IBN7 पर हमला लोकतंत्र पर हमला नहीं है!
♦ विनीत कुमार

IBN7 और IBN7 लोकमत के मुंबई और पुणे दफ्तर में शिवसेना के गुर्गे ने जो कुछ भी किया, वेब लेखन के जरिये हम उसका विरोध करते हैं। दफ्तर के अंदर घुसकर शिव सैनिकों ने महिला मीडियाकर्मियों के साथ जो दुर्व्यवहार किया, हम उसके ख़िलाफ़ न्याय की मांग करते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर गुंडई और जाहिलपने को लेकर आये दिन किये जानेवाले प्रयोग और पेश किये जानेवाले नमूनों का हम पुरज़ोर विरोध करते हैं। पिछले 15 दिनों के भीतर और उससे भी पहले शिवसेना और उसी की कोख से पैदा हुआ मनसे ने लोकतंत्र के दो स्तंभों – विधायिका और मीडिया को कुचलने और ध्वस्त करने की जो कोशिशें की है, हम उसका विरोध करते हैं। संजय राउत जैसे देश के उन तमाम संपादकों और पत्रकारों को धिक्कारते हैं, जिनकी औकात रहनुमाओं के पक्ष तक जाकर ख़त्म हो जाती है। दिमाग़़ी तौर पर सड़ चुके लोगों के लेखन को फर्जी करार देते हैं जिनके भीतर तर्क करने की ताक़त नहीं रह गयी है। हम चाहते हैं कि ऐसे लोगों को पत्रकारिता बिरादरी से तत्काल बेदखल किया जाए। हमारे इस विरोध के बावजूद अगर मुंबई सरकार इस दिशा में सक्रिय होकर कार्यवाही नहीं करती है तो हम अपनी आवाज़ और तेज़ करेंगे। हम मीडिया की आवाज़ को किसी भी स्तर पर दबने नहीं देंगे। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी के हाथों का खिलौना बनने नहीं देंगे। हम देश की मीडिया को किसी भी रूप में तहस-नहस नहीं होने देंगे।
अपनी बात कहने और सच बयान करने की इच्छा रखनेवाले देश के बाकी पत्रकारों और मानव अधिकारों के पक्ष में बात करनेवालों की तरह मैं भी शिवसेना की बर्बरता का विरोध करता हूं। हम सबों को अपने-अपने स्तर से इस तरह की गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। लेकिन ये सब लिखते-कहते हुए मैं उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और मेटाफर पर थोड़ा इत्मीनान होकर सोचना चाहता हूं, जिसे कि मीडिया के लोग इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में मैं समर्थन के स्तर पर जज़्बाती होते हुए भी अभिव्यक्ति के स्तर पर तटस्थ होना चाहता हूं। मुझे लगता है कि ऐसा करना शिवसेना जैसी बवाल मचाने वाली पार्टी के समर्थन में जाने के बजाए मीडिया और खुद को देखने-समझने की कोशिश होगी। इसलिए तोड़फोड़ की घटना का लगातार दो दिनों तक विरोध किये जाने के बाद अब इस स्तर पर विचार करें कि हम किस लोकतंत्र पर हमले की बात कर रहे हैं? लोकतंत्र के पर्याय के तौर पर बतायी जानेवाली मीडिया के किस हिस्से पर हमला किये जाने का विरोध कर रहे हैं? मीडिया अपने ऊपर हुए हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बता रहा है, इसे किस रूप में समझा जाए? कुल मिलाकर हम पहले तो लोकतंत्र को रिडिफाइन करना चाहते हैं और उसके बाद उसके खांचे में काम कर रही मीडिया को समझना चाहते हैं?
