जेएनयू में अपराधियों की पहचान छुपाने के लिए लाठीचार्ज
♦ चंदन पांडेय, जेनएनयू कैंपस से

कोई सुने तो शायद ही विश्वास करे कि भारत के सबसे अग्रणी विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ इतना अमानवीय सलूक किया गया। एक मामूली विवाद, जिसमें जेनयू के छात्रों का ज़रा-सा भी दोष नहीं था, पुलिस ने अपराधियों को बचाने के लिए निर्दोष छात्रों पर लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज में पचास से ऊपर छात्र घायल हुए हैं। पंद्रह छात्रों की हालत गंभीर है। सबसे पहले हम निर्दोष छात्रों के स्वस्थ होने की प्रार्थना करेंगे फिर आगे की बात।
घटना कुछ यूं घटी : चार बिगड़ैल रईसजादे जेनयू आये। 24×7 ढाबे पर उन्होंने शराब की महफिल जमायी। फिर नशे मे चूर होकर छात्रों से बदतमीजी की। छात्रों ने, जो आजकल सेमेस्टर परीक्षाओं की तैयारी मे लगे हैं, पहले तो इनकी “तमीजदार” हरकतों पर ध्यान नहीं दिया, पर जब एकजुट होकर विरोध करने लगे तो चारों गुंडे भाग निकले।
गुंडों के पास कार थी, इसलिए इनकी रफ्तार के नीचे आने से बाल-बाल बचे लोगों ने विश्वविद्यालय सुरक्षा को फोन मिलाया। जेएनयू मेन गेट पर जब सुरक्षाकर्मियों ने इन्हें रोका, तब इन चार गुंडों मे से एक ने पिस्टल दिखाया। पिस्टल देखते ही बड़ा दरवाजा बंद कर दिया गया। मेन गेट पर एक नहीं, दस-पंद्रह सुरक्षाकर्मी रहते हैं। जैसे ही मेन गेट बंद हुआ, कहानी शुरू हो गयी। चूंकि विश्वविद्यालय की सुरक्षा का ज़िम्मा निजी कंपनी के हाथों मे है, इसलिए उनके सारे अधिकार दिल्ली पुलिस के पास गिरवी हैं। उन्होंने तुरंत दिल्ली पुलिस को बुला लिया और “महान” दिल्ली पुलिस ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया – उन चार गुंडों को बचाने का काम।
ख़बर है कि चारों बेहद शक्तिशाली घराने से हैं। दिल्ली पुलिस कितनी ताक़तवर है या दिल्ली पुलिस का एक हाईस्कूल पास सिपाही (साथ में अधिकारी भी थे) कितना ताक़तवर है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि छात्रों तथा सुरक्षाकर्मियों के लाख आग्रह के बावजूद दिल्ली पुलिस की महान सत्ता ने एफआईआर मे पिस्टल को पिस्टल नहीं लिखा। कभी उसे खिलौना बंदूक लिखा, तो कभी लाइटर लिखा, तो कभी कुछ लिखा।
छात्रों की मांग बस इतनी थी कि इन चार गुंडों की शिनाख्त हो। पता तो चले कि ये हैं कौन, जिनके अमीर खानदान की गुलामी दिल्ली पुलिस तक कर रही है, जो आराम से जेनयू मे बंदूकें लहराते दिखाई पड़ते हैं? पर दिल्ली पुलिस ने यह नहीं होने दिया। और अंतत: जो हुआ, वो यह कि सैकड़ों निर्दोष छात्र अपनी मामूली मांग के बदले पुलिस की बेरहम लाठियों से पीटे गये। आंसू गैस के गोले छोड़े गये। हवाई फायर हुआ। ख़बर यह भी है कि कुछ छात्र गोली का शिकार हुए हैं। मैं चाहूंगा कि ये ख़बर अफवाह बन जाए। नौजवानों की मृत्यु की ख़बर से वीभत्स कोई दूसरी ख़बर नहीं होती है।
उन चार गुंडों को बचाने में लगी पुलिस इस कदर मुस्तैद थी कि घटनास्थल पर तीन वैन लाठी-बंदूक से लैस पुलिस पहले ही बुला ली गयी। फिर दो वैन आरएएफ (rapid action force) भी बुला लिया गया। जहां पुलिस अपने सारे काम शातिरपने के साथ पूरी कर रही थी, वहीं छात्र अपनी बात किसी तक पहुंचा नहीं पा रहे थे। मसलन “ताकतवर” मीडिया भी घटनास्थल पर सात बजे के बाद पहुंची है, जबकि छात्र कुछ गुंडों की शिनाख्त की यह लड़ाई दिन के दो बजे से लड़ रहे थे।
