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औकात नहीं है, तो हाथ ही न लगाओ

14 November 2009 No Comment

कम बजट का हादसा

abraham hindiwala

कल ही एक फिल्‍म रिलीज हुई है। विशेष फिल्‍म की इस प्रस्‍तुति के निर्देशक कुणाल देशमुख हैं। कुणाल की पिछली फिल्‍म जन्‍नत ने ठीक बिजनेस किया था। भट्ट कैंप में जो निर्देशक सफल होता है, उसे फिल्‍में मिलती रहती हैं। वह बाहर नहीं जाता। एक कंफर्ट बन जाता है। सीमित बजट, उपलब्‍ध स्‍टार, महेश भट्ट का मार्गदर्शन और हर साल आ रही एक फिल्‍म। किसी युवा निर्देशक को और क्‍या चाहिए? हमें और उन्‍हें बाद में पता चलता है कि वे कई मीडियॉकर फिल्‍मों के मीडियॉकर निर्देशक बन कर रह गये। आज विक्रम भट्ट की क्‍या स्थिति है? वे भट्ट कैंप से बाहर तो निकल गये, लेकिन अनुराग बसु की तरह प्रतिभाशाली साबित नहीं हुए। उनका स्‍ट्रगल जारी है।

tum mile

कुणाल देशमुख की फिल्‍म तुम मिले हिंदी फिल्‍मों में चल रहे मीडियॉकर काम का ताज़ा नमूना है। बजट नहीं है। ज़्यादा दांव पर लगाना नहीं है। फार्मूला है कि अपने घर के स्‍टार इमरान हाशमी को लो। उसके साथ कम पॉपुलर और सस्‍ते में उपलब्‍ध हीरोइन लो। रोमांस का नया एंगल डालो। सीमित बजट में निश्चित समय में फिल्‍म पूरी करो। संगीत मधुर हो। कुछ नयी प्रतिभाओं के चमकदार स्‍वर और संगीत का भरपूर दोहन करो। फिल्‍म को समय रहते किसी और के कंधे पर डाल दो। अपनी लागत पहले ही निकाल लो। फिल्‍म बिजनेस करे तो और फायदा लो। अगली मीडियॉकर फिल्‍म की तैयारी शुरू कर दो। पिछले कुछ सालों से महेश भट्ट और मुकेश भट्ट की कंपनी विशेष फिल्‍म ऐसी ही फिल्‍में बना रही है। आप उन्‍हें असफल नहीं कह सकते, क्‍योंकि उनकी फिल्‍में औसत बिजनेस तो कर ही लेती हैं।

तुम मिले की बात करें तो इसकी पृष्‍ठभूमि में 26 जुलाई 2005 को मुंबई में आयी बाढ़ है। इस बाढ़ ने कई ज़‍िंदगियां तबाह कर दी थीं। इसके प्रभाव का अनुमान इसी तथ्‍य से लगाया जा सकता है कि आज भी तेज़ बारिश होती है तो 26 जुलाई की स्‍मृतियां घुमड़ने लगती हैं। उस हादसे को कुणाल देशमुख ने सीमित बजट के कारण निबटा दिया है। इस फिल्‍म में स्‍पेशल इफेक्‍ट और बाढ़ के दृश्‍यों के रीक्रिएशन के लिए भारी सोच, तैयारी और ध्‍यान की ज़रूरत थी। इस फिल्‍म में हादसा भी हास्‍यास्‍पद हो गया है। ख़तरा और डर महसूस ही नहीं होता। फिल्‍म देखते हुए रोंगटे खड़े नहीं होते। उल्‍टे हंसी आती है। हंसी आती है, क्‍योंकि इस ग्‍लोबल दौर में हम विदेशों में हादसों पर बनी ख़ौंफ़नाक फिल्‍में देख रहे हैं। आप 2012 ही देख लें।

सिनेमा में यह तर्क बेमानी है कि हमारे पास बजट नहीं था, इसलिए हम वैसा इफेक्‍ट पैदा नहीं कर सके। मेरा कहना है कि औकात नहीं है, तो हाथ ही न लगाओ। कम बजट में हादसों पर बनी फिल्‍में खुद ही हादसा होती रहेंगी।

♦ अब्राहम हिंदीवाला

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