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	<title>Comments on: &#8220;कृपया प्रभाष जोशी का झूठा महिमामंडन न करें&#8221;</title>
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		<title>By: Suraj Badtiya</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/11/alok-srivastav-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4950</link>
		<dc:creator>Suraj Badtiya</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Dec 2009 11:17:12 +0000</pubDate>
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		<description>अलोक जी ,

एक दलित की नजर से भी देखें 
तो आपका मूल्यांकन उचित ही है &#124;

सूरज बड्त्या</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अलोक जी ,</p>
<p>एक दलित की नजर से भी देखें<br />
तो आपका मूल्यांकन उचित ही है |</p>
<p>सूरज बड्त्या</p>
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		<title>By: Suraj Badtiya</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/11/alok-srivastav-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4949</link>
		<dc:creator>Suraj Badtiya</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Dec 2009 11:14:06 +0000</pubDate>
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		<description>अलोक जी ,

अच्छा लगा आपको पढकर, बहुत दिनों के बाद इतनी बेबाकी 
और हिम्मती के साथ लिखा गया कुछ पढ़ा है &#124; चापलूसी और पीठ्खुज्ज्वल से अलग लेखन है ये &#124;
एक बार फिर से बधाई &#124;

सूरज बड्त्या</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अलोक जी ,</p>
<p>अच्छा लगा आपको पढकर, बहुत दिनों के बाद इतनी बेबाकी<br />
और हिम्मती के साथ लिखा गया कुछ पढ़ा है | चापलूसी और पीठ्खुज्ज्वल से अलग लेखन है ये |<br />
एक बार फिर से बधाई |</p>
<p>सूरज बड्त्या</p>
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		<title>By: एकलव्य</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/11/alok-srivastav-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4421</link>
		<dc:creator>एकलव्य</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 07:43:12 +0000</pubDate>
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		<description>ये है जनवादी कहे जाने वाले सवर्ण लेखक संघ की विज्ञप्ति:

http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2009/11/blog-post_4457.html</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये है जनवादी कहे जाने वाले सवर्ण लेखक संघ की विज्ञप्ति:</p>
<p><a href="http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2009/11/blog-post_4457.html" rel="nofollow">http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2009/11/blog-post_4457.html</a></p>
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		<title>By: एकलव्य</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/11/alok-srivastav-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4420</link>
		<dc:creator>एकलव्य</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 07:36:56 +0000</pubDate>
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		<description>पश्चिम बंगाल के जनवादी लेखक संघ ने जो कहा है उससे तो प्रभाष जोशी भी सहमत नहीं हो पाते। इन जातिवादी वामपंथी पंडितों की जय हो। देखिए उनकी प्रेस रिलीज के अंश: 

&quot;भारत के दीन-हीन और उत्पीड़ित जनों के पक्ष में प्रभाष जी ने हमेशा पूरी बुलंदी से अपनी आवाज उठायी। इस अर्थ में वे मूलरूप से एक उत्कट वामपंथी थे।&quot; (आरक्षण विरोधी आंदोलन में जनसत्ता की शर्मनाक भूमिका के बावजूद, सती का समर्थन करने के बावजूद, ब्राह्मणवाद का खुला समर्थन करने के बावजूद, अवर्णों के लिए तू-तड़ाक करने के बावजूद...)

&quot;प्रभाष जी भारत में सांप्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष के अमर सेनानी थे।&quot; (ये बात क्या वो नहीं जानते कि देश में सबसे सांप्रदायिक अखबारों में से एक के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी थे। जलेस वाले इतने अज्ञानी अनपढ़ तो नहीं हैं।) 

&quot;प्रभाष जी एक कट्टर साम्राज्यवाद-विरोधी लेखक थे।&quot; (क्या सचमुच) 

तो फिर हिटलर भी मार्क्सवादी था, चार्ल्स शोभराज नारीवादी है, और सीपीएम एक कम्युनिस्ट पार्टी है। 

ये देखना रोचक है कि जाति की पहचान किस तरह विचारों पर हावी हो जाती है। प्रभाष जोशी ने जिंदगी भर कम्युनिस्टों के बारे में जूते और गाली की भाषा में बात की। लेकिन वही पंडित प्रभाष जोशी जलेस के सवर्ण लेखकों के लिए इतने महान हो जाते हैं कि वो अपनी प्रेस रिलीज में कहते हैं: 