विश्वविद्यालय के नख-दंतविहीन सुरक्षाकर्मियों के पास हथियार की जगह वॉकी-टॉकी है। ऐसे में छात्रों के पास बस एक ही हथियार था कि वो मेन गेट खुलने न दें। पुलिस का सारा ज़ोर इसी पर था कि मेन गेट खुले और दिल्ली पुलिस (एसीपी रैंक तक के अधिकारी घटनास्थल पर थे) अपने मालिकों के मुस्टंडे बच्चों को लेकर भाग निकले, कुछ रिश्वत पानी का इंतज़ाम हो, कोई प्रोन्नति मिले।
उन चारों को पुलिस की गाड़ी, जो मेन गेट के अंदर थी, में रखा गया था। आप छात्रों के अनुशासित और मानवोचित विरोध का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि वो चारों मेन गेट के इस पार थे, जहां छात्रों की तादाद पांच सौ से ऊपर थी। फिर भी कोई शारीरिक क्षति उन गुंडों को छात्रों ने नहीं पहुंचायी।
पुलिस की मुस्तैदी का दूसरा नमूना यह निकला कि मीडियाकर्मियों तक को उन चार “बहादुरों” की तस्वीर उतारने की इजाज़त नहीं दी गयी। छात्रों के पास शाम के आठ बजे तक कोई नेता तक नहीं था। हालांकि जो ख़बरें अभी रात के दो बजे तक आयी है कि जिस नेता से उम्मीदें थीं, जब वो सामने आया तो छात्र अपनी लड़ाई और मनोबल दोनों हार गये। क्या आपको लगता है कि ऐसे लोगों का नाम लेना ज़रूरी है?
अभी निहत्थे छात्र अपनी मांग मनवाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक से मेन गेट खुल गया और लाठीचार्ज का आदेश हो गया। जो मौक़े पर थे, उनका कहना है कि एक-एक छात्र को पांच-पांच पुलिस वाले पीट रहे थे। छात्राओं तक को नहीं बख्शा गया है। ख़बरों के अनुसार पचास से ऊपर छात्र ज़ख्मी हुए हैं। उन चार गुंडों को पुलिस ने इसी बीच बाहर निकाल लिया। कल से उन गुंडों के पक्ष में दलीलें मिलनी शुरू हो जाएंगी। जो कुछ नहीं कहेगा, वो भी इतना तो कहेगा ही कि – जेनयू के लड़कों को ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? कुछ लोग देश के इन बेहतरीन विद्यार्थियों को पढ़ने और पढ़ते रहने की सलाह देंगे। विश्वविद्यालय के सुरक्षा नियम कुछ और कड़े हो जाएंगे, जो कि छात्रों को ही परेशान करेंगे।
अब जबकि उन चार अमीर गुंडों की पहचान नहीं हो पायी है, तो कायदे से सरकारी महकमा इस पूरी वारदात को झूठा भी करार दे सकता है। मीडिया को सरकारी विज्ञापन पाने का बेहतरीन मौक़ा छात्रों ने खुद लाठी खाकर दिया है। खुद के शरीर पर लाठी खा कर पुलिस वालों को प्रोन्नति पाने के क़ाबिल बनाने वाले छात्रों के प्रति आप क्या सोचते हैं? मैं घटनास्थल पर निहायत निजी कारणों से मौजूद था। अपने जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिलाषा को असफल होते देख अब मेरे पास लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था, पर जब जेनयू के मेन गेट का नज़ारा देखा तो निजी दुख को कुछ पल के लिए किनारे कर वहां मौजूद छात्रों से मिला, सुरक्षाकर्मियों से मिला, पुलिसवालों से बात की। पाया कि छात्रों की मांग बिल्कुल जायज़ थी।
(चंदन पांडेय। युवा कथाकर। बनारस से पढ़ाई-लिखाई। सुनो नाम की कहानी से मशहूरियत मिली। इन दिनों करनाल में रहते हैं और सामाजिक मुद्दों पर विभिन्न माध्यमों में लगातार लिख रहे हैं। उनके ब्लॉग का नाम है नयी बात। उनसे chandanpandey1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










