“कॉन्सपिरेसी” के आईने में 26/11
♦ अभिषेक श्रीवास्तव

मुंबई में हुए आतंकी हमला को एक साल हो गये। अब ताज होटल की पुरानी अभिजात्य चमक वापस आ चुकी है। सारे इंसानी सवाल जो पिछले साल 26 नवंबर को पैदा हुए थे, हल हो चुके हैं। बची है, तो बस जांच, जैसा कि हर हमले के बाद होता है। मुंबई से लेकर अमेरिका-पाकिस्तान वाया दिल्ली जांच की सारी कवायद की जा चुकी है। पहले कसाब, अब हेडली-राणा और यहां तक कि फिल्मी सितारों तक जांच का दायरा फैल चुका है। अब तक कोई निष्कर्ष नहीं निकला है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि ये सब आतंक की पड़ताल में पुलिस की थ्योरी हैं, या ज़्यादा से ज़्यादा उससे आगे के कुछ पड़ाव। इसे इस तरह से भी रखा जा सकता है कि जब आपको पता हो कि साबित क्या करना है, तो आपका रास्ता आसान हो जाता है। खैर, ग़ौर करने की बात है कि इस थ्योरी में भारतीय जांच एजेंसियों की कोई भूमिका नहीं है। यह सब अमेरिकी एजेंसी एफबीआई से निकली बातें हैं।
ऐन इसी वक्त अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख भारत में और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका में हैं। सीआईए प्रमुख की भारत में रॉ और आईबी के अधिकारियों से महत्वपूर्ण बैठकें हुई हैं। वहीं प्रधानमंत्री ने परमाणु करार (पुनर्प्रसंस्करण का मुद्दा) को निपटा लिया है। कुछ दिनों पहले एफबीआई प्रमुख और उप-प्रमुख, 17 नवंबर को इज़रायली खुफिया एजेंसी के प्रमुख और गृह विभाग के अधिकारी भी भारत आये थे। पिछले साल भर में ऐसे चार दौरे हो चुके हैं। इनका उद्देश्य आतंकवाद से निपटने और परमाणु ठिकानों की सुरक्षा के लिए भारतीय खुफिया एजेंसियों को अमेरिकी व इज़रायली उपकरणों से लैस करना बताया जा रहा है। यानी भारत, अमेरिका और इज़रायल के खुफिया तंत्र की एक समग्र तस्वीर पर से अब परदा हट रहा है। दिलचस्प यह है कि ऐसा पहली बार हो रहा है, जब भारत-अमेरिका-इज़रायल के खुफिया तंत्रों के गंठजोड़ का प्रदर्शन सरकार की ओर से खुलेआम किया जा रहा है। अब तक तो दबे-छुपे ये सब चलता था।
यह तस्वीर देखने में भले नयी लगती हो, लेकिन है नहीं। दरअसल, 26/11 के बाद इसी तस्वीर के आधार पर जांच की एक थ्योरी सामने आयी थी। इसे मुख्यधारा में जगह नहीं मिली, बल्कि कह सकते हैं कि इस पर चर्चा तक नहीं हुई। तीनों देशों के खुफिया तंत्रों के बीच परस्पर सहयोग, हिंदूवादी संगठनों से इनके तालमेल और हमलों में इनकी भूमिका की बात को कॉन्सपिरेसी थ्योरी कह कर उड़ा दिया गया। अगर इस देश में गुप्तचर एजेंसी रॉ के गठन के वक्त से खुफिया एजेंसियों की आपसी संलग्नता और हिंदू संगठनों के साथ उसके संबंधों के इतिहास की पड़ताल की जाए, तो ऐसे तमाम साक्ष्य मिलते हैं जहां इजरायल की मोसाद, भारत की आईबी-रॉ, हिंदूवादी संगठनों और सीआईए का तालमेल दिखता है। और यही वह थ्योरी है, जिसे मुख्यधारा में साजिशाना माना जाता है।
