एक मुंबई, जिसे टीवी ने नहीं देखा…
♦ नरेंद्र पाल सिंह

नालासोपारा। इतिहास के पन्नों में करीब एक हजार साल पुराने बंदरगाह का हिस्सा। लेकिन फ़िलहाल करीब दो लाख से ज्यादा की आबादी का शहर, ठाणे जिले में अपनी म्यूनिसिपल काउंसिल का शहर। ठाणे यानी कोंकण जिले का उत्तरी प्रवेश द्वार।
यह इशारा करता हुआ कि यह मुंबई महानगर का हिस्सा नहीं है। लेकिन, मुंबई का न होते हुए भी नालासोपारा मुंबई के उपनगरों की छाप को अपने से अलग नहीं करता।
विष्णु डोंडे भी ठेठ मुंबईकर था। चार साल पहले सांताक्रूज की चाल के अपने दस गुना बारह फ़ीट के घरौंदे को छोड़ नालासोपारा आ गया था। बैंक से तीन लाख के लोन में अपनी पचास हजार की जमा-पूंजी जोड़ उसने साढ़े तीन लाख में दो कमरों का फ्लैट खरीदा। सीएसटी रेलवे प्लेटफ़ार्म पर एक सामान्य अनाउंसर की नौकरी कर रहे डोंडे के लिए यह कम जोखिम भरा नहीं था। रेलवे की नौकरी में उस वक्त उसे सिर्फ़ साढ़े छह हजार रुपये मिलते थे। इसमें से वह करीब आधी पगार में बैंक लोन की मासिक किस्त की अदायगी करता था। आज जरूर उसे साढ़े बारह हजार रुपये मिलने लगे हैं।
मैं डोंडे की इसी दुनिया के बीच आ रहा था। उसमें दाखिल हो रहा था। विष्णु डोंडे होने के मतलब को समझने। मैं नालासोपारा में जय मानसरोवर अपार्टमेंट के ठीक सामने ख़ड़ा था। सीढ़ियों के रास्ते दूसरी मंजिल तक पहुंचा। दरवाजा खटखटाया। गहरा रंग, गोल चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूंछें। विष्णु सामने थे।
मैं विष्णु डोंडे की दुनिया में दाखिल हो गया था। कमरे में सिर्फ़ नाम भर के लिए सामान था। दरवाजे के ठीक सामने दो कुर्सी और एक टेबल। दूसरी ओर उसके उलट, दीवार से सटे एक कैबिनेट में एक अदद टेलीविजन। एकबारगी लगा कि शायद डोंडे इसी अस्त-व्यस्तता के बीच से राह तलाश अपनी जिंदगी को शक्ल देते हैं। लेकिन, चाय की ट्रे लेकर आयी उनकी पत्नी ने इस सोच को नया विस्तार दे डाला। ‘घर में रंग-रोगन हो रहा है। अभी आधी दीवार पर गुलाबी रंग देख रहे हैं। हम दोनों ही इसे रंग रहे हैं।’ इस निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में यह पैसों की किफ़ायत का गणित नहीं है।
‘घर में कोई भी छोटे से छोटा, ब़ड़े से ब़ड़ा काम यह (डोंडे) पूरा दिल लगा कर करते हैं। रंग-रोगन ही क्यों, बढ़ईगीरी हो या घर का दूसरा कोई काम। वह हर वक्त आगे बढ़ कर उसे हाथ में लेते हैं। एक स्वाभिमान तलाशते हैं, अपने घर काम में।’ श्रुति के इन शब्दों में डोंडे की शख्सीयत के पन्ने अब खुलने लगे थे। फ़िर डोंडे ने तिनका-तिनका कर अपने इस आशियाने को खड़ा किया था। अब से पांच दशक पहले उनके पिता कोंकण के सिंहदुर्ग जिले के भेहकुर्ली गांव से मुंबई पहुंचे थे। लेकिन, मुंबई डोंडे के पिता के लिए बड़े ख्वाबों का शहर नहीं था। यह दो वक्त की रोटी की तलाश थी, जो उन्हें मुंबई खींच लायी। इसी मुंबई में पैदा हुआ डोंडे दसवीं से आगे नहीं पढ़ पाया। नतीजा यह हुआ कि 1990 में उन्हें रेलवे में क्लास फ़ोर में प्वाइंट्समैन का काम मिला। लेकिन, शायद डोंडे को इन डिब्बों से ज्यादा इंसानी रिश्तों से जुड़ना था। रेलवे में अनाउंसर की जगह निकली। डोंडे ने इसके लिए आवेदन किया और चुन लिये गये। अब वह प्लेटफ़ार्म पर अपने आशियाने की तरफ़ लौटते और आशियाने से काम पर आते लोगों को राह बताते थे। प्लेटफ़ार्म पर कांच के एक बंद कमरे से वह हर एक को देख सकते थे। डोंडे प्लेटफ़ार्म पर रोजाना आते-जाते चेहरों से एक अदृश्य तार जोड़ रहे थे।
