं होने की कमी जरुर खलेगी। गरम खून के पत्रकारों के बीच कोई तो था जिसे बार-बार पटकनी देने की मंशा से लड़ते-भिड़ते और अपना कद बड़ा होने की खुशफहमी से फैल जाते। आज हमसे लड़ने-भिड़ने वाला नहीं रहा,फच्चर मत डालो को लिखकर चैलेंज करनेवाला नहीं रहा। अब बार-बार याद आएगा कागद-कारे.
प्रभाष जोशी चले गए। उनकी अस्थियां भी उस नर्मदा में विसर्जित हो गई जिस वे हमेशा मां कहते थे और अक्सर नर्मदा को याद कर के इतने भावुक हो जाते थे कि गला भर आता था। इन दिनों हमारे प्रभाष जी को ले कर संवेदनाओं के लेख, संस्मरण और शोक सभाओं का दौर चल रहा है। वे लोग जो कुछ दिन पहले तक इंटरनेट पर प्रभाष जी को इस युग का सबसे पतित, मनुवादी और ब्राह्मणवादी पत्रकार करार दे रहे थे, उनकी बोलती बंद है। उनमें से कई तो उनके निधन पर घड़ियाली आंसू भी बहाते दिखे।
लेकिन अब वक्त प्रभाष जी को याद करने से ज्यादा उनके सरोकारो को याद करने का है। तिहत्तर साल की उम्र में भी जिन सरोकारो को ले कर प्रभाष जी देश के हर कोने तक हर किस्म के वाहन से और होटलों से ले कर लोगों के घरों में ठहर कर पत्रकारिता के कायाकल्प और उसमें आ गए दोषों से कलंक मुक्ति की अलख जगा रहे थे, उनके इसी सरोकार को जारी रखना और आगे बढ़ाना शायद प्रभाष जी को सबसे बड़ी श्रध्दांजलि होगी। पता नहीं आज जो लोग आंसू बहा रहे हैं वे इस सरोकार को सहेजने में कितनी रुचि दिखाएंगे। सरोकार रोटी और शराब के पैसा नहीं देता। उसके लिए तो प्रभाष जी जैसा कलेजा चाहिए और एक सक्रिय और तेजस्वी वैराग्य चाहिए।
प्रभाष जी पत्रकारिता के नाम पर हो रही धंधेबाजी के खिलाफ जूझ रहे थे। वे समाज की हर बुराई और हर अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ भी वे खड़े थे और बंगाल के नंदीग्राम के ग्रामीणों के साथ भी शामिल थे। हमारे मित्र और विश्वविख्यात कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा बता रहे थे कि चंडीगढ़ में एक्सप्रेस के संपादक रहने के दौरान उन्होंने एक सवाल किया था कि जिस देश में 70 प्रतिशत लोग खेती पर आधारित हो वहां गंभीर कृषि पत्रकारिता क्यों नहीं हो सकती? देवेंद्र शर्मा कृषि वैज्ञानिक बनने के रास्ते पर थे मगर कृषि पत्रकार बन गए और इन दिनों उन्हीं से पता लगा कि विदेशी बीजों और मल्टीनेशनल खेती के अलावा किसानों पर कर्जे के खिलाफ भी प्रभाष जी की जंग जारी थी।
प्रभाष जी के बेटे संदीप ने उनके अंतिम क्षणों का वर्णन किया है। सचिन के आउट होते ही वे टीवी वाले कमरे से उठ कर चले गए थे और संदीप जो खुद भी रणजी और कांउटी तक खेल चुके थे, ने पिता को फोन किया तो आखिरी सवाल था कि क्या स्कोर हुआ है? इसके बाद फोन मां ने लिया और कहा कि बेटा जल्दी आओ, पिता जी बेहोश हो गए। सो प्रभाष जी के अंतिम शब्द थे- ‘क्या स्कोर हुआ है’।