पिछले छ साल से लगातार जेएनयू कैंपस जाना हो रहा है। IIMC की लाइब्रेरी में काम करते हुए कई बार खाने के लिए कैंपस के भीतर के ढ़ाबे पर भी चला जाया करता हूं। लेकिन पिछले दो-ढाई सालों में मैंने देखा है कि चाहे 24*7 हो या फिर कैंपस के दूसरे ढाबे,बाहर से लंबी-लंबी गाडियां लेकर आनेवाले रईसजादों के लिए चखनाघर की तरह इस्तेमाल होता है। शराब की बोतलें गाड़ी में खुलती है। ढाबे से खाने लिए जाते हैं और फिर जारी रहता है। शाम होते ही इतनी गाडियां मैंने पहले नहीं देखी। जेएनयू को बाहर के ये बिगडैल लोग आउटिंग के तौर पर लेते हैं जिनका कि न तो कोई अकादमिक मकसद होता है और न ही यहां रह रहे छात्रों से मिलना-जुलना। वो इसे फार्म हाउस जैसी बर्बरता पैदा करते हैं। मेरे हॉस्टल के बगल में भी वीकेआरवी की जो कैंटीन है,वहां भी यही काम हुआ करता है और समय-समय पर इन लोगों की वजह से बंद कर दिया जाता है।.हम जेएनयू के छात्रों के साथ हैं। हम उनके संघर्ष के साथ है।.
सबकुछ बहुत निराश करने वाला है चंदन लेकिन अप्रत्याशित कुछ भी नहीं। पुलिस की समझदारी और सहिष्णुता पर कभी शक नहीं रहा। मेरा कोई मित्र जेएनयू में नहीं रहता लेकिन मैं अक्सर वहां खाना खाने जाता रहा हूं मुनीरका के अपने पत्रकार मित्रों के साथ्। दुखद बात यह है कि कल रात राज.शिल्पामय हो रहे चैनलों पर इस बारे में कोई खबर तक नहीं थी।
पुलिसिया बर्बरता के इतिहास में एक और काला अध्याय…शीला दीक्षित सरकार को शर्म आनी चाहिए।
Since last three years of my stay in the JNU campus as a research scholar, what I have found that people of JNU community is very gentle and utmost behave in matured and intellectual way. Had such incident happened in any other university where students had caught culprits of heineous crime of public drinking, eve-teasing and intimidating security men within their campus premises and such a huge mob of students gathered around the culprits, the accused might have been lying in hospitals with uncountable beyond recoverable fractues. But, it were the students of this campus who protected them from fury of angry mob. They were lathicharged because their were demanding public apology from culprits and wanted their identities revealed. Shame to Delhi Police who tried to sheild culprits by all possible means and going to the extent of using tear gas and lathis over innocent victim students including several P.hd women students!! The highschool-pass uncivilized policemen men acted in their well-known brutal way and forgot that from this prestigeous university hundreds of student excels in IAS exam merit list every year and it is known for its worldwide academic excellence.
ईमानदार पुलिसवालों और मीडियाकर्मियों से क्षमा मांगते हुए मैं बार-बार दुहराई गई यह बात फ़िर से कहना चाहता हूँ कि सत्ताधारी वर्ग मीडिया और पुलिस को कभी-कभी वेश्याओं की तरह इस्तेमाल करता है।
इन घटनाओं के बाद आम आदमी अपने ‘नपुंसक’ क्रोध की आग में जलता रहने के अलावा और क्या कर सकता है?