बुधवार 26 नवंबर की आतंक की रात उनके इसी रिश्ते का इम्तिहान लेने पहुंच रही थी। डोंडे की जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान। मौत की दहलीज पर खड़े होकर जिंदगियों को जीतने का इम्तिहान। डोंडे तीन बजे की ड्यूटी के लिए हमेशा की तरह एक बजे घर से निकले। दादर पर उतर कर सेंट्रल लाइन की ट्रेन पकड़ी। अब वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पहुंच गये थे।
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस यानी सीएसटी। सिंहदुर्ग (कोंकण), नालासोपारा और सीएसटी (मुंबई)। डोंडे की जिंदगी इसी त्रिकोण पर सिमटी थी। तीनों ही एक दूसरे को बराबर खींचते रहते हैं। मुंबई में रहते हुए घर, घर में हों तो कोंकण और कोंकण में रहते हुए मुंबई वापस बुलाती है। मुंबई में आधी से ज़्यादा आबादी शायद डोंडे की तरह ही अपनी ज़िंदगी को शक्ल देती है। अलग-अलग खांचों में बांटते हुए। इस मुंबई की एक फ़ितरत और है। आप इस मुंबई के हो सकते हैं। लेकिन, यह मुंबई किसी की नहीं होती।
डोंडे अब अपने केबिन पर थे। अब शाम के पांच बज रहे थे। लोकल के प्लेटफ़ार्म पर भीड़ उमड़नी शुरू हो गयी थी। यह दफ्तर छूटने का वक्त था। रोजाना की तरह सीएसटी के प्लेटफ़ार्म पर देखते ही देखते एक जनसैलाब जुटने लगा। डोंडे इसे अपने खास अंदाज़ में जनसागर बोलते हैं। इस जनसागर को कांच के केबिन से देखते रोजाना की तरह साढ़े आठ बज गये। डोंडे के लिए यह जरूर कुछ फ़ुर्सत के क्षण थे। वह जानते थे कि अब नौ बज कर चउवन मिनट पर जानेवाली फ़ास्ट लोकल के लिए ही रोजाना की तरह भीड़ जुटेगी।
लोकल ने 9:54 बजे सात नंबर का प्लेटफ़ार्म को छोड़ा। डोंडे अब चार नंबर से जानेवाली गाड़ी की जानकारी देने लगे। लेकिन, जैसे ही गाड़ी प्लेटफ़ार्म से निकली, एक जोरदार धमाके की आवाज से सब सन्न रह गये। इतना तेज धमाका था कि केबिन में बैठे तीनों के मुंह से बरबस निकल पड़ा-ब्लास्ट।
डोंडे ने भी इस शक को पुख्ता करने के लिए शीशे से नीचे झांक कर देखा। आंखें फ़टी की फ़टी रह गयीं। चारों ओर एक बदहवासी थी। सब दौड़ रहे थे। लेकिन, सब अकेले थे। बेहद अकेले। डोंडे भी इस वक्त बिलकुल अकेले थे। ऐसे वक्त में एक इंसान की सहज प्रतिक्रिया की तरह घर पर उन्होंने अपनी पत्नी को फ़ोन मिलाया। श्रुति ने फ़ोन उठाया। तेजी से बोले – ‘यहां ब्लास्ट हुआ है शायद। पर तुम चिंता मत करना। मैं फ़िर फ़ोन करता हूं।’ यह कह कर डोंडे ने फ़ोन काट दिया।
लेकिन, अभी तक घर में अपने बच्चों के साथ विष्णु डोंडे का इंतजार कर रही श्रुति के लिए चिंता का दौर शुरू हो गया। श्रुति सीएसटी पर हुए इस ब्लास्ट की जानकारी के लिए टेलीविजन पर खबर देखना चाहती थी। लेकिन, घर में टेलीविजन था, उसमें केबल नहीं था। वह भागी पड़ोस में। लेकिन, टेलीविजन पर सीएसटी की खबर अभी तक दस्तक नहीं दे रही थी। टेलीविजन के न्यूज-रूम तक अभी तक सीएसटी के धमाके की आवाज नहीं पहुंची थी।