यदि मालेगांव विस्फोट कांड की मुंबई एटीएस द्वारा तैयार चार्जशीट से लीक हुए और मुंबई के अख़बारों में छपे तथ्यों को पढ़ें, तो पता चलता है कि इस थ्योरी की खुद एटीएस ने तस्दीक़ की है। मालेगांव धमाकों की चार्जशीट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन मुंबई मिरर, आउटलुक और हिंदुस्तान टाइम्स के माध्यम से चार्जशीट के बारे में जो भी सूचनाएं बाहर आयी हैं, उन्हें जानना चाहिए। चार्जशीट में दयानंद पांडेय और कर्नल पुरोहित के बीच हुई बातचीत के संदर्भ हैं, जिसमें कर्नल पुरोहित ने साफ-साफ कहा है कि इज़रायल में हिंदुओं की प्रवासी सरकार बनाने का एजेंडा है, जिस पर इज़रायल वाले सहमत हैं। आगे कहा गया है कि सेना के कुछ अफसरों को प्रशिक्षण के लिए इज़रायल भेजा भी गया था। यह सूचना सिर्फ माउस के एक क्लिक पर उपलब्ध है, दुर्लभ नहीं। यदि इस पर विश्वास न हो, तो विश्व हिंदू परिषद की वेबसाइट पर पड़े दस्तावेजों को देखें जिसमें 2007 और 2008 में इज़रायल के धर्म गुरुओं और हिंदू धर्म गुरुओं के बीच हुई बैठकों की रिपोर्ट है। यदि यह भी संदेहास्पद लगे, तो इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता कि लालकृष्ण आडवाणी ने इज़रायल की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान प्रोटोकॉल तोड़ते हुए मोसाद के दफ्तर का दौरा किया था, जब वे गृहमंत्री थे। और अब तो मोसाद व सीआईए-एफबीआई के अधिकारी खुले तौर पर भारत आकर यहां बैठकें कर रहे हैं। सवाल है कि जिस थ्योरी की पुष्टि खुद एटीएस की चार्जशीट ने की है, आखिर 26/11 के बाद उस पर काम क्यों नहीं हुआ?
एक और अहम सवाल है, जिस पर अखबारों में 26/11 के शुरुआती दिनों में खूब चर्चा हुई, लेकिन आज एक साल बाद भुला दिया गया है। हमले के तुरंत बाद एक 47 साल की महिला अनिता राजेंद्र उड्डैया को गवाह बना कर, पैसे देकर अमेरिका ले जाया गया था। एफबीआई के सामने उसका बयान भी दर्ज करवाया गया था। लेकिन अंत में गवाहों की सूची में से उसका नाम निकाल दिया गया। इस महिला का दावा था कि इसने छह आतंकियों को समुद्र के रास्ते आते वक्त देखा था। जब उसने एफबीआई की इच्छा के मुताबिक आतंकियों की पहचान करने से इनकार कर दिया, तो उसका नाम गवाहों में से हटा दिया गया। यह दिलचस्प कहानी उधर बीच टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस व कई अन्य अखबारों के मुंबई और पुणे संस्करण में खूब छपी थी। मुंबई पुलिस ने उसके अमेरिका ले जाये जाने की बात को सिरे से नकारा है। सवाल है कि जांच के पहले ही दिन से इस मामले में एफबीआई का प्रवेश कैसे हो गया? अनिता की कहानी का सच क्या है?