क्रिकेट की भाषा में ही कहे तो प्रभाष जी ने अपने आपको हिट विकेट कर दिया। उम्र हो चली थी। पच्चीस साल से शुगर के मरीज थे। एक बाई पास सर्जरी हो चुकी थी। पेस मेकर लगा हुआ था। फिर भी अगर किसी से मिलना है तो मिलना है। तीन मंजिल चढ़ के चले जाएंगे। प्रभाष जी जैसा न कोई हुआ है, न कोई होगा क्योंकि जैसा कि पहले और हमेशा कहा कि प्रभाष जोशी बनने के लिए कलेजा चाहिए। जिस समय प्रभाष जी का जनसत्ता अपने चरम पर था और विज्ञापन देने वालों की और पैसा दे कर खबर छपवानों वालों की लाइन लगी होती थी, प्रभाष जी ने जनसत्ता को घाटे में चलने दिया लेकिन वे सौदे नहीं किए जिनके खिलाफ वे आखिर तक लड़ रहे थे। इंडियन एक्सप्रेस के एक्सप्रेस टॉवर्स की किराएदार न्यू बैंक ऑफ इंडिया के घपलों को बैंक के निपट जाने तक उजागर करने का पूरा मौका दिया और इसके बावजूद दिया कि उनके खास मित्र और बड़े वकील लक्ष्मी मल्ल सिंघवी रामनाथ गोयनका तक पहुंच गए थे। इसके अलावा अखबार को साल में करोड़ों का विज्ञापन देने वाले मारुति उद्योग समूह के मुखिया के खिलाफ अभियान चलाया, विज्ञापन बंद हो गए मगर उन्हें परवाह नहीं थी।
बाजार के कुछ नियम होते हैं मगर पत्रकारिता की एक पूरी आचार संहिता होती है। प्रभाष जी ने इस आचार संहिता को वास्तविकता बनाने के लिए कई मोर्चे खोल रखे थे। इतना ही नहीं एक मोर्चा हिंद स्वराज का भी था। प्रभाष जी भारत की पत्रकारिता को आजादी का मंत्र देने वाले रामनाथ गोयनका की एक प्रमाणिक जीवनी लिखना चाहते थे और एक किताब आजादी के बाद की राजनीति पर लिखना चाहते थे और यह सब दो साल में यानी 75 का आंकड़ा पार करने के पहले कर लेना चाहते थे। मगर काल ने मौका ही नहीं दिया।
प्रभाष जोशी को याद करना असल में उन कामनाओं को पूरा करना होगा जिनमें से एक भी खुद उनके लिए नहीं थी। वे एक मुक्त और ताकतवर समाज चाहते थे। ऐसा समाज बने और वही प्रभाष जी को याद करे, इससे बड़ी श्रध्दांजलि दूसरी नहीं हो सकती। मगर दिक्कत यह है कि आज अखबार चलाने के साथ शराब की फैक्ट्रियां और दूसरे कारोबार करने वाले लोगों की जो जमात है और इसमें से कई अखबार को सिर्फ अपने कारोबार का कवच बनाना चाहते हैं उनके लिए उनके पत्रकार उनके धंधे के चौकीदार के अलावा कुछ नहीं होते। प्रभाष जी की लड़ाई पत्रकार को चौकीदार बनाने के खिलाफ थी। जो यह लड़ाई जारी रखेगा वही प्रभाष जी की परंपरा का हिस्सेदार होने का हक पाएगा।
प्रभाष जी के जाने के यथार्थ का आभास सिर्फ पत्रकारिता जगत को नहीं बल्कि पूरे समाज को होने में वक्त लगेगा। अभी से बहुत सारे आंदोलनकर्मी, बहुत सारे जूझारू पत्रकार और बहुत से साहित्यकार कहने लग गए हैं कि प्रभाष जी के बिना सब कुछ अधूरा लग रहा है। प्रभाष जी को भी इस संसार में जो अधूरा लगता था उसे पूरा करने की कोशिश वे कर रहे हैं। पहले भी कह चुका हूं और फिर कह रहा हूं कि प्रभाष जी वैरागी नहीं थे मगर उनकी सांसारिकता और उनके संघर्ष हमारे संसार को बेहतर और रहने लायक बनाने वाले थे। प्रभाष जी के आत्मा को भगवान कभी शांति नहीं दे। उनकी आत्मा हमारी नायक बनी रहे। आंखे बंद कर के सुनिए यह आत्मा पुकार रही है- आओ और संघर्ष के सहयात्री बनो। कोई है?