&quot;प्रभाष जी के आकस्मिक देहांत से हिंदी पत्रकारिता में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे आसानी से भरा नहीं जा सकेगा।&quot;

जाति के अलावा इस प्रलाप की और कौन सी व्याख्या हो सकती है? जगदीश्वर चतुर्वेदी इस बारे में कुछ बता सकते हैं शायद?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पश्चिम बंगाल के जनवादी लेखक संघ ने जो कहा है उससे तो प्रभाष जोशी भी सहमत नहीं हो पाते। इन जातिवादी वामपंथी पंडितों की जय हो। देखिए उनकी प्रेस रिलीज के अंश: </p>
<p>&#8220;भारत के दीन-हीन और उत्पीड़ित जनों के पक्ष में प्रभाष जी ने हमेशा पूरी बुलंदी से अपनी आवाज उठायी। इस अर्थ में वे मूलरूप से एक उत्कट वामपंथी थे।&#8221; (आरक्षण विरोधी आंदोलन में जनसत्ता की शर्मनाक भूमिका के बावजूद, सती का समर्थन करने के बावजूद, ब्राह्मणवाद का खुला समर्थन करने के बावजूद, अवर्णों के लिए तू-तड़ाक करने के बावजूद&#8230;)</p>
<p>&#8220;प्रभाष जी भारत में सांप्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष के अमर सेनानी थे।&#8221; (ये बात क्या वो नहीं जानते कि देश में सबसे सांप्रदायिक अखबारों में से एक के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी थे। जलेस वाले इतने अज्ञानी अनपढ़ तो नहीं हैं।) </p>
<p>&#8220;प्रभाष जी एक कट्टर साम्राज्यवाद-विरोधी लेखक थे।&#8221; (क्या सचमुच) </p>
<p>तो फिर हिटलर भी मार्क्सवादी था, चार्ल्स शोभराज नारीवादी है, और सीपीएम एक कम्युनिस्ट पार्टी है। </p>
<p>ये देखना रोचक है कि जाति की पहचान किस तरह विचारों पर हावी हो जाती है। प्रभाष जोशी ने जिंदगी भर कम्युनिस्टों के बारे में जूते और गाली की भाषा में बात की। लेकिन वही पंडित प्रभाष जोशी जलेस के सवर्ण लेखकों के लिए इतने महान हो जाते हैं कि वो अपनी प्रेस रिलीज में कहते हैं: </p>
<p>&#8220;प्रभाष जी के आकस्मिक देहांत से हिंदी पत्रकारिता में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे आसानी से भरा नहीं जा सकेगा।&#8221;</p>
<p>जाति के अलावा इस प्रलाप की और कौन सी व्याख्या हो सकती है? जगदीश्वर चतुर्वेदी इस बारे में कुछ बता सकते हैं शायद?</p>
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	<item>
		<title>By: अशोक</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/11/alok-srivastav-on-prabhash-joshi/comment-page-1/#comment-4417</link>
		<dc:creator>अशोक</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Nov 2009 16:54:24 +0000</pubDate>
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		<description>बंसल साहब यह कहा जाये कि वे महान पुरोगामी, ब्राह्मणवादी, स्त्रीविरोधी, दलितविरोधी, नौटंकीबाज पत्रकार थे। और उनकी इस &#039;महानता&#039; पर &#039;गर्व&#039; किया जाये? अगर इससे फ़र्क नहीं पडता तो किससे पडता है।

और शोक हो या प्रसन्नता गंभीर व्यक्ति कभी होश नहीं खोता।

http://hamkalam1.blogspot.com/2009/11/blog-post_11.html</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बंसल साहब यह कहा जाये कि वे महान पुरोगामी, ब्राह्मणवादी, स्त्रीविरोधी, दलितविरोधी, नौटंकीबाज पत्रकार थे। और उनकी इस &#8216;महानता&#8217; पर &#8216;गर्व&#8217; किया जाये? अगर इससे फ़र्क नहीं पडता तो किससे पडता है।</p>
<p>और शोक हो या प्रसन्नता गंभीर व्यक्ति कभी होश नहीं खोता।</p>
<p><a href="http://hamkalam1.blogspot.com/2009/11/blog-post_11.html" rel="nofollow">http://hamkalam1.blogspot.com/2009/11/blog-post_11.html</a></p>
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