करीब साल भर बाद पिछले दिनों मुंबई पुलिस के एक पूर्व आयुक्त हसन गफूर ने विवादास्पद बयान दे डाला। उन्होंने मारे गये एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के बुलेटप्रूफ जैकेट व पुलिस की गड़बड़ियों की ओर इशारा किया, तो समूचा पुलिस महकमा नाराज़ हो उठा और उन पर मुकदमे की धमकी दे दी गयी। गफूर भी क्या करते, आखिरकार उन्होंने दबाव में अपना बयान वापस ले लिया। यह प्रकरण बिल्कुल एआर अंतुले जैसा था। बटला हाउस कांड पर अंतुले के बयान के पीछे चाहे जो भी कारण रहा हो, इस मुद्दे से जिस तरह मीडिया और सरकार ने निपटा, बात उस पर होनी चाहिए थी। एक बार अंतुले से पूछा जाना चाहिए था कि आखिर उनकी सूचना का स्रोत क्या है? बजाय इसके, उनके ख़िलाफ़ सीधी कार्रवाई की गयी और राजनीति के हाशिये पर छोड़ दिया गया। हम समझ सकते हैं कि सत्ता की थ्योरी से इतर कोई भी बयान कैसे कॉन्सपिरेसी थ्योरी बन जाता है।
26/11 की बरसी पर ऐसे तमाम सवाल खड़े किये जा सकते हैं। इन सवालों की समूची पृष्ठभूमि को अगर समझना हो, तो मुंबई पुलिस के ही एक पूर्व आईजी एसएम मुशरिफ की लिखी किताब हू किल्ड करकरे : दी रियल फेस ऑफ टेररिज्म इन इंडिया को पढ़ा जा सकता है। मुशरिफ वही पुलिस अधिकारी हैं, जिन्होंने तेलगी कांड में कुछ बड़े नामों का खुलासा किया था। मुंबई की लोकल ट्रेन में 2006 में हुए बम विस्फोट से लेकर 26/11 तक तकरीबन हर बड़े आतंकी हमले की इसमें खबरों और तथ्यों के माध्यम से पड़ताल की गयी है। पुस्तक आईबी के हिंदूकरण, अमेरिकी और इजरायली खुफिया एजेंसियों के साथ उसके रिश्तों, 26 नवंबर के हमलों और मालेगांव विस्फोट कांड का विस्तृत विश्लेषण करते हुए दरअसल कॉन्सपिरेसी थ्योरी की ही स्थापना करती है।
सत्ता और उसका प्रचार तंत्र इस देश की आम जनता को तो अपनी थ्योरियों से सहमत कर सकता है, लेकिन असल संकट उस बुद्धिजीवी मध्य वर्ग का है, जिसके पास विकल्प के नाम पर कुछ नहीं। एक टीवी पत्रकार साथी कुछ दिनों पहले बड़े दुखी मन से ज़िक्र कर रहे थे कि अब तक वह हेडली नाम के प्राणी पर तीन स्टोरी बना चुके हैं, लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि यह शख्स है कौन? उनका संकट दो तरह का है। पहला यह कि वो सत्ता द्वारा उछाले गये नामों को समझ नहीं पाते। जब उन्हें वैकल्पिक थ्योरी बतायी जाती है, तो वह क्रेडिबिलिटी का सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि हसन गफूर हों या मुशरिफ, दोनों ही मुसलमान हैं इसलिए बात बहुत जंचती नहीं।
अब दिक्कत यह है कि हसन गफूर हों या फिर मुशरिफ, दोनों ही ऐसी कौम से ताल्लुक रखते हैं जिसे मुख्यधारा के मीडिया और सत्ताओं के बीच आतंकवाद का पर्याय मान लिया गया है। हालांकि 26/11 पर सबसे पहले इस थ्योरी का प्रचार करने वाले इतिहासकार अमरेश मिश्रा हैं, जो कतई मुसलमान नहीं हैं। लेकिन क्या किसी के मुसलमान या हिंदू होने से कोई थ्योरी साजिशाना हो जाती या नहीं होती है। या यह सिर्फ सत्ता और उसके पिछलग्गू प्रचार तंत्र का एकाधिकार है।