गुरू बहुत शानदार क्राफ्ट है। भाषा को मांजने-संवारने में बडी मेहनत की है। जैसे और कामों को करीने से करते हैं। बधाई हो।
ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर गहन पड़ताल करता हुआ आलेख…भारत में अक्सर यही होता है ..मौत के बाद सिक्के के दूसरे पहलू को छोड़ दिया जाता है…
लब्बोलुबाब यह है कि यह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही है जिसने प्रजातंत्र के तथाकथित चौथे खंबे पर अपना साम्राज्य टिका रखा है। प्रभाष जी की आलोचना तो की गई है मगर यह नहीं बताया गया है कि किस तरह प्रभाष जी जैसे लोग पूँजीवादी तंत्र के हथियार बनते है।
प्रमोद ताम्बट
भोपाल
http://www.vyangya.blog.co.in
kya hi zabarjadast aalekh hai khud bhi soch raha tha prabhash ji ke jaane ke baad zaruri is bat kee hai unke kaamon aur vichron kee parkha jaye. itna hi nahi balik unke adhure rah gaye kaam aandolan ko anzam diya jaye. shayad yah sachi shadhanjali hogi. kewal pranshasa ke pool bandhne se kya hasil hona…
aameen
आलोक भाई से शतप्रतिशत सहमत
प्रभास जी की मृत्यु किसी अन्य मृत्यु की ही तरह दुखी करती है…परंतु इससे यह सच्चाई नहीं छुप जाती कि वह अपने लेखन और जीवन मे भयावह विचलनों के शिकार थे।
उस रात आलोक भाई से बातचीत में मैने कहा था वह एक बडे लेखक थे जिन्होंने तमाम पाठक पैदा किये। परंतु वह प्रगतिशील नहीं थे। हृदय के भीतर से वह एक प्रतिगामी ब्राह्मण थे जिसे सत्ता के साथ समीकरण बैठाना और उसका निजी हित में प्रयोग बख़ूबी आता था।
बहुत बेहतर और इमानदार लेखन। प्रभाष जोशी के महिमामंडन के दौरान मोहल्ला पर ही पिछले दिनों एक और लेख पढा था ‘बुद्धिजीवी प्रभाष जोशी को याद करते हुए’। प्रभाष जोशी की बौद्धिकता और जातिवाद की अच्छी पोल खोली गयी थी उस लेख में। इस लेख को उससे मिलाकर पढा जाना चाहिए। मोहल्ला के ‘बहसबाडा’ में वह लेख है।
आपकी सुविधा के लिए लिंक भी दिये दे रहा हूं, पढिए- http://mohallalive.com/2009/11/07/prabhash-joshi-memorial-writeup-by-pramod-ranjan/
आपने खुलकर बातें सामने रखी है, दरअसल यह विमर्श का निमंत्रण है। भय की भांति ही साहस भी संक्रामक होता है। वह आपने दिखाया है। पर भारत की अपनी कुछ परंपराएं हैं, मान्यताएं हैं, क्या यह सब हमें अभी करना ही चाहिए। संवेदना की भाषा और अभिव्यक्ति की भाषा के बीच एक अन्तराल होता तो क्या अच्छा नहीं होता।
mai bhi hindustan ki hindi patrakarita par pichle panch salo se paini nigah rakh raha hun.Aur mere man me aalok srivaastav ki chavi pehle ek kavi ki rahi hai. bad me ve patrakar honge. lekin aaj prabhash ji ke jane ke bad jis tarah se aalok purani parat udhed rahe hai. mujhe lagta hai aalok ka kavi man maila ho gaya hai. aalok bhatrat ki hindi patrakarita ko apne nazar se toulana chodiye. yahan vahi nahi hota hai jo hume achha lage balki kuch kadvi sacchai hoti hai. lekinb in sabke bich agar kuchh mithas thi to thi prabhash jaisi shakshiyat jo aaj humare bich nahi hai. mai aapke lekh ke muqable prabhash ji ko defend karna nahi chahta. kyonki iski koi jaroorat nahi hai.
