अब मुकेश कुमार संभालेंगे मौर्या टीवी की कमान
देशकाल के संपादक मुकेश कुमार लॉन्चिंग की प्रतीक्षा कर रहे प्रकाश झा के टीवी चैनल मौर्या टीवी की कमान संभालेंगे। वे ‘मौर्य टीवी’ के डायरेक्टर बनाये गये हैं। मुकेश को चैनल लांचिंग कराने से लेकर इसके न्यूज, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन समेत सभी विभागों का ज़िम्मा दिया गया है। मुकेश कुमार पुराने टीवी पत्रकारों में से रहे हैं और सुबह सबेरे के लोकप्रिय दूरदर्शनी दिनों में वे टीवी पर न्यूज़ पढ़ते थे और वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह से पुस्तक चर्चा करते थे। उनके पत्रकारीय सफ़र में जो कुछ अहम पड़ाव रहे हैं, उनमें गोहाटी का अख़बार द सेंटीनल, सहारा समय, वॉयस ऑफ इंडिया, एस वन का ज़िक्र किया जा सकता है। अपनी शर्तों पर काम करने वाले मुकेश कुमार ने सहारा समूह में सहारा प्रणाम कहने से इनक़ार कर दिया था और सहारा के ड्रेस कोड को लेकर भी खासी आपत्ति जतायी थी। ऐसे समय में, जब पत्रकार बड़े मीडिया हाउसेज़ में बने रहने के लिए खुद को कॉरपोरेट लुक में रखना पसंद कर रहे हैं, मुकेश कुमार का बर्ताव और अप्रोच सादगी से भरा है। उम्मीद है, मौर्या चैनल के लिए पटना की उनकी यात्रा नयी तरह की टीवी पत्रकारिता का आगाज़ करेगी।









उम्मीद है व्यक्तित्व की तरह सूचना में भी सादगी बनाए रखेगें जैसा उन्होंने अब तक किया है। सनसनी विवाद से परे खबर देना आज के समय में दृढ़ता और जिम्मेदारी की माँग करता है। मुकेश जी जैसे सजग पत्रकार से यह आशा है।
सादगी और सरोकार की पत्रकारिता में भरोसा रखनेवाले अनुभवी पत्रकार मुकेश कुमार को बधाई दूं इसके पहले मैं मोहल्लाlive के मॉडरेटर का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। मॉडरेटर ने खबर की शुरुआती लाइनों में ही साफ कर दिया है कि वो डायरेक्टर के तौर पर मौर्या टीवी के लिए और क्या-क्या काम करेंगे? मुकेश कुमार की तरह देश में दर्जनों अनुभवी टीवी पत्रकार और संपादक हैं जो कि सरोकार की पत्रकारिता करना जानते हैं,करना चाहते हैं। कई बार कोशिश भी करते हैं लेकिन बाजार की शर्तों,टीआरपी के मकड़जाल और मालिकों की परेड के आगे लाचार हो जाते हैं। जिस टीवी को सर्जनात्मक माध्यम बनाने की लालसा से जिम्मेदारी उठाते हैं,उसे आगे जाकर खुद ही गोबर का पहाड़ करार देते हैं। इसलिए सवाल सरोकार की पत्रकारिता को लेकर बात करने भर की नहीं है। सवाल है कि बाजार के बीच रहकर,मैनेजरी का काम करते हुए,नंबरी और सिक्कों की खनक की चिंता करते हुए भी कैसे सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को जिंदा रख पाते हैं? ये शब्द जितने पारंपरिक जरुरी और चमकीले लगते हैं इसका व्यवहार के स्तर पर बने रहना टीवी पत्रकारिता के भीतर जिंदा रह पाना उतना ही मुश्किल है। कल को अगर मुकेश कुमार ये दोनों काम करते हुए,दोनों स्तर पर मौर्या टीवी को सफलतापूर्वक आगे ले जा पाते हैं तो वो हिन्दी टीवी पत्रकारिता के लिए मिशाल के तौर पर जाना-समझा जाएगा। इसलिए मेरे जैसा पाठक सरोकारी पत्रकारिता के नमूने देखने के साथ-साथ बाल स्ट्रीट के आंकेडों और ग्राफों के उपर भी टकटकी लगाए रखेगा।
मुकेश कुमार के लिए सरोकार की पत्रकारिता शब्द का प्रयोग खासतौर से किया जाता है। टेलीविजन के बहुत ही कम मीडियाकर्मियों को ये शब्द नसीब होते हैं। मैं मुकेश कुमार की इस सरोकारी पत्रकारिता से बहुत अधिक परिचित नहीं हूं। दूरदर्शन की पत्रकारिता के लिए अगर इस शब्द का प्रयोग हो रहा है और किया जाता है तो मुझे वो अधूरा लगता है। वहां कभी भी बाजार और आर्थिक शर्तों को ध्यान में रखकर बात नहीं की जाती। कभी भी ये नहीं समझ आता कि घंटे भर के कार्यक्रम के पीछे कितना मैन पॉवर और साधन लगे। लेकिन देशकाल डॉट कॉम और मंचों के जरिए इस तरह की पत्रकारिता की बात करते हुए पढ़ा-सुना जरुर है। बकौल मुकेश कुमार टीवी का संपादक और उपर के लोग मगरमच्छ हो जाते हैं। टीवी पत्रकारिता में सरोकार की गुंजाइश नहीं रहती। देशकाल डॉट कॉम शुरु होने के उद्देश्य पर उन्होंने लिखा-
देशकाल उन लोगों का उन लोगों के लिए उन लोगों द्वारा खड़ा किया जा रहा एक ऐसा मंच है, जहाँ पत्रकारिता एक पेशा नहीं सामाजिक कर्म है, कारोबार नहीं परिवर्तन का औज़ार है और एक ऐसा “स्पेस” है जो बाज़ार के दबाव में लगातार सिकुड़ता जा रहा है। हममें से बहुत से लोग जानते और मानते हैं कि मीडिया का भले ही अंधाधुंध विस्तार हो रहा हो, टीवी चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं की भरमार हो रही हो, मगर उनमें ऐसी चीज़ों की गुंज़ाइश लगातार कम होती जा रही है, जो समाज और देश की सेहत के लिए परम आवश्यक हैं। उनकी जगह घटिया मनोरंजन, अंध विश्वास, सस्ती उत्तेजना, झूठ-फरेब आदि ने ले ली है और सही मायनों में वह बुद्धू बक्सा बन गया है। ये दर्शकों के साथ छल है और इसीलिए ऐसे वैकल्पिक मंचों की सख़्त ज़रूरत हम महसूस करते हैं जहाँ वे चीज़ें उपलब्ध करवाई जा सकें जो कि उन तक पहुँचनी चाहिए। हम देख रहे हैं कि मीडिया से सच्चाई गायब हो गई है। वे एक ऐसा मायालोक गढ़ रहे हैं, जिसमें तरक्की के आँकड़े तो जगमगाते हैं मगर उस आबादी का ज़िक्र नहीं होता जो घोर अंधकार में जीवन जीने को अभिशप्त है। मीडिया उस वर्ग का प्रवक्ता बन गया है जिसने ग़लत-सही तरीकों से बेहिसाब धन जोड़कर अपना जीवन सुरक्षित कर लिया है और उसे मनोरंजन चाहिए, चिंता पैदा करने वाली सूचनाएं और समाचार नहीं।
हम उम्मीद करते हैं कि मुकेश कुमार हमारे-आपके और दुनिया की उम्मीदों पर खरे उतरे या न उतरें,अपने ही बनाए गए प्रतिमानों पर खरे साबित हों। अपनी ही बातों को पूरी करते नजर आएं तो बहुत सुकून मिलेगा। क्योंकि हम मुकेश कुमार के विचारों को टीवी पत्रकारिता के बीच धराशायी होने देना नहीं चाहते। नहीं चाहते कि उनके विचारों को लेकर जिस नयी पौध में उर्जा भर जाया करती है,वो व्यवहार के स्तर पर लडखड़ा जाए।
मुकेश कुमार को इन दोनों मोर्चे पर सफल और सार्थक होने की उम्मीद के साथ।
ढेर सारी शुभकामनाएं…
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