ईमानदार पुलिसवालों और मीडियाकर्मियों से क्षमा मांगते हुए मैं बार-बार दुहराई गई यह बात फ़िर से कहना चाहता हूँ कि सत्ताधारी वर्ग मीडिया और पुलिस को कभी-कभी वेश्याओं की तरह इस्तेमाल करता है।
इन घटनाओं के बाद आम आदमी अपने ‘नपुंसक’ क्रोध की आग में जलता रहता है…
मुनिरका में कई छात्र-छात्रा जे.एन.यू. के भरोसे ही रह कर अपनी महत्वाकांक्षा की उड़ान भरते हैं.. उनमें से कई को मैं निजी तौर पर जानता हूं जो जे.एन.यू. के छात्र-छात्रा ना होकर भी जे.एन.यू. में खाते, पीते, पढ़ते हैं और कुछ बनने का सपना लिये होते हैं(कुछ महिने मैं भी रहा हूं, सो यथार्थ जानता हूं).. आमतौर पर वे बहुत पैसे वाले घरों से नहीं होते हैं जो कहीं भी जा कर रह लें और सपनो को भी जी लें..
मेरा मानना है कि इस घटना के बाद उन अमीर गुंडो का तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला है, मगर सुरक्षाकर्मी जे.एन.यू. के छात्रों और बाहर रहने वाले ऐसे छात्रों के लिये परेशानी का सबब जरूर बन जायेंगे..
प्रशांत जी आपकी बात सौ फीसद सही है। कुछ दिनो पहले से ही शाम के सात बजे के बाद विश्वविद्यालय मे उनलोगों का आना जाना बन्द हो रखा था जिनके पास परिचय पत्र नही है। सात बजते ही मेन गेट पर सुरक्षाकर्मी आपको रोककर उनसे फोन-इन बात कराने के लिये कहता है जिससे मिलने आप जा रहे है।
Thanks Chandan Pandey ji for taking up the cause of JNU students.
I think its about time we JNU students should start interrogating these so called ‘visitors’ themselves, albiet politely, but if found not on some serious purpose or there just for merry-making, then it must be reported to the security right away.
Tolerance, if not accompanied with vigilance may boom-rang at times, just as in this case. And Vineet Kumar is right when he says that the ‘dhabas’ and openness of JNU is being abused by boozers and dopers pretty openly. Enough is Enough!
पुलिस की मैंने एक खास बात नोट की है, मान लीजिए अगर एक आम हैसियत रखने वाले शख्स ने कोई गलत काम किया या उस पर लोगों का शक हुआ है और भीड़ उग्र होकर उस पर हमला कर देती है। ऐसे हालात में पुलिस वाले उस आदमी को बचाने की कोशिश नहीं करेगी। लेकिन वहीं अगर उग्र भीड़ किसी कुख्यात अपराधी, पैसेवाले या रसूखदार आदमी के खिलाफ होती है तो ये पुलिसवाले अपनी जान की बाज़ी लगा देते हैं। इसलिए इनकी इस भावना के पीछे कर्तव्यनिष्ठा तो कहीं है ही नहीं। इनके मन में सिर्फ एक ही बात होती है… लालच… कि ऐसा करके इन्हें कुछ पैसा मिल जाएगा। जेएनयू वाले केस में भी ऐसा ही होने की संभावना ज्यादा है। पुलिस चाहती होगी कि इनके परिजनों से खाने का अच्छा माल मिलेगा…
police ki karrvaee behad sharmnak hai, bigrail pitaon ke mahabigrail beton aur nangi punji ke sahdharm se upji vyavastha me isse jyada kya ummid ki ja sakti hai. par chandan bhaee mujhe lagta hai ki ye shayad utni badi kabar nahi banti yadi ye jnu ki bat nahi hoti.