तो सवाल पैदा होता है कि आज कसाब, हेडली, राणा के नामों के सहारे आगे बढ़ रही 26/11 की अमेरिकी जांच में कॉन्सपिरेसी थ्योरी कहां टिकती है। एक ऐसी थ्योरी, जो न तो मनगढ़ंत है, न अवास्तविक, बल्कि जिसके ठोस तथ्य मौजूद हैं। इसके बरक्स मुख्यधारा की थ्योरी को रख कर देखें, जहां कुछ भी स्पष्ट नहीं, फिर भी वह सर्वस्वीकार्य हो जाती है। दो लाइनों के बीच आखिर इतना बड़ा फर्क कैसे आता है? जाहिर है, यह फर्क सत्ता से पैदा होता है।
मुंबई हमले की जांच के चाहे जो भी परिणाम आएं, लेकिन फिलहाल कई सवाल ऐसे भी हैं, जिन्हें आंखें बंद कर तटस्थ रूप से पूछा जा सकता है। जिनके लिए किसी थ्योरी का पक्षकार होने की जरूरत नहीं। मसलन, 26/11 पर राम प्रधान कमेटी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गयी है? मालेगांव कांड की एटीएस चार्जशीट में भारतीय सेना के अधिकारियों, इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और इजरायल में निर्वासित हिंदू राष्ट्र की स्थापना के हिंदूवादी संगठनों के लक्ष्य बीच के संबंध पर आखिर बात क्यों नहीं हो रही? हेडली के नाम का सामने आना, एफबीआई और मोसाद के अधिकारियों की भारत यात्रा, हसन गफूर का बयान, मुशरिफ की किताब, परमाणु करार पर अंतिम मुहर – ये सारी घटनाएं एक साथ एक वक्त में कैसे और क्यों हो रही हैं?
अमेरिका में विश्व व्यापार केंद्र की दो इमारतों पर हवाई जहाज के हमले ने इस दुनिया की भू-राजनीतिक तस्वीर को बदल दिया था। 9/11 के नाम पर न सिर्फ आंतरिक और बाहरी राजनीति, आर्थिकी और सामाजिक ताने-बाने को इस वाक्य के इर्द-गिर्द दोबारा पारिभाषित किया गया कि जो हमारे साथ नहीं है, वह आतंकवादी है। दूसरी ओर, साम्राज्यवाद द्वारा पोषित कुछ खुराफाती बौद्धिकों ने मानसिक और मनोवैज्ञानिक मोर्चे को संभालते हुए तमाम किस्म की झूठी दलीलों से जॉर्ज बुश द्वारा दिये गये उपर्युक्त नारे को पुष्ट किया। इस तरह से एक संप्रदाय विशेष के ख़िलाफ़ आतंकवाद की ब्रांडिंग कर दी गयी और इस लड़ाई में ब्रांड अमेरिका समूचे विश्व का अगुवा बनकर उभरा। उसकी पूंछ पकड़ कर पिछले आठ साल से आतंकवाद का चीत्कार कर रहे देशों में ब्रिटेन के साथ तकरीबन सभी पश्चिमी देश और भारत की अगुवाई में तथाकथित तीसरी दुनिया के देश शामिल हैं। ऐसा लगता है कि शायद आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध के इस अभियान में भारत को भी ऐसी ही किसी घटना का इंतजार था, जिससे कि वह खुद को ब्रांड अमेरिका के करीब पा सके और संप्रदाय विशेष के ख़िलाफ़ अपनी मान्यताओं को पुष्ट कर अपनी सभ्यतागत सर्वोच्चता को सिद्ध कर सके।
इस लिहाज से 26 नवंबर 2008 की घटना को बिल्ली के भाग्य से छींका फूटना ही कहा जाएगा, क्योंकि पलक झपकते ही भारत के इतिहास में 26/11 को अमेरिकी इतिहास के 9/11 के समान बना दिया गया। जो प्रतिक्रियाएं आयीं, उनसे ऐसा लगा है कि जैसे तमाम दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी फासिस्ट बुद्धिजीवी व मीडिया इस घटना का इंतज़ार ही कर रहे हों। समूचा देश सिक्योरिटी के हिस्टीरिया में जकड़ दिया गया और आतंक के ख़िलाफ़ वैश्विक युद्ध में अचानक भारत व अमेरिका के गठजोड़ की आठ साल पुरानी कहानी मुकम्मल हो गयी।