प्रभाष जोशी का निधन हो गया. लोगो ने प्रभाष जी के निधन पर सोक व्यक्त किया. आपने लोगो को बिना किसी लाग लपेट के प्रभाष जी की जमीनी हकीकत से वाकिब कराने के लिये सुंदर पश्न खडे किए . हो सकता है की प्रभाष जी अपने आप मे बहुत बडे पत्रकार रहे हो ! ओर उनके जाने से पत्रकरिता की बडी हानि हुई हो !(आप का लेख पढ कर तो नही लगता कि किसी प्रकार कि बडी हानि हुई है ) मै यह नही समझ प रहा हु कि किस आधार पर पूरी मिडिया यह साबित करने मे जुट गई है कि प्रभाष जी के बाद अब कोई पत्रकार रहा ही नहीं ! क्या इस तरह के लेख लिखने वालो ने समूचे पत्रकारो के बेयिमान, अयोग्य ,चाटूकार होने कि पुष्टी कर ली है ! ये कोई अदभूद बात नही है कि हिंदी के चाटूकारो ने प्रभाष जी कि मोत को भुनाने के लिए उन्हें युग का महान पत्रकार बताकर उनकी आत्मा कि शांति के बहाने अपना नेटवर्क बढाने मे जुटे हुए है . मै मुंबई के कई लोगो के नाम गिना सकता हु जो प्रभाष जी को जितना महान बता रहे है, अगरचे वे उतने महान होते तो सायद इन लोगो कि श्रधांजली पाकर उनकी आत्मा तक रो उठती! इन लोगो को पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं,लेकिन ये भाई अपना काम छोड कर प्रभाष जी के सदमे से न उभर पाने की बात करते नजर आ रहे है. पहले तो ये प्रभाष जी को महान बताते है फिर उनकी मोत के गम मे दुबे हुए अपने को उनका अनुचर बताते हुए उनसे बची हुई महानता अपने खाते मे जमा करवाने की मुहिम मे जुट गए है . कुल मिलाकर मुझे तो प्रभाष जी के महिमा मंडन मे यही स्वार्थ दिखाई पडता है .
kam se kam unke jaan ke baad to vivad na karen
बेहद नकारात्मक रुख है मित्र…इस नज़रिए से देखेंगे तो पूरा ब्रह्माण्ड ही स्वार्थी नज़र आएगा…मानव की कुछ सीमाएं होती हैं…आप प्रभाष जी से भगवान् बन जाने की तो अपेक्षा नहीं रख सकते..
आलोक जी….