JNU na ho gayaa, koi paradise ho gayaa. itanee ‘Aaah!’ kyon nikal rahi hai JNU ke students par maamooli ‘laathi charge’ se ? aakhir apane hi ‘class’ ki baat hai naa. police is desh me hazaaron nauzavaanon ko har roz goliyon se bhoon rahi hai …aadivaasiyon aur daliton ko aur gareebon ko…
kyaa ve JNU ke students se kam naagarik hain?
yaa unaki jaan shaayad zyaada sasti hai…
usase bhi sasti, jitane ki JNU ke ‘keemati’ students coffee yaa ‘rubber’ par kharch karate honge…
isee din, dilli me ghatee Rohini, Fridabad, mangolpuri ki khabar padho…
Please treat JNU as an ordinary, normal part of this country…
राकेश जी आपका बेकार गुस्सा मेरी समझ मे नही आया। मैने ये तो लिखा ही नही है कि देश के अलग अलग हिस्सों और समाज के विभिन्न वर्गों को प्रताड़ित करने की कार्रवाई सही है। मैने यह भी नही लिखा है कि जे एन यू को कुछ अलग दर्जा हासिल है। जैसे फरीदाबाद एक शहर है,मुनरिका एक गॉव है ठीक वैसे ही जे एन यू एक विश्वविद्यालय है। शहर, गाँव और विश्वविद्यालय की अपनी अलग अलग पहचान है, विशेषता है, खामियाँ हैं। आप खा-म-खा बुरा मान गये!
बहुत अच्छा होता कि आपने फरीदाबाद वाली घटना पर कुछ लिखा होता क्योंकि उसे हम सब पढ़ते गुनते। मुझे पता है मेरी इस राय पर आप कहोगे-मैं(मतलब राकेश) क्यों किसी पचड़े मे पड़ने जाऊँ। सिर्फ इसी रवैये के कारण फरीदाबाद की जो घटना आपको परेशान कर रही है, वो शायद सामने ना आ पाये।
गलत कह रहा हूँ तो कहिये!
राकेश जी, क्षमा चाहता हूं… कड़वा है लेकिन सच है, आप दिगभ्रमित हैं…
एक तरफ आप जेएनयू के छात्रों को साधारणत: लेने की बात कह रहे हैं… वहीं दूसरी तरफ भाषण पिला रहे हैं..। ठीक है, जेएनयू के छात्र Ordinary ही हैं…। और अगर Ordinary के पक्ष में बात की जा रही है तो आपको क्यों समस्या है। दिन भर में दुनिया भर में हज़ारों घटनाएं घटती हैं, हम उन सभी पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकते। तो क्या हम किसी एक मुद्दे के खिलाफ भी आवाज़ न उठाएं। या इस मुद्दे पर चुपचाप बैठे रहें कि ये तो साधारण घटना है, इस तरह आए दिन होता रहता है।
lathicharge ki gatana ke 10 din bad JNU administration ne ek nayi chal chali. JNU me kuch professor ese bhi hai, jinka pramukh kaam commitees ko chair karna hai, ese hi ek yvakti hai, prof. harjeet singh, ye geography dept. me hain. swanamdhany VC BB Bhattacharya ne is gatana ki janch ke liye harjeet singh commitee banayi. lagbhag 10 din me is committee ne apani report de di, lekin is report ka aadhar kya hai pata nahi. kam se kam jo chhatra gayal hue, unka deposition to lena chahiye tha, vo bhi nahi liya gaya. aur report yah aayi ki chhatro ne police ko uksaya. aur JNU VC chhatro ko identify karne ke liye proctorial inquiry ka order de diya hai. dusari taraf, delhi police ne JNU chhatro ke khilaf FIR darj kar di hai, prashan chatro ko identify kar naam dega, fir police un par case chalayegi. udhar, vo char gunde jamnat par chhut chuke hai. yah sab ho raha hai, or khuli aakho se sab dekh rahe hai, JNU me bhi hamesha samne aane wale 15-20 adhyapako ke alava (In 15-20 adhyapako ki himmat or concern ko salam!) sab police ke paksh me hai, kyoki prashashan police ke paksh me hai or police sarkar ki hai. ab promotion or dusare fayade keval police walo or media walo ko hi thode milte hai, professoro ko bhi milte hai. shayad andher nagari chaupat raja ka yahi matlab hota hai, lathi bhi khao, or mukdama bhi jhelo.
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