मीडिया बिक गया, संपादक दो कौड़ी के हो गये!

एक आदमी है, जो पिछले कई महीनों से सच बोल रहा है – जब, जहां मौक़ा मिल रहा है। वह बोल रहा है कि मीडिया बिक चुका है और अब उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है। वह बोल रहा है कि मीडिया की चिंता में देश और समाज नहीं, सिर्फ बिजनेस और बिजनेस है – लेकिन कोई उसे सुन नहीं रहा। उस आदमी का नाम है जस्टिस जी एन रे। प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस जी एन रे। सोमवार को चेन्नई में एक बार फिर उन्होंने कहा कि मीडिया आज एक वस्तु (कमॉडिटी) से अधिक कुछ नहीं है। चौथे खंभे की अपनी ज़िम्मेदारी वह पूरी तरह भूल चुका है और अपनी उस भूमिका से वह बहुत दूर जा चुका है।
मौक़ा प्रेस दिवस का था और सेमिनार का विषय था, भारतीय मीडिया का बदलता चेहरा। रे ने कहा कि मीडिया आज बाज़ार का मोहरा है और सनसनी उसका हथियार है। अख़बारों का फोकस आज कंटेंट के लिहाज़ से बेहतर बनने पर नहीं, न ही सामाजिक-आर्थिक फ़ासले को पाटने में उसकी कोई भूमिका रह गयी है।
रे ने कहा कि समाज के वंचित और दबे-कुचले लोग आज मीडिया के लिए कोई मायने नहीं रखते। मीडिया पूरी तरह से कॉरपोरेटाइजेशन की चपेट में है। उनके मुताबिक न्यायाधीन मामलों का मीडिया ट्रायल और अदालती कार्यवाहियों की ग़लत रिपोर्टिंग परेशानी का सबब बन गयी है। पैसे लेकर ख़बर छापने की जैसे परंपरा बन गयी है। मीडिया में मुनाफे के लिए सूचनाओं की भ्रामक प्रस्तुति का सहारा लिया जा रहा है। संपादक दो कौड़ी की चीज़ रह गया है… ऐसी कितनी-कितनी बातें न्यायमूर्ति जी एन रे ने कहीं।
उन्होंने यह भी कहा कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्नीकल एडुकेशन की तर्ज पर मीडिया के लिए भी कोई निगरानी रखने वाली संस्था का गठन हो, जिसके पास किसी भी मीडिया संस्थान की मान्यता रद्द करने का अधिकार हो।
जस्टिस जी एन रे की ये वो बातें हैं, जो वे बार-बार बोल रहे हैं। कई मंचों से उन्होंने लगभग यही बात की है। कोई फर्क नहीं पड़ा। इसके बावजूद वे अपनी बात कह रहे हैं। सरकार अगर निकम्मी है, तो उसे बार-बार निकम्मी कहना होगा। मीडिया ग़लत है, तो उसे बार-बार ग़लत कहना होगा। मामला दोहराव का नहीं है, बल्कि सच को बार-बार और हास्यास्पद हो जाने की हद तक कहने का साहस होना चाहिए। अगर जस्टिस जीएन रे ऐसा कर रहे हैं, तो हमें भी उनकी वही बातें-बातें बार-बार छापने से गुरेज़ नहीं करनी चाहिए। आप क्या कहते हैं?









justice ray ke kahane se kya hota hai? aankh ka paani mar gaya hai. koi kuchh kahe kahta rahe. paisa leker khabaren chhapne ko lekar prabhash ji khoob cheekhe chillaye. kya ho gaya? media netaon ko gali de sakta hai lekin uska apna kukarm use kahaan dikhta hai?
dear sir
main aap ko salute lagata hu.
Bande me hai dum.
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