कृपया अपने मस्तिष्क को भी थोड़ा आलोकित कर लें…क्योंकि लगता है तमकार कुछ ज़्यादा ही गहरा है….आपको अगर ये गलतफ़हमी है कि इंसान नाम का जीव पूर्णता को प्राप्त कर सकता है….तो फिर आप महान हैं…और इस नाते फिर आपको बुद्ध से लेकर गांधी तक सबको गरियाने का हक है…पर एक बार किसी इंसान के गुणों की तुलना के उसके अवगुणों या कमियों से करें…और फिर अगर अवगुण ज़्यादा दिखें तो आक्षेप करें…एक व्यक्ति के निधन के बाद इस तरह की बातें आपको शोभा नहीं देती…फिर आप तो कायस्थ कुल से आते हैं…किस आधार पर अपने प्रबुद्ध होने का प्रमाण देंगे…कई बार समय और परिस्थितियां चीज़ों को ऐसे दिखाती हैं कि उनके निहितार्थ बदल जाते हैं…मुंबई वाली घटना भी ऐसी ही हो सकती है….लेख निष्पक्ष लिखें….व्यक्तिगत कारणों और द्वेष से प्रभावित हो कर रंजिशें और तुच्छता की जा सकती है…पत्रकारिता नहीं…आपसे कम अनुभवी हूं पर लेख पढ़ कर लगता है विचारवान आपसे ज़्यादा हूं…अगर आप क्षमा नहीं कर सकते…गुणग्राही और विनम्र नहीं हैं तो आप बड़े नहीं हैं….क्या अपने घर के वरिष्ठों के निधन के बाद भी हम ऐसी ही बातें करते हैं….क्यों नहीं क्या उनमें कमियां नहीं होती हैं….
राजेंद्र माथुर…रघुबीर सहाय और मनोहर श्याम जोशी…धर्मवीर भारती, अज्ञेय गए तो वो इंटरनेट का ज़माना नहीं था और न ही टीवी चैनलों का ऐसा ज़ोर था….खुद आप जिस धर्मयुग में काम करते थे उसमें इन महान सम्पादकों के निधन के बाद श्रद्धांजलि को कितनी जगह दी गई थी? और फिर क्या आपकी लिखने की क्षमता चुक गई है जो वर्षों पुराना लेख कचरे से निकाल कर प्रकाशित होने के लिए फेंक दिया….और क्या अज्ञेय को केवल इसलिए नकार सकते हैं कि उन्होंने जापानी साहित्य की अपने नाम से चोरी की….क्या बच्चन जी की मधुशाला के उमर खय्याम की मधुशाला के काव्यानुवाद होने से आप कह देंगे कि बच्चन बेकार थे…आप अगर पूर्वाग्रहों से ऊपर नहीं उठ सकते तो कम से कम लिखना छोड़ दें…लिखना नहीं छोड़ सकते तो उसे सार्वजनिक करना छोड़ दें…किसी को कोई हक नहीं कि वो अपनी व्यक्तिगत खुन्नस दुनिया पर थोपे….इतिहास उन लोगों को भूल जाता है जो तुच्छता से ऊपर नहीं उठते…कलम का दुरुपयोग आगे कहां ले जाएगा ये स्पष्ट दिख रहा है….और अविनाश जी धन्य हैं कि 3 दिन की शोकसभा के बाद फिर तबेला खोल कर बेठ गए हैं….
आलोक जी ने सच ही कहा है। शोक के सैलाब में डूबना तो मूखॆता ही है। प्रभाषजी का हर कोई सम्मान करता है लेकिन बहुत बडे़ गुणों के साथ उनके कुछ छोटे अवगुणों पर भी चरचा होनी चाहिए। मसलन-सती प्रथा का समथॆन,कई बार कागज-कारे में एक खुन्नसी पत्रकार की तरह एकतरफा लेखन और बिहार जाकर दिग्विजय सिंह के लिए चुनाव प्रचार करना कई सवाल तो खड़े करता ही है।
- एल.पी.पंत
ALOKJI KE AALEKH KO MAIN KATHADESH MEIN NIRANTAR PADHATA RAHA HOON. IN LEKHOAN KO PADH CHUKA HOON. AJ BHI MERE PAS WE LEKH OR KATHADESH HAI.