यह अनायास नहीं है कि 26/11 के ठीक बाद एफबीआई का इस मामले की जांच में प्रवेश हुआ और आज भी अमेरिकी जांच एजेंसियों की लीड पर ही कार्रवाई आगे बढ़ रही है। अगर 9/11 अमेरिका द्वारा एकतरफा घोषणा का एक निर्णायक बिंदु था – कि जो हमारे साथ नहीं, वह आतंकी है, तो भारत के लिए 26/11 इस घोषणा को मुकम्मल करता है कि हां, हम तुम्हारे ही साथ हैं। शायद सत्ताओं द्वारा तवारीख ऐसे ही गढ़ी जाती है।
और इन बातों को समझने के लिए किसी कॉन्सपिरेसी थ्योरी को अपनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हां, इतना ज़रूर है कि इस थ्योरी को छोड़ कर ये सवाल मुकम्मल शक्ल नहीं ले सकते हैं। सत्ताओं द्वारा प्रचारित थ्योरी व वैकल्पिक थ्योरी दोनों को समझना और सही सवाल पूछना ही आतंक के शिकार निर्दोष लोगों को इस वक्त सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।
(इस लेख के संपादित अंश दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संस्करण में 25 नवंबर, 2009 को छप चुके हैं। यह मूल लेख है)
(अभिषेक श्रीवास्तव। व्यापक जन सरोकारों से जुड़े युवा पत्रकार। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और आईआईएमसी से शिक्षा-दीक्षा। कई न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। मूलत: फ्रीलांसर वृत्ति। जनपथ के ब्लॉग राइटर। उनसे guru.abhishek@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)











ये सच है कि भारत ‘संप्रभु राष्ट्र राज्य’ के रूप में अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है।
सच है कि इसका ‘लोकतांत्रिक चेहरा’ धब्बेदार होता जा रहा है। सच ये भी है कि भारत अमेरिका का निकृष्ट पिछलग्गू होता जा रहा है। लेकिन क्या ये भी सच नहीं है कि भारत का आतंकवाद और अमेरिका का आतंकवाद दोनों बिल्कुल अलग-अलग है? दोनों के ऐतिहासिक कारण, कर्यप्रणाली, राजनीतिक लक्ष्य और समस्या की वजहें अलग है? दोनों को एक ही मापदंड पर नहीं तौला जा सकता। बहुत सारी वजहों से ये अंतर मिटता जा रहा है-ये सच भी है। लेकिन बुनियादी फर्क मौजूद हैं। अगर ऐसा नही होता तो पाकिस्तान का वजूद ही खतरे में पड़ गया होता! हिंदूवादी संगठनों के साथ मोसाद और एफबीआई की साठगांठ है लेकिन मुंबई हमले को हिंदूवादी साजिश के तौर पर देखना ठीक नहीं। अमरेश मिश्रा के बयान से वाकिफ हूं। निहायत ही गैरजिम्मेदाराना और वैचारिक भावोच्छास था। अगर आप को याद होगा तो कुछ लोगों ने 9/11 के बाद भी यही तर्क दिया था कि ट्विन टावर पर हमला धवस्त होते साम्राज्यवादी अमेरिकी राज्य की साजिश थी। ताकि खुद की वैधता को बचाया जा सके।
इस तरह के सरलीकरण को बचकाना मार्क्सवाद की श्रेणी में डालना चाहिए।
(अगर लेनिन होते तो जरूर करते)
Leave your response!
Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)