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	<title>Comments on: IBN7 पर हमला लोकतंत्र पर हमला नहीं है!</title>
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		<title>By: अजित वडनेरकर</title>
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		<dc:creator>अजित वडनेरकर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 21:51:25 +0000</pubDate>
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		<description>बढ़िया आलेक। विनीत को बधाई। हम जैसे बहुतों के मन की बात कही है गई यहां। लोकतंत्र पर हमला एक मरा हुआ, पिटा हुआ मुहावरा है। शब्द-शक्ति खो चुके मुहावरे कभी चेतना नहीं जगाते। इस मुहावरे का जैसा बेशर्म प्रयोग मीडिया करता है उस पर सोचना चाहिए? मीडियाकर्म को लोकतंत्र जैसे शब्द के आईने में देखें तब &lt;b&gt;लोक&lt;/b&gt; तो ग़ायब नज़र आता है, या तो &lt;b&gt; भद्रलोक&lt;/b&gt; के लिए वहां स्पेस है या मनोरंजन के &lt;b&gt;भदेस-लोक&lt;/b&gt;   में खुद मीडिया अश्लील कलाबाजियां खाता दिखता है। 
बडे़-बड़े नामी पत्रकार खुद को लोकतंत्र का पहरेदार समझते हुए क्या जानते हैं कि इसके क्या मायने हैं? जिस ढांचे की हिफ़ाज़त या उसे टूटने से बचाने के लिए वे अपना कंधा लगाए हुए हैं या तो वह अर्थी है या फिर वे खुद बुत। इस ढांचे में सिर्फ बॉलीवुड बसता है। मनोरंजन की अधनंगी दुनिया की प्रेतात्माएं मंडराती हैं। लोकतंत्र के मायने क्या सिर्फ कलुषित राजनीति है? कामुक, भ्रष्ट, निर्लज्ज और खुद को स्वयंभू समझनेवाले नेताओ के कब कुकर्म उजागर होते हैं और कब विभाग को मालामाल कर देने जैसी नकली खबरों को चमकाया जाता है, यह सब समझ से परे है। 

चट मंगनी, पट ब्याह की तर्ज पर भर्ती हो गए मीडियाकर्मियों के मुंह से मीडिया का महिमागान इसीलिए असर नहीं छोड़ता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया आलेक। विनीत को बधाई। हम जैसे बहुतों के मन की बात कही है गई यहां। लोकतंत्र पर हमला एक मरा हुआ, पिटा हुआ मुहावरा है। शब्द-शक्ति खो चुके मुहावरे कभी चेतना नहीं जगाते। इस मुहावरे का जैसा बेशर्म प्रयोग मीडिया करता है उस पर सोचना चाहिए? मीडियाकर्म को लोकतंत्र जैसे शब्द के आईने में देखें तब <b>लोक</b> तो ग़ायब नज़र आता है, या तो <b> भद्रलोक</b> के लिए वहां स्पेस है या मनोरंजन के <b>भदेस-लोक</b>   में खुद मीडिया अश्लील कलाबाजियां खाता दिखता है।<br />
बडे़-बड़े नामी पत्रकार खुद को लोकतंत्र का पहरेदार समझते हुए क्या जानते हैं कि इसके क्या मायने हैं? जिस ढांचे की हिफ़ाज़त या उसे टूटने से बचाने के लिए वे अपना कंधा लगाए हुए हैं या तो वह अर्थी है या फिर वे खुद बुत। इस ढांचे में सिर्फ बॉलीवुड बसता है। मनोरंजन की अधनंगी दुनिया की प्रेतात्माएं मंडराती हैं। लोकतंत्र के मायने क्या सिर्फ कलुषित राजनीति है? कामुक, भ्रष्ट, निर्लज्ज और खुद को स्वयंभू समझनेवाले नेताओ के कब कुकर्म उजागर होते हैं और कब विभाग को मालामाल कर देने जैसी नकली खबरों को चमकाया जाता है, यह सब समझ से परे है। </p>
<p>चट मंगनी, पट ब्याह की तर्ज पर भर्ती हो गए मीडियाकर्मियों के मुंह से मीडिया का महिमागान इसीलिए असर नहीं छोड़ता।</p>
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		<title>By: धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, एम.फिल., दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली - 07</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/22/vineet-kumar-view-on-shiv-sena-attack-on-ibn7/comment-page-1/#comment-4575</link>
		<dc:creator>धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, एम.फिल., दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली - 07</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 20:18:18 +0000</pubDate>
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		<description>नमस्कार सर! आप की कुछ बातों से मैं खुद को भी सहमत पाता हूं। मसलन मीडिया खुद को लोकतंत्र के रूप में कैसे और क्यों पेश कर रही है? क्या आज की मीडिया लोकतांत्रिक है या उसे लोकतांत्रिक होने का एक और बहाना मिल गया है? लेकिन साथ ही दफतर तोडू मर्दों (शिव सैनिकों को औए कुछ आता भी तो नै है) के कारनामें की मैं कडी आलोचना भी करता हूं। वह इसलिए भी क्योंकि ये महाराष्ट्र को विकसित करना-देखना नहीं बल्कि लोगों को उससे डरते देखना चहते हैं.........।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>नमस्कार सर! आप की कुछ बातों से मैं खुद को भी सहमत पाता हूं। मसलन मीडिया खुद को लोकतंत्र के रूप में कैसे और क्यों पेश कर रही है? क्या आज की मीडिया लोकतांत्रिक है या उसे लोकतांत्रिक होने का एक और बहाना मिल गया है? लेकिन साथ ही दफतर तोडू मर्दों (शिव सैनिकों को औए कुछ आता भी तो नै है) के कारनामें की मैं कडी आलोचना भी करता हूं। वह इसलिए भी क्योंकि ये महाराष्ट्र को विकसित करना-देखना नहीं बल्कि लोगों को उससे डरते देखना चहते हैं&#8230;&#8230;&#8230;।</p>
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		<title>By: RAJ SINH</title>
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		<dc:creator>RAJ SINH</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 03:02:57 +0000</pubDate>
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		<description>शाबाश विनीत . साफगोई और सच्चाई आपकी बेमिसाल है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शाबाश विनीत . साफगोई और सच्चाई आपकी बेमिसाल है .</p>
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		<title>By: आदर्श राठौर</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/22/vineet-kumar-view-on-shiv-sena-attack-on-ibn7/comment-page-1/#comment-4542</link>
		<dc:creator>आदर्श राठौर</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 18:46:15 +0000</pubDate>
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		<description>रंगनाथ जी, आप कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो जाते हैं... संयम रखें अंगुलियों पर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रंगनाथ जी, आप कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो जाते हैं&#8230; संयम रखें अंगुलियों पर</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/11/22/vineet-kumar-view-on-shiv-sena-attack-on-ibn7/comment-page-1/#comment-4538</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 16:58:20 +0000</pubDate>
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		<description>सुन्दर बात। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। बधाई सलीके से अपनी बात कहने के लिये।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुन्दर बात। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। बधाई सलीके से अपनी बात कहने के लिये।</p>
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