“प्रभात खबर ने सभी प्रत्याशियों से पैसे लिये”
ये प्रभात खबर को जवाब नहीं है, क्योंकि उनकी दलील इस लायक नहीं
♦ तथागत
चुनाव में फंसा था, इसलिए कोई ख़बर नहीं दे पाया। लौटा, तो सरयू राय प्रसंग पर विनोद शरण जी का जवाब पढ़ा। बचकाना जवाब है। उनकी सारी दलील उनके अखबार को ही कठघरे में खड़ा करती है। तय कीजिए कि शिनाख्तों पर आधारित खोजपरक पत्रकारिता करनी है या बयानों पर आधारित पत्रकारिता। विनोद शरण ने अपनी जितनी भी रिपोर्टों के उदाहरण दिये हैं, वे हास्यास्पद हैं। बताइए तो, कभी प्रत्याशी बन्ना को रिपोर्टर मां-बाप का आशीर्वाद लेते देखते हैं और लहालोट होकर उसकी रिपोर्ट लिखते हैं, तो कहीं लिखते हैं – मोहन को मिल रहा जीत का आशीर्वाद। ये रिपोर्टिंग का कौन सा ककहरा है भाई। और मज़ेदार ये कि विनोद शरण लिखते हैं कि 20 साल से प्रभात खबर में हूं। कमाल है – 20 सालों में न तो खुद रिपोर्ट लिखना आया, न ही किसी ने सिखाया। रिपोर्टिंग की उनकी भाषा साफ बताती है कि मामला निष्पक्ष रिपोर्टिंग का नहीं बल्कि भक्तिभाव का है और ये भक्तिभाव बिना लेन-देन कहां आता है इस कलियुग में! हमने पहले ग़लत कह दिया कि प्रभात खबर सरयू राय का मुखपत्र है – माफी। सारी रपटों पर नज़र डालने के बाद लगता है कि प्रभात खबर ने सभी प्रत्याशियों से पैसे लिये हैं। खास कर झारखंड की तीन प्रमुख पार्टियों – बीजेपी, कांग्रेस, झामुमो से। आचार संहिता की आड़ में ऐसी रिपोर्टिंग का खेल पाठकों को समझना चाहिए। बस।
और, अनुज कुमार सिन्हा कब के झारखंडी हो गये भाई? वे तो दिकू हैं। बाहरी आदमी हैं। झारखंड की मलाई खा रहे हैं। सांगठनिक रूप से जुड़ाव होने पर ही किसी को संघी नहीं कहा जाता। मैं उनका कलीग रहा हूं। उस वक्त भी, जब छह दिसंबर 1992 का हादसा हुआ था। पूछिए उनसे कि मस्जिद गिरने के बाद उनकी बांछें किस तरह खिल रही थी। तब वे खेल पत्रकार हुआ करते थे। किस किस्म की मुसलमान विरोधी कहानियां (चुटकुले) सुनाया करते थे। उन्हीं के मुंह से भाजपा का ये फुल फॉर्म सुना था कि भाग जोलहा पाकिस्तान। हां, वे शिबू सोरेन से ज़रूर सटे रहे हैं – लेकिन सिर्फ इसलिए कि शिबू सोरेन को एक दिन मुख्यमंत्री बनना था। जब बने, तो शिबू ने ज़रा सा भी भाव नहीं दिया। पहली बार जिस दिन शिबू सोरेन शपथ ले रहे थे, उस दिन पूरे प्रभात खबर में वे घूम घूम कर उन्हें मिनट मिनट पर फोन कर रहे थे। ताकि ये जता सकें कि शिबू से उनकी निकटता कैसी है। बहरहाल, बातें बहुत हैं, जवाब क्या देना…
विनोद शरण ने भोपाल के किसी पत्रकार का ज़िक्र किया है कि उनके बारे में पता करें कि उन्होंने वहां क्या क्या क्राइम किया। हम झारखंड में रहते हैं भइया – कहां हमें भोपाल भेज रहे हो। रही बात बड़े अख़बारों की ख़बर न लेने की, तो हम लेंगे – थोड़ा धीरज तो रखिए। हरिनारायण सिंह ने कितना पैसा बनाया – उन्होंने वाईसी अग्रवाल को सोने की खान कैसे दिलवाया – हटिया से चुनाव लड़ते-लड़ते वो कैसे रहे गये – जागरण ने पटना में पप्पू यादव-सूरजभान के पांव छूने वाले ज्ञानेश्वर को पहला संपादक बना कर उससे क्या क्या कुकर्म करवाया – पूरी फेहरिस्त है हमारे पास। थोड़ा धीरज धरिए। मामला बड़े अखबार, छोटे अख़बार का नहीं भाई। मामला पत्रकारीय कर्म और गैरपत्रकारीय कुकर्म का है। इसमें अभी प्रभात खबर का पलड़ा इसलिए भारी है क्योंकि वह आंदोलनी छवि की आड़ लेकर सब कुछ करने की कोशिश में है, जो दूसरे अखबार खुलेआम कर रहे हैं। मधु कोड़ा वाले मामले में आउटलुक की ताज़ा ताज़ा कवर स्टोरी नहीं देखी क्या? मोहल्ला लाइव में भी मॉडरेटर ने छापा ही था…
इसलिए विनोद शरण जी महाराज, मुंह खोलने से पहले अपने अखबार के गिरेबां में झांक लिया कीजिए। अस्तु। समाप्त करता हूं।












तथागत जी, ऐसा अगर आप करते है तो सराहनीय प्रयास होगा। मैने देखा है कि बेईमान पत्रकार को बस एक ही तकलीफ होती है कि वो जो गन्दा मचाये हुए है उसकी तरफ लोग ध्यान ही क्यों देते हैं! कोड़ा मामले मे मीडिया और खासकर एक समूह का किरदार अकथनीय है। आपको ऐसी एक सीरिज तैयार करनी चाहिये, चीजे या खबरे व्यक्तिगत भी हो तो भी आपको प्रयास करना चाहिये बस देखियेगा कोई घुन न पिस जाये।
Leave your response!
Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)