नक्सलवाद के बहाने असहमतियों पर निशाना
♦ देवाशीष प्रसून
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| सेज़ या साज़िश: क्या यह विकास है? |
नक्सलवाद के नाम पर सरकार तमाम तरह की असहमतियों के स्वर पर निशाना साध रही है। सरकारें कुछ ऐसी चीज़ों का हौव्वा बना कर रखती हैं, जिन्हें वो किसी भी गंभीर असहमति या असहमति से उपजे प्रतिरोध के स्वर के विरोध में खड़ी कर सकें। ऐसा करने के बाद प्रतिरोधी लोगों के सारे लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकारों को खत्म मान लिया जाता है। फिर सरकारों को मनमाने तरीके से अपने विरोधियों को चुप कराने में आसानी होती है। जैसे, अमरीका के पास आतंकवाद नाम का हौव्वा है, जिसे वह उन देशों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करता है, जो अमरीका के वर्चस्व को नहीं स्वीकारते हैं। भारतीय सत्ता तंत्र के पास भी नक्सल नाम का एक ऐसा ही हौव्वा है, जिसे वह तमाम असहमतियों के स्वर के विरोध में इस्तेमाल कर धड़ल्ले से उनका दमन करता फिरता है।
छत्तीसगढ़ के पीयूसीएल, वनवासी चेतना आश्रम, दंतेवाड़ा और ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, दिल्ली के पीयूडीआर, मलकानगिरी के मन्नाधिकार व ज़िला आदिवासी एकता संघ और उड़ीसा के एक्शन एड के संयुक्त 15 सदस्यीय जांच दल द्वारा हुए एक अध्ययन के मुताबिक नक्सल विरोधी अभियान ग्रीन हंट के तहत 17 सितंबर को दंतेवाड़ा के गचनपल्ली में छह लोगों की कोबरा, स्थानीय पुलिस, विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) और सलवा जुडूम के कार्यकर्ता बोड्डू राजा के नेतृत्व में हत्याएं की गयी। दंतेवाड़ा के ही गोमपद और चिंतागुफा में एक अक्टूबर को फर्जी मुठभेड़ में भी कई हत्याएं हुईं। पीयूसीएल, उत्तर प्रदेश के हवाले से पता चलता है कि 8 नवंबर को रोहतास जिले से पांच लोगों को पुलिस ने उठाया और इनमें से किसी को भी न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया। यूपी पुलिस ने अगले दिन सोनभद्र के चोपन जंगलों में उनमें से एक कमलेश चौधरी को सीपीआई माओवादी का एरिया कमांडर बता कर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया। बाकी चार लोग अब तक लापता हैं। ऐसी सैन्य कार्रवाइयों का सिलसिला पूरे देश में लगातार चल रहा है।
बीते दिनों, पुलिस दमन के ख़िलाफ़ बनी पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारणेन समिति (पीसीएपीए) ने पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में जबरन भू-अधिग्रहण के ख़िलाफ़ हल्ला बोला था। इस जनांदोलन को कई जाने-माने बुद्धिजिवियों के साथ-साथ ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और सीपीआई माओवादी का भी समर्थन प्राप्त है। इसके नेता छत्रधर महतो को मुख्यमंत्री की हत्या के कोशिश और सीपीआई माओवादी से संबंध के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी के विरोध में पीसीएपीए कार्यकर्ताओं ने झाड़ग्राम में भुवनेश्वर-दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन को चार घंटे तक घेरे रखा। किसी को हताहत करने के बजाय इस दौरान उन्होंने सरकार से उनके साथी छत्रधर महतो को रिहा करने की मांग रखी। एक ओर जहां, देश में रेल का घेराव विरोध प्रदर्शन का आम तरीका रहा है, वहीं सरकार ने इसे माओवादियों के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा और तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों से लैस इन आदिवासियों को नक्सली समझा।
पूरी सरकारी मशनरी ने नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ख़तरा मान लिया है और ऐसा मानना उनके लिए आप्तवचन है। वर्ष 2005-06 में सरकार ने कई महत्वाकांक्षी विकास परियोजनाओं के मद्देनज़र कुछ अहम फ़ैसले लिये। इसी वर्ष नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा संबंधी व्यय स्कीम में केंद्र सरकार ने नक्सली राजनीति के असर वाले प्रदेशों के लिए प्रतिपूर्ति की दर पचास प्रतिशत से बढ़ाकर शत-प्रतिशत कर दिया गया। इस राशि के अग्रिम भुगतान की व्यवस्था की गयी। राज्यों की सरकारों को पुलिस आधुनिकीकरण स्कीम के तहत आधुनिक हथियारों, मोबिलिटी, संचार उपकरण और प्रशिक्षण के आधारभूत ढांचे के उन्नयन हेतु खर्च राशि के कम से कम तीन-चौथाई प्रतिपूर्ति का इंतज़ाम किया गया। साथ ही, नौ राज्यों के 76 नक्सल प्रभावित जिलों को प्रति ज़िला दो करोड़ रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से पुलिसिया ढांचे को मज़बूत करने के लिए मिलनी शुरू हुई। नक्सल प्रभावित राज्यों में, प्रत्यक्ष तौर पर, युवाओं को रोज़गार प्रदान करने के लिए इंडिया रिज़र्व बटालियनों के गठन का फ़ैसला लिया गया। लेकिन, असलियत यह थी यह राज्यों में पीड़ित जनता के असहमति के स्वर को दबाने के लिए पीड़ित लोगों में ही कुछ को सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करना के जुगाड़ था। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम, झारखंड में नागरिक सुरक्षा समिति, तथा बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में संत्रास प्रतिरोध समिति, घोस्कर वाहिनी और हरमद बलो जैसे ग्राम सुरक्षा या नागरिक सुरक्षा समितियों के लिए केंद्र सरकार की ओर से एकमुश्त अनुदान और विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) के लिए मानदेय का प्रबंध किया गया। फलस्वरूप आमलोगों पर अत्याचार बढ़ा। “फूट डालो, शासन करो” की नीति अपनाते हुए सरकार ने किसानों-आदिवादियों को अपनी ज़मीन और रोज़गार से विस्थापित करने के लिए उनमें से ही कुछ लोगों का इस्तेमाल किया। लोगों के मन में आतंक पैदा करने के लिए जनसंहार, आतंक, बलात्कार तथा घरों को जलाने की कई वारदातें हुईं।
किसानों के लिए ज़मीन और आदिवासियों के लिए जंगल उनके जीवन और आजीविका का आधार है। सरकार सेज़ों, बांधों और औद्योगीकरण के जरिये जिस विकास का सपना देखती है, उसमें किसानों को ज़मीन से और आदिवासियों को जंगल से महरूम होना पड़ता है। किसी की चाहे कोई भी विचारधारा हो, लेकिन जब उससे जीवन का आधार छीना जाएगा, तो वह इसका आख़िरी दम तक विरोध करेगा। इन विरोधों पर काबू करने के लिए सरकार ने नक्सलवाद का एक ऐसे हथियार के रूप में चिह्नित किया, जिसके नाम पर सारी असहमतियों को निर्ममता से दबाया जा सके। वक्त आने पर हुआ भी ऐसा ही। सिंगूर, नंदीग्राम, कलिंगनगर और लालगढ़ जैसे कई जगह पर देश में सेज़ के विरोध में लोकतांत्रिक व शांतिपूर्ण तरीकों से संघर्षरत आम भुक्त-भोगी जनता को नक्सली या नक्सल समर्थित बताकर निशाना बनाया गया। संभव है कि बाद में मजबूरन, उनमें से कई लोगों ने आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाया हो, लेकिन इसके लिए सरकार ने ही उन्हें उकसाया। हिंसा जायज़ नहीं है, लेकिन क्या उसे सहना भी वाज़िब है? परंतु भारत सरकार ने पूर्णतः अहिंसक असहमतियों पर नक्सलवाद के नाम पर निशाना साधने से भी कोई गुरेज़ नहीं किया है। छत्तीसगढ़ में कार्यरत गांधीवादी एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम को ही बतौर उदाहरण लें, जो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सलवा जुडुम के बाद हुए विस्थापित आदिवासियों के पुनर्वास की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए काम करती है। सरकार ने इनके द्वारा लिंगागिरी, बासगुडा और नेंद्रा में आदिवासियों के लिए भेजे जाने वाले चावल को यह आरोप लगाते हुए अपने कब्ज़े में ले लिया कि यह चावल नक्सलियों के लिए भेजे जा रहे थे। इस संगठन के एक कार्यकर्ता सुखदेव पर विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गयी। याद ही होगा कि इसी सरकार ने आदिवासियों के स्वास्थ्य और मानवाधिकार के लिए समर्पित चिकित्सक डॉ विनायक सेन पर भी नक्सली डाकिया का आरोप मढ़ कर लगभग दो सालों तक उन्हें सलाखों के पीछे रखा था।
आदिवासी देश की ज़्यादातर खनिज संपदा के रखवाले रहे हैं। सरकार के नज़रों में आज इसकी ज़रूरत वैश्विक पूंजी को फलने-फूलने के लिए है। ऐसी स्थिति में सरकारों की नज़रें आदिवसियों की पारंपरिक संपत्तियों पर गड़ी हुई हैं। सरकारें औद्योगीकरण के लिए निगमों के साथ गुप्त समझौते कर रही है। आदिवासियों से बेशकीमती ज़मीन छीन कर निगमों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है। जल, जंगल और ज़मीन की अंधाधुंध लूट जारी है। देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सस्ते या मुफ्त में ही बिजली, पानी, खनिज और सुरक्षा मुहैय्या कराने में सरकारें प्रतिबद्ध हैं। विकास के प्रति सरकार की यह सनक भारतीय लोकतंत्र के धराशाही होने की ओर इशारा करता है। विरोध और असहमतियों की सभी आवाज़ों को दबाने के लिए नये-नये हथकंडे तैयार किये जा रहे हैं।
(देवाशीष प्रसून। प्रखर, ज़मीन से जुड़े बुद्धिजीवी। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के शोध छात्र। सरोकार नाम से उनका चर्चित ब्लॉग है। उनसे prasoonjee@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










सरकार निरंकुश हो गयी है। पूंजीपतियों के हित में नागरिकों के अधिकारों को कुचल रही है।
भूल सुधार: गांधीवादी एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम के जिस कार्यकर्त्ता पर छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई हुई उनका नाम सुखदेव नहीं, बल्कि सुखनाथ है।
मित्र ये लोकतंत्र की ताकत है कि खून बहाने वालों के समर्थन में भी लेख लिखे जाते हैं। घरने- प्रदर्शन किए जाते हैं। पुलिस के तमाम आला अफसर जेलों में आराम फरमा रहे हैं। इसी लोकतंत्र को बचाने में ताकत लगाइए। नक्सलवाद अगर कोई विचार था भी तो वह आज तो आतंकवाद ही है। इससे आम जनता को, इस देश को कोई लाभ नहीं है। खून खराबा करने और जनतंत्र को तोड़ने में लगी किसी भी ताकत का सर्मथन नहीं किया जा सकता। प्रभु सबको सदबुद्धि दे।
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