एजेंडा (IBN7 का कार्यक्रम) में एंकर संदीप चौधरी ने कहा कि आगे जब हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो इसे काला शुक्रवार के तौर पर समझा जाएगा। इसके पहले भी जो फ्लैश चलाये गये, उसमें बार-बार इस हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया गया। संदीप चौधरी ने काला शुक्रवार शब्द रूस की बोल्शेविक क्रांति से उधार के तौर पर लिया। बाकी के न्यूज़ प्रोड्यूसरों और रिपोर्टरों ने भी लोकतंत्र पर हमला या चौथे स्तंभ पर हमला जैसे शब्दों का प्रयोग कहीं न कहीं ऐतिहासिक संदर्भों से उठा कर किये। यहां दिक्कत इस बात की बिल्कुल भी नहीं है कि इतिहास से इस तरह के शब्द नहीं लिए जाने चाहिए। इतिहास के शब्दों और अभिव्यक्तियों को अगर मीडिया के लोग खींचकर वर्तमान तक लाते हैं तो हमें उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन असल सवाल है कि क्या जिस लोकतंत्र पर हमले और उसे बचाने की बात की जा रही है, वो महज कुछ वैल्यू लोडेड शब्दों के प्रयोग कर दिए जानेभर से जिंदा रहेगा? क्या हम लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी इन सबों को सिर्फ शब्दों के तौर पर जिंदा रखना चाहते हैं? हम इसे बोलने के लिहाज से चटकीला भर बनाना चाहते हैं? क्या हम लोकतंत्र, सरोकार, मानवीयता और इस तरह के वैल्यू लोडेड शब्दों को पुतलों की शक्ल में बदलना चाहते हैं? ऐसे पुतले जिसे कि दागदार, धब्बे लगे, बदबूदार समाज और फ्रैक्चरड डेमोक्रेसी के बीच लाकर रख दिया जाए, तो सब कुछ अचानक से चमकीला हो जाए। चित्ते-चित्ते रंगों के बीच एकदम से चटकीले रंगों का प्रभाव पैदा हो जाए। क्या इन शब्दों का प्रयोग अपनी ज़ुबान को सिर्फ चटकीला बनाने भर के लिए है?
टेलीविजन मीडिया से ये सवाल पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि लोकतंत्र कोई वैक्यूम में पैदा हुई चीज नहीं है। इसके भीतर हाड़-मांस, दिल-दिमाग़, जज़्बात और सोच लिये लोग मौजूद होते हैं। इसलिए जैसे ही आप लोकतंत्र शब्द का प्रयोग करते हैं, आपको लोकतंत्र को लोकेट तो करना ही होगा। पहले तो आपको और फिर हमें समझाना होगा कि आप लोकतंत्र से क्या समझ रहे हैं? आप जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, उसके भीतर कौन से लोग शामिल हैं? आप किसके वीहॉफ पर अपने को लोकतंत्र का पर्याय बता रहे हैं? क्या आप खुद से पैदा किये जानेवाले लोकतंत्र को संबोधित कर रहे हैं या फिर अभी भी देश के भीतर बहाल लोकतंत्र को लेकर बात कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि मीडिया पर किये जानेवाले हर हमले को लंबे समय तक लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया जाना आगे जाकर आसान होगा। तत्काल जज़्बाती होकर हम मीडिया के पक्ष में होते हुए भी इत्मीनान होने पर सवाल तो ज़रूर करेंगे कि हम किस मीडिया के पक्ष में खड़े हैं? उसके सालभर का चरित्र क्या है? हम न तो लोकतंत्र को मुहावरे की शक्ल देना चाहते हैं और न ही मीडिया को मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करने देना चाहते हैं? इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसे में हम मीडिया हमलों के बीच लोकतंत्र के संदर्भों को समझने की कोशिश करें।