इधर, डोंडे भी समझ नहीं पाये थे कि यह ब्लास्ट था या कुछ और। उनके साथियों के चेहरों पर भी सवाल था। यह धीरे-धीरे एक भय में तब्दील होने लगा। लगातार। डोंडे ने माइक फ़िर थाम लिया। बोलना शुरू किया, ‘जीपीआरएफ, आरपीएफ़ आप फ़ौरन मेन लाइन की तरफ़ पहुंच जाइए।’ डोंडे लगातार दोहराने लगे। उनकी इस आवाज के बीच ही फ़ायरिंग की आवाज़ भी घुलने लगी। डोंडे और उनके साथियों ने एक-दूसरे की ओर देखा। बोले-फ़ायरिंग की भी आवाज आ रही है। इस बार बाहर झांक कर देखा, तो अंदर तक दहल गये। लोग जख्मी हालत में पड़े थे। फ़र्श पर खून बह रहा था। एक पैसेंजर दो-तीन जख्मी लोगों को दौड़ते-दौड़ते खींच रहा था। एक दूसरा पैसेंजर गोली से घायल होमगार्ड को कुर्सी पर बैठा कर दौड़े जा रहा था। उसने उसे एक केबिन की तरफ़ अंदर धकेला। खुद बदहवास-सा एक नंबर की गेट की ओर दौड़ गया। जो दूसरे की जान बचा रहा था, वह अब खुद की जान बचाने के लिए दौड़ने लगा था। डोंडे को हालात की गंभीरता समझ आ रही थी। कोई भयानक हादसा है – इससे पार पाना होगा। इसी बीच चार और पांच नंबर पर लोकल आ रही थी। डोंडे ने फ़ौरन फ़ैसला किया कि इन पैसेंजरों को अपनी ओर आने से रोकना होगा। डोंडे ने माइक फ़िर संभाला, ‘कोई भी पैसेंजर हॉल की तरफ़ न आएं। आप सीधे एक नंबर के गेट से या पीछे से बाहर निकल जाएं।’ डोंडे लगातार बोले जा रहे थे, ‘कोई पैसेंजर बाहर न आये। या फ़िर लोकल में ही बैठे रहे। कोई बाहर न आये। जाना हो तो पीछे से या एक नंबर के गेट से जाएं। आगे मत आइए।’
डोंडे ने देखा, जो लोग ट्रेन से उतर कर आगे आ गये थे, वे पीछे घूम गये। अपने पीछेवाले को इशारा करते जा रहे थे। कहते हुए – आगे कुछ लफ़ड़ा है। अनाउंसमेंट हो रहा है। आगे मत जाओ। डोंडे ने देखा कि कुछ लोग ट्रेन के दरवाजे से झांक रहे थे। उतरें या न उतरें, इस दुविधा में थे। डोंडे को अपने शीशे से अपने अदृश्य तारों से जुड़ी अपनी दुनिया साफ़ दिख रही थी। डोंडे ने देखा कि सभी ट्रेन से उतर कर धीरे-धीरे पीछे से ही बाहर निकल गये।
अब पूरा प्लेटफ़ार्म खाली था। लेकिन अचानक एक पैसेंजर डोंडे की निगाहों के सामने आ गया। डोंडे चिल्लाए – लाल शर्टवाले भाई साहब, कृपया पीछे चले जाइए। जब तक वह वापस नहीं लौट गया, डोंडे लगातार घोषणा करते रहे। उधर, घर पर श्रुति की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। उसकी निगाहें टेलीविजन पर गड़ी थीं। लेकिन, सीएसटी की खबर ने अब तक दस्तक नहीं दी थी। मुंबई में फ़ायरिंग, शूट आउट और ताज पर हमले की खबरें स्क्रीन पर पट्टियों की शक्ल में उभार ले रही थीं।
सीएसटी अभी भी टेलीविजन के स्क्रीन से दूर था। सीएसटी पर डोंडे अभी भी लगातार घोषणा कर रहे थे। सभी छह लोकल प्लेटफ़ार्म पर आ चुकी थीं। अब इसके बाद फ़िलहाल किसी और गाड़ी के आने की गुंजाइश नहीं थी। डोंडे लगातार प्लेटफ़ार्म पर निगाह डाल अनाउंसमेंट किये जा रहे थे। इसी बीच छह नंबर प्लेटफ़ार्म के ठीक सामने हाथ में एके-47 लिए शख्स ने उभार लिया। यह डोंडे को दिखनेवाला पहला आतंकी था। ‘एक उसके पीछे भी है।’ डोंडे के साथी उसे बताने लगे। डोंडे पूरी तरह से आतंकियों को देख नहीं पा रहे थे। लेकिन, उन्होंने अपनी घोषणाओं का सिलसिला बनाये रखा। उनके दोनों साथी शीशे से झांक-झांक कर उन दोनों आतंकियों को देख रहे थे। अचानक एक साथी बोला – देखो वह आ रहा है। वह आ रहा है। वह गेट के पास आ गया। आतंकी छह नंबर के प्लेटफ़ार्म के गेट के ठीक सामने थे। डोंडे भी अब उन्हें सीधे-सीधे देख रहे थे।