MURTI BHANJAN JARURI HOTA HAI. SAB PE SHAK KARO—ISWAR PAR BHI! YE LEKH PADHATE HUE MAIN BHI ACHARAJ ME PAD GAYA THA OR ALOK PAR EK SHAN BHI KI WE KAFI TEJASWI HAIN. MAHA AAKASHIYA BHI UNKE SWALOAN KE GHERE ME HAIN. LEKIN ALOK KO HAR BAT MEIN CHHED NIKALANE SE BACHANA CHAHIYE.
pRABHASJI NAHI RAHE—AB BATAYEIN KYA KARANA CHAHIYE? WE NAHI RAHE TO KYA SABHI LOG MILKAR ALOKJI TARAH UNPAR PIL PADE?
ARE BHAI! JO ACHACHHA LIKHA-PADHA HAI, BOLA BATIYA HAI USKO NA KAHA JAY? HAWN! KISI BHI VYAKTI KO BEMATALAB DEWATA BANANE SE BACHANA CHAHIYE, YEH JANTE HUE BHI KI DEWATAGAN SWALOAN SE PARE NAHI RAHE HAIN. ALOKJI KI IMANDARI, UNKI BATKAHI, UKNE SAROKAR KO SABHI EK TARAH SE NAHI BACHENGE. PRABHASJI KE KIYE DHARE KA IMANDAR MULYANKAN HONA CHAHIYE.
प्रभाष जोशी के लिए शोक का जो सामूहिक माहौल बनाया जा रहा है और जिस तरह से इस रुदाली में शामिल न होने वालों को हांकने-धमकाने की कोशिश हो रही है, वो अभूतपूर्व है।
तमाम जाति समूहों को देखना चाहिए कि ब्राह्मणवाद अपने नायकों को किस तरह से स्थापित करता है। काश कि ठाकुरों ने त्रिलोचन शास्त्री और कायस्थों ने रघुवीर सहाय जैसे असली दिग्गजों के लिए ऐसा कुछ किया होता (लिखने वाला कितना कास्टिस्ट है, क्यों?)और उन्हें स्थापित करने में दूसरी जाति के लोगों का भी किस चतुराई से इस्तेमाल करता है।
लेकिन फिर भी बहुत लोग आज नहीं बोल रहे हैं तो इसलिए कि परिवार के लिए (उनके नाम पर रूदाली राजनति करने वालों के लिए नहीं) ये शोक का समय है। इसलिए कृपया इस समय इस प्रसंग को रहने दें। जब कभी प्रभाष जोशी का मूल्यांकन होगा, तो कोई भी शोधार्थी इन बातों की अनदेखी शायद ही कर पाएगा कि:
1. प्रभाष जोशी ब्राह्मणवाद के घोषित समर्थक थे, हिंदू धर्म के वर्णाश्रम आधारित सनातनी रूप से उन्हें प्रेम था
2. उनके अखबार ने राममंदिर आंदोलन का उग्र समर्थन किया था
3. उनके नेतृत्व में जनसत्ता ने आरक्षण का जमकर विरोध किया था
4. उनके अखबार ने रूपकंवर को जिंदा जलाए जाने का समर्थन किया था और एक बार नहीं बार-बार किया था
5. जनसत्ता उनके संपादक रहते ही मरनासन्न हो गया था
इनमें से कोई भी बात निजी नहीं है। और तथ्य चाहे तो किसी भी स्रोत से जांच लीजिए।
आलोक जी, प्रभाष जोशी के भक्तों की यह चाल कामयाब रही। आखिर उन्होंने आप सभी से वो ग़लती करा ही दी जिससे बचना चाहिए था। अब वो वैचारिक बहस को शोक का रंग देकर प्रभाष जोशी के जातिवादी और मर्दवादी चेहरे को ढांप लेंगे।
आलोक जी, बेहतर होता कि आप इस वक़्त अपनी चेतना को थोड़ा थाम लेते। शोक के पलों को बीत जाने देते। जख्मों को थोड़ा भर जाने देते। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। आप आलोक तोमर जैसे लोगों के आरोपों को पढ़ कर उकसावे में आ गए। इससे प्रभाष जोशी के भक्तों को यह कहने का मौका भी मिल गया कि आप संवेदनहीन हैं।