एक बात पर आप लगातार ग़ौर कर रहे होंगे कि पहले के मुकाबले निजी चैनलों पर राजनीतिक पार्टियों, धार्मिक संगठनों और संस्थाओं की ओर से हमले तेज़ हुए हैं। नलिन मेहता ने अपनी किताब INDIA ON TELEVISION और पुष्पराज ने अपनी किताब नंदीग्राम डायरी में सकी विस्तार से चर्चा की है। हाल ही में हमने देखा कि गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने आजतक को लंबे समय तक केबल पर आने से रोक लगा दी। आसाराम बापू के चेले-चपाटियों ने आजतक की संवाददाता पर हमले किये और घायल कर दिया। इसके पीछे की लंबी रणनीति हो सकती है। लेकिन एक समझ ये भी बनती है कि जिस तरह मीडिया और चैनलों के कार्पोरेट की शक्ल में तब्दील होने की प्रक्रिया तेज़ हुई है, राजनीतिक पार्टियों के प्रति उसकी निर्भरता पहले से कम हुई है। साधनों के स्तर पर तो कम से कम ज़रूर ही ऐसा हुआ है। दूसरी तरह कार्पोरेट और विश्व पूंजी की ताकत से इन चैनलों का मनोबल भी बढ़ा है। इसके आगे राजनीतिक पार्टियों की क्षमता का आकलन इनके लिए आसान हो गया है। इसलिए अब ये स्थिति बन जाती है कि कोई भी चैनल किसी राजनीतिक पार्टी, धार्मिक संगठन या संस्थानों पर बहुत ही साहसिक तरीके से स्टोरी कवर करता है, प्रसारित करता है। ऐसे में ये बिल्कुल नहीं होता कि राजनीति स्तर की निर्भरता उसकी एकदम से ख़त्म हो जाती है, लेकिन इतना ज़रूर होता है कि मैनेज कर पाना और संतुलन बना पाना पहले के मुकाबले आसान हो गया है। यहां राजनीति और मीडिया की ताक़त की आज़माइश होने के बजाय राजनीति और कार्पोरेट की आज़माइश होनी शुरु होती है। कार्पोरेट का पलड़ा मज़बूत होने की स्थिति में चैनल और मीडिया बहुत आगे तक राजनीतिक पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हैं, धार्मिक संगठनों पर बरस पाते हैं। हमें ये सबकुछ लोकतंत्र का पक्षधर होने के स्तर पर दिखाया-बताया जाता है। एक हद तक सही भी है कि कम से कम राजनीतिक मामलों में दूरदर्शनी दिनों के मुकाबले निजी चैनल ज़्यादा मुखर हुए हैं। चैनल की इस बुलंदी का स्वागत किया जाना चाहिए।
लेकिन दूसरी स्थिति पहली स्थिति से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं। अगर बारीकी से समझा जाए तो ये लोकतंत्र के नहीं बचे रहने से जितना नुक़सान नहीं है उससे कहीं ज़्यादा नुकसान टेलीविज़न की ओर से पैदा किये जानेवाले और तेज़ी से पनपनेवाले लोकतंत्र से है। टेलीविज़न का लोकतंत्र, जनता के लोकतंत्र को लील जाने की फिराक में है। इसके हाल के कुछ नमूनों पर गौर करें तो हमें अंदाजा लग जाएगा। तालिबान और आतंकवाद पर स्पेशल स्टोरी दिखाते हुए एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार ने कहा कि तालिबान में देश का कोई भी रिपोर्टर नहीं है लेकिन वहां की ख़बरें रोज़ दिखायी जा रही है। ये खबरें यूट्यूब की खानों से फुटेज निकालकर बनायी जा रही है। हंस के वार्षिक समारोह में अरुंधति राय ने कहा कि सलवाजुडूम इलाके में देश के किसी भी पत्रकार को जाने की इजाज़त नहीं है। पाखी के वार्षिकोत्सव में पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि विदर्भ को आइडियल शहर घोषित किया गया लेकिन वहां चालीस हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की। आज मीडिया में गांव नहीं है, मीडिया से जुड़े लोग गांव की स्थितियों को संवेदना के स्तर पर नहीं ला पा रहे हैं। 2 नवंबर को जब शर्मिला इरोम को बर्बर प्रशासन के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे दस साल पूरे हो गये, देशभर के अनुभवी मीडियाकर्मी शाहरुख खान के बर्थ केक काटने के फुटेज लेने के लिए बेकरार होते रहे। एक ही साथ नक्सलवाद और सरकारी कार्रवाइयों के ख़ौफ़ में झारखंड के आदिवासी आशंका के दिन खेप रहे होते हैं, देशभर के चैनल पी चिदंबरम की बाइट को उलट-पुलट कर सुलझाने में जुटे रहे। देश के एक चैनल पर ताला लग जाने से करीब चार सौ मीडियाकर्मी रातोंरात सड़कों पर आ जाते हैं, वो कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनने पाता। तो क्या ये मीडिया तय करेगा कि लोकतंत्र के भीतर का कौन सा हिस्सा टेलीविजन पर आकर लोकतंत्र की शक्ल लेगा और कौन सा नहीं? अगर सचमुच ऐसा है तो हमें मीडिया के लोकतंत्र पर नये सिरे से विचार करना होगा।
