भारतीयों के दिल पर लिखी इबारत को हुक्मरान भी सुनें
♦ मज़्कूर आलम
क्रिकेट की दुनिया के पा बन गये सचिन ने क्रिकेट जगत में 15 नवंबर 2009 को दो दशक पूरे कर लिये। 15 नवंबर 1989 को पाकिस्तान दौरे से उठा यह हिलोर अब धीर-गंभीर और गहरा हो गया है। इतना गहरा समुद्र कि न जाने कितनी मौजें अब उसमें हिलोरें मारती रहती हैं। टीम हित के हिसाब से उनकी खेल शैली बदलती रहती है। शतकों के शतक के करीब सचिन के बारे में क्रिकेट लवर्स का मानना है कि जब तक भारतीय क्रिकेट का रखवाला सचिन है, तब तक भारतीय क्रिकेट सुरक्षित है।
लेकिन दूसरी तरफ हमारे सीमाई इलाकों में जबरदस्त तनाव पसरा है। अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा, कश्मीर में आतंकी गुटों की दखलअंदाज़ी, नेपाल की अस्थिरता, बांग्लादेश जैसे छोटे देश के साथ भी सीमा-विवाद का न सुलझना। ऐसे में कूटनीतिक स्तर पर भारत के द्वारा की गयी कोई भी चूक भारी पड़ सकती है। इसे ही लीजिए न कि हम अपने देश में किसे कहां जाने दें और कहां नहीं। यह हम तय करेंगे कि चीन। लेकिन जब दलाईलामा का अरुणाचल प्रदेश जाने का प्रोग्राम बनता है, तो चीन इस पर एतराज़ जताता है। हां, भारत सरकार ने उस दबाव में न झुक कर बहुत अच्छा काम किया। देश में इससे यह भी मैसेज गया कि हम सुरक्षा मामले में किसी से कमज़ोर नहीं है, इसलिए किसी की धौंसपट्टी में आने वाले नहीं हैं। दलाईलामा भी वहां बेधड़क जाते हैं और ताल ठोंक कर कूटनीतिक भाषा में अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग बता आते हैं। वह कहते हैं – हम किसी राजनैतिक यात्रा पर नहीं आये हैं, यह धार्मिक यात्रा है। लेकिन इसके आगे यह कह कर कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है, वह अरुणाचल प्रदेश पर भारत का स्टैंड साफ कर देते हैं। विदेशी मोर्चे पर एक बार फिर भारत ने दिखाया कि वह सशक्त है किसी की धौंसपट्टी में नहीं आने वाला।
लेकिन क्या वह आंतरिक मोर्चे पर भी इतनी ही मुस्तैदी दिखाता है।
चलिए, सचिन के दो दशक पूरा होने पर हम थोड़ा क्रिकेट की भी बात कर लें। हम जान रहे हैं कि आप के दिमाग़ में चल रहा होगा कि क्या कभी देश की सुरक्षा व्यवस्था, भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंध और फिर क्रिकेट का तड़का लगा रहा हूं। किसी इंफोटेनमेंट चैनल की तरह यह भी किसी मुद्दे पर ठीक से बात नहीं कर सकता क्या?
