“लागत जोबनवा मा चोट” को खोजती एक फिल्म
♦ उमेश पंत
लगत जोबनवा में चोट, फूल गेंदवा न मार… ये शब्द फिर गाये नहीं गये। ठुमरी के ये बोल कहीं खो गये होते! शब्द ही थे, खो जाते, अगर सबा उन्हें ढ़ूढ़ने की कोशिश नहीं करती। लेकिन सबा दीवान को न जाने क्या सूझी कि वो इन शब्दों को ढूंढते ढूंढते एक सिनेमाई सफर तय कर आयीं। उनकी डॉकुमेंट्री फिल्म द अदर सौंग दरअसल लगत जोबनवा में चोट की लगत करेजवा में चोट बन जाने की यात्रा है। आखिर क्यों जोबनवा करेजवा हो गया। शब्दों को इस तरह बदल देने के पीछे आखिर क्या वजह रही होगी। इन्हीं प्रश्नों को तलाशती सबा की ये फिल्म लखनऊ, वाराणसी और बिहार के मुज़फ़्फरपुर तक हमें ले जाती है और इस पूरी यात्रा में देश की तवायफ़ों की एक संस्कृति के दर्शन फिल्म कराती है। शास्त्रीय संगीत को पालने वाली इस संस्कृति की शुरुआत संगीत को पूरी तरह जीने वाले लोगों ने की। ये वो लोग थे, जो संगीत को राजे-रजवाड़ों और रसूख वाले लोगों की सेवा में पेश कर संगीत को बचा रहे थे। उसे पाल रहे थे। हांलाकि रोज़ी-रोटी कमाना इस पेशे में आने की मूल वजह ज़रूर थी लेकिन इन लोगों को अपने पेशे से प्यार था। समाज में तवायफ़ों को जिस भी नज़रिये से देखा जाता रहा हो, पर ये लोग अपने पेशे को अपने आत्मसम्मान और अपनी मरज़ी दोनों को बिना दांव पर लगाये जारी रखे हुए थे।


Stills from Saba Dewan’s video documentation of singer Daya Devi from Muzaffarpur, Bihar
1935 में वाराणसी की रसूलन बाई नाम की एक तवायफ़ ने लगत जोबनवा में चोट आखिरी बार गाया और उसे ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड कर लिया। सबा की फिल्म तीन साल की उनकी रिसर्च का नतीजा है। उनकी फिल्म तवायफ़ों को एक कलाकार के रूप में देखे जाने का आग्रह करती मालूम होती है। उनका यह आग्रह सही भी है, क्योंकि तवायफ़ों की संस्कृति दरअसल एक कला से उपतजी है लेकिन धीरे-धीरे समाज उन्हें दूसरे नज़रिये से देखने लगता है। वो उनके भीतर के कलाकार को नहीं समझ पाता। तवायफ़ और सेक्स वर्कर दोनों एक ही नज़र से देखे जाने लगते हैं और ये बात उन तवायफ़ों को चोट पहुंचाती है। वो अपने लोगगीतों में एक कलाजन्य सुख परोसना चाहती हैं, जिसका सीधा संबंध मन से है। लेकिन सुनने और देखने वाला समझने लगता है कि ये एक दैहिक आग्रह है और वो इसे सेक्स से जोड़ कर देखने लगता है। ऐसे में एक कलाकार के अंदर की आत्मा मरने लगती है। लगत जोबनवा में चोट के भीतर की आत्मा मरने लगती है। उसका अर्थ दैहिक हो जाता है। जोबनवा दिल न रहकर दिल के ऊपर की मांसल देह भर रह जाता है और उसे बदलना पड़ता है। लगत जोबनवा में चोट कहीं खो जाता है। साथ में रसूलन बाई कहीं लुप्त हो जाती हैं और उनका संगीत कहीं खो जाता है। लोग तवायफ़ों की खोज करते हैं। उनकी देह को तलाशते हैं। पर उनके संगीत को कोई नहीं तलाशता। न उस वजह को, जिस वजह से ये संगीत धीरे-धीरे मर जाता है।