आप अगर चैनल की इन ख़बरों के बीच सरोकार से जुड़ी ख़बरों और हिस्सेदारी की मांग करेंगे तो टीआरपी का शैतान सामने आ जाएगा। इनमें से सारी घटनाएं टीआरपी पैदा करने के लिहाज से बांझ है। इसलिए टीआरपी तो उन्हीं ख़बरों से पैदा होती है, जिनमें कि मेट्रो और मध्यवर्ग की ऑडिएंस दिलचस्पी ले। संकेत साफ है। मंजर साफ है। फीदेल कास्त्रो के पद को उधार लेकर कहा जाए तो ये सांस्कृतिक संप्रभुता का संकट है। टेलीविज़न देश की संप्रभुता को बचाये रखने के दावे से लैस है। लेकिन उसके भीतर के ठोस के जार-जार हो जाने की चिंता बिल्कुल भी नहीं है।
देश की सत्तर फीसदी आबादी को जब पीने को पानी नहीं है, बच्चों के हाथों में स्लेट नहीं है, स्त्रियों की आंखों में सपने नहीं है – टेलीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न के दम पर जो आइस संस्कृति (information, entertainment, consumerism) एक ठंडी संस्कृति के बतौर पनप रही है, क्या उसी लोकतंत्र पर हमला हो रहा है और उसी को बचाये जाने की बात की जा रही है? हम वर्गहीन समाज जैसे मार्क्सवादी यूटोपिया से बाहर निकलकर भी सोचें तो क्या ज़रूरी है कि इस आइस संस्कृति के बूते देशभर के लोगों को खींच-खींचकर मध्यवर्गीय मानसिकता के खांचे में लाया जाए। ये मानसिकता चार रुपये लगा कर अपनी पसंद और नापसंद जाहिर करे। क्या हमें इस लोकतंत्र पर हमला किये जाने से अफ़सोस होगा? दुर्भाग्य से इस लोकतंत्र पर हमला कभी नहीं होना है लेकिन बदकिस्मती है कि जिस लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं उसे शायद ही कभी बचाया जा सकेगा। इसलिए लोकतंत्र के रैपर में मीडिया जिसे बचाना चाहती है, पहले उसे साफ कर दे, तो पक्षधरता कायम करने में आमलोगों को सहूलियतें होगी। क्योंकि जज़्बाती होने की वैलिडिटी जल्द ही ख़त्म होने जा रही है।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ताना बाना और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









किसी भी तरह की हिंसा, हमला, अत्याचार, व्यभिचार, दुर्व्यवहार, हुड़दंग के पक्ष में न कोई सभ्य समाज होगा और उस समाज के एक हिस्सा के नाते मैं भी नहीं हूं. और उस सिलसिले में आइबाएन लोकमत के दफ्तर में घुसकर ऐसे ही टीवी चैनलों द्वारा समय-समय पर दी जाने वाली ‘मुगली घुट्टी’ से शक्ति पाकर ठाकरे के गुंडों द्वारा किए गए हमले की भी मैं निंदा करता हूं. ऐसे तमाम हमलों की निंदा करता हूं जिससे देश और समाज पर कुप्रभाव पड़ता है, जिससे नफ़रत और निराश पैदा होती है.
विनीत ने जो प्रश्न उठाए हैं उसकी गंभीरता यदि खबरिया चैनलवाले समझ जाते हैं तो उन्हें अपने आचरण को दुरुस्त करने में सुविधा होगी. मैं ये कहने के स्थिति में नहीं हूं कि चैनलों का आचार-व्यवहार कैसा होना चाहिए; हां, ये तो ज़रूर कह सकता हूं कि जिस तरह वे पेश आते हैं उससे अकसर खिन्नता होती है. जिस तरह से पिछले 50-60 घंटों में डेमोक्रेसी पर ख़तरे या डेमोक्रेसी की हत्या की कोशिश या लोकतंत्र का गला घोंटने जैसी बात की जा रही है, मैं उससे निश्चिंत नहीं हो पा रहा हूं, माने मैं उससे सहमत नहीं हो पा रहा हूं. कुछ अन्य सेक्टरों और कुछ अन्य किस्म के धंधेबाज़ों की ओर से भी ‘डेमोक्रेसी पर खतरे’ की चिंता जताना एक फैशन-सा बन गया है.