लेकिन जनाब मेरा तो मानना है कि पूरा न सही लेकिन समाज का थोड़ा बहुत आईना तो मीडिया होता ही है। अगर देश के विचारों में सातत्य नहीं होगा तो मीडिया के विचारों तारतम्यता कहां से आएगी। इसलिए आश्चर्य करने की कोई ज़रूरत नहीं। जैसे भारतीय क्रिकेट एक दिन में अर्श से फर्श पर पहुंच जाती है (इसे उलट भी सकते हैं), वैसे ही भारत की कूटनीति, जो समस्या न होने पर भी उसे समस्या बना सकती है।
इसे ही ले लीजिए न, कितना अच्छा तो कश्मीर में चुनाव हुआ। लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हुई। कोई बहुत ज़्यादा दिन पहले की बात नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा – कश्मीर से अलगाववादियों का सफाया हो गया है। अलगाववादी बातचीत के रास्ते पर आने के लिए तैयार हैं। बात भी ठीक थी। सब कुछ पटरी पर था। कश्मीर में फारुख अब्दुल्लाह की सरकार ने वहां का कायाकल्प न भी किया हो, तो सुधार के रास्ते पर बढ़ा तो दिया ही था। लेकिन सत्यानाश हो क्रिकेट का जैसे खुद अर्श से फर्श पर पहुंचती रही है, वैसी ही भूमिका उसने यहां भी एक बार फिर निभायी।
बहुत पुरानी बात नहीं है सिर्फ एक से डेढ़ महीने पुरानी होगी कि जम्मू-कश्मीर की अंडर-22 टीम कर्नाटक खेलने गयी थी। वहां की पुलिस ने जम्मू-कश्मीर के एक उभरते युवा खिलाड़ी परवेज़ रसूल को आतंकी होने और एक्सप्लोसिव रखने के संदेह में पकड़ लिया था। कर्नाटक पुलिस ने पूरी तसल्ली से परवेज़ की तलाशी ली थी। उसके पास से कुछ नहीं मिला। इस बीच इस मामले को लेकर घाटी के लोगों में खूब आक्रोश देखा गया था। उन लोगों ने पुलिस के इस कृत्य के विरोध में जमकर प्रदर्शन किये। एक ज़माने के सबसे तेज़ गेंदंबाज़ माने जाने वाले रहे और वर्तमान जम्मू-कश्मीर रणजी टीम के सदस्य आबिद नबी समेत एक स्वर में पूरे घाटी के लोगों ने आरोप लगाया था कि राज्य के लोगों के साथ देश के दूसरे हिस्से में सौतेला व्यवहार होता रहा है। जब भी हमलोग देश के दूसरे हिस्से में जाते हैं, हम पर फब्तियां कसी जाती हैं। इसलिए हमलोग देश के दूसरे हिस्सों में कम ही जाते हैं। इस मामले पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री सह राज्य क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मुखिया उमर अब्दुल्ला भी जमकर बरसे थे। कर्नाटक पुलिस को आड़े हाथों लिया था। मामले की गंभीरता को देखकर कर्नाटक पुलिस ने फौरन उस मासूम युवा खिलाड़ी को छोड़ दिया। इस माफी के साथ कि हमें ग़लत जानकारी मिली थी। हमारे मेटल डिटेक्टर में ही गड़बड़ी थी। इतने संवेदनशील मामले में क्या आप किसी और देश की पुलिस से ही इतनी लापरवाही भरे कृत्य और बयान की उम्मीद कर सकते हैं।
चलिए फिर भी मान लेते हैं कि यह एक भूल थी और पुलिस ने उसे स्वीकार कर लिया। इसलिए यह उम्मीद तो हम कर ही सकते हैं कि आगे इस तरह की भूल न हो। लेकिन क्रिकेट की तरह भारतीय नीति-नियंताओं के अनिश्चित चरित्र के बारे में आप कोई भी बात निश्चित तौर पर नहीं कह सकते।
और वही हुआ – रणजी सत्र की शुरुआत होते ही सेना की टीम ने श्रीनगर में प्लेट ग्रुप का मैच जम्मू-कश्मीर की टीम से खेलने से इनकार कर दिया। पहले वाला ज़ख़्म अभी भरा भी नहीं था कि इस घटना ने उसे फिर कुरेद दिया। कमाल तो यह है कि इस मामले की गंभीरता को एक खेल संस्था ने समझा और इसके दूरगामी परिणाम का अंदाज़ा लगाकर आनन-फानन में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने सेना की टीम को इस साल रणजी के बाकी बचे मैच खेलने पर बैन लगा दी और सेना की टीम को एक साल के लिए बरखास्त कर दिया।