ऐसा अक्सर होता है कि शोक में पलों में व्यक्तियों के सोचने-समझने की शक्ति ख़त्म हो जाती है। और इसका फायदा कुछ शातिर लोग उठा लेते हैं। लेकिन फायदा उठाने वालों को भी हमेशा यह याद रखना चाहिए कि उनकी यह चाल लंबे समय तक नहीं चलेगी। अगर वो सोच रहे हैं कि प्रभाष जोशी की मृत्यु के बाद एक सुर में आलाप लगा कर उन्हें खुदा बना देंगे और उनके आलोचकों को निपटा देंगे तो यह मुमकिन नहीं। इसलिए यह कहना बंद करें कि प्रभाष जोशी के मृत्यु से “युग का अंत हो गया” … या “हिंदी पत्रकारिता अनाथ हो गई” … या “अब कहीं से रोशनी की कोई किरण नहीं आएगी”… “अब गरीबों की बात कौन करेगा”… “अब समाज के सबसे निचले तबके की आवाज़ कौन बनेगा” … जो लोग भी यह कह रहे हैं अगर वो सभी सच कह रहे हैं और अगर वो इस पेशे में हैं तो उन सबको सामूहिक तौर पर डूब मरना चाहिए।
मैं प्रभाष जी को उनके लेखन से ही जानता हूं। या मित्रों की बातचीत और उनकी राय से। दुख हुआ था जब गुजरात में दंगों के बाद लिखे अपने प्रसिद्ध कॉलम में प्रभाष जी क्रिकेट क्रिकेट भजते रहे थे। अपने देश के राजनीतिक हालात से वे या तो बेखबर रहे या फिर दिल्ली की राजनीति को चमकती दिशा देने के एजेंडे पर काम करते रहे। प्रभाष जोशी एक सामान्य पत्रकार थे, निराशाजनक है कि वे अन्य पत्रकारों के बीच बौने होते हुए भी ऊंचे दिखाई देते थे।
आलोकजी,
आपको इस बेबाक़ आलेख के लिये बधाई।
आपकी यह ईमानदारी, सोच की पारदशिता बनी रहे।
72 वर्षीय प्रभाष जोशी का 6 नवंबर की रात को हो गया। आज 7 दिन हो गये। कुछ भाई लोग कह रहे हैं कि अभी कुछ दिन रूक कर उनकी आलोचना करनी चाहिए थी। शायद ये भाई लोग उनकी बारहवीं में शामिल होने जा रहे होंगे।
बहरहाल, जो लोग उनकी बारहवीं मे शामिल होने नहीं जा पर रहे हैं वे उनके विचारों पर विमर्श के लिए स्वतंत्र हैं। एकलव्य ने बात को ठिकाने पर ला दिया है। प्रभाष जी के ब्राह्मण (ब्राह्वामणवादी) अनुयायी चाहें तो बारहवीं के लौटने के बाद भी इसका जबाव दे सकते हैं। इस दौरान उनके पास प्रभाष जी के शब्दों में ‘ब्रह्म से संवाद’ की भी सुविधा रहेगी। अगर उनके ब्रह्म भी इन सवालों का उत्तर न दे सकें तो हम मानेंगे कि प्रभाष जी कुछ अच्छाइयों के बावजूद इतिहास के कूडेदान में जाने लायक हैं।
एकलव्य के सवाल-
1. प्रभाष जोशी ब्राह्मणवाद के घोषित समर्थक थे, हिंदू धर्म के वर्णाश्रम आधारित सनातनी रूप से उन्हें प्रेम था
2. उनके अखबार ने राममंदिर आंदोलन का उग्र समर्थन किया था
3. उनके नेतृत्व में जनसत्ता ने आरक्षण का जमकर विरोध किया था
4. उनके अखबार ने रूपकंवर को जिंदा जलाए जाने का समर्थन किया था और एक बार नहीं बार-बार किया था
5. जनसत्ता उनके संपादक रहते ही मरनासन्न हो गया था
ओफ्फ… माज़ी को माज़ी न बनाया…
Prabhji ke pragatsheel hone ya na hone se unke virat personality,adarsh patrikar and ek acche insan hone par kya phark prega.koi nahi.