डेमोक्रेसी घिउरा का बतिया नहीं है कि लठैतों और लंपटों की गीदड़भभकी से डरकर सूख जाएगी. पत्रकारों की जैसी नस्ल और पत्रकारी की जो किस्म ये चैनलवाले तैयार कर रहे हैं, मेरी आशंका है कि इन्हें हर कुछ समय पर ऐसे न तो वैसे डेमोक्रेसी पर खतरे की शंका व्यक्त करनी पड़ सकती है. फिलहाल मेरी ये राय बन रही है कि पत्रकारिता बाइट की भीख और छिनाझपटी से बहुत बड़ा कुछ और कर्म है. प्रभाष जोषी इसलिए भी याद आते रहेंगे.
गुण्डों ने किया दलालों पर हमला। मेरा हिसाब से यही हेडिंग ठीक रहती।
लीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न……………nice
मीडिया पर हमला यानी लोकतंत्र पर हमला!
मीडिया अपने आप को समझता क्या है? अपने बारे में ऐसा भ्रम तो अज्ञान से उपजे अहंकार का ही बाई-प्रोडक्ट हो सकता है।
मीडिया तमाम नीति अनीति भूलकर पैसा कमाने में जुटा रहे, आप स्वर्ग की सीढ़ी बनाएं, रावण का गांव ढूंढे, और न जाने क्या क्या दिखाएं, बताएं, सृष्टि के अंत की घोषणाएं करें, आंदोलनों की अनदेखी ऐसे कर दें, जैसे वो हुए ही नहीं, गांव को भुला दें, आम जनता की ऐसी की तैसी करते रहें, किसानों को विलेन बताएं और जब कोई आप पर हमला कर दें तो विलाप करने लगें, कि हाय हम तो लोकतंत्र हैं, हमें बचाओ, लोकतंत्र को बचाओ।
वाह साहब वाह।
सुन्दर बात। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। बधाई सलीके से अपनी बात कहने के लिये।
रंगनाथ जी, आप कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो जाते हैं… संयम रखें अंगुलियों पर
शाबाश विनीत . साफगोई और सच्चाई आपकी बेमिसाल है .
नमस्कार सर! आप की कुछ बातों से मैं खुद को भी सहमत पाता हूं। मसलन मीडिया खुद को लोकतंत्र के रूप में कैसे और क्यों पेश कर रही है? क्या आज की मीडिया लोकतांत्रिक है या उसे लोकतांत्रिक होने का एक और बहाना मिल गया है? लेकिन साथ ही दफतर तोडू मर्दों (शिव सैनिकों को औए कुछ आता भी तो नै है) के कारनामें की मैं कडी आलोचना भी करता हूं। वह इसलिए भी क्योंकि ये महाराष्ट्र को विकसित करना-देखना नहीं बल्कि लोगों को उससे डरते देखना चहते हैं………।
बढ़िया आलेक। विनीत को बधाई। हम जैसे बहुतों के मन की बात कही है गई यहां। लोकतंत्र पर हमला एक मरा हुआ, पिटा हुआ मुहावरा है। शब्द-शक्ति खो चुके मुहावरे कभी चेतना नहीं जगाते। इस मुहावरे का जैसा बेशर्म प्रयोग मीडिया करता है उस पर सोचना चाहिए? मीडियाकर्म को लोकतंत्र जैसे शब्द के आईने में देखें तब लोक तो ग़ायब नज़र आता है, या तो भद्रलोक के लिए वहां स्पेस है या मनोरंजन के भदेस-लोक में खुद मीडिया अश्लील कलाबाजियां खाता दिखता है।
बडे़-बड़े नामी पत्रकार खुद को लोकतंत्र का पहरेदार समझते हुए क्या जानते हैं कि इसके क्या मायने हैं? जिस ढांचे की हिफ़ाज़त या उसे टूटने से बचाने के लिए वे अपना कंधा लगाए हुए हैं या तो वह अर्थी है या फिर वे खुद बुत। इस ढांचे में सिर्फ बॉलीवुड बसता है। मनोरंजन की अधनंगी दुनिया की प्रेतात्माएं मंडराती हैं। लोकतंत्र के मायने क्या सिर्फ कलुषित राजनीति है? कामुक, भ्रष्ट, निर्लज्ज और खुद को स्वयंभू समझनेवाले नेताओ के कब कुकर्म उजागर होते हैं और कब विभाग को मालामाल कर देने जैसी नकली खबरों को चमकाया जाता है, यह सब समझ से परे है।
चट मंगनी, पट ब्याह की तर्ज पर भर्ती हो गए मीडियाकर्मियों के मुंह से मीडिया का महिमागान इसीलिए असर नहीं छोड़ता।
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