यह टीम उसी सेना की है, जिस पर हर भारतीय को नाज है। यह उस रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है, जो देश की सुरक्षा करता है। इस मंत्रालय के मुखिया हैं यानी रक्षामंत्री एके एंटोनी। इस मामले पर उनका बयान सुनिए – यह फैसला सचिव स्तर पर लिया गया था। उनको इसकी कोई जानकारी नहीं थी। जी हां, एक रक्षा मंत्री का बयान है यह। उसे यह तक पता नहीं कि उसके विभाग में ही क्या हो रहा है। किसी मामले पर क्या फैसला लिया जा रहा है। आगे वह फरमाते हैं कि चूंकि श्रीनगर में सेना की टीम की सुरक्षा को खतरा था। हमारे पास ऐसी सूचना थी कि सेना की टीम को श्रीनगर में ह्यूमिलिएट किया जा सकता है। इसलिए श्रीनगर में न खेलने का निर्णय लिया गया। आपको आश्चर्य हो रहा है, लेकिन ये सच है कि ये बयान एक रक्षामंत्री का ही है। अब बताइए अगर किसी देश का रक्षामंत्री यह कहेगा कि सेना की टीम को अपने देश के ही एक हिस्से में इसलिए नहीं जाती क्योंकि उसकी सुरक्षा को ख़तरा है, तो कैसा लगेगा। चौंकाने वाली बात है न। इस तरह के बयान से क्या आतंकियों का हौसला नहीं बढ़ेगा। अपने ही देश में सेना को ख़तरा। है न अजीब बात।
बात यहीं पर खत्म हो जाती तब भी गनीमत थी, लेकिन रक्षामंत्री का उसके बाद आया बयान तो और हताशा पैदा करने वाला है, जो उन्होंने अपने पहले बयान की गड़बड़ी को सुधारने की नीयत से शायद दिया था। उन्होंने कहा – यह सही नीयत से लिया हुआ एक ग़लत फैसला था।
((अब उनकी सही नीयत का क्या आशय है, यह मेरी तो समझ में नहीं आया। मोहल्ला लाइव के पाठकों से मेरा आग्रह है कि उन्हें इस सही नीयत का मतलब समझ मे आये, तो एक कमेंट ज़रूर कर देंगे।))
हद तो तब हो गयी, जब इस मामले में टांग अड़ाने से हमारे देश के गृहमंत्री भी खुद को नहीं रोक पाये, जबकि सेना रक्षा मंत्रालय के अधीन आती है, न कि गृह मंत्रालय के। पी चिदंबरम कहते हैं कि सेना की टीम पर बैन नहीं लगाया जाना चाहिए। उसे माफ कर दिया जाना चाहिए।
क्यों जनाब, क्या आप यह साबित करना चाहते हैं कि सेना जो भी करती है, वही नज़ीर बन जाती है। उस पर देश का कोई कानून लागू नहीं होता। किसी अनुशासन को मानने के लिए वह बाध्य नहीं? चलिए रण-भूमि में वह क्या करती है, हम इसकी बात नहीं करते, लेकिन रन-भूमि में तो बड़ा दिल-गुर्दा दिखाना चाहिए न। और अगर वहां क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड जैसी संस्था सक्रियता दिखाती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए, न कि उस पर दबाव बनाया जाना चाहिए। ताकि दूसरी टीमों के लिए भी एक नज़ीर हो।
लेकिन इसके उलट देश के शीर्षस्थ संवैधानिक संस्था में से एक के मुखिया इस फैसले की तारीफ़ करने के बजाय, क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पर दबाव बना रहे हैं। वह भी ऐसे मंत्रालयों के, जिन्हें किसी भी सरकार में नंबर 2 और 3 का स्थान हासिल होता है। इसका मतलब आप समझ रहे है न। जब ये लोग अपने ही यहां अनुशासन लागू नहीं करवाएंगे, बल्कि और शह देंगे, तो दूसरों के सामने किस मुंह से ऐसा करने की उम्मीद करेंगे। कमाल तो यह है ये लोग उसी सरकार के हिस्सा हैं, जो लोग कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर से अलगाववाद खत्म हो गया है। वहां अब इस तरह की कोई समस्या नहीं है। राज्य सुरक्षित स्थिति और हाथों में है।