प्लेटफ़ार्म पर अब कोई पैसेंजर नहीं था। सिर्फ़ यह दो आतंकी सामने थे। एकदम छरहरे, हट्टे-कट्टे। डोंडे ने अब अनाउंसमेंट करना बंद कर दिया। वह अपने बारे में सोचने लगे। ‘क्या होगा मालूम नहीं।’ फ़िर अपने ही सवाल के जवाब में बुदबुदाने लगे। ‘जो होगा, देखा जाएगा।’ सोच-विचार के बीच अपने परिवार का ख्याल आया। पत्नी को फ़ोन लगाया – ‘मैं सेफ़ हूं। चिंता मत करना।’ परेशान श्रुति के लिए डोंडे की यह आवाज बेहद ढांढस बंधानेवाली थी।
आतंकी अब छह नंबर के प्लेटफ़ार्म के गेट से आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ रहे थे। एक आतंकी ठीक चार नंबर के गेट के आगे आकर रुक गया। अचानक उनके एक साथी ने स्विच दबाया। केबिन की बत्ती बुझते ही दोनों आतंकियों ने गोलियों की बौछार कर दी। डोंडे का साथी एक झटके में पीछे हटा, एक गोली शीशे में जा लगी। पंद्रह से बीस गोलियां केबिन के नीचे बोर्ड में धंस गयीं। डोंडे और उसके साथियों ने शीशे से झांकना बंद कर दिया। वे नीचे बैठ गये। अब बाहर देखने का साहस उनमें नहीं था।
इधर, घर पर परेशान श्रुति को कुछ समझ नहीं आ रहा था। टेलीविजन पर सीएसटी की खबर अभी तक नहीं थी। आशंकाओं से जूझती श्रुति ने डोंडे को फ़ोन मिलाया। डोंडे ने पहली ही बीप पर फ़ोन उठाया। दबी आवाज में कहा – फ़ोन मत करो। अरे यार वे नीचे ही खड़े हैं। श्रुति के पांव तले जमीन खिसक गयी। अब वो दोबारा फ़ोन भी नहीं कर सकती थी। उसे डोंडे और अपने बीच का यह आखिरी तार भी टूटता दिखाई देने लगा। अब टेलीविजन ही उसका आखिरी सहारा था। लेकिन, टीवी अभी भी सीएसटी की इस आतंकी रात के सन्नाटे में नहीं पहुंच पाया था।
करीब 11:30 बजे श्रुति के फ़ोन की घंटी बजी। डोंडे बिलकुल सही-सलामत थे। वह श्रुति से कुछ देर पहले तक के खौफ़नाक लमहों को साझा कर रहे थे। खुद को उन लमहों के साये से बाहर लाने की कोशिश कर रहे थे। डोंडे ने इस हादसे को एक नरसंहार में तब्दील होने से रोक दिया था। लेकिन, यह हादसा फ़िर भी 59 जिंदगियों को लील गया था। कितने ही ख्वाबों को तार-तार करता चला गया था। लेकिन, डोंडे को अभी जिंदगी के और कड़वे सच से रू-ब-रू होना था।
रात दो बजे वह अपने केबिन से नीचे उतरे, तो प्लेटफ़ार्म पर कहीं खून बिखरा था, तो कहीं सामान। डोंडे का शरीर थर-थर कांपने लगा। भोर से पहले ही रोजाना की तरह चार बजके पांच मिनट की पहली लोकल प्लेटफ़ार्म से निकल रही थी। अब उसमें सिर्फ़ पैसेंजर ही नहीं थे। उनके साथ-साथ सीएसटी पर पसरा आतंक भी था। वह भी अब मुंबई की इस जीवनरेखा कही जानेवाली लोकल से एकाकार हो चुका था। (प्रभात खबर से साभार)
(नरेंद्र पाल सिंह। जानने वाले एनपी के नाम से जानते हैं। वरिष्ठ पत्रकार हैं। अमर उजाला, आजतक, एनडीटीवी और सहारा समय जैसे संस्थानों में बड़ी भूमिकाओं में काम किया। खेल ज़िंदगी है उनका मशहूर ब्लॉग है। उनसे singhnarendrapal9@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









अगर लिखने वाले का नाम न भी होता तो भी जान जाता कि यह एनपी ने लिखा है। डिटेल को रिपोर्टिंग का हिस्सा बनाने की आदत कुछ हमने इसी शख्स से भी सीखी है। मुंबई हमले पर कई लेख पढ़ चुका हूं लेकिन रोंगटे खड़े कर देने वाला और लिख कर लाइव टीवी जैसा माहौल रच देने वाला यह पहला लेख है।
वाकई रोंगटे खड़े करने वाला लेख!
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