क्या सीएनबीसी के पत्रकार शिवसेना के समर्थक थे?
♦ सुशांत झा
सीएनबीसी ने सैकड़ों पत्रकारों की ज़िंदगी को एक झटके में रोड पर ला दिया। जो लोग देश और दुनिया की ख़बरों से आमलोगों को कभी रूबरू करा रहे थे वो आज खुद ही ख़बर बन गये। वैसे ये उतनी बड़ी ख़बर नहीं बन पायी, जितनी बड़ी ख़बर इसी मीडिया समूह के चैनल आईबीएन-लोकमत पर हुए शिवसेना के आतंकवादयों के हमलों ने बनायी। बनती भी कैसे… आख़िर पहला हमला एक कॉरपोरेट पर हमला था, जिसे बड़ी खूबसूरती से लोकतंत्र के चौथे खंभे पर हमला करार दिया गया जबकि दूसरा हमला निरीह किस्म के मिमियाते, रिरियाते, ईएमआई भरते, अपनी शादी का सपना देखते और अपने बच्चों के स्कूल के फीस चिंता में डूबे हुए ज़्यादातर नौजवानों पर था जिनका इस सिस्टम में कोई माई-बाप नहीं। उनका कोई यूनियन नहीं क्योंकि जो पत्रकार कोई यूनियन बनाएगा सबसे पहले उसे ही नौकरी से निकाल दिया जाएगा। उनके लिए किसी अंबिका सोनी का बयान नहीं आता क्योंकि वे सिर्फ विचार बनाने (?) के धंधे में लगे हुए लोग थे। वे एक बड़े मतदाता समूह नहीं हैं, न ही वे नक्सलियों की तरह बंदूक ही उठा सकते हैं।
इस बात का ज़िक्र करना बेमानी हो गया है कि क्यों मीडिया समूह किसी जेट-एयरवेज या होंडा समूह से छंटनी को हे़डलाइन बना देता है और अपने घर में चल रही कॉरपोरेट हिंसा को टिकर तक पर नहीं चलाता। आख़िर ये कहां का उसूल है कि जब विज्ञापन का बाज़ार उफान मार रहा होता है, तो मीडिया समूह धड़ल्ले से भर्ती कर लेते हैं और कॉरपोरेट प्लानिंग के नाम पर मनचाहे ढंग से और मनचाहे वक्त पर हंसती-खेलती ज़िंदगानियों को सड़क पर ला पटक देते हैं? और अभी तो बाज़ार लौट रहा था – मीडिया कंपनियों के नतीजे बताते हैं कि विज्ञापन से मोटी कमाई का दौर वापस आ रहा है। ऐसे में ये कॉरपोरेट क़त्लेआम जानबूझकर की गयी एक साज़िश लगती है जो मुनाफे को और मोटा बनाना चाहती है। बारीक स्तर पर देखें तो ये सरकार-सत्ता और सिस्टम के उसी रणनीति के तहत दिखता है जब सरकार प्लानिंग और अर्बन डेवलपमेंट के नाम पर मज़दूरों को झुग्गी से निकाल बाहर करती है। वाकई कॉरपोरेट प्लानिंग और गवर्नमेंट प्लानिंग कितने सगे दिखते हैं।
अब दूसरे चैनलों के भाईलोगों को ये डर सताये जा रहा है कि तथाकथित नामचीन चैनल अपने कर्मचारियों की वेतन बढ़ोत्तरी को बहुत आराम से सालभर के लिए टाल देंगे क्योंकि प्रशिक्षित कर्मचारियों की एक बड़ी आवक से मीडिया हाउस मैनपावर की कमी से बिल्कुल चिंतामुक्त हो गये हैं।
आज सीएनबीसी से निकाले गये इन पत्रकारों की हालत बिल्कुल उन किसान आंदोलनकारियों जैसी हो गयी है, जिनका मीडिया के एक बड़े हिस्से ने फालतू मानकर कवरेज किया था। वे बीड़ी पीते, पगड़ी बांधे और पजामा पहने लोग अपनी हुल्लड़बाज़ी और जंतरमंतर पर मूतने की वजह से कवरेज पा गये थे लेकिन इन पत्रकारों को कवर करनेवाला कोई नहीं।
एनडीटीवी में पिछले साल हुई छंटनी के बाद बड़े चैनलों में सीएनबीसी दूसरा बड़ा हाउस है, जो बोल्ड हुआ है – ये डर बहुतों को सता रहा है कि क्या ये हालात दूसरे चैनलों में भी हो सकता है? वित्तीय बाज़ीगरी, कमज़ोर नींव और महिमामंडन की बदौलत बहुत सारे दूसरे चैनल भी ऐसे हो सकते हैं, जो अपने ही ग्रुप के दूसरे बड़े चैनलों के विज्ञापन पर चल रहे हों। ऐसे में इस ख़तरे से इनकार नहीं किया जा सकता। दिन के अभी और काले होने की आशंका बरकरार ही है।
लेकिन ये बहस यहीं नहीं रुकती। ये बहस उन घटनाओं का एक छोटा हिस्सा भर है जो संगठित-असंगठित क्षेत्र के हजारों-लाखों लोगों की रोटियां लील रही हैं। लेकिन हम इतने परेशान क्यों है? जो मीडिया राहुल गांधी की जॉगिंग और शिल्पा शेट्टी की मेंहदी में अपना भविष्य संवार रहा हो, उसके कर्मचारियों पर अगर गाज गिरती है तो हमें ‘मुद्दों’ की याद क्यों आनी चाहिए? चलिए हम दिल को खुश करें कि हम संक्रमणकाल में हैं और जगतसेठों ने हमें विदूषक बना दिया है। चलिए हम युवाओं की उस भीड़ का फिर से हिस्सा बन जाएं जिसकी तारीफ़ नारायणमूर्ति से लेकर राहुल गांधी तक करते हैं!
(सुशांत झा। मिथिला में जन्म। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई। मोहल्ला लाइव के नियमित कंट्रीब्यूटर। जुझारू युवा पत्रकार। आंदोलनी विरासत। ई मेल jhasushant@gmail.com)











स्थिति के विद्रूप को बेहद बारीकी से उभारा है सुशांत आपने।
बहुत अच्छा लिखा है।
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