इसी बने माहौल का फायदा उठाकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड वहां क्रिकेट मैच का आयोजन कर यह साबित कर देना चाहता था कि सचमुच घाटी पूरी तरह बदल गयी है। और शायद इसीलिए उसने दूरदर्शितापूर्ण निर्णय लेते हुए पहले मैच के लिए सेना की टीम का वहां कार्यक्रम तय किया था। उसे लगा था कि सेना की टीम जब वहां मैच खेलेगी तो दूसरी टीमों का भी हौसला बढ़ेगा, लेकिन प्रथमे ग्रासे मच्छिका पाते वाली कहावत चरितार्थ करते हुए सेना ने वहां मैच खेलने से इनकार कर दिया। सीमाओं पर अपनी जान की बाजी लगा देने वाली सेना, जिसकी बहादुरी की किस्से पढ़-पढ़ कर ही हम सब बड़े हुए हैं – जिसकी शान में – वीर तुम बढ़े चलो – टाइप कितनी ही कविताओं को कोरस में गाया होगा हम सब ने, उसने रन-भूमि में जाने से पहले ही हथियार डाल दिया। साथ ही घाटी वालों के मन में फिर से अविश्वास का बीजारोपण भी कर दिया। जबकि हम सब जानते हैं कि पड़ोसी देशों समेत आतंकी गुट ऐसी ही घटनाओं की ताक में रहते हैं, स्थानीय लोगों की भावनाओं को भडक़ाने के लिए। हालांकि जम्मू-कश्मीर टीम का दूसरा मैच भी श्रीनगर में ही खेला जा रहा है, जिस पर ओलावृष्टि की दृष्टि लगी हुई है। इसे लिखने तक एक भी गेंद फेंकी नहीं जा सकी थी। यानी श्रीनगर में अभी तक टीमें रन-भूमि में नहीं उतरीं।
खैर छोड़िए, वनडे के 17 हजारी सचिन, टेस्ट में 13 हजार की दहलीज पर खड़े सचिन और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में श्रीलंका दौरा में 30 हजार पूरा करने जा रहे सचिन, शतकों के शतक से 13 शतक पीछे सचिन के दो दशक पूरा करने पर हमें नाज है और आइए हम 15 नवंबर 2009 को उनके क्रिकेटीय जीवन के दो दशक पूरा करने पर एक सच्चे खेल प्रेमी की तरह उनके लिए क्लैपिंग करें। और मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि जब तक सचिन भारतीय टीम में हैं, क्रिकेट की तमाम अनिश्चितताओं के बाद भी भारतीय क्रिकेट सुरक्षित हाथों में है। देश के एक-एक कोने से सचिन के दीवाने इस तरह की अहमकाना नफ़रत की दीवार गिरा कर सचिन का जोश बढ़ाते रहेंगे। और बता देंगे कि मराठी सचिन किसी मराठी ठाकरे की तरह सिर्फ मराठियों का नहीं पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है। क्या हम देश की राजनीतिज्ञों से भी ऐसी ही उम्मीद कर सकते हैं? सचिन के लिए पल रहे हर भारतीय के दिल प्यार को भारतीय हुक्मरान भी सुन लें।
(मज़्कूर आलम। बक्सर, बिहार में जन्म। सरोकारों के प्रति सजग पत्रकार। प्रभात खबर से पत्रकारिता की शुरुआत। नवबिहार, कॉम्पैक्ट के बाद फिलहाल द संडे इडियन की एडिटोरियल टीम के सदस्य। शीघ्र प्रकाश्य साप्ताहिक गणादेश के साहित्य विशेषांक का अतिथि संपादन। mazkooralam@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)












सचिन के कारनामें को सलाम। कारनामा इन मायनों में कि ऐसा कोई कर पायेगा, यह सोचकर विश्वास नहीं होता और शायाद सचिन को क्रिकेट का भगवान भी इसीलिय कहा गया है। वैसे भी जिस औसत से, जिस कला से और जिस समझदारी एवं धौर्य से सचिन ने अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट में लगभग तेरह हजार और अंतर्राष्ट्रीय एकदीवसीय क्रिकेट में सत्रह हजार रन पूरे कर अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में तीस हजार रन बनाने वाले पहले खिलाडी बनने जा रहे हैं वह अपने आप में लोगों कि इस धारणा को पुरजोर समर्थन करने वाला है।…
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