जेल अच्छी फिल्म है

कोशिशें जारी हैं। मधुर भंडारकर की फिल्म जेल को फ्लॉप घोषित करने की कोशिशें जारी हैं। दूसरे दिन से ही ट्रेड पत्रिकाओं में ख़बरें आने लगी थीं कि राजकुमार संतोषी की अजब प्रेम की गजब कहानी ने जेल को धो डाला। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह पुराना रिवाज़ है। अपनी कामयाबी बताने के लिए किसी और की हार दिखाने की। मज़ेदार तथ्य यह है कि यह काम तमाशबीन करते हैं। तथाकथित ट्रेड विशेषज्ञ करते हैं। और मीडिया के लोग अधूरी जानकारियों के आधार पर निष्कर्ष निकाल देते हैं। फिर एक धारणा बन जाती है। धारणाएं इतनी मजबूत होती हैं कि उन्हें तोड़ पाना मुश्किल होता है। अब जैसे कि मान लिया गया है कि हरमन बावेजा फ्लॉप एक्टर हैं। एक्टर अच्छा या बुरा नहीं होता। वह फ्लॉप या कामयाब होता है।
फिल्मों के बारे में भी ऐसे ही राय बनायी जाती है। मुंबई में किसी ट्रायल या प्रिव्यू शो से आप फिल्म देख कर निकलें तो उस फिल्म यूनिट और दूसरे असंबंधित लोगों का एक ही सवाल रहता है कि फिल्म चलेगी या नहीं? अब आप ही बताएं कि आप जलेबी की मिठास के बारे में तो बता सकते हैं, लेकिन उसके बिकने या न बिकने की भविष्यवाणी कैसे कर सकते हैं? बात यह नहीं चल रही है कि जेल अच्छी फिल्म है या बुरी फिल्म है। बात चल रही है कि जेल फ्लॉप हो गयी है। इसके साथ ही अजब प्रेम की गजब कहानी की तारीफ के कसीदे पढ़े जा रहे हैं। निश्चित ही अजब प्रेम की गजब कहानी को ज्यादा दर्शक मिले हैं, लेकिन उसकी वजह से जेल कैसे असफल हो गयी? अगर दोनों फिल्मों के बजट को ध्यान में रखें तो अजब प्रेम की गजब कहानी को हिट होने में अभी वक्त लगेगा। इस साल कई फिल्मों को रिलीज़ के दूसरे दिन हिट घोषित किया गया है।

जेल मधुर भंडारकर की शैली की फिल्म है। मधुर हर बार अपनी फिल्म में समाज के नये क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि वे उसके बारे में संवेदनशील तरीके से कुछ बता और दिखा सकें। वे इस उद्देश्य में सफल रहते हैं। जेल इस मायने में उल्लेखनीय है कि जेल के अंदर जाने के बाद पराग दीक्षित जेल के बाहर की दुनिया से भी वाकिफ होता है। हम अपने दैनंदिन जीवन में समाज को करीब से नहीं जान पाते। हमें मालूम ही नहीं रहता कि हम जिस समाज में जी रहे हैं, वह आखिरकार चलता कैसे है। कोई बीमार पड़ जाए तो मालूम होता है कि जीवन बचाने और देने के उद्देश्य से बने अस्पताल कैसे मौत का ख़ौफ़ दिखा कर सौदेबाज़ी करते हैं। कभी इमरजेंसी में गांव जाने के लिए ट्रेन का टिकट न मिले तो रेल विभाग की धांधलियों की जानकारी मिलती है।
जेल इस साल की एक महत्वपूर्ण फिल्म है। नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी और राहुल सिंह ने सपने, उम्मीद, हताशा और सदमे को अच्छी तरह व्यक्त किया है। ख़ास कर मनोज बाजपेयी अपने फॉर्म में लौटते नज़र आते हैं। इस फिल्म को देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्या यह हो गयी है कि हर फिल्म में हम मनोरंजन चाहते हैं। और मनोरंजन का खास संदर्भ और मतलब हो गया है। इसके अभाव में हमें हर फिल्म नीरस, शुष्क और बेजान लगती है।
♦ अब्राहम हिंदीवाला









आपने सही कहा ये वाकई एक बेहतरीन फिल्म है। फैशन के बाद मधुर भंडारकर से ऐसी ही फिल्म की उम्मीद की जा रही थी। जेल उससे भी ज़्यादा प्रवोकिंग फिल्म है। जेल के यकड़वे यथार्थ को बहुत ही सहजता से मधुर ने फिल्माया है।
beh. kya sach men?
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