Ashok Bansal
बंसल साहब यह कहा जाये कि वे महान पुरोगामी, ब्राह्मणवादी, स्त्रीविरोधी, दलितविरोधी, नौटंकीबाज पत्रकार थे। और उनकी इस ‘महानता’ पर ‘गर्व’ किया जाये? अगर इससे फ़र्क नहीं पडता तो किससे पडता है।
और शोक हो या प्रसन्नता गंभीर व्यक्ति कभी होश नहीं खोता।
http://hamkalam1.blogspot.com/2009/11/blog-post_11.html
पश्चिम बंगाल के जनवादी लेखक संघ ने जो कहा है उससे तो प्रभाष जोशी भी सहमत नहीं हो पाते। इन जातिवादी वामपंथी पंडितों की जय हो। देखिए उनकी प्रेस रिलीज के अंश:
“भारत के दीन-हीन और उत्पीड़ित जनों के पक्ष में प्रभाष जी ने हमेशा पूरी बुलंदी से अपनी आवाज उठायी। इस अर्थ में वे मूलरूप से एक उत्कट वामपंथी थे।” (आरक्षण विरोधी आंदोलन में जनसत्ता की शर्मनाक भूमिका के बावजूद, सती का समर्थन करने के बावजूद, ब्राह्मणवाद का खुला समर्थन करने के बावजूद, अवर्णों के लिए तू-तड़ाक करने के बावजूद…)
“प्रभाष जी भारत में सांप्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष के अमर सेनानी थे।” (ये बात क्या वो नहीं जानते कि देश में सबसे सांप्रदायिक अखबारों में से एक के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी थे। जलेस वाले इतने अज्ञानी अनपढ़ तो नहीं हैं।)
“प्रभाष जी एक कट्टर साम्राज्यवाद-विरोधी लेखक थे।” (क्या सचमुच)
तो फिर हिटलर भी मार्क्सवादी था, चार्ल्स शोभराज नारीवादी है, और सीपीएम एक कम्युनिस्ट पार्टी है।
ये देखना रोचक है कि जाति की पहचान किस तरह विचारों पर हावी हो जाती है। प्रभाष जोशी ने जिंदगी भर कम्युनिस्टों के बारे में जूते और गाली की भाषा में बात की। लेकिन वही पंडित प्रभाष जोशी जलेस के सवर्ण लेखकों के लिए इतने महान हो जाते हैं कि वो अपनी प्रेस रिलीज में कहते हैं:
“प्रभाष जी के आकस्मिक देहांत से हिंदी पत्रकारिता में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे आसानी से भरा नहीं जा सकेगा।”
जाति के अलावा इस प्रलाप की और कौन सी व्याख्या हो सकती है? जगदीश्वर चतुर्वेदी इस बारे में कुछ बता सकते हैं शायद?
ये है जनवादी कहे जाने वाले सवर्ण लेखक संघ की विज्ञप्ति:
http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2009/11/blog-post_4457.html
अलोक जी ,
अच्छा लगा आपको पढकर, बहुत दिनों के बाद इतनी बेबाकी
और हिम्मती के साथ लिखा गया कुछ पढ़ा है | चापलूसी और पीठ्खुज्ज्वल से अलग लेखन है ये |
एक बार फिर से बधाई |
सूरज बड्त्या
अलोक जी ,
एक दलित की नजर से भी देखें
तो आपका मूल्यांकन उचित ही है |
सूरज बड्त्या
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