सबा सत्तर सालों बाद अपनी इस फिल्म के जरिये कई कड़ियां खोजते-खोजते 1935 में घटी उस छोटी-सी घटना की तह में जाती हैं। सत्तर साल का ये एतिहासिक सफ़र वो रीयल टाइम में तीन सालों में तय करती हैं और 120 मिनट के रील टाइम में हमें सोंप देती हैं। इस यात्रा में वो बिहार के मुज़फ़्फरपुर की दयाकुमारी और रानी बेग़म से मिलती हैं। बनारस की सायरा बेग़म उनकी यात्रा का हिस्सा बनती हैं। ये वो तवायफ़ें हैं, जिन्होंने अपने पेशे का इसलिए छोड़ दिया कि लोगों ने उसके मर्म को समझना बंद कर दिया। उसमें एक वैचारिक गंध घोल दी और तवायफ़ें कुछ और हो गयीं। जो हो जाना सायरा, दया या रानी को गवारा नहीं था।
हिंदी फिल्मों ने भी तवायफ़ों के इस दर्द को समझने की कोशिश एक दौर में की थी। पाकीजा या उमराव जान जैसी फिल्मों ने तवायफ़ों की सामाजिक मान्यता पर बहस छेड़ी। लेकिन सबा की ये कोशिश कई मायनों में ज़्यादा ज़रूरी हो जाती है। सबा जब इस फिल्म पर बात करती हैं, तो उनकी आंखों में वो तीन साल की मेहनत नज़र आती है। उनकी बातों से लगता है कि एक फिल्मकार जब अपनी फिल्म के विषय को जीने लगता है, तो वो एक इतिहासकार या एक दार्शनिक हो जाता है। सबा ने नाच, बर्फ जैसी कुछ अन्य डॉकुमेंट्री फिल्में भी बनायी हैं। हालांकि अभी उन्हें देखने का मौका नहीं मिला है। सबा की फिल्म और उनके अनुभवों की ये खेप आप तक पहुंचा रहा हूं। पढ़ें और चाहें तो अपनी टिप्पणियां दें।
(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, छात्र। सिनेमा और समाज के ख़ास कोनों पर नज़र रहती है। मोहल्ला, नयी सोच और पिक्चर हॉल नाम के ब्लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल जामिया मिल्लिया के एमसीआरसी से मास कम्यूनिकेशन में एमए कर रहे हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









बहुत सुंदर। आप ने द अदर सौंग की जानकारी दी। मोहल्ला पर एक वीडियो सेक्शन भी होना चाहिए,जहां ऐसी फिल्मों के अंश देखे जा सकें।
botot achha paryas hai….
बहुत खूब! उम्दा सिनेमाई सफर और उसे परोसता बेहतरीन लेखन!
काबिले तारीफ ।
बॉस इस फिल्म को देखना कैसेट संभव होगा। अगर संभव हो तो सबा जी का नंबर दें या फिर कोई और उपाय बताएं। इसके बारे में पढ़कर देखने की इच्छा जागृत हो गई है।
बहुत प्रभावी समीक्षा. अब जल्दी ही मित्रों के साथ मिलकर दिल्ली में इसकी स्क्रीनिंग ऑर्गेनाइज़ करूंगा.
देखिये राजीव जी आपका काम तो हो गया। रोकेश जी, जिन्हें मैं व्यक्तिगत रुप से नहीं जानता, ने स्क्रीनिंग करवाने की बात कह ही दी है। अच्छा लगा कि आप लोगों ने फिल्म देखने का मन बनाया है। अविनाश जी भी फिल्म देखना चाहते हैं। उनसे बात हुई थी तो उन्होंने इच्छा जाहिर की थी। खैर वैसे फिल्म तो मिल ही जायेगी। अब एक दूसरे तक कैसे पहुंचे ये आप तय करें। सबा जी की मेहनत काबिलेतारीफ है। समीक्षा पढ़कर आपको अच्छा लगा। फिल्म देखकर और भी अच्छा लगेगा। तय मानिये।
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