बेनतीजा, बेमतलब बेमानी है, लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट
♦ सलीम अख्तर सिद्दीकी

6 दिसंबर, 1992 को एक प्राचीन इमारत, जिसे मुसलमान बाबरी मस्जिद तो हिंदुओं का सांप्रदायिक वर्ग राम मंदिर होने का दावा करता था, ज़मींदोज़ कर दी गयी थी। उस दौर के लोग जानते हैं कि उस राष्ट्र विरोधी घटना को अंजाम देने के लिए भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में संघ परिवार ने अभूतपूर्व धार्मिक उन्माद फैलाया था। बुज़ुर्ग कहते हैं कि ऐसा उन्माद तो तब भी नहीं फैला था, जब देश का बंटवारा हुआ था। फरवरी 1986 से लेकर 6 दिसंबर 1992 तक की घटनाओं को सिलसिलेवार देखने वाले लोग जानते हैं कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को किसने अंजाम दिया था? उसके पीछे कौन-कौन लोग थे? इसकी जांच करने के लिए किसी जस्टिस लिब्रहान की ज़रूरत भी नहीं थी, जिसे पूरा करने में आयोग ने सत्रह साल लगा दिये। यह शीशे की तरह साफ था कि क्या हुआ था, किसने किया था और क्यों किया था। सही तो यह होता कि आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, कल्याण सिंह, उमा भारती, साध्वी रितम्भरा, मुरली मनोहर जोशी प्रमोद महाजन, विनय कटियार, अशोक सिंहल और प्रवीण तोगड़िया सहित पर्दे के पीछे से इन सभी को ‘हांकने’ वाले संघ नेतृत्व को जेल में डाल देना चाहिए था। लेकिन यह सभी न केवल आज़ाद घूमते रहे बल्कि सत्ता पर काबिज होकर ‘गुजरात नरसंहार’ जैसे हादसों को अंजाम देते रहे।
लिब्रहान आयोग जांच रिपोर्ट के लीक हुए हिस्से में अटल बिहारी वाजपेयी पर उंगली उठने से कुछ लोग हैरत जता रहे हैं। लेकिन सच यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के ‘खांटी संघी’ चेहरे पर आरएसएस ने एक उदारवादी मुखौटा लगा दिया था, जो बोलता कुछ था और करता कुछ और था। यह नहीं भूलना चाहिए कि आखिर अटल बिहारी वाजपेयी भी तो खाकी निक्करधारी ही हैं। वे भला सभी स्यंवसेवकों की तरह आरएसएस की नीतियों से कैसे अलग जा सकते थे? उसी मुखौटे से संघ परिवार ने ‘अछूत’ मानी जाने वाली भाजपा को कुछ सत्ता के भूखे ‘समाजवादियों’ में स्वीकार्य कराकर भाजपा की सरकार बनवा दी थी। अटल बिहारी वाजपेयी नाम के शख्स का मुखौटा तो तब ही उतर गया था, जब वे 5 दिसंबर 1992 को ज़मीन को समतल करने और वेदी के लिए ज़मीन लेने की बात कह कर अपनी मंशा जाहिर कर रहे थे। क्या किसी को याद पड़ता है कि कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने संघ की मर्जी के बग़ैर कोई क़दम उठाया हो? याद कीजिए 2002 का गुजरात नरंसहार। नरसंहार के बाद जब वाजपेयी विदेश यात्रा पर जा रहे थे, तो उन्होंने रुंधे गले से कहा था कि ‘मैं क्या मुंह लेकर विदेश जाऊंगा।’ विदेश यात्रा से आने के बाद शायद आरएसएस की फटकार का नतीजा था कि विदेश यात्रा से कुछ ही दिन बाद हुए भाजपा के गोवा अधिवेशन में वाजपेयी का ‘सुर’ बदला हुआ था।
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के कुछ अंश ही लीक हुए हैं। पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक कर भी दी जाएगी तो क्या फायदा होने वाला है। 6 दिसंबर का हादसा ऐसा नहीं था, जिसकी जांच में सत्रह साल का वक्त लगा दिया जाए। ऐसे में जांच रिपोर्ट बेनतीजा, बेमतलब और बेमानी है। वैसे भी भारत के इतिहास में अव्वल तो कभी जांच रिपोर्ट मुश्किल से ही सार्वजनिक की जाती है। सार्वजनिक कर भी दी गयी तो उस पर कभी अमल नहीं होता। 1987 में हुए मलियाना कांड की जांच रिपोर्ट सरकार के पास पड़ी धूल फांक रही है। मुसलमानों का अलमबरदार कहे जाने वाले मुलायम सिंह भी मुख्यमंत्री बने। मायावती पूर्ण बहुमल से सत्ता में हैं, लेकिन इन दोनों को कभी यह खयाल नहीं आया कि मलियाना कांड की रिपोर्ट को सार्वजनिक करके दोषियों को दंड दिया जाए। बाबरी मस्जिद विध्वंस के फौरन बाद हुए मुंबई दंगों की श्रीकृष्णा आयोग की रिपोर्ट का हश्र सबको मालूम है। सवाल यह है कि जब ऐसी जांच आयोग की रिपोर्ट की कोई हैसियत नहीं है तो क्यों समय और पैसा बरबाद किया जाता है?
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट लीक होने से किसको फायदा या नुकसान होगा, ये भी अब बेमानी है। 6 दिसंबर 1992 के बाद सरयू में बहुत पानी बह चुका है। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। यदि भाजपा या सपा ये सोच रही है कि वे इसका फायदा उठा लेगी तो वे ग़लत सोच रही है। हिंदुओं को पता चल चुका है कि भाजपा ने उनको उल्लू बनाया तो मुसलमान भी बाबरी मस्जिद को भूलकर आगे निकल चुके हैं। जो बेगुनाह लोग बाबरी मस्जिद और राममंदिर आंदोलन के चलते मारे गये थे, शायद उन्हीं बेगुनाह लोगों की बद्दुआओं का असर है कि बाबरी मस्जिद और राममंदिर आंदोलन के ‘गर्भ’ से निकली भाजपा और समाजवादी पार्टी न सिर्फ समय-समय पर अपमानित हो रही है, बल्कि ‘सुपूर्द-ए-खाक’ होने की ओर भी अग्रसर है। सरकार भले ही इंसाफ दे या न दे, वक्त तो अपना काम करता ही है। वक्त को किसी लिब्रहान आयोग की ज़रूरत